Sunday, December 29, 2013

घूसखोरों की धरपकड़ के कुछ सीन

http://web.archive.org/web/20140209180510/http://hindini.com/fursatiya/archives/5328

घूसखोरों की धरपकड़ के कुछ सीन

bribeकल दिल्ली के मुख्यमंत्री जी ने घोषणा की – कोई अगर घूस मांगता है तो उससे सेटिंग करो। हमको बताओ। हम उनको जेल भेजवायेंगे।
इस घोषणा पर अमल कैसे होगा यह तो समय बतायेगा लेकिन कुछ सीन ऐसे बन सकते हैं:
सीन 1: सुबह-सुबह घूस पकड़ने वाले महकमें में फ़ोन आयेंगे-साहब हमसे घूस मांगी जा रही है। कनाट प्लेस पर मिलना तय हुआ है। आइये पकड़वाइये आकर।
जबाब दिया जायेगा- अच्छा अभी भेजते हैं। कित्ते पर बात तय हुई है?
अरे बात तो पांच सौ पर तय हुई है। हम राजी भी थे। लेकिन एक दिन के लिये बाहर चले गये। इस बीच ‘आप’ की सरकार बन गयी। आपने घोषणा भी कर दी। तो रेट डबल हो गये। हजार तो हम न दे पायेंगे। आप आइये घूस लेने वाले को पकड़वाइये। हमारा काम करवाइये।
पुलिस वाला भुनभुनाते हुये कहेगा- आप एक हजार देने को तैयार कैसे हो गये? क्या आपको पता नहीं है कि घूस लेना और देना दोनों अपराध हैं?
शिकायत कर्ता कहेगा- अरे सब पता है साबजी। लेकिन हमें क्या पता था कि आपकी सरकार बनेगी और घूस लेने वालों को पकड़वाना इत्ता आसान हो जायेगा। अब जब सरकार सुविधा दे रही है तो सोचा उसका उपयोग करने में क्या हर्जा? ट्राई कर लेते हैं।
पुलिस वाला भुनभुनाते हुये कनाट प्लेस के लिये निकलेगा। जाड़े की सुबह-सुबह थाने से एक हजार की घूस पकड़ने के लिये निकलना। नौकरी जो न कराये।
कनाट प्लेस पर ‘घूस घटना स्थल’ पर मुस्तैद होकर पुलिस वाले घूस देने का इशारा करेगा! घूस देने वाला देने की कोशिश करेगा। सरकारी आदमी उसको झिड़क देगा। ये क्या नाटक है भाई! जायज काम के बदले हमें घूस देने की कोशिश कर रहे हो? जाते हो या बुलायें पुलिस को?
लेकिन देने वाला भी देने की जिद पर अड़ा हुआ है। मजबूरन लेने वाल थाने फ़ोन करेगा- साहब ये एक आदमी हमको सुबह से घूस की पेशकश कर रहा है। सुबह पांच सौ से शुरु हुआ था अब एक हजार तक पहुंच चुका है। आप जल्दी से आइये हमको बचाइये वर्ना ये कहीं जबरदस्ती हमको घूस न दे डाले।
थाने वाले कनाट प्लेस गये सिपाहियों को फ़ोन करके जबरिया घूस देने वाले को भी पकड़ने की हिदायत दें देंगे। पुलिस वाले झल्लाकर दोनों को अन्दर कर देंगे। एक को घूस लेने के आरोप में, दूसरे को जबरिया घूस देने के आरोप में। एक ही केस में डबल उपलब्धि।
