Tuesday, April 05, 2016

बहुत दिन बाद दर्शन हुये

क्रासिंग खुलने का इन्तजार है
सुबह साइकिल स्टार्ट करने के पहले देखा कि सड़क पर जाता एक आदमी अपनी दोनों बाहें दोनों तरफ तेजी से फ़ैलाता चला जा रहा था। हाथ फ़ैलाने से ऐसा लग रहा था कि वह अपना रकबा तय कर रहा था। टहलने के दौरान अपनी शरीर के अधिकार क्षेत्र की बाउंडरी खींचता हुआ। कोई उसके अंदर आया तो परिणाम के लिये खुद जिम्मेदार होगा।

पुलिया पर कुछ बुजुर्ग बैठे थे। सबने यही कहा- ’बहुत दिन बाद दर्शन हुये।’ मने हम दर्शनीय आइटम हो गये।
रिटायरमेंट के बाद के फ़ायदे-नुकसान की चर्चा छिड़ गयी। तय हुआ कि फ़ायदा यह कि आदमी स्वतंत्र हो जाता है। नुकसान यह कि संगी-साथी छूट जाते हैं जिनके साथ रहे। इस बीच हमारी फ़ैक्ट्री से तीन पहले रिटायर हुये हरिप्रसाद विश्वकर्मा भी मिले। बताया बढिया कट रही है जिन्दगी।

पास ही सड़क पर दो महिलायें और एक पुरुष निहुरे-निहुरे महुआ बीन रहे थे। आदमी कुछ देर में चल दिया। महिलायें सड़क के किनारे नीचे उतरकर महुआ बीनती रहीं।


हिंदी में पूरे नंबर आने पर मिला इनाम दीपा को
आदमी पुलिया की तरफ़ आया। हमने उसकी पालीथीन देखी। दो-तीन किलो के करीब रहा होगा महुआ। वह पुलिया पर ही बैठकर बीड़ी सुलगाता हुआ सुस्ताता रहा। बाकी लोग महुआ के उपयोग के बारे में बतियाने लगे।
ऊपर निहुरे-निहुरे (झुके-झुके) से लवकुश दीक्षित का लोकगीत याद आ गया-
http://fursatiya.blogspot.in/2005/03/blog-post_26.html
’निहुरे-निहुरे कैसे बहारौं अंगनवा’
पुलिया से आगे चले तो एक बच्ची साइकिल से जाती स्कूल दिखी। बच्ची सर झुकाये उदास-उदास सी लगी। चलते-चलते बात की तो बताया 12 वीं पढ़ती है। सुबह 0650 से स्कूल है। बारहवीं का दबाब होगा या फ़िर बेमन से साइंस, गणित पढ़ रही होगी या कुछ और पर उसकी आवाज उदास सी थी।
बस स्टैंड पर एक बुजुर्ग अपने हाथों को ही डम्बल की तरह ऊपर-नीचे कसरत करते दीख रहे थे।
पार्क के पास तमाम मजदूर नहा रहे थे। आदमी औरत साथ-साथ। नहाई महिलायें दिशाओं की आड़ में ही कपड़े बदल रही थीं।

दीपा अपना इनाम दिखा रही है। पापा जमीन ठीक कर रहे।
क्रासिंग बंद थी। हम क्रासिंग खुलने का इंतजार करते हुये पास की ही दुकान पर चाय पीने लगे। वहीं अखबार में देखा तमाम नेताओं-अभिनेताओं के नाम विदेशी बैंक में पैसा होने की खबर मोटी हेडिंग में थी।
क्रासिंग, नेता की बात से मुझे याद आया कुलदीप नैयर का संस्मरण। शास्त्री जी की कार से एक बार कहीं जा रहे थे। क्रासिंग बंद थी। कार रुकी तो शास्त्री ने कुलदीप नैयर से कहा -’जब तक क्रासिंग खुलती हैं तब तक आओ गन्ने का रस पीते हैं।’


धूप छाँव में दीपा
रस पीकर उन्होंने पैसे दिये और क्रासिंग खुलने के बाद चले गये। शास्त्री जी उन दिनों गृहमंत्री थे।
बाद में जब वे गृहमंत्री नहीं रहे तो परिवार बड़ा होने के कारण गुजारे में दिक्कत के दिनों में अखबार में लेख लिखकर खर्च चलाने की बात भी कुलदीप नैयर ने लिखी है। शास्त्री जी के निधन पर उनके खाते में बहुत कम पैसे होने की बात भी अखबारों में छपी थी।

