Saturday, April 23, 2016

पाठक तक गए बगैर कोई भी लेखन पूरा नहीं होता

कल लखनऊ में अट्टहास सम्मान समारोह में शुरु हुआ। जाने की इच्छा के बावजूद जा नहीं पाया। वहां जाता तो तमाम लोगों से मिलता और समारोह की लाइव रिपोर्टिंग करता। मजे लेते हुये। अभी तो वहां की फ़ोटुयें देखकर ही आनन्दित हो रहे हैं।

व्यंग्य से मेरा जुड़ाव एक पाठक की हैसियत से रहा है। काफ़ी दिनों से। ब्लॉगिंग की शुरुआत हुई तो मुफ़्त की सुविधा का इस्तेमाल करते हुये छुट-पुट लिखते भी रहे। दोस्त लोग तारीफ़ करते। मजे लेते। कभी-कभी किसी को ज्यादा मजे लेने का मन होता तो लिखता- ’ तुम्हारे लेख में परसाई की छवि है, ऐसा लगता है श्रीलाल शुक्ल पढ रहे हैं।’

ब्लॉग और सोशल मीडिया का यह फ़ायदा है। आज के समय में सैकडों, हज्जारों लोग ऐसे होंगे जिनके लिखे को पढकर उनके मित्र बदले की भावना से उनके लेखन को परसाई, श्रीलाल शुक्ल, शरद जोशी आदि के बराबर बताकर बेवकूफ़ बनाते हुये परेशान करते हैं। तमाम हैं जिनको इस तरह बेवकूफ़ बनना सुहाता भी है। उनमें से कुछ अखबारों और पत्रिकाओं में छपने लगते हैं उनकी तो तबियत और गड़बड़ा जाती है।

लेखन के बारे में श्रीलाल शुक्ल जी ने एक लेख में लिखा था:

"लेखन-कर्म महापुरुषों की कतार में शामिल होने का सबसे आसान तरीका है। चार लाइने लिख देने भर से मैं यह कह सकता हूं कि मैं व्यास, कालिदास, शेक्सपीयर, तोल्सताय, रवीन्द्रनाथ ठाकुर और प्रेमचन्द की बिरादरी का हूं।

इसके लिये सिर्फ़ थोड़े से कागज और एक पेंसिल की जरूरत है। प्रतिभा न हो तो चलेगा, अहंकार से भी चल जायेगा- पर इसे अहंकार नहीं लेखकीय स्वाभिमान कहिये। लेखकों के बजाय आप किसी दूसरी जमात में जाना चाहें तो वहां काफ़ी मसक्कत में करनी पड़ेगी; घटिया गायक या वादक बनने के लिये भी दो-तीन साल का रियाज तो होना चाहिये ही। लेखन ही में यह मौज है कि जो लिख दिया वही लेखन है, अपने लेखन की प्रशंसा में भी कुछ लिख दूं तो वह भी लेखन है।"

चूंकि मेरे कुछ लेख अखबार में भी छपे हैं इस लिहाज से मैं परसाई, श्रीलाल शुक्ल, शरद जोशी जी की बिरादरी का हूं। लेकिन व्यंग्य की मेरी समझ उतनी ही है जितनी किसी वकालत की पढाई करके स्वास्थय विभाग का मंत्री की समझ डाक्टरी मामलों में हो सकती है। सच तो है कि जब साथी लोग व्यंग्य की गहरी बातें करते हैं तो मुझे डूबने का एहसास सा होता है। मैंने कई बार सोचा कि इस बार छुट्टी में अमिधा, व्यंजना, लक्षणा का मतलब समझना है लेकिन सोच कार्यरूप में परिणत न हो सका।

पाठक की हैसियत से कुछ रुचियां बनी उनके हिसाब से कुछ पसंदीदा लेखक हैं। पढते सभी को हैं। सोशल मीडिया में जब साथी अपना लेख लगाते हैं तो सबसे पहले वाह, बहुत अच्छे, बधाई आदि लिखते हैं इसके बाद लेख पढ़ना शुरु करते हैं। पहले बधाई इसलिये लिख देते हैं कि कहीं लेख पढ़ने के बाद न लिखने का मन हुआ तो खराब लगेगा।

किसी लेखक के लिखे में किसको क्या पसंद आता है यह कहना बड़ा मुश्किल होता है। आज के समय में सक्रिय बेहतरीन व्यंग्यकारों में से एक ज्ञान चतुर्वेदी जी के तमाम लेखन में से मुझे ये प्रसंग याद आते हैं:

