Sunday, October 15, 2006

अपनी रचनायें भेजें

http://web.archive.org/web/20110926000228/http://hindini.com/fursatiya/archives/199

अपनी रचनायें भेजें

आप सभी साथी जो मेरा ब्लाग पढ़ते रहे हैं उन्होंने अक्सर मेरी पोस्टों में चर्चित कथाकार कृष्ण बिहारी का नाम जरूर पढ़ा होगा। साहित्य में रुचि रखने वाले साथियों ने पहले ही उनकी कहानियां पढ़ी होंगी और उनसे अच्छी तरह परिचित होंगे। लगभग दो सौ कहानियां, लेख लिख चुके कृष्ण बिहारी जी की कहानियां भारत की लगभग हर प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका छप चुकी हैं। अभिव्यक्ति में प्रकाशित उनके प्रवासी जीवन के संस्मरण काफ़ी चर्चित रहे । फिलहाल अबूधाबी में हिंदी अध्यापक के रूप में कार्यरत हैं बिहारीजी आजकल बच्चों के लिये हिंदी किताब तैयार करने के महत्वपूर्ण काम में लगे हैं।
बिहारीजी ने एक पत्र के माध्यम से किताब के लिये सामग्री भेजने के लिये मुझे अपने साथियों तक अपना अनुरोध पहुंचाने के लिये लिखा है । उनका पत्र जस का तस यहां प्रस्तुत है:-

आदरणीय महोदय/महोदया,
सादर नमस्कार।
आप शायद मुझे नाम से जानते हों। यदि अब तक अपरिचय है तो इसे इस पत्र के माध्यम से दूर कर रहा हूं। मेरा नाम कृष्ण बिहारी है। मैं एक कहानीकार के रूप में जाना जाता हूं। पिछले २८ साल से हिंदुस्तान से बाहर हूं और (अबूधाबी में) एक हिंदी अध्यापक के पद पर काम कर रहा हूं।
मुझे यहां एक विद्यालय के प्रधानाचार्य के आग्रह/अनुरोध पर कक्षा १ से ८ तक की हिंदी की पाठ्य पुस्तक तैयार करने का सुझाव नहीं बल्कि आदेश दिया गया है। समयाभाव के बावजूद मैंने इस काम को हाथ में ले लिया है, केवल यह सोचकर कि इस काम के द्वारा मैं आप लोगों को उन बच्चों तक पहुंचा सकूंगा जो आपको याद करते हुये अपनी जिंदगी दुनिया में न जाने कहां जियेंगे। वैसे भी यदि रचनाकार किसी पाठ्यक्रम में शामिल हो जायें तो शायद दीर्घजीवी हो
सकेगा। मैंने १० साल पहले ऐसा काम किसी के कहने पर किया था लेकिन वह अपना प्रभाव नहीं दिखा सका। इस बार वैसा होने की सम्भावना नहीं है।
मुझे शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई, स्वस्थ नागरिकता, त्याग, सेवा, ईमानदारी, पर्यावरण, सूचना-तंत्र-अखबार, रेडियो, टेलीफोन, मोबाइल, इंटरनेट, म्यूजिक, होम-थियेटर, स्पोर्ट्स, आत्मकथा, जीवनी, चरित्र प्रधान जीवन मूल्यों पर आधारित डायरी, संस्मरण, कहानियां, कवितायें, लेख आदि की तुरंत आवश्यकता है। काम बहुत ज्यादा है और मैं इसमें अकेला ही लगा हूं। पुस्तक को दुनिया के स्तर पर प्रकाशित करना है। सामग्री मिलने के बाद भी बहुत काम है। प्रश्न बनाना,
चित्रांकन, अभ्यास पुस्तिका बनाना आदि।
मैं जानता हूं कि यह काम मेरे रचनात्मक लेखन को बुरी कुप्रभावित करेगा क्योंकि मेरे पास समय ही नहीं है कि मैं यह सब करूं। चूंकि वचन दे चुका हूं इसलिये मुझे आप सबका ही भरोसा है।
आपसे अनुरोध है कि आप इस काम में सहयोग करने के लिये मुझे अपनी रचनायें भेजें । सामग्री में मुझे अपेक्षित परिवर्तन का भी अधिकार दें ताकि वह बच्चों के लायक बन सके। दूसरी बात रचना भेजते समय फांट भी भेजें ताकि मैं उसे खोल सकूं और उपयोग कर सकूं। रचना अपनी रुचि की विधा में तुरंत
भेजें। साथ में अपना परिचय और पासपोर्ट साइज का फोटो भी।
शेष फिर,
आपका
कृष्ण बिहारी

आपसे अनुरोध है कि आप अपनी रचनायें भेजें और बिहारीजी को उनके कार्य में सहयोग करें । बिहारीजी का पता है:- krishnatbihari@yahoo.com

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

5 responses to “अपनी रचनायें भेजें”

  1. राकेश खंडेलवाल
    यह जो दीप जला है हम सब इसमें सहभागी हों
    अपनी अपनी कोशिश कर दें नई वर्तिका इसमें
    तेल सभी जो बून्द बून्द डालेंगे इस दीपक में
    है निश्चित जग का हर कोना हो इससे ज्योतिर्मय
  2. हिंदी ब्लॉगर
    इतना अच्छा आमंत्रण हमारे समक्ष लाने के लिए धन्यवाद!
    कुछ बातें स्पष्ट करने की ज़रूरत है. जैसे- रचनाओं की शब्द-सीमा और उन्हें जमा कराने की समय-सीमा.
  3. Anunad
    नन्द बिहारी जी ने एक अच्छा काम हाथ मे लिया है। क्यों न इस काम को विधिवत किया जाय? इसके लिये अनुगूंज का आयोजन कैसा रहेगा?
  4. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] समीक्षा 5.मूंदहु आंख कतहुं कछु नाहीं 6.अपनी रचनायें भेजें 7.लिखिये तो छपाइये भी न! 8.जेहि पर जाकर [...]

Thursday, October 12, 2006

मूंदहु आंख कतहुं कछु नाहीं

http://web.archive.org/web/20110925154914/http://hindini.com/fursatiya/archives/198