सीन 2: घूस की सूचना देने वाले ने पुलिस वालों को कनाट प्लेस बुलवाया है। पुलिस चल चुकी है। लेकिन पुलिस की गाड़ी जाम में फ़ंसी हुयी है। लाल बत्ती विहीन गाड़ी को टैफ़िक भी कोई भाव नहीं दे रहा है। ड्राइवर ट्रैफ़िक वाले को हड़काता है कि जल्दी निकालो हमें घूस देने वाले को पकड़ना है। ट्रैफ़िक वाला कहेगा अरे भाई साहब पीछे देखिये आपकी गाड़ी के पीछे मुख्यमंत्री की गाड़ी है। आपको जल्दी निकलवा कर हमें अपनी नौकरी थोड़ी गंवानी है। पुलिस वाला थाने फ़ोन करेगा – साहब जाम में फ़ंसेगा। सेटिंग का टाइम निकला जा रहा है। बताइये क्या करें? थाने वाला लोकेशन पूछकर कहेगा- अच्छा तुम कनाट प्लेस वाली घूस छोड़ दो। वो पहाड़गंज वाली टीम को सौंप देते हैं। तुम अगले चौराहे वाली घूस को कवर कर लो। बड़ी घूस है। अच्छा कवरेज मिलेगा।
सीन 3: सचिवालय, ट्रांसपोर्ट आफ़िस, सेल्स टैक्स के दफ़्तर वाले अपनी बिल्डिंग के पास थाने की मांग के लिये हड़ताल करेंगे। उनकी मांग है कि घूस के पेशकश करने वाले इत्ते ज्यादा हैं कि शिकायत करने के बावजूद पुलिस तय समय पर पहुंच नहीं पाती। मजबूरन उनको काम करके देना पड़ता है। लोग जबरियन पैसे थमा देते हैं। घूस देने वालों से सुरक्षा के लिये थाना बगल में होना चाहिये ताकि पुलिस फ़ौरन आकर घूस देने वालों को पकड़ सके। जब तक थाने की व्यवस्था नहीं होगी -काम बन्द हड़ताल जारी रहेगी।
सीन 4: फ़ोन कंपनियां अपना विज्ञापन करते हुये बतायेंगी कि कैसे उनके मोबाइल से फ़ोन करने पर पुलिस वाले फ़ौरन हरकत में आते हैं। बाकी मोबाइल कम्पनियों का नेटवर्क घूस की शिकायत करने के नाम पर बिजी हो जाता है।
सीन 5: घूस लेने देने के चक्कर में घूस बिचौलियों की संख्या बढ़ जायेगी। ऐसी स्वयं सेवी संस्थायें खुल जायेंगी जो लेन -देन के काम को बिना किसी खतरे के आपके लिये अंजाम देंगी। सस्ती दरों में। उन संस्थाओं के विज्ञापन ऐसे हो सकते हैं- सेल्स टैक्स दफ़्तर से बिना घूस दिये अपना काम करवाइये, प्लॉट रजिस्ट्री के लिये संपर्क करें, कानून के अनुसार काम कराने के लिये तत्पर विश्वसनीय संस्था।
क्या पता इस धरपकड़ अभियान में बातचीत के बाद सरकार को पता चले कि तमाम निर्दोष लोग फ़ंस गये हैं। उनके मामले में निपटारे के लिये सरकार एस.एम.एस. करके जनता की राय लेगी। पूरा किस्सा ईमानदारी से बताते हुये जनता से पूछा जायेगा- बताइये इनको मार दिया जाये या छोड़ दिया जाये?
जनता की राय के हिसाब से फ़ैसला किया जायेगा। कुछ लोगों को छोड़ दिया जायेगा और कुछ के खिलाफ़ मुकदमा दर्ज होगा।
क्या पता साल भर के भीतर जन्तर-मन्तर पर एक और आंदोलन शुरु हो जाये। उसका नाम होगा — “एस.एम.एस. मुक्ति आंदोलन!”
आपका क्या कहना है इस बारे में?