"१. अगस्त 2015 में उनके वक्तव्य का वह अंश जिसमें उसमें उन्होंने कहा था- हम जो आज हैं उससे हमें बेहतर होना है। हमें बेहतर लेखक, बेहतर मनुष्य, बेहतर पति, बेहतर पिता , बेहतर ........बनना है।
२. मरीचिका उपन्यास का वह अंश जिसमें कवि निराश होकर अपनी पत्नी से कहता है - आज सब घटिया कविता लिखकर इनाम पा रहे हैं। मैं वह सब कर नहीं सकता। यह कहकर वह कविता लिखना छोड़ने की बात करता है। तब उसकी पत्नी उसको समझाती है - यही तो सबसे उपयुक्त है जब तुमको कविता लिखनी चाहिये। इसी समय तो समाज को तुम्हारी कविता की जरूरत है। "
और भी हैं लेकिन ये प्रसंग अनायास याद आते हैं। इनमें व्यंग्य कहीं नहीं है लेकिन आज के समय में सबसे अच्छे माने जाने वाले व्यंग्यकार के लेखन के यही अंश मुझे हमेशा याद आते हैं। कहने का मतलब यह पाठक के ऊपर है कि वह किसी लेखक से क्या ग्रहण करता है।
अट्टहास इनाम पर कुछ लोगों को आपत्ति रही। कुछ ने इस पर इशारे में तो कुछ ने सीधे-सीधे लिखा। लिखने वालों में व्यंग्यकार ही थे। Suresh Kant जी ने आज लिखा:

" कल लखनऊ की 'माध्यम' साहित्यिक संस्था द्वारा लखनऊ स्थित हिंदी भवन में वरिष्ठ व्यंग्यकार हरि जोशी को अट्टहास शिखर सम्मान से सम्मानित कर 'देर आयद दुरुस्त आयद' मुहावरे को चरितार्थ किया गया। अगर इस मुहावरे का खयाल न रखना होता, तो जोशी जी यह पुरस्कार बहुत पहले ही पाने के हकदार थे। और हाँ, हिंदी-व्यंग्य पर कुंडली जमाए बैठी तिकड़ी की पकड़ ढीली न हुई होती, तो यह पुरस्कार उन्हें अब भी न मिला होता। तिकड़ी की एक भी कड़ी ने समारोह में शामिल न होकर यह साबित करने में संकोच भी नहीं किया।

इस छिन्न-भिन्न तिकड़ी की जगह लेने को बेताब एक नई तिकड़ी ने भी समारोह का बहिष्कार कर एक अन्य मुहावरे को चरितार्थ किया--रानी रूठेगी अपना सुहाग लेगी। "

सुरेश जी ने जिन दो तिकडियों का जिक्र किया उनमें से एक का तो अंदाज लगाया जा सकता है लेकिन दूसरी के बारे में सिर्फ़ कयास ही लगाये जा सकते हैं। मेरे एकाध मित्रों ने बताया भी कि उनको फ़ोन करके इस कार्यक्रम का बहिष्कार करने आह्वान किया गया था। उनके विरोध का कारण शायद यह रहा हो कि उनके हिसाब से चयन गलत हुआ। इसलिये आयोजन का बहिष्कार करके व्यंग्य का स्तर ऊपर उठाया जाये।
अपनी-अपनी समझ है। मेरी समझ में इनाम देने वाली संस्था जिसको सम्मानित करना चाहती है उसको करती है। अगर सम्मान पाने वाले लोग पात्र नहीं हैं तो उस संस्था के इनाम की छवि अपने आप कम हो जायेगी। ’पहल सम्मान’ बहुत कम पैसों का दिया जाता था लेकिन उसकी गरिमा हमेशा बनी रही क्योंकि जिनको वह दिया गया वे सक्षम रचनाकार थे।

जिनको लगता है कि सम्मान और पुरस्कार हमेशा हर तरह से सुपात्रों को दिये जाते रहे हैं उनके लिये यह प्रसंग परसाई जी पुस्तक ’मेरे समकालीन’ की भूमिका से:

" माखनलाल चतुर्वेदी ने भाषा को ओज दिया, कोमलता दी, मुहावरे को तेवर दिया और अभिव्यक्ति को ऎंठ दी। वे शक्तिशाली रूमानी कवि, ओजस्वी लेखक तथा वक्ता थे। ‘निराला’ के बाद वही थे, जिन्होंने काव्य-परिपाटी तोड़ी। उनमें विद्रोह और वैष्णव समर्पण एक साथ थे। एक तरह से वे ‘मधुर-साधना’ वाले कवि थे। परंतु ‘कर्मवीर’ में उनके संपादकेय लेख व टिप्पणियां आज पढ़ते हैं तो चौंक जाते है। उनमें वर्ग-चेतना प्रखर थी। अगर कहीं उनका वैज्ञानिक समाजवाद का अध्ययन हो गया होता तो बड़ा कमाल होता। पर वे मोहक किंतु अर्थहीन भी लिखते थे। रंगीन, रेशमी पर्दे के पीछे कभी-कभी कुछ नहीं होता था। उनके लेखन के कुछ ‘मैनेरिज्म‘ थे। उनके पहले ही दो पैराग्राफ़ में ‘तरूणाई’, ‘पीढ़ियां’,मनुहार’,बलिपथ,’कल्पना के पंख’ आदि शब्द आ जाते थे। मेरी उनसे एक बार भेंट हुई थी, कुछ भाषण सुने थे। अंतिम बार मैने उन्हें गोदिया में मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में देखा। इसमें अध्यक्षता के लिए हमारे उम्मीदवार प्रखर समाजवादी पंडित भवानीप्रसाद तिवारी थे। मुक्तिबोध भी आए हुए थे। परंतु प्रदेश के अर्थमंत्री ब्रजलाल बियाणी भी अध्यक्ष बनना चाहते थे। उनकी तरफ़ से पूरी शासकीय मशीनरी और व्यापारी वर्ग लगा था। पर पलड़ा भारी तिवारी जी का था और बियाणी जी हार भी गए थे। पर तभी परम श्रद्धेय पंडित माखनलाल चतुर्वेदी को पूरी नाटकीयता के साथ मंच पर लाया गया। दोनों तरफ़ से दो आदमी उन्हें सहारा दे रहे थे। माखनलाल जी को अभ्यास था कि अब और कैसे बीमार दिखना, कितने पांव डगमगाना, कितने हाथ कंपाना, कितनी गर्दन डुलाना, चेहरे पर कितनी पीड़ा लाना। उन्हें कुर्सी पर बिठाकर उनके सामने माइक लाया गया। उन्होंने कांपती आवाज में कहा- मैं चालीस वर्षों की साधना के नाम पर यह चादर आपके सामने फ़ैलाकर आपसे भीख मांगता हूं कि बियाणी जी को अध्यक्ष बनाएं। वे सम्मेलन का भवन बनवा देंगे और बहुत रचनात्मक कार्य करेगें। हम लोग क्या करते? हमने अर्थमंत्री बियाणी को अपमान के साथ अध्यक्ष बन जाने दिया और माखनलाल जी का कर्ज पूरा उतार दिया। मुक्तिबोध ने नागपुर लौटकर ‘नया खून’ में एक तीखा लेख लिखा, जिसका शीर्षक था- ‘साहित्य के काठमांडू का नया राजा’। "

मुक्तिबोध का निधन 1964 में हुआ। मतलब यह किस्सा साठ के दशक का होगा। जिनको लगता है कि चयन गलत हुआ उनको यह समझकर तसल्ली करनी चाहिये परम्परा का निर्वाह हुआ है।

वैसे जिनको अट्टहास से सम्मानित लेखकों से नाराजगी है उनके लिये राजकशोर जी की यह बात पेश है:

"पाठक तरह-तरह के होते हैं तो लेखक भी तरह-तरह के होते हैं। जैसे हर पाठक अपना लेखक खोज लेता है, वैसे ही हर लेखक अपना पाठक खोज लेता है। दोनों के मिलन की यह घड़ी अपूर्व आनंदमयी होती है। वस्तुतः लेखक लिखता अपने मौज में है, पर वह सिर्फ अपने लिए नहीं लिखता। पाठक तक गए बगैर कोई भी लेखन पूरा नहीं होता। जैसे नदी की सार्थकता महासागर में जा कर विलीन होने में है, वैसे ही रचना की सार्थकता पाठक के अंक में जा कर संतृप्त होने में है। "

तो यह मानकर बात मटिया देनी चाहिये इनाम देने वालों को पाठक की हैसियत से लेखकों की बात पसंद आ गयी होगी।

वैसे लोगों की नाराजगी जायज भी है। जिस तेजी से लिखने वाले बढ रहे हैं उस तेजी से इनामों की संख्या नहीं बढ रही है। जैसे अदालतों में जजों की संख्या में कमी के चलते अनकों मुकदमें लंबित पड़े रहते हैं वैसे इनामों की संख्या कम होने के चलते अच्छा लेखन स्थगित होता रहता है। लोग लिखते-लिखते बुढा जाते हैं पर कोई इनाम नहीं मिलता। अखबार भी पारिश्रमिक देते नहीं। मुफ़्त में लेख छापते हैं या ब्लाग से उठा लेते हैं। ऐसे में खराब तो लगता है न !

हमने तो इसी चक्कर में व्यंग्य लिखना ही बन्द कर दिया है। क्या फ़ायदा जब कुछ हासिल नहीं होना इस सबमें। जबकि सच्चाई यह है कि व्यंग्य लिखने की बात तो दूर हमको तो समझने की तमीज नहीं। होती तो इतनी सब बकवास लिखते भला । :)
 
डिस्क्लेमर: यह पोस्ट बिना किसी डिस्क्लेमर के इसलिये ताकि डिस्क्लेमर बाद में लिख सकें जरूरी हो तो।





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