अब बताइये एक तरफ़ शास्त्री जी जैसे जननायक थे जो सत्ता की शीर्ष पर रहते हुये भी अभावों में रहे। दूसरी तरह सैंकड़ों टुंटपुजिये नेता-अभिनेता हैं आज के जिनके पास इत्ते पैसे कि उसको विदेश में रखने के लिये तमाम दंद-फ़ंद करते रहते हैं। 'कायस्थ कुलोदभव' का भी नाम उछल रहा है इसमें।

क्रासिंग खुली तो हम आगे बढे। सामने से आ रही साइकिल एकदम सामने आ गयी तो हम रुक गये। सामने वाली साइकिल में सब्जी लदी थी। तराजू हैंडल पर बख्तरबंद की तरह बंधा। उसका बैलेंस गड़बड़ाया तो उतरकर उसने हमको सलाह दी- ’सामने देखकर चलाया करो भाई साइकिल।’


अभय स्कूल जाने के लिए तैयार

क्रासिंग पर राधेश्याम मिल गये। गैस, स्टोव, कुकर रिपेयर का काम करते हैं। पहले भी मिल चुके हैं। उनके एक बेटे का तलाक का मुकदमा चल रहा है। हमने पूछा वो केस कहां तक निपटा। बोले-’ लड़की का बाप निपटाना ही नहीं चाहता। राजी ही नहीं हो रहा तलाक के लिये। देखते हैं कुछ दिन नहीं तो फ़िर कर देंगे लड़के की दूसरी शादी जो करते बने कर लेना।’
हमने कहा-’ लड़की (बहू) परेशान होगी इस लफ़ड़े से।’ इस पर वो बोले-’ वो परेशान होती तो आकर रहती न अपने आदमी के साथ।’
क्रासिंग खुली तो पार हुये। दीपा से मिलने गये आज।बताया उसने कि उसके हिन्दी टेस्ट में पूरे नंबर आये हैं। मैडम ने इनाम दिया है। इनाम में पेंसल, कटर, रबर आदि दिखाये।
हमने कहा-’तुमको पूरे नम्बर कैसे मिले। तुम्हारी तो राइटिंग ठीक नहीं है।’
इस पर वो बोली-’ हम घर में खिचड़ी पकाते हैं लिखने में पर स्कूल में अच्छा लिखते हैं।’ बता रही थी कि गणित में भी पूरे नंबर आयेंगे।
कान में पीला-पीला कुछ लगा दिखा तो हमने पूछा -’ ये क्या हुआ?’
उसने बताया- ’ हमने बबूल के कांटा से कान में छेद किये तो पापा ने कहा हल्दी लगा लो। इससे कान पकेंगे नहीं।’
हमने पूछा- ’अपने आप कान कैसे छेदे, क्यों छेदे?’
’हमने शीशा में देखकर अपने आप छेद लिये। कान छेदने वाले जो छेदते हैं उससे बहुत दर्द होता है इसलिये अपने आप छेद लिये। ’- दीपा ने बताया।
रिक्शा नहीं दिखा वहां। पता चला कि रिक्शे में सवारी नहीं मिलती टेम्पो के चलते तो रिक्शा जमा करवा दिया कोमल ने। 35 रुपया किराया था उसका रोज का।
’अब मजदूरी करते हैं रोज। ढाई सौ रुपये तो कहीं नहीं गये।’ - फ़ावड़े से फ़र्श बराबर करते हुये बताया कोमल ने।
लौटते में देखा कि काम से निकलने के पहले मजदूर महिलायें और पुरुष शीशे में खुद को देखते हुये बाल काढ रहे थे, चोटी कर रहीं थीं।
आटो स्टैंड पर अभय मिले। उसने हमको देखकर हाथ हिलाया तो हमने साइकिल मोड़ी और बतियाये उससे। उसकी फ़ोटो भी खींच ली। नाम का मतलब अब समझ में आ गया है उसको। नाम का मतलब बताने के लिये हमने उससे जबरियन थंकू बुलवाया। उसने बोला भी। हमने पूछा- ’कल क्यों नहीं बोला था थंकू?
उसने कहा- ’कल आटो आ गया था इसलिये चले गये थे।’ :)
कल जो लिखा था अभय के बारे में उसको पढ़वाया। पूछा भी कि कोई चिढ़ाता तो नहीं दांत के बीच गैप के कारण। उसने कहा - ’नहीं कोई चिढ़ाता नहीं। कभी-कभी भाई मजे लेता है।’
आजकल के बच्चे समझदार हो रहे हैं

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