3 responses to “घूसखोरों की धरपकड़ के कुछ सीन”

  1. समीर लाल "भूतपूर्व स्टार टिपिण्णीकार"
    “एस.एम.एस. मुक्ति आंदोलन!” – ये आप चला दिजिये और भीड़ लग ली तो अगले मप्र के मुख्य मंत्री आप…:)
    समीर लाल “भूतपूर्व स्टार टिपिण्णीकार” की हालिया प्रविष्टी..नारे और भाषण लिखवा लो- नारे और भाषण की दुकान
  2. देवांशु निगम
    कैसा भी मूड रहे, आपको पढ़ लो चौकस हो जाता है !!! धुआंदार और शानदार पोस्ट !!!
    घूस तो हमारे यहाँ मशीन में डाले गए तेल जैसी मान ली गयी है , डालोगे नहीं तो कुछ चलेगा नहीं | इन सबके बीच अपने केजरीवाल साहब क्या कर गुजरते हैं ये वक़्त बताएगा | बाकी शुरुआत तो बढ़िया है !!! क्या कहते हैं आप ???
    देवांशु निगम की हालिया प्रविष्टी..एक सपने का लोचा लफड़ा…
  3. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    कुछ ऐसे जिद्दी टाइप मुलाजिम हैं जो घूस न पायें तो कलम ही नहीं उठा सकते। ऐसे लोग दफ़्तर जाना ही बन्द कर देंगे। गये भी तो कलम घर छोड़ आयेंगे। किसी ने कलम थमा दी तो फाइल में गलती कर देंगे। यदि गलती से सही काम कर गये तो उनकी तबियत खराब हो जाएगी। अस्पताल में भर्ती कराना पड़ेगा। सरकार को कुछ नामी विभागों के दफ़्तर के आसपास अस्पताल खुलवाना पड़ेगा जहाँ हृदयरोग व साइकियाट्री के विशेषज्ञ रखने पड़ेंगे, इमरजेन्सी वार्ड खोलना पड़ेगा। कुछ कर्मचारियों के लिए घरों में पत्नी से पिटने का खतरा बढ़ जाएगा। बच्चों का विद्रोह भी बढ़ सकता है। सबको खुश करने वाले घूस की गैरमौजूदगी से रिश्ते टूटने की घटनाएं बढ़ेंगी। कौन्सिलिंग का इन्तजाम करना पड़ेगा। इस क्षेत्र में रोजगार के नये अवसर बढ़ेंगे। यही है एक सिल्वर लाइनिंग।
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..कुछ अलग रहेगा नया साल

Saturday, December 28, 2013

कोहरे की रजाई में दुबका सूरज




सूरज कोहरे की रजाई में दुबका है सुबह-सुबह !
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Friday, December 27, 2013

अलग तरह की सादगी

http://web.archive.org/web/20140209184613/http://hindini.com/fursatiya/archives/5290

अलग तरह की सादगी

delhi “सादगी परम परिष्कार है.” – लियोनार्डो दा विंसी
दिल्ली में आम आदमी की सरकार बनने वाली है। पार्टी के लोगों ने ईमानदार सरकार देने का वायदा किया। बड़ा हल्ला मचाया है पार्टी ने ईमानदारी का। लगता है कि ’आप’ लोग ही ईमानदारी के ’अथाराइज्ड स्टॉकिस्ट’ हैं। एकमात्र होलसेल डीलर हैं। कोई कैसे बताये भाई लोगों को कि ईमानदारी कोई गर्व का विषय नहीं है। वह तो होनी ही चाहिये। सार्वजनिक जीवन की मूल आवश्यकता है ईमानदारी।
ईमानदारी के साथ ’आप’ का जोर सादगी पर भी है। सादगी से रहने की बात जितनी ऐंठ से कही जा रही है उससे लगता है ’सादगी का फ़ैशन’आने वाला है। ’वीआईपी कल्चर’ खतम करने की मुनादी हो गयी है। घोषणा सुनते ही ’वीआईपी कल्चर’ बेचारा कहीं कोने में मुंह लटकाये खड़ा ’सादगी की सरकार’ बनते देख रहा होगा।
’वीआईपी कल्चर’ खतम होते ही सब तड़क-भड़क खतम हो जायेगी। मंत्रियों के काफ़िले कम हो जायेंगे। सुरक्षा का ताम-झाम मंहगाई में गरीबों की जरूरतों सा सिमट जायेगा। कारों से लाल बत्तियां उतर जायेंगी। लाल बत्ती उतरने पर कारें सिंदूर पुंछी सुहागन सरीखी दिखेंगी। मंत्री छोटे घरों में रहने लगेंगे। बड़े घर खाली पड़े रहेंगे। ज्यादा दिन चली सरकार तो उन घरों की मरम्मत का खर्चा बढेगा। उनकी मरम्मत का खर्चा सादगी के खाते में जुड़ेगा।
बकौल परसाई जी मंच से मरघटी कवितायें पढने वाले कवि घंटो मेकअप करके तैयारी करके थे जिससे वे लुटे-पिटे और बहदवास दिख सकें। ताकि मरघटी कवितायें असरदार दिख सकें। क्या पता वही हाल सादगी का भी हो। लोग सादगी के लिये हुड़कने लगेंगे। काम के सिलसिले में मंत्रियों से मिलने के लिये आने वाले लोग सादगी से लैस होकर आने लगेंगे। फ़ैशनेबल लोगों को सादे कपड़े पहनते देख उनकी घरैतिनें पूछेगी- फ़िर दिल्ली जा रहे हो? ब्यूटी पार्लर में सादगी के मेकअप होने लगेंगे। ड्रेस डिजाइनर ऐसे कपड़े डिजाइन करने में जुट गये होंगे जिनको पहनकर सादगी खिलती दिखे।
मंत्रियों के आगमन में कालीनें बिछनी बन्द हो जायेंगी। कालीन उद्योग से जुड़े बुनकरों के पेट पर लात पड़ेगी। झालर लगाने वाले बेरोजगार हो जायेंगे। पानी के फ़व्वारे बंद हो जायेंगे। जनरेटर वाले दूसरा धंधा तलासेंगे। सादगी से समारोह होंगे तो ’इवेंट मैनेजरों’ की चुनौतियां बढ जायेंगी कि कैसे इंतजाम करें कार्यक्रमों का ताकि तड़क-भड़क नेपथ्य में रहे। सादगी उभरकर नजर आती रहे।
सादगी के इस हल्ले के बीच आप की सरकार के शपथ ग्रहण की खबर आई है। सुना है रामलीला मैदान में शपथ ग्रहण का कार्यक्रम होगा। छह मंत्रियों के शपथ ग्रहण का कार्यक्रम देखने के लिये लाखों लोग जुटेंगे। मंत्रियों को शपथ लेने में मुश्किल से आधा घंटा लगेगा। एकाध भाषण-वाषण होगा। इस सबके इंतजाम सैकड़ों लोग लगेंगे। सुरक्षा व्यवस्था हो रही है। सीसी टीवी लग रहे हैं। माइक से लैस हो रहा है मैदान। लाखों का खर्चा होगा। मंच से ईमानदारी की हुंकार भरी जायेगी। सादगी की फ़ैशन परेड होगी।
यह कुछ-कुछ ऐसा ही है जैसे कि अपने समाज का गरीब आदमी पेट काटकर बचाये पैसे शादी व्याह के दिखावे में लुटा देता है।
छह मंत्रियों की शपथ ग्रहण के कार्यक्रम में लाखों रुपये फ़ूक देने वाली सादगी एक खर्चीली सादगी है। भव्य सादगी भरा कार्यक्रम करने की बजाय किसी हाल में चुप्पे से शपथ लेकर अपना काम शुरु करने में वो मजा नहीं आता जो लाखों की भीड़ में करने में आयेगा।
यह एक अलग तरह की सादगी है। इसका भी फ़ैशन अब आया ही समझो।

5 responses to “अलग तरह की सादगी”

  1. सतीश सक्सेना
    यार,कट्टा फट्टा भाई !!
    आपको अपना मुंह बंद रखने के लिए क्या चाहिए ?
    फ़िलहाल ब्लॉग परिषद् का अध्यक्ष पद दिया जाता है !
    सतीश सक्सेना की हालिया प्रविष्टी..घर से माल कमाने निकले, रंग बदलते गंदे लोग -सतीश सक्सेना
  2. सलिल वर्मा
    राजनीति में सादगी वैसे भी फोटोजेनिक होती हैं.. लालू जी ने साइकिल से विधान सभा में पदार्पण किया, फ़ोटो खिंचवाई और अगले दिन से लाल बत्ती एरिया सॉरी कलम फिसल गयी.. लालबत्ती गाड़ियों में घूमते नज़र आये.. एक दिन दलितों की बस्ती में जाकर उनके बच्चों को नहलाया, फोटो छपवायी और अगले दिन वो सारी गाड़ियाँ धुलवाईं जिनपर उस बस्ती की गन्दगी लगी हुई थी..
    ईमानदार साहब भी कल मेट्रो से जाने का एलान कर चुके हैं..
    पुनश्च:
    “लाल बत्ती उतरने पर कारें सिंदूर पुंछी सुहागन सरीखी दिखेंगी।”
    इस पर मेरी आपत्ति दर्ज़ की जाये.. सफ़ेद रंगों वाली गाड़ियाँ तो वैधव्य धारण करेंगी!! पहले फ़ैशनेबुल थीं.. अब सिन्दूर गया!!
    सलिल वर्मा की हालिया प्रविष्टी..तुम मुझमें ज़िन्दा हो
  3. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    तो अब सादगी का भव्य प्रदर्शन देखने का मजा मिलने वाला है। कवि कुमार विश्वास कहाँ हैं जी। कुछ कविता हो जाय।
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..दहलीज़ पे बैठा है कोई दीप जलाकर (तरही ग़जल)
  4. arvind mishra
    व्यंगकार का मुंह कभी बंद नहीं हो सकता
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..ह्रदय का रिक्त है फिर एक कोना!
  5. Blog Chiththa
    आपकी इस ब्लॉग-प्रस्तुति को हिंदी ब्लॉगजगत की सर्वश्रेष्ठ कड़ियाँ (27 दिसंबर, 2013) में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,,सादर …. आभार।।
    कृपया “ब्लॉग – चिठ्ठा” के फेसबुक पेज को भी लाइक करें :- ब्लॉग – चिठ्ठा
    Blog Chiththa की हालिया प्रविष्टी..हिंदी ब्लॉगजगत की सर्वश्रेष्ठ कड़ियाँ (27 दिसंबर, 2013)

Thursday, December 26, 2013

सांता क्लॉज की उलझने

http://web.archive.org/web/20140209195544/http://hindini.com/fursatiya/archives/5291

सांता क्लॉज की उलझने

santa1कल क्रिसमस था। क्रिसमस माने बड़ा दिन। मेरी क्रिसमस।
इस मौके पर सांता क्लास के किस्से पढ रहे थे। पता चला कि सांता 24 दिसम्बर की शाम या देर रात के समय के दौरान अच्छे बच्चों के घरों में आकर उन्हें उपहार देता है।
पता नहीं कहां-कहां गया सांता इस बार। पता नहीं किस बच्चे को क्या उपहार दिया। जिनको कुछ दिया वे सही में अच्छे बच्चे हैं या सांता को झांसा देकर उसकी नजरों में अच्छे बन गये। अच्छे बच्चे किस तरह चुनता है सांता यह भी जांच का विषय है। अकेले चुनता है वह अच्छे बच्चे या कोई टीम काम करती है उसके साथ जो उसको सहायता देती है अच्छे बच्चों के चुनाव में। वह कैसे दुनिया भर में अच्छे बच्चे चुन लेता है? वह अच्छे बच्चे चुनने के लिये किस इलाके में जाता है।
जो भी हो लेकिन सांता भला आदमी लगता है। सादगी पसंद भी। सालों से एक ही ड्रेस से काम चला रहा है। उसका दर्जा आलादर्जे का होगा। ऐसे कपड़े सिले कि सालों पहनने के बाद भी नये बने हुये हैं। दाड़ी तक नहीं बनाता। रेजर ब्लेड और सेविंग क्रीम के पैसे बचाकर गरीबो में बांट देता है।
इधर जब से लोकपाल कानून बना तब से मुझे सांता क्लॉज की चिंता सता रही है। लोकपाल भ्रष्टाचार की खिलाफ़ जांच करने का वायदा किया है। मुझे डर है कि सांता क्लॉज की भलमनसाहत से जलने वाला कोई सांता की शिकायत न कर दे लोकपाल से कि इसके पास इत्ता पैसा कहां से आता है जो ये हर साल दुनिया भर के बच्चों को उपहार बांटता रहता है। बड़ी बात नहीं कि शिकायत की जांच के लिये कोई दरोगा सांता को थाने में बैठा ले और उसके खिलाफ़ आय से अधिक संपत्ति का मुकदमा ठोंक दे।
सांता क्लॉज अक्सर बच्चों के घरों में खिड़कियों से उनके लिये उपहार रखता रहा है। ये पुराने जमाने की बात रही होगी जब हर घर में खिड़की होती होगी। एक मंजिल के घर की खिड़की से उपहार गिराना तो आसान काम है। लेकिन आजकल जब इमारतें पचास-पचपन-सौ मंजिला होने लगी हैं तो वहां कैसे पहुंचता होगा सांता? सोसाइटियों के गेट तो बन्द हो जाते हैं रात को, दरबान गेट पर रहता है वहां कैसे घुस पाता होता सांता? सोचकर अचरज होता है।
सांता की भलमनसाहत पर हमें कोई शंका नहीं न उसके इरादे पर। लेकिन लगता है उसका बच्चों में उपहार बांटने का तरीका थोड़ा रूढिवादी सा है। वह केवल उन्हीं बच्चों को भला मानता है जिनके घर मे पीछे खिड़की है। केवल उनको ही अच्छा मानता है जिनके पास घर है। अगर ऐसा नहीं होता तो सांता उन बच्चों के पास भी उपहार बांटने जाता जिनके पास घर नहीं हैं। जो झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं। राहत शिविरों में रहते हैं। खुले आसमान के नीचे रहते हैं।
कल मैं मुजफ़्फ़र नगर के दंगों में बेघर हुये लोगों के बच्चों की एक डाक्यूमेंट्री देख रहा था। उसमें दो समुदायों के बच्चे जो दंगे के चलते अलग हो गये अपने बिछुड़े दोस्तों को शिद्दत से याद कर रहे थे। सब गरीब के घरों के बच्चे। सांता कहीं मिलेगा तो पूछुंगा कि वह मुजफ़्फ़रपुर के राहत शिविर में गया कि नहीं? वहां बच्चों को उपहार बांटे कि ऐसे ही खाना पूरी करके निकल लिया?
सांता से सवाल पूंछने की बात सोचते हुये मुझे लगा कि अपन भी उन निठल्लों की तरह हो गये हैं जो खुद तो कुछ करते नहीं पर दूसरों की नेकनीयती में झोल देखते रहे हैं। खुद सांता सरीखा बनने की बजाय सांता पर सवाल उठा रहे हैं। भले आदमी की उलझन बढा रहे हैं।

5 responses to “सांता क्लॉज की उलझने”

  1. रचना त्रिपाठी
    अब तो देव भी मठाधीशों के घर में ही विराजते हैं..
    :(
    रचना त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..बेचारी कांग्रेस..!
  2. सलिल वर्मा
    अब इतना सवाल का गोली दाग दीजियेगा त बेचारा जो साल में एक बार आता है, ऊहो आना बन्द कर देगा… कहेगा – का जाएँ, ई सुकुल जी एतना ना बात पूछते हैं कि हम उनका जवाब दें कि अपना काम करें! अब बताइये मुजफ्फर नगर का दंगा हो चाहे कोई बालक भूखा नंगा हो, आप लोग दंगा सिबिर आबाद की जिएय अऊर हमसे पूछिये कि हम ओहाँ गये कि नहीं!! सुकुल जी, हम तो खुद चाहते हैं कि सब बच्चा को सबकुछ मिले ताकि हमरा जरूरते न रहे.. तनी हमारा काम करके देखिये, हर आदमी अगर सांता बन जाए त हम अपने आना छोड़ देंगे!! मगर जब तक आपलोग नहीं बनियेगा, हमको त आना ही होगा साले-साल.. अब चाहे लोकपाल बइठा दीजिये चाहे द्वारपाल..!!
    सलिल वर्मा की हालिया प्रविष्टी..तुम मुझमें ज़िन्दा हो
  3. Swapna Manjusha
    आप तो सांता का क्लास ले लिए :)
    Swapna Manjusha की हालिया प्रविष्टी..बेचारा एक आम आदमी !!!
  4. Swapna Manjusha
    आप तो सांता का क्लास भी ले लिए और सांता पर इतने सारे clause भी लगा दिए :)
    Swapna Manjusha की हालिया प्रविष्टी..‘देवयानी-संगीता’ घोटाला…..
  5. Blog Chiththa
    आपकी इस ब्लॉग-प्रस्तुति को हिंदी ब्लॉगजगत की सर्वश्रेष्ठ कड़ियाँ (26 दिसंबर, 2013) में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,,सादर …. आभार।।
    कृपया “ब्लॉग – चिठ्ठा” के फेसबुक पेज को भी लाइक करें :- ब्लॉग – चिठ्ठा
    Blog Chiththa की हालिया प्रविष्टी..हिंदी ब्लॉगजगत की सर्वश्रेष्ठ कड़ियाँ (26 दिसंबर, 2013)

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Monday, December 23, 2013

लोकपाल के साइड इफ़ेक्ट

http://web.archive.org/web/20140209202321/http://hindini.com/fursatiya/archives/5281

लोकपाल के साइड इफ़ेक्ट

लोकपाल१लोकपाल बिल पास होते ही सरकारी दफ़्तरों में हल्ला मच गया।
लोकपाल में यह व्यवस्था है कि जांच फ़ौरन निपटाई जायेगी। दफ़्तरों में चर्चा होने लगी कि जांचों से निपटना तो खैर आता है लेकिन इस लोकपाल से कैसे निपटा जायेगा।
इस बारे में दो विचारधारायें सामने आयीं- व्यवहारिक विचारधारा और ईमानदार विचारधारा।
व्यवहारिक विचारधारा वाले लोगों का मानना है कि लोकपाल-फ़ोकपाल से डरने की कोई जरूरत नहीं है। अपना काम जैसे अब तक करते आये हैं वैसे ही किया जाये। कहीं लोकपाल ने पकड़ा तो उससे उसी तरह निपटा जायेगा जिस तरह अभी तक बाकी जांचों से निपटते आये हैं। आखिर लोकपाल में भी तो इसी समाज के लोग होंगे। कोई मंगलग्रह के लोग थोड़ी होंगे लोकपाल में जो हमारी भाषा न समझें। हमारे इशारे न बूझें।
ईमानदार विचारधारा के लोगों का कहना है कि हमको अपना काम और सावधानी से करना चाहना। काम हो चाहे न हो पर नियम कानून का पालन अच्छे से करना चाहिये। भले साल का काम चार साल में करें लेकिन करें पूरी ईमानदारी से।
साल का काम चार साल में करने वाले प्रस्ताव से लोगों में आम सहमति थी लेकिन उसमें एक अड़चन यह समझ में आई कि दफ़्तरों के नियम कानून चन्द्रमा की कलाओं की तरह बदलते रहते हैं। हर आला अधिकारी अपने आला दिमाग के प्रभाव में नये नियम बनाना रहता है या फ़िर पुराने नियम की नयी व्याख्या करता रहता है। नये नियम और पुराने नियम में अक्सर छत्तीस का आंकड़ा रहता है। ऐसे में फ़ाइलों पर कौन से नियम लागू होंगे? पहले साल वाले या चौथे साल वाले।
बड़ी बहस और फ़िर आपसी वोटिंग के बाद तय किया गया कि जिस तरह किसी राजनीतिक दल में नये प्रधानमंत्री का उम्मीदवार सामने आने पर पुराना अपने आप खारिज हो जाता है वैसे ही नये नियम के तहत ही काम का निपटारा किया जायेगा। नियमों में ज्यादा मतभेद हुये तो सारे काम को खारिज करके नये सिरे से काम शुरु किया जायेगा। काम भले हो न हो लेकिन ईमानदारी पर कोई समझौता नहीं होगा।
व्यवहारिक और ईमानदार दोनों विचारधारा के लोग इस बारे में एकमत थे कि ये नियम कानून भी बड़े छलिया टाइप होते हैं। कभी एक साथ सामने नहीं आते। काम के वक्त सामने रहें तो उनका ख्याल रख लिया जाये। लेकिन अक्सर कई नियम काम हो जाने पर उचककर सामने आ जाते हैं- ये देखिये हमारी अनदेखी हो गयी। 2013 में लिये गये फ़ैसले पर सन 1984 का कोई नियम आपत्ति जता देता है कि बरखुरदार हमें भूल गये। 1984 वाले की मिजाजपुर्सी करो तो उसी मामले में 1989 का कोई नियम सामने आ जाता है- अरे यार तुम खारिज नियम का पालन कर रहे हो। हमारी अनदेखी क्यों कर रहे हो। कुल मिलाकर नियम कानून सर्वव्यापी ’वरमूडा त्रिकोण’ की तरह होते हैं जो सामने दिखते भले न हों लेकिन कब किस फ़ाइल का जहाज कहां डुबा दें इसका कोई भरोसा नहीं होता।
व्यवहारिक और ईमानदार विचारधारा के लोग इस बात पर भी एकमत थे कि काम भले अलग-अलग तरीके से करें लेकिन फ़ंसने की हालत में बचने के तरीके पर अच्छे विचार करना चाहिये। नियम कानून के हिसाब से काम करना हमेशा एक ऐसी भूलभुलैया में चलने सरीखा होता है जिसमें दीवारों पर जगह अलग-अलग लम्बाई की कीलें निकले रहती हैं। तमाम सावधानी के बावजूद किस नियम की कील आपकी नौकरी का कुर्ता फ़ाड़ दे , कुछ कहा नहीं जा सकता।
इस खतरे से बचने के लिये लोगों ने अलग-अलग सुझाव दिये। उनमें से कुछ इस तरह हैं:
1. अपनी कमाई का कुछ हिस्सा मासिक किस्तों के रूप में बैक में जमा करते रहें। किसी केस में फ़ंसने पर उस पैसे का उपयोग मुकदमा लड़ने के लिये किया जाये।
2. सरकार से मांग की जाये कि हर कर्मचारी का ’लोकपाल बीमा’ कराया जाये। किसी जांच में फ़ंसने पर इस बीमा की रकम से फ़ंसे हुये कर्मचारी को कानूनी सहायता और नौकरी जाने पर जीवन यापन की सुविधा मिलेगी।
3. करप्शन के मामलों में शिकायत सीवीसी से की जाती है। सीवीसी काम हो जाने के बाद बताती है ये गड़बड़ हुई फ़ाइल में। अच्छा ये रहेगा कि निर्णय लेने के बाद और काम में अमल होने के पहले फ़ाइल सीवीसी के पास भेज दी जाये। सीवीसी द्वारा क्लियर करने के बाद ही फ़ाइल में लिये निर्णय पर अमल हो। जिन फ़ाइलों में अमल न होने की निर्णय हो उनकी रद्दी बेचकर ’प्रधानमंत्री राहत कोष’ में जमा करायी जाये। इससे आपदा प्रबंधन में किसी का मुंह न देखना पड़ेगा।
4. ज्यादा फ़ाइलें होने की दशा में एक ऐसा स्कैनर बनाने के बारें में सोचा जा सकता है जिससे गुजरने पर फ़ाइल अपने आप बता देगी कि किसी नियम की अनदेखी तो नहीं हुई इसमें। ’सीवीसी स्कैनर’ से गुजरने पर फ़ाइल में जिस नियम की अवहेलना हुई वह बीप-बीप करके सामने दिखने लगेