Saturday, April 16, 2016

घोडा घोडा दौड़ा घोडा

कल हम लखनऊ की एक सड़क पर कार से चले जा रहे थे। हमारे आगे कुछ वाहन थे, बाकी जो बचे वो पीछे थे। अगल-बगल भी इक्का-दुक्का वाहन गम्यमान थे। पीछे वाले कुछ वाहन हमको ओवरटेक करते हुए आगे निकले जा रहे थे।ओवरटेक करने वालों की गति इतनी तेजी थी लोगों की मानों अगले चौराहे पर पहुंचते ही उनको किसी मन्त्रिमण्डल की शपथ दिला दी जायेगी। हम खरामा-खरामा 'मार्गदर्शक वाहन' की गति से चले जा रहे थे।

अचानक देखा कि हमारी बायीं तरफ एक घोड़ा अपने तांगे को लिए दुलकी चाल से चलने लगा। तांगा सवारी विहीन था। कोचवान रहित भी। घोड़ा सम चाल से चलता हुआ चला जा रहा था।

भीड़-भरी चलती सड़क पर चालक रहित तांगे को चलता देख कौतुहल हुआ। पहला मन किया कि वीडियो बनाया जाए। उस समय तो नहीं लेकिन अभी मन किया कि अगर वीडियो बनाकर किसी चैनल को दे दिए होते तो चैनल वाला और सब कार्यक्रम किनारे करके खबर चलाता - 'उत्तर प्रदेश की राजधानी में बिना चालक दौड़ता रहा घोड़ा देखिये हमारे चैनल पर पहली बार।'

क्या पता शाम को इसी खबर पर प्राइम टाइम बहस भी हो जाती और बिना चालक चलते घोड़े की खबर का कोई फंडू निष्कर्ष आगामी चुनाव से जोड़कर निकल आता। क्या पता कोई वक्ता निष्कर्ष निकालता -' सड़क पर बिना चालक तांगा उसी तरह चला जा रहा है जैसे कि देश/राज्य में राजकाज बिना कानून व्यवस्था के चल रहा है।'

बिना चालक जाते तांगे का वीडियो बनाने के विचार को हमने डांटकर भगा दिया। इसके बाद देखा कि तांगे के पीछे एक आदमी तहमद लपेटे भागता चला जा रहा था। उसकी चाल और घोड़े की चाल एक जैसी थी इसलिए उसके और घोड़े के बीच की दूरी भी एक जैसी बनी रही।

तहमद लपेटे घोड़े के पीछे भागते आदमी को देखते ही अंदाज लगा कि वह घोड़े की 'भलघुड़साहत' पर भरोसा करके तांगे को सड़क किनारे खड़ा करके कुछ और काम निपटाने लगा होगा। इसी बीच घोड़े का मन कुछ और हो गया होगा और वह दुलकी चाल से चल दिया होगा।

हो यह भी सकता है कि घोड़े को लगा होगा कि उसका कोचवान बैठ गया है और यह एहसास होते ही वह चल दिया हो आगे ( कम वजन का मालिक बैठा या न बैठा उसको पता ही न चला होगा) उसकी चाल में विद्रोह का कोई रंग नजर नहीं आ रहा था। न यह लग रहा था मालिक की पकड़ से छूटकर भागा जा रहा है। उसकी चाल में ड्यूटी बजाने वाला भाव ही था।

लेकिन घोड़े को पकड़ने के लिए भागते आदमी के चेहरे पर जो भाव थे उनको देखकर यही लग रहा था मानो कोई मुख्यमंत्री अपने कुछ विधायकों के बागी हो जाने की समस्या से जूझ रहा हो। अब गाड़ीवान बेचारा उसी तरह किसी तरह घोड़े को पकड़ने और काबू पाने की कोशिश में मशक्कत कर रहा था जैसे कुछ विधायकों के बागी हो जाने की स्थिति में अल्पमत में आई सरकार का मुखिया विधायकों को साधने की जुगत भिड़ाता है।
हमने पहले सोचा कि कोचवान को अपनी गाड़ी में बैठाकर उसको घोड़े के आगे ले जाएँ। लेकिन सड़क का ट्रैफिक, तहमत लपेटे भागते चालक और लगातार आगे जाते घोड़े के चलते ऐसा करना कठिन लगा। इसके बाद हम कार आगे ले गए यह सोचकर कि घोड़े के आगे कार खड़ी कर देंगे।


कार आगे ले जाते हुए हमने यह भी सोचा कि कहीं ऐसा न हो कि घोडा तांगा सहित हमको पीछे से आकर टक्कर मारे और हमारा प्रमुख समाचार हो जाए--' बिना चालक तांगा चलाते हुए घोड़े ने मारी चालक सहित कार को टक्कर' कोई बिंदास अख़बार खबर छपाता 'जबलपुर के अफसर को घोड़े ने लखनऊ में पीछे से ठोंका'। घोड़े और आदमी के बीच का मामला दो अलग-अलग दलों वाली सरकारों के बीच का किस्सा बन जाता।
कार ठुक जाने से बचाने की गरज से हमने अपनी योजना में सुरक्षा का गठबन्धन भी कर लिया और सोचा कि कार आगे कर लेंगे और देखेंगे घोड़ा अपनी गति धीमी करता है तो धीरे-धीरे करके उसको रोक लेंगे। तक तक पीछे से तहमद लपेटे भागता आता तांगा चालक आ जाएगा और पसीने से लथपथ हमको शुक्रिया अदा करते हुए कुछ कहेगा तो हम भी कुछ कह ही देंगे।

लेकिन मेरे सारे प्लान पर कोकाकोला (पानी नहीं भाई पानी बहुत दुर्लभ हो गया है आजकल) फेर दिया एक साइकिल वाले ने। वह लपककर साईकल से आया घोड़े की बायीं और से और उसकी लगाम पकड़कर उसको काबू में कर लिया। सड़क पर दुलकी चाल से चलता हुआ घोडा अचानक 'थम' हो गया।


घोड़े के रुक जाने पर उसका पीछे से भागता आये मालिक ने दनादन उसकी लंबी लगाम फटकारते हुए उसकी पिटाई सरीखी की। तहमदधारी की पिटाई में किसी अल्पमत सरकार के विश्वासमत हासिल करने में सफल हुई सरकार के मुखिया सा गुस्सा और प्यार एक साथ मिला हुआ था। घोड़ा चुपचाप मार खाता रहा। उसकी चुप में सफल अल्पमत सरकार के विधायक सा भरोसा था कि कोई न कोई तो मलाईदार पद मिलेगा ही।

हमको कुछ समझ नहीं आया। हम चुनाव हो जाने के बाद जनता की स्थिति की तरह अप्रासंगिक हो चुके थे। कार आगे बढ़ा दी। आगे जाम लगा था पर ऍफ़ एम पर गाना बज रहा था- 'गाड़ी वाले गाड़ी धीरे हांको जी।'
घोडा घोडा दौड़ा घोडा
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