मूंदहु आंख कतहुं कछु नाहीं

सबेरे हम उठने के बाद कुछ देर फिर’लेट’गये और अपने दफ़्तर जाने के लिये हमेशा की तरह फिर ‘लेट’ हो गये। हम इंतजार करते रहे बिस्तर पर पड़े-पड़े कि कब घड़ी हमारे ‘लेट’ होने के समय तक पहुंचे तकि हम हड़बड़ा के उठें और धड़धड़ाते हुये दफ्तर पहुंचें। समय पर आप पहुंचते हैं तो आप ‘रूटीनी’ हो जाते हैं। ‘डल’, लकीरी ,सीधे-सादे आदमी का तमगा चिपकते देर नहीं लगती। देरी से जाने का मजा ही कुछ और है। आप दस मिनट देरी से पहुंचने मात्र से इतनी ऊर्जा अपने अंदर संजो लेते हैं कि सोचते हैं कि आज सारे काम निपटा ही देने हैं। वो तो भला हो सबेरे की दफ्तरी चाय का जिसके पीते ही आप सामान्य होकर कामकाज करने लगते हैं वर्ना अगले दिन कुछ करने को रहे ही न!
जाते-जाते अखबारों पर भी निगाह पड़ ही जाती है तो क्या करें! दिखता है कि कानपुर दुनिया में प्रदूषण में विश्व में सातवें नम्बर पर आ गया। यह एक सर्वेक्षण रिपोर्ट है। इस तरह की सर्वे रपटें हमारे लिये एकतरफा समाचार होती हैं। आज किसी नंबर पर कर दिया हमारे शहर को कल कहीं। हमारा शहर इन सर्वे लहरों की छाती के ऊपर अलसाये से पड़े निर्लिप्त तिनके की तरह है। ले चलो जहां ले चलना है, इधर या उधर। आज सातवें, कल दसवें पर। परसों किसी और नम्बर पर। यह तो हुआ गंदगी के मामले में। किसी और मामले में कोई और नंबर हमारे माथे पर चस्पां हो जाता है। हम एक नोटिस बोर्ड हो गये हैं जिसमें कोई भी आकर अपनी सूचना चिपका जाता है। शहर के लोगों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता।
हमारे फैक्ट्री कालपी रोड पर स्थित है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग है। नगर निगम की गाड़ियां कूड़ा उठाकर हमारी निर्माणियों के सामने से जाती हैं। सड़क होने के नाते वहां स्पीड-ब्रेकर भी हैं। स्पीड ब्रेकर एक बाधा है। बाधा को देखकर ड्राइवर (देखकर बाधा विविध बहु विघ्न घबराते नहीं)इसे जल्दी से जल्दी पार कर लेना चाहता है और गाड़ी और तेज हो जाती है। ऊर्जा और गति के तमाम नियमों के बंधन में बंधी गाड़ी बेचारी खिलौने की तरह उछलती है। अपने पास का कुछ कूड़ा सड़क पर छोड़कर अपनी मंजिल की ओर बढ़ जाती है। मुझे लगता है कि सड़क किसी वेटर की प्लेट की तरह है जिस पर वह कूड़े से भरा ट्रक अपने पास के कूड़े की कुछ टिप छोड़ जाता है।
कूड़े की गाड़ियां अक्सर मुक्त अर्थव्यवस्था की तरह खुली रहती हैं। गाड़ी का कूड़ा सड़क के कूड़े से जुड़ाव की भावना के वसीभूत होकर जगह-जगह उसे ‘हाऊ डू यू डू’ कहने के लिये गाड़ी से उतर कर उससे बतियाने लगता है और उसे पता ही नहीं चलता कि ट्रक कब उसे छोड़कर आगे बढ़ गया। वह न्यूटन के जड़त्व के नियम का गुलाम होकर वहीं पड़ा-पड़ा ट्रक के कूड़े से वियोग में टसुये बहाता रहता है। कुछ हर हाल में खुश रहने वाले व्यवहारिक कूड़े के टुकड़े यहां भी खुशी तलाश ही लेते हैं और कहते हैं, ‘आयम बेटर आफ हेयर’ आसपास ताजी हवा तो है।
कभी-कभी ऐसा होता है कि हम भावुकता के शिकार हो जाते हैं और बदलाव के बारे में सोचने लगते हैं। अब बदलाव भी दो तरह के होते हैं एक सार्थक दूसरा निरर्थक। यह खुशी की बात है कि निरर्थक बदलाव के लिये कुछ करना नहीं पड़ता है। केवल निर्लिप्त, क्रियाहीन बने रहने पड़ता है। न ऊधो से लेना न माधो को देना का मुफ्तिया पैकेज अपने दिमाग में डाउनलोड कीजिये और मजे से निरर्थक बोले तो बेमतब या सही कहें तो नकारात्मक बदलाव अपने चारो तरफ होते देखिये। आप देखिये कि आपके एकदम बगल में कोई मसाले की पीक आकर गिरी है जिससे आप सिर्फ इसलिये बच सके हैं कि अगले से आप सुरक्षित दूरी पर हैं। आपके देखते-देखते सामने की दुकान का दुकानदार उठा और अपनी जिप खोलकर दीवार से सटकर हल्का होने लगा है। वह थोड़ा हड़बड़ाया हुआ है काहे से कि उसकी दुकान पर उसे ग्राहक दिखने लगा है और दूर से आता वह दुकानदार भी नजर आने लगा जो अपना ठेला लिये चला आ रहा है। उसी दीवार के पा खड़े होकर उसे आजकी दिहाड़ी कमानी है। दीवार से सटा आदमी अपनी दुकान से ग्राहक के जाने, दीवार के पास लगने वाली ठेलिया के पास आते जाने के तनाव से एक साथ जूझता हुआ अपने अंदर के दबाब को जल्दी से जल्दी कम करने के तनाव से एकसाथ निपटने के लिये अभिशप्त है।
पता नहीं दुनिया भर के डाक्टर दिल के दौरों के कारणों के लिये कोलस्ट्राल, चर्बी और मोटापे जैसे निरीह कारणों को इसके लिये काहे दोषी ठहराते हैं! पता नहीं क्यों वे इन सब अमानवतावादी स्थापनाऒं के खिलाफ कुछ न कहकर अफजल को बचाने के लिये पिली पड़ी हैं गोया हमारे महामहिम राष्ट्रपति बिना सोचे-बिचारे ही सब कुछ कर देंगे।
इस तरह के नकारात्मक बोले तो निरर्थक बदलाव में सुविधा यह होती है कि किसी को कुछ करना नहीं पड़ता है। इसमें ऊर्जा बिल्कुल खर्च नहीं होती। आप मानो न मानो लेकिन यह सच है भाई! हम कोई आपसे झूठ थोड़ी ही बोलेंगे। यह हम अपने पढ़े हुये और देखे हुये अनुभव से कह रहे हैं। देखिये जिसको मन आया और उसने हमारे यहां तम्बू लगाकर पहले अस्थायी कब्जा किया और फिर पक्का मकान बना लिया और हम खड़े-खड़े गुबार देखते रहे। हमारी धर्मशाला पर उसने अपना महल बना लिया और हम निर्लिप्त रहे। ये जो अपना देश में भ्रष्टाचार की इत्ती प्रगति है वो ऐसे ही थोड़ी हो गयी अगर हम निर्लिप्त न रहते तो भला मिलते कहीं इतने ‘अमेजिंग रिजल्ट्स’? अशिक्षा, गरीबी, बेकारी और न जाने कितनी अटरम-सटरम उपलब्धियां कहां संभव हैं भाई बिना उदासीन हुये। और इसका फायदा भी देखिये न! हमें रोने के लिये कोई रोज-रोज कोई नया बहाना खोजना नहीं पड़ता। ये हैं न शाश्व्त कारण। अब रोने के फायदे बताने लगें तो फिर बात से भटक जायेंगे बस इतना जान लीजिये कि रोने से आंखें खूबसूरत होती हैं। आपको कोई भी खूबसूरत आंख दिखे आप उससे बहे हुये दरिया के बारे में भी सोचना।
ये देखिये हमें बताना सार्थक बदलाव के बारे में था और कहानी निरर्थक में सुना गये। गये थे हरिभजन को ऒटन लगे कपास। बहरहाल दुर्घटना से देर भली मानते हुये हम सार्थक की भी बात करते हैं।
हां तो हम कह रहे थे कि सार्थक बदलाव के लिये मेहनत करनी पड़ती है, पसीनागीरी करनी पड़ती है। तो ऐसा ही हुआ कि हमारे फैक्ट्री के महामहिम को पता नहीं भावुकता के किन क्षणों में चौथे माले के अपने कमरे से सड़क पर अपना पूरा बदन उघाड़े कूड़े को अपने आगोश में समेटे नगर निगम का ट्रक( बकौल श्रीलाल शुक्ल- ट्रकों का जन्म ही सड़कों से ब्लात्कार करने के लिये हुआ है) जाता दिखा। आदमी जब ऊपर से देखता है तो उसे चीजें दूर से दिखती हैं दूर तक दिखती हैं और अगर और कुछ बेहतर नहीं है देखने के लिये तो देर तक भी दिखती हैं।
ऐसे ही दूर-दूर-देर के झमेले में फंसे महामहिम को ट्रक, ट्रक पर लदा कूड़ा और हर स्पीड ब्रेकर पर अनायास गिरता और कूड़े से जुड़ता कूड़ा दिखा। उनको लगा होगा कि ये स्पीड ब्रेकर नाके पर खड़ा सिपाही है जिस पर ट्रक कूड़े की रिश्वत टिका कर आगे बढ़ लेता है। एक बारगी तो उन्होंने तय किया कि स्पीड ब्रेकर तुड़वा दें लेकिन उनको उनके काबिल सलाहकार ने समझाया कि साहब वो तो एक घंटे का काम है लेकिन इसमें तकनीकी समस्या यह है कि फिर आडिट वाले सवाल उठायेंगे कि जब स्पीड ब्रेकर उखड़वाना था तो आगे स्पीड ब्रेकर है का बोर्ड काहे लगवाया। सौ रुपये के खर्चे का जस्टीफिकेशन देने में हजार रुपये खर्च हो जायेंगे। इस तकनीकी सलाह और सुरक्षा की आड़ में स्पीड ब्रेकर की जान तो बच गई। लेकिन चौथी मंजिल से नीचे सड़क पर जाता, दिखता, गिरता, मिलता, उड़ता और बैठ जाता कूड़ा साहब को लगातार परेशान करता रहा।
ऐसी ही एक दिन साहब भावुक हो गये और फिर तो नगर निगम से लिखा-पढ़ी हुई और अंतत: तय हुआ कि निर्माणी के सामने से जो कूड़ा जायेगा उसका ट्रक ढका रहेगा। नीले बरसाती कागज के नीचे ढंका हुआ कूड़ा बार-बार हवा के झोंके का सहारा लेकर सिनेतारिकाऒ की तरह वजह-बेवजह अपन वदन उघाड़कर दिखाता रहता। हमें ऐसे सौंदर्य पूर्ण कूड़े के उपयुक्त कोई कविता शेर याद नहीं थे लेकिन नीले बरसाती कवर के उघड़ते, ढंकते ढेर को देखते हुये मुझे अक्सर जयशंकर प्रसाद की कविता याद आती:-
नील परिधान बीच सुकुमार, खुल रहा मृदुल अधखुला अंग।
बहरहाल कूड़ा परदे में चला गया लेकिन लेकिन स्पीड ब्रेकर उसका गिरना बरकरार रहा। गति और जड़त्व और नाके पर वसूली के नियम शाश्वत होते हैं। साहब चले गये हैं। हमारे नजरों के सामने ट्रक पर जाते कूड़े और जेहन में उनका कूड़े के खिलाफ भावुक अभियान सुरक्षित है।
ऐसे ही तमाम उदाहरण हैं जिनके बल पर ही हम इसी तरीके की तमाम उपलब्धियां हासिल करने में सफल होते हैं। कभी प्रदूषण में सातवें, कभी भ्रष्टाचार में अव्वल, कभी अनुशासन में लद्धड़, कभी तहजीब में फुस्स-पटाखा और न जाने क्या-क्या!
बहरहाल ये सब तो आम बाते हैं होती रहती हैं। हर शहर में। लेकिन पिछले दिनों एक घटना हमारे शहर में घटी जिसका जिक्र किसी सर्वे में नहीं हुआ न ही किसी टी.वी. वाले ने इसका कवरेज किया। अखबार भी के अगले दिन घटना की विस्तार से खबर देकर खामोश हो गये।
हुआ यह कि कानपुर के कोतवाली थाना क्षेत्र के मोहल्ले रामनारायण बाजर में एक मुस्लिम परिवार का एक लड़का उसी मोहल्ले में हुये भगवती जागरण के समय हुई छेड़खानी के बाद हुयी गुम्मेबाजी में मारा गया। हिंदू लड़की से हुयी छेड़खानी का आरोप मुस्लिम लड़कों पर लगा और मिश्रित आबादी होने के कारण तनातनी के बाद गालीगलौज, गुम्मेबाजी, गोलीबाजी की रस्में अदा की गयीं। जो लड़का मारा गया वह किसी छेड़छाड़ में शामिल नहीं था लेकिन पत्थर कोई पासवर्ड पूछकर तो गिरते नहीं हैं लिहाजा वह पहले घायल हुआ फिर अगले दिन मर गया। एक हिंदू जनप्रतिनिधि ने हिंदुऒं की तरफदारी की थी और मुस्लिम लड़का मारा गया लिहाजा तनाव बढ़ता गया।
कानपुर एक दंगाप्रधान शहर भी है। साल में तीन-चार बार किसी न किसी इलाके में इतने दिन कर्फ्यू जरूर लग जाता है कि उस इलाके के लोग इन सब घटनाऒं के आदी से हो जायें।
लड़के के मरने के कारण चाहे जो रहे हों लेकिन वह मुस्लिम था और मिश्रित आबादी होने के नाते उस इलाके में मुस्लिम जवानी और भड़काने वाले लोग भी पर्याप्त मात्रा में थे। हिंदू लोग भी ईंट का जवाब पत्थर से देने के लिये अपने को लैस करने में जुट गये थे। खून का बदला खून के नारों के बीच दंगे की भूमिका बन गयी थी और लोगों ने दो-तीन दिन के राशन-पानी का इंतजाम भी करने का मन बनाना शुरू कर दिया था।
इसी सब तनातनी के बीच कुछ लोग भड़के हुये लोगों को समझाने बुझाने के प्रयास में लगे रहे। वे समझाने बुझाने वाले लोग ज्यादातर मुहल्ले के ही थे और शायद स्थिति तनावपूर्ण किंतु नियंत्रण में काफ़ी देर बनी रही। बहुत से बुजुगों ने हाथ-जोड़कर लोगों को रोका तमाम दुनियावी बातों का हवाला दिया। कुछ लोगों के गुस्से में आगे बढ़ने पर लोग उनके आगे सड़क पर लेट तक गये। मुहल्ल्ले के लोगों में न जाने कहां से नैतिक साहस आ गया कि वे दंगायी मिजाज वाले सिरफिरों के आगे दीवार की तरह अविचलित खड़े रहे।
जैसा कि अगले दिन के अखबारों से पता चला कि यह भीषण तनाव की स्थिति करीब छह-सात घंटे लगातार बनी रही। पुलिस को भी खुद को शांत रहकर लोगों को शान्त रखने में पसीना आ गया।
इस सारे तनाव पूर्ण घटना का पटाक्षेप तब हुआ जब अपने जवान बेटे की मौत से बुरी तरह टूटे बाप ने भरी भीड़ के सामने हाथ जोड़कर कहा- मैं अपना इकलौता बेटा खो चुका हूं। वह तो चला गया और किसी और की मौत से तो वापस आ नहीं जायेगा। अब मेरी आपसे हाथ जोड़कर विनती है कि अब जो हो गया सो हो गया लेकिन अब किसी और के घर का चिराग बुझाने का कोई काम न करो।
इसके बाद भीड़ धीरे-धीरे छंट गयी। अगले दिन अखबार मोहल्ले वालों और खासकर मारे गये लड़के के पिता की सहनशीलता, मानवता की विजय, इंसानियत जीती जैसे विवरणॊं से भरे दे।
इसके अगले दिन फिर शहर के अखबार हत्या, लूट, चेन छीनने, शोहदे को पीटने में जुट गये थे।
दुनिया के किसी सर्वे की किसी भी रिपोर्ट में इस घटना का कोई जिक्र नहीं हुआ। शहर के किसी भी अखबार में उस मोहल्ले के लोगों के व्यवहार के पीछे की केमेस्ट्री खोजने के लिये न कोई जहमत उठायी गयी न ही इस घटना का पोस्ट मार्टम नहीं हुआ।
एक लिहाज से यह सही भी है। पोस्टमार्टम मरे हुये लोगों का होता है। जीवनदायिनी घटनायें का पोस्टमार्टम कैसा? वे तो हमारे-आपके दिल में धड़कने बनकर यादों में खुशबू की तरह महकती रहती हैं।
ऐसी घटनायें ऐसा नहीं कि हमारे ही शहर में होती हैं। आपके भी यहां तमाम ऐसी घटनायें होती होंगी। वास्तव में तो ऐसा दुनिया के हर शहर में,हमेशा, भले ही कम क्यों न हो, होता रहा है लेकिन इनका कोई सर्वे नहीं किया जाता। इसमें मेहनत लगती है। और आपाधापी के इस युग में अब मेहनत करने की आदत कम होती जा रही है।
आप आंखें खोलकर देखें तो अपने आसपास भी इस तरह की घटनायें होती दिखेंगी वर्ना तो तुलसीदास जी ने कहा ही है -मूंदहु आंख कतहुं कछु नाहीं
मेरी पसंद


छत के किसी कोने में
अटकी वह बूंद
टीन पर ‘टप्प’ गिरी
समय के अंतराल पर
गिरना जारी है उसका
लय-सीमा बंधी वह
गिरने के बीच
प्रतीक्षा दहला देती है
कि अब गिरी…अब गिरी. वर्षा थम चुकी है
छत से बहती तेज धार
एकदम चुप है
पर यह धीरे-धीरे संवरती
शक्ति अर्जित कर
गिरती है ‘टप्प’ से

सुकीर्ति गुप्ता

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

11 responses to “मूंदहु आंख कतहुं कछु नाहीं”

  1. अतुल
    “वे तो हमारे-आपके दिल में धड़कने बनकर यादों में खुशबू की तरह महकती रहती हैं।”
    पर अफसोस सिर्फ यही है कि यह खुशबू फैलयी जाये तो समाज का भला हो पर वह जिम्मेदारी उठाने वाले तो कोला बेचने , चौबीस घंते मसालेदार खबरो की जुगत मे लगे हैं।
  2. mitul
    व्यंग बहुत अच्छा है अनूप भाई, हमे पसंद आया। ‘अमेजिंग रिजल्ट्स’ का फारमूला सही समझाया है आपने। यह लेख भी पंच सितारा है आपका। सभी बातो से हम सहमत हैं।
    वैसे, हमारा बस कहाँ कि मूंदे अपनी आँखे, वे सूसरी खूद ही तो बंद रहती है।
  3. अनुराग श्रीवास्तव
    अनूप भाई लिखा बहुत की सहज तरीके से है। दिल खोल कर रख दिया हो जैसे – पत्रकारिता और ब्लागिंग में शायद यही अंतर है – यहां इंसान दिल से लिखता है। उस पर ‘किसी’ भी प्रकार का दबाव नहीं होता, दिल की बात सुनने के अतिरिक्त शायद और कोई अपेक्षायें भी नहीं होती। मेरी सोच गलत भी हो सकती है – पर भैया दिल तो मेर यही कहता है।
    पूर्व का मानचेस्टर कहलाने वाला कानपुर, सरकार द्वारा परोसे जा रहे सौतेले व्यवहार के कारण तिल तिल करके अपना अस्तित्व खोता जा रहा है। हलांकि अपना अस्तित्व बचाने के लिये जूझ तो रहा है लेकिन सरकारी प्रणाली या नीलियों के वाण ऐसे हैं कि घायल नगर को वापस अपने पैरों पर खड़े होने में लम्बा अर्सा लग सकता है।
    कानपुर के लिये दिल से प्रार्थना “Get Well Soon Kanpur!”
  4. Jatin Jain
    bhai, pichhle kuchh dino se blog padhna chaaloo kiya hai. Anoop bhai, aapka lekhan padhna, kaam ke beech achchha refreshing break deta hai.
  5. SHUAIB
    आपने इस लेख मे अपने शहर का आइना दिखा दिया अनूपजी, और पढने मे भी मज़ा आया।
  6. समीर लाल
    आदमी जब ऊपर से देखता है तो उसे चीजें दूर से दिखती हैं दूर तक दिखती हैं और अगर और कुछ बेहतर नहीं है देखने के लिये तो देर तक भी दिखती हैं।
    *******
    पत्थर कोई पासवर्ड पूछकर तो गिरते नहीं हैं लिहाजा वह पहले घायल हुआ फिर अगले दिन मर गया
    *******
    अति सुंदर. इस तरह के लेख बहुत कम पढ़ने को मिलते हैं.
    आप यदि इसमें से शहर का नाम हटा लें तो भारत के अधिकतर शहरों का रहने वाला हर पाठक इसे अपने शहर पर लिखा व्यंग ही समझेगा.
    आगे भी जारी रखें इस तरह के लेख.
  7. राकेश खंडेलवाल
    सिर्फ़ कानपुर नहीं आज यह दर्पण है हर एक नगर का
    शुतुर्मुर्ग से, नजर छुपा कर करते हल हर एक समस्या
    दोषारोपण करें दूसरों पर, हम साफ़ बचें संकट से
    हमने यह ही वर पाया कर पांच साल की कड़ी तपस्या
  8. Anoop Bhargava
    बहुत अच्छे अनूप भाई …
  9. आशीष
    शुक्ला जी, सच में आप हंसते हंसाते बहुत कुछ कग गये। श्री लाल शुक्ल जी का उद्धरण अच्छा लगा “ट्रकों का जन्म सड़कों का बलात्कार करने के लिये हुआ है”, शायद उसी तरह से टैपुओं का जन्म वातावरण का बला्त्कार करने कि लिये हुआ है। वैसे क्या कानपुर और क्या भोपाल, भारत के दूसरी श्रेणी के ज़्यादातर शहर कूड़े कि डिब्बे हैं और प्रदूषण की थाली हैं। अगर हम गिने चुने शहर मसलन पूना, चंडीगढ, और नागपुर को छोड़ दें, स्थिति बहुत अच्छी नहीं है।
  10. फुरसतिया » दीवाने हो भटक रहे हो मस्जिद मे बु्तखानों में
    [...] कानपुर एक दंगा प्रधान शहर है। यहां पिछले दिनों एक दंगा होते-होते रह गया। इसमें मुस्लिम परिवार का लड़का मारा गया था। दोनों समुदाय के लोग दंगा करने पर उतारू थे। दिन भर मोहल्ले के लोग दंगा टालने के लिये कोशिशे करते रहे। अंत में बुजुर्ग ने जिसका लड़का मारा गया था लोगों से अनुरोध किया – मैं अपना इकलौता बेटा खो चुका हूं। वह तो चला गया और किसी और की मौत से तो वापस आ नहीं जायेगा। अब मेरी आपसे हाथ जोड़कर विनती है कि अब जो हो गया सो हो गया लेकिन अब किसी और के घर का चिराग बुझाने का कोई काम न करो। [...]
  11. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] 4.चिट्ठाचर्चा,नारद और ब्लाग समीक्षा 5.मूंदहु आंख कतहुं कछु नाहीं 6.अपनी रचनायें भेजें 7.लिखिये तो छपाइये [...]

Wednesday, October 11, 2006

चिट्ठाचर्चा,नारद और ब्लाग समीक्षा

http://web.archive.org/web/20110925154754/http://hindini.com/fursatiya/archives/197

चिट्ठाचर्चा,नारद और ब्लाग समीक्षा

दो दिन पहले रविरतलामीजी ने मेरी पोस्ट पर वाह-वाही टिप्पणी करते हुये आह्वान किया:-


फुरसतिया से एक करबद्ध प्रार्थना है. काहे को वे अपनी ऊर्जा चिट्ठा चर्चा में वेस्ट करते हैं. उसके बदले वे नित्य इसी तरह की धुँआधार पोस्ट लिखा करें.

तारीफ़ का एक अन्दाज मानकर हम इसे हाजमोला खाकर पचा गये। वैसे भी जिनका आप किसी न किसी कारणवश सम्मान करते हैं, चाहे वह उम्र के कारण हो या सीनियरिटी के कारण या उनके ज्ञान या व्यवहार के कारण, जब वे करबद्द कुछ भी करते हैं (चाहे प्रार्थना ही करें) तो ऐसा लगता है कि उन्होंने अपने हाथ तो बांध लिये हैं लेकिन इसके पहले अगले की गरदन भी दबा ली है। दबी है गरदन बंधे हुये हाथों के बीच। गरदन पर दबाब हाथ के बंधाव के समानुपाती होता है।
चिट्ठाचर्चा के बारे में मैंने बताया कि और साथी आ जायेंगे कुछ दिन में तब मेरा काम कम हो जायेगा। हमें लगा रवि रतलामी जी और हमारा दोनों का काम हो गया है। उन्होंने तारीफ कर दी हम विनम्रता से सकुचा गये। लेकिन बाद में रत्नाजी ने भी दबाव बढ़ाया कि नारदजी आ ही गये हैं तो अब काहे उधम मचा रहे हो! हम इस बाउंसर को भी गर्दन झुकाकर ‘डक’ कर गये यह सोचकर कि शायद रत्नाजी ने इसलिये भी ऐसा लिखा कि कहीं रविरतलामी जी अकेलापन न महसूस करनें लगें हमारी- तारीफ और नारदजी के बारे में अपने विचार के संबंध में।
अल्ला-अल्ला,खैर सल्ला मनाते हुये हम चुप हो गये कि तब तक रवि रतलामी ने अपना दूसरा मार दिया:-
…नारद फिर से बढ़िया काम करने लगा है,बेहतर है चिट्ठा चर्चा सप्ताह में एक बार पठनीय पोस्टों का विवरण दें, नाकि नारद पर आने वाली पोस्टों की “रनिंग कमैन्टरी”…
मेरा यही कहना था. जिन्हें जो चिट्ठा पढ़ना है, वे तो ढूंढ कर पढ़ेंगे, फरमाइशी लिखवाएँगे. जिन्हें नहीं पढ़ना है, कितनी ही चर्चा कर लें, नहीं ही पढ़ेंगे.
पुनर्विचार हेतु आवेदन प्रस्तुत
अब तारीफ़ की बात खत्म और मुद्दे की बात शुरू हो गयी थी कि नारद के आने पर चिट्ठाचर्चा की क्या जरूरत! गोया नारद और चिट्ठाचर्चा एक म्यान में दो तलवारे हों। हमें अगर आश्चर्य भी हुआ हो तो किंआश्चर्यम्।
अभी हम जवाब देने के लिये ‘डू आर नाट टु डू’ के अर्दभ में फंसे ही थे कि उधर से सृजन शिल्पी जी ने अपना ह्र्दय मुक्त कर दिया और तारीफ करके हमें फुला दिया। चूंकि वे हमारे शुभचिंतक भी हैं इसलिये उन्होंने हमें फूलकर गुब्बारा होकर फूटने से बचाने के लिये हमें बहुत काबिल मानते हुये अपेक्षाऒं का जुआं हमारे ऊपर धर दिया:-

चिट्ठों की गुणवत्तापरक ‘रेटिंग’ तय करने का दायित्व ‘चिट्ठाचर्चा’ के लेखकों का है। ‘चिट्ठाचर्चा’ पर ऐसी समीक्षा किस काम की, जब उसको पढ़ने के बाद पाठक मूल चिट्ठे पर जाकर किसी पठनीय प्रविष्टि को पढ़ने के लिए प्रेरित न हो सकें!

यह चुनौती ऐसी थी कि हमारे रवि भाई भी ‘बूहूहू’ करने लगे।
हालांकि सृजनशिल्पी जी कुछ भी गलत नहीं लिखा था। कुछ तथ्यात्मक चूक के अलावा उनकी सारी बातें काबिले गौर और उत्साह बढा़ने वाली थीं लेकिन हमारे भैये पंकज( कहीं फिर नाम न गड़बड़ा गया हो) को कुछ ऐसा लगा कि सृजनशिल्पी के यह कहने का मतलब यह है कि चिट्ठाचर्चा के स्तर में कुछ लोचा है और इसके लिये वे भी कहीं न कहीं जिम्मेदार हैं। कुछ खिन्न से भी थे वे यह सोचकर। पंकज की खिन्नता देखकर हमें तत्काल कन्हैयालाल नंदन की कविता याद आई। इस कविता में अर्जुन भगवान कृष्ण से (जब वे अर्जुन से यह कहकर कि तुम्हारे योग और क्षेम का वहन मैं करूंगा कहते हुये युद्ध् करने के लिये उपदेश देते हैं) कहते हैं :-
योग और क्षेम के
ये पारलौकिक कवच मुझे मत पहनाऒ
अगर हिम्मत है तो
खुलकर सामने आऒ
और जैसे मेरी जिंदगी दांव पर लगी है
वैसे ही तुम भी लगाओ।
मतलब कि हम सृजनशिल्पी जी से कहें कि भैये, आप हमें रास्ता बताये हो तो आगे भी चलो और बताओ कि कैसे लिखा जाये चिट्ठाचर्चा (और हमने अनुरोध भी किया) लेकिन उनकी पोस्ट की भावना को उचित समझकर हमने ऐसा करना उचित नहीं समझा। इस बारे में अपना लिखने का विचार मटिया दिया।
शाम होते-होते हमारे कुंडलियाकिंग समीरलालजी की भगवान से मुलाकात पढ़ी। यहां भी नारद जी वीणा बजा रहे थे और चिट्ठाचर्चा के साथ एकता के गीत गा रहे थे। जब सब तरफ से हम एक हैं, हममें कोई झगड़ा नहीं है, की चहल-पहल होती है तो स्वाभाविकत: लोग सूंघते हैं माज़रा क्या है! हमने भी सोचा बात क्या है भाई!
आज राकेश खंडेलवाल जी के द्वारा कविता में चिट्ठाचर्चा देखकर मन बहुत खुश हुआ और मन किया कि एक पोस्ट इसी खुशी में काहे न लिखी जाये!
पहले कुछ तथ्यात्मक बातें बता क्या, दोहरा दें, तो बेहतर रहेगा।
चिट्ठाचर्चा की शुरुआत गतवर्ष जनवरी में हुयी थी। इसकी शुरुआत के कारण और परिस्थितियां इसकी पहली पोस्ट में बताये गये हैं। उस समय न नारद शुरू हुआ था न देसीपंडित। शुरू में यह मासिक सा था और काफ़ी दिन हम अकेले इसे लिखते रहे। जीतू, अतुल, देबू, रमणकौल समय-समय पर इसमें कुछ न कुछ योगदान देते रहे। पहले हम यह करते थे कि बारी-बारी से अपने-अपने हिस्से का लिखकर एक ही पोस्ट में प्रकाशित कर देते थे। धीरे-धीरे साथियों का उत्साह कम होता गया और यह अनियमित होता गया।
फिर देबाशीष ने इसे चिट्ठाविश्वमें लगाया और वह कुछ दिन वहां दिखता रहा और लोगों को कुछ रुचि हुयी। उस समय भी मुख्य रूप से मैं और देबाशीष ही इसे लिखते रहे।
बाद में नारद के आने पर मुझे यह अप्रासंगिक लगने लगा (जैसे अभी आपको लग रहा है रवि भाई)। इसका कारण मेरा अकेले लिखना और लोगों की कोई प्रतिक्रिया न होना था। मैंने सोचा कि क्या बेकार लोगों को परेशान करूं! और मैंने इसे लिखना बंद कर दिया।
कुछ दिन बाद मुझे फिर से लगा कि मेरा सोचना शायद सही नहीं था और यह चलना चाहिये। उस समय मेरा विचार विस्तार से कुछ पोस्टों की चर्चा/समीक्षा करने का था( जैसी शायद आपकी सोच/सुझाव है सृजनशिल्पीजी)। हम अपना शिल्प/अंदाज़ तय कर सकें तब तक नारदजी बैठ गये और समय की मांग के अनुसार हमारी प्राथमिकतायें बदलीं तथा हम लोगों के लिये नये प्रकाशित होने चिट्ठों की जानकारी देने का जरिया बन गये। और यही कारण शायद रहा कि कुछ साथी चिट्ठाचर्चा को नारद की अनुपस्थिति में हुई अस्थायी व्यवस्था मात्र मानते हैं।
उस दौरान हम लोग लगभग तीन सौ ब्लाग रोज देखते रहे और नयी पोस्टों की चर्चा का प्रयास करते रहे। यह वाकई मेहनत का काम था और हम लोग यह करते रहे तो सिर्फ इसलिये कि लोगों तक नये लिखे चिट्ठों की जानकारी पहुंचाने का काम कर सकें। इस काम से मिला सुकून ही हमारे लिये बहुत था। फिर जीतू की नारद की टेस्ट साइट से हमारा काम और भी आसान हो गया। लेकिन अभी भी एक पोस्ट लिखने में दो-तीन घंटे लग ही जाते हैं।
अतुल तो हमारे साथ पहले से ही थे फिर समीरलाल, रविरतलामी, पंकज बेंगाणी के जुड़ने से इसमें विविधता आयी। सच तो यह है कि इनके और अब आज राकेश
खंडेलवाल जी के जुड़ने से मुझे इसके महत्व का अंदाजा लगा। यह भी अहसास हुआ, फिर से, कि साथ में- मिलजुलकर काम करने का मजा ही कुछ और है। अकेले में आप कितने ही बड़े तीसमार खां क्यों न हों आप रहते अकेले ही हैं। न कोई आपकी खुशी में शरीक होता है और न ही कोई आपके दुख बांटता है।
प्रसंगवश बता दूं कि राकेशजी को लिंक लगाने की जानकारी अभी नहीं थी। इसकी कमी पूरी की समीरलाल जी ने और फोन से या न जाने कैसे-कैसे उनको बताया कि ऐसे लिंक लगायें और ऐसे फोटो तब उन्होंने आज यह किया।
हमारे नयन दुलारे बोले तो ‘ब्लू आइड व्बाय’, पंकज बेंगाणी के माध्यम से हमें पता चला कि गुजराती में भी गजलें लिखीं जाती हैं और उनकी पोस्ट पर तमाम नये गुजराती चिट्ठाकार आभार प्रकट कर रहे हैं तथा यह पूछ रहे हैं कि उर्दू से गुजराती शब्दकोष कैसे बनायें। नारद या अन्य किसी आटोमैटिक व्यवस्था में इस तरह की गुफ्तगू शायद न हो पाये या कम हो।
देबाशीष हमारे छटपटा रहे हैं कि उनके घर में अभी नेट नहीं उपलब्ध है और इसीलिये न वे बावजूद तमाम तैयारियों के निरंतर निकाल पा रहे हैं और न ही चिट्ठाचर्चा में योगदान दे पा रहे हैं। कुछ दिन मे हर शनिवार वे चिट्ठाचर्चा में योगदान देंगे। आजकल देबू आफिस में कुछ ज्यादा ही व्यस्त हैं और एकाध दिन तो रात के तीन बजे घर पहुंचे। इसके बावजूद उन्होंने चिट्ठाचर्चा के टेम्पलेट में आकर्षक बदलाव किया।
अभी तक नारद के पुनर्जन्म में लगे रहे हमारे जीतेंद्र चौधरी इसी इतवार से चिट्ठाचर्चा में अपनी पारी की दुबारा शुरुआत करने वाले हैं। पहले भी वे हिंदी में लिखने के अलावा सिंधी ब्लाग और फोटो ब्लाग के बारे में लिखते थे।
इस तरह हमारे सामान्य हालत मे मेरे जिम्में हफ्ते में केवल एक ही दिन बचा है-गुरुवार। वह मैं आराम से कर सकता हूं।
साथी लोगों की इतनी जुड़ाव की भावना के बाद हमें कहां से यह हक है कि हम चिट्ठाचर्चा बंद कर दें? हम कैसे कह दें कि अब हम केवल धांसू पोस्ट लिखेंगे-
चिट्ठाचर्चा नहीं। हमारा ऐसा कोई अधिकार नहीं बनता। सच तो यह है कि हमारे सभी साथी दिग्गज हैं और उनका अपना पाठक वर्ग है। चाहे वे कुंडलिया किंग, समीरलाल हों या व्यंजल नरेश रविरतलामी, पंकज के ताऊ जीतेंन्द्र चौधरी हों या इंडीब्लागर विजेता अतुल, गीत सम्राट राकेश खंडेलवाल हों या फिर हिंदी ब्लागजगत के पितामह की नाम-उपाधि से विभूषित देबाशीष चक्रवर्ती, हमारे मास्टर साहब पंकज बेंगाणी या फिर हम बोले तो फुरसतिया ही काहे न हों सबका अपना-अपना पाठक वर्ग है और यह हो ही नहीं सकता कि ऐसे लोग मन से किसी सामूहिक काम में जुटे और वह काम न हो या स्तरहीन हो।
पता नहीं कैसे लोगों को यह लगा कि नारद के आने से चिट्ठाचर्चा बंद हो जाना चाहिये। नारद का मह्त्व अलग है, चिट्ठाचर्चा के उद्देश्य अलग हैं। दोनों बराबरी और तुलना की बात करना मेरे ख्याल में दोनों के साथ अन्याय करना होगा। अगर समानता की बात ही करें तो शायद यह कहना ठीक होगा कि अगर नारद एक लोकप्रिय और जरूरी समाचार पत्र है तो चिट्ठाचर्चा उसका तीसरा पन्ना मतलब सम्पादकीय पेज। दोनॊं का अपना महत्व है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं न कि एक दूसरे के स्थानापन्न।
नारद में अन्य तमाम सूचनाऒं के साथ-साथ नयी पोस्टों का विवरण रहता है। यह आटोमैटिक और यांत्रिक है जबकि चिट्ठाचर्चा व्यक्तिपरक है। हर एक को उत्सुकता रहती है कि चिट्ठाचर्चा में मेरी पोस्ट के बारे में क्या लिखा चर्चा करने वाले ने? आदि चिट्ठाकार आलोक को उत्सुकता रहती है कि आज की टिप्पणी में क्या आया और आज का फोटो में किसकी फोटो है? अगर चिट्ठाचर्चा में हम केवल हिंदी चिट्ठोंकी बात करें तो नारद से तुलना ठीक भी है लेकिन उसमें तो हम अंग्रेजी चिट्ठे की भी चर्चा करते हैं और पोस्टसीक्रेट जैसे ब्लाग के बारे में भी जानकारी देते हैं।
पहले हमें लगता था कि इसे हिंदी तक ही रख पायेंगे लेकिन अब पंकज के गुजराती ब्लाग की चर्चा से लगा कि हम सारी भारतीय भाषाऒं के ब्लाग की चर्चा हिंदी में कर सकते हैं और मेरे ख्याल से करना भी चाहिये। अफलातूनजी शायद किसी उड़िया ब्लागर को पटा भी रहे हैं।
तो मुझे तो नहीं लगता कि ऐसे में जबकि हमारे सबसे बेहतरीन चिट्ठाकार चिट्ठाचर्चा से जुड़े़ हों और सक्रिय हों तो इसे बंद करने की बात सोची जानी चाहिये।
अब बात समीक्षा की। जैसे शिल्पी जी कीचिंताथी। मेरा मानना है कि समीक्षा हमेशा व्यक्ति सापेक्ष होती है।
यह सही है कि ब्लाग के संदर्भ में अभी इसका मानकीकरण नहीं हुआ है लेकिन अगर ध्यान से चर्चायें देखें तो चर्चा करने वाले के रुझान और बेहतर पोस्ट और आम पोस्ट का अंतर साफ दिखता है चर्चा में। मेरी एक पोस्ट में जब मैं विस्तार से प्रत्यक्षाजी और फिर मनीष की पुस्तक चर्चा वाली पोस्ट की चर्चा करता हूं तो अनजाने में ही मैं एक रेखांकित करने वाली पोस्ट का जिक्र करके उसको उल्लेखनीय बता रहा हूं। अनुदित और दूसरे लेखकों की रचनाऒं पर मौलिक पोस्ट की तुलना में कम चर्चा होती है मेरे ख्याल में। तो ये समीक्षा के सिद्धांत अनजाने में पालन किये जा रहे हैं।
समीक्षा के विचार व्यक्ति परक होते हैं इसका उदाहरण अभी पिछले दिनों दिखा। वागर्थ के नवलेखन विशेषांक में चर्चित युवा लेखक कुणाल सिंह की एक कहानी छपी थी- साइकिल। इस कहानी में नायक युवा है और वह अपनी प्रौढ़ा, विधवा चाची की तुलना साइकिल से करता है और यौन संबंध भी (जहां तक मुझे याद है)बनाता है। इस कहानी के शिल्प, कथा शैली और बोल्डनेस पर प्रख्यात कथाकार काशीनाथ सिंह मुरीद से हो गये और कहानी तथा लेखक की बहुत तारीफ की।
कुछ अंक बाद ही एक युवा आलोचक ने कहानी की सोच, काशीनाथ सिंह की समझ की आलोचना की तथा यह बताया कि कहानी पतनशील मूल्यों की स्थापना करती है और जाने-अनजाने एक महिला को साइकिल के बराबर खड़ा कर देती है। यह् अंदाज़ सब कुछ बिकाऊ है की बाजारू सोच की स्थापना करता है और भारतीय समाज में, जहां चाची का दर्जा मां के बराबर है, गलत संस्कारों को बढ़ावा देने का कारण बनता है। इसी तरह की और तमाम बातें बताकर एक युवा आलोचक ने तमाम बुढ़ऊ कथाकारों, आलोचकों के, मेरी समझ में, धुर्रे उड़ा दिये और अभी तक उस समीक्षा के जवाब में कुछ नहीं छपा है।
तो मेरा तो यही मानना है कि समय सारी दिशा तय करेगा। जो ब्लाग बंद किये जाने की घोषणा करने के बाद नियमित हो जाये और जिस ब्लाग से हिंदी ब्लाग जगत के वो धुरंधर जुड़े हों जिनका लेखन, योगदान अपने आप में मिसाल हो, उसके बारे में और तमाम अटकलें लगाई जा सकती हों लेकिन बंद करने की बात करना किसी एक के लिये मुमकिन नहीं है।
यह पोस्ट बावजूद तमाम सावधानियों के कुछ गरिष्ठ हो गयी है। लेकिन अब हो गयी तो हो गयी -क्या करें?
हमारे नियमित लेखक साथी हैं:-
रवि रतलामी- सोमवार
राकेश खण्डेलवाल-मंगलवार
समीरलाल- वुधवार
अनूपशुक्ला- गुरुवार
अतुल अरोरा- शुक्रवार
देबाशीष चक्रबर्ती-शनिवार
जीतेंन्द्र चौधरी-रविवार
पंकज बेंगाणी- हरवार, जब मन करे तब जिसमें मन करे(हिंदी/गुजराती) उसमें
यह सामान्य दिन हैं। इसके अलावा भी किसी के भी लिखने पर न कोई दिन का बंधन है न पोस्ट की संख्या पर। कभी भी लिखें,कितना भी लिखें।
यह पोस्ट खत्म करने के पहले एक बात अतुल की तरफ़ से। अतुल का सोचना है कि प्रतिदिन अच्छी पोस्ट का चुनाव होना चाहिये और फिर उनमें से माह/ साल की सबसे अच्छी पोस्ट का चुनाव किया जाये और उस चिट्ठाकार को सम्मानित किया जाये, इनाम दिये जायें।
आपकी क्या राय है इस मुद्दे पर? किया जाय यह सब? अगर हां तो कैसे? अगर नहीं तो क्यों?
इसके अलावा और किसी मुद्दे पर आपकी कोई राय/सुझाव है क्या चिट्ठाचर्चा को और उपयोगी,बेहतर बनाने के लिये?
मेरी पसंद
गीत !
हम गाते नहीं तो
कौन गाता?

ये पटरियां
ये धुआं
उस पर अंधेरे रास्ते
तुम चले आओ
यहां
हम हैं तुम्हारे वास्ते।
गीत !
हम आते नहीं तो
कौन आता ?
छीनकर सब ले चले
हमको
हमारे शहर से
पर कहां सम्भव
कि बह ले
नीर
बचकर लहर से।
गीत !
हम लाते नहीं तो
कौन लाता?
प्यार ही छूटा नहीं
घर-बार भी
त्योहार भी
और शायद छूट जाये
प्राण का आधार भी।
गीत
हम पाते नहीं
तो कौन पाता?
-विनोद श्रीवास्तव

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

17 responses to “चिट्ठाचर्चा,नारद और ब्लाग समीक्षा”

  1. राम चन्द्र मिश्र
    शुक्ल जी,
    चिट्ठा चर्चा पढ़ना बहुत मनोरंजक लगता है, और शायद इसीलिये मैने आपकी ये पोस्ट पूरी पढी!
    सबसे अच्छी पोस्ट के चुनाव का विचार अच्छा है साथ ही लेखन की विविधता के लिहाज से कम से कम तीन श्रेणियोँ से चुनाव हो, हर श्रेणी के लिये अलग समय-क्षेत्र(साप्ताहिक-त्रैमासिक)निर्धारित किया जा सकता है।
  2. समीर लाल
    सबसे अच्छी पोस्ट का विचार सही है मगर स्तर और चुनने की प्रक्रिया पर विचार करना होगा ताकि सर्वमान्य रहे.
    सब कुछ आम सहमती और सर्व सम्मती पर आधारित होना चाहिये, ऐसी मेरी मान्यता है.
  3. प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह
    मैने आपका यह पूरा लेख पढा है, तथा आपके विचारो को समझने का प्रयास भी किया। इस पर मेरे उक्‍त विचार है यह है-
    1. जो लोग चिठ्ठा चर्चा को बन्‍द करने या मासिक करने विचार कर रहे है उनसे एक प्रश्‍न है, क्‍या घर मे द्वितीय पुत्र के आगमन के बाद प्रथम पुत्र की उपयोगिता समाप्‍त हो जाती है? चाहे नारद हो या नारायण चिठ्ठा चर्चा का अपना महत्‍व है।
    2. नारद एक स्‍वाचलित प्रणाली पर आधारित है वह कभी भी तौबा बोल सकता है। किन्‍तु चिठ्ठा चर्चा एक व्‍यक्ति परक है, यह तब तक चलता रहेगा जब तक लिखने वाला व्‍यक्ति तौबा न बोले। यह परिस्थितियां नारद के साथ कभी भी आ सकती है। मुझे नही लगता है कि नारद के आने से चिचा की लोकप्रियता मे कोई कमी हुई है। औसत 4-6 टिप्‍पणी रोजना होती है।
    3. कुछ चिठ्ठे एसे है जो किसी कारण से नारद पर स्‍थान नही पा सके है। ऐसे मे चिठ्ठा चर्चा श्रेष्‍ठ माध्‍यम है अपनी अभिव्‍यक्ति कोे सबके सम्‍मुख रखने के लिये। अत: जो नारद पर ही निर्भर है, उनके लिये चिठ्ठा चर्चा की उपयोगिता न होगी पर जो निर्भर नही है। उनके लिये तो यही माध्‍यम है।
    4 चिठ्ठा चर्चा एक संगम है जहां भिन्‍न भिन्‍न लोग मिल कर लिखते है। कोई कितना बडा तरण-ताल आपने घर मे लगा ले किन्‍तु मैली गंगा के संगम मे स्‍नान का महत्‍व कभी भी कम नही होता है। उसी प्रकार चिठ्ठा चर्चा भी भिन्‍न-2 चिठ्ठो की मैल(पाठ्य सामग्री तथा चित्रो) हमारे समने लाता है और हम इसमे स्‍नान करके ज्ञान मोक्ष प्राइज़ करते है।
    5. जिसे चिठ्ठा चर्चा पढना होगा वह पढेगा, जिसे नही पडना होगा नही पढेगा यही बात लिखने वालो पर भी लागू होती है, मुझे नही लगता है कि इस विशय पर इतना लम्‍बा लेख लिखने की अवश्‍यक्‍ता थी। चिठ्ठा चर्चा के अपना अधार और अपने पाठक है। मै नही मानता हू कि नारद के आने से इसका महत्‍व समाप्‍त होगया है।
  4. प्रत्यक्षा
    हम भी हिमायती हैं कि चिट्ठा चर्चा चलती रहनी चाहिये । आजकल जो पहला पोस्ट मैं पढती हूँ वह चिट्ठा चर्चा ही है ।शायद काफी साथी ऐसा ही करते होंगे ।
  5. पंकज बेंगाणी
    बाबा रे !!
    लग गई मेरी तो :(
    आपके ब्लु आई बोय की आई बनी! सब डिक्लेर कर दिया :)
    “मत चुको चौहान” से अब तो “लो भुगतो चौहान” हो गए.. लागे है।
    शिल्पी महोदय चिट्ठाचर्चा को तराश कर सँवारने का अति महत्वपूर्ण एवं स्वागत योग्य कार्य कर रहे थे। वे योग्य भी हैं। वो मुझे पकडें उससे पहले मैं चला हिमालय!!
  6. संजय बेंगाणी
    आज सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला चिट्ठा हैं ‘चिट्ठाचर्चा’. फिर क्यों बन्द किया जाए?
    क्या इसे प्रतिदिन दो बार नहीं लिख सकते?
  7. SHUAIB
    चिट्ठा चर्चा को मैं बहुत शौक से पढता हूं, दुआ है के वो ऐसे ही जारी रहे – रही बात रविरतलामी जी की, शायद उन्हों ने आपसे हमदर्दी से कहा होगा के आप हर दिन इतनी सारी महनत करते हैं।
  8. जीतू
    अरे भई,
    चिट्ठा चर्चा अपनी जगह है, नारद अपनी जगह। जहाँ नारद एक ट्रेलर(प्रिव्यू) यानि पूर्वावलोकन है, चिट्ठा चर्चा रिव्यू, भले ही संक्षेप मे हो। चिट्ठा चर्चा जारी रहना चाहिए, मै तो कहता हूँ इसमे सभी भाषा के चिट्ठों का समावेश वो। लेकिन इसके लिए टैगिंग जरुर करो, ताकि जिसको जिस भाषा के पढने हो, उस भाषा का चिट्ठा चर्चा तुरन्त दिखे उसे। इस रविवार से हम भी जुटेंगे, उसके पहले थोड़ी नैट प्रैक्टिस करने के वास्ते शायद किसी और दिन के भी लिख डालें। फुरसतिया जी इस नैट प्रैक्टिस को कहाँ डालें, अपने ब्लॉग पर या चिट्ठा चर्चा पर।
  9. सागर चन्द नाहर
    मैं तो कब से ही कह रह था रोजाना एक अच्छी पोस्ट के बारे में, जरूरी नहीं कि इनाम ही दिया जाये, चिट्ठाचर्चा के धुरंधर किसी चिट्ठे की तारीफ़ करे, यह किसी इनाम से कम होगा क्या?
    मासिक या वार्षिक बेहतरीन चिठ्ठे को इनाम देने का विचार अच्छा है।
  10. bhuvnesh
    मुझे तो लगता है नारद की अनुपस्थिति में चिठ्ठाचर्चा ने उसके सब ग्राहक झटक लिए। चिठ्ठाचर्चा में चिठ्ठों की जो विवेचना है वह मनोरंजक है और पढने को प्रेरित करती है।
  11. प्रियंकर
    पोस्ट लिखते रहें यह तो सब चाहेंगे .पर ‘चिट्ठा चर्चा’ का बंद होना प्रतिगामी कदम होगा . पता नहीं रवि जी ने इसे किस संदर्भ में कहा है . वह भी करबद्ध करके और प्राथना के जरिए . बड़ा धर्मसंकट है . पर जब काशीनाथ सिंह कुणाल की वस्तुवादी, शैली-प्रधान और शॉविनिस्टिक कहानी पर गड़बड़ा सकते हैं तो यह विशेषाधिकार आदि चिट्ठाचार्य रवि रतलामी का भी बन जाता है . सो यदि फ़ुरसतिया जी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन न हो रहा हो तो निर्णय लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ही होना चाहिए और तब मुझे लगता है कि बहुमत इसके जारी रहने के पक्ष में ही होगा .आमीन !
  12. rachana
    अनूप जी, मुझे चिट्ठा चर्चा बहुत पसँद है…आशा ही नही विश्वास भी करती हूँ कि ये बन्द नही होगी!
    मेरे जैसे नये लोगों के लिये ये बडी उपयोगी है.सच कहूँ तो इसके माध्यम से ही मै कई अच्छे हिन्दी चिट्ठों तक पहुँची हूँ,जिन्हे अन्यथा मै शायद नही पढती..धन्यवाद..
  13. रवि
    लगता है इस दफ़ा भी मुझसे अपनी बात स्पष्ट रुप से कहने में कहीं चूक हो गई.
    अकसर हम कहना कुछ चाहते हैं, कह कुछ देते हैं और उम्मीद करते हैं कि सामने वाला हमारे हिसाब से समझ ही नहीं रहा है!
    मैंने चिट्ठा चर्चा बन्द करने के लिए कभी नहीं कहा.
    मैंने तो कहा था कि सप्ताह में चार-चार चिट्ठा चर्चा लिखकर अपनी ऊर्जा गंवाने के बजाए फुरसतिया धमाकेदार चिट्ठा लिखने में लगाएँ तो ज्यादा उत्तम होगा. मैंने मार्क किया है कि जब चिट्ठा चर्चा लिखा जाता है, तो पोस्ट लिखने के लिए समय का टोटा पड़ता ही है. फिर या तो आप चिट्ठा लिखें या चिट्ठा चर्चा. भई, मैं तो सप्ताह में चार दिन फुरसतिया का चिट्ठा चर्चा पढ़ने के बजाए चार दिन उनका लिखा पोस्ट पढ़ना चाहूँगा. और अगर साथ में मुफ़्त चर्चा भी पढ़ने मिले तो बात ही क्या!
    शायद बात कुछ स्पष्ट हुई होगी. :)
  14. मनीष
    अब अगर नारद आ गया है या आने वाला है तो क्यूँ ना चिट्ठा चर्चा का स्वरूप बदला जाए ।
    चिट्ठा चर्चा में जितने लेखक हैं उन्हें उनकी रुचि के हिसाब से एक एक, दो क्षेत्र दे दिया जाएँ जैसे कविता, साहित्य, करेंट अफेयर, व्यंग्य, विज्ञान , यात्रा , फिल्म आदि आदि । हफ्ते में जब भी उनकी बारी आए वो अपने क्षेत्र के विषयों के हिसाब से पिछले हफ्ते के चिट्ठों की समीक्षा करें ।
  15. राकेश खंडेलवाल
    टिप्पणियां पढ़्पढ़ कर सारी आश्वासित मैं हुआ अंत में
    एक बार की कविता से ही, चर्चा बंद नहीं है होगी
    हर मंगल अब झेलें कविता, चारा कोई शेष नहीम है
    नाम हुआ जो शामिल मेरा, सूची मेम बन कर सहयोगी
  16. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] 3.गलत हिंदी लिखने के कुछ सरल उपाय 4.चिट्ठाचर्चा,नारद और ब्लाग समीक्षा 5.मूंदहु आंख कतहुं कछु नाहीं 6.अपनी [...]
  17. प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI
    हम भी हिमायती हैं कि चिट्ठा चर्चा चलती रहनी चाहिये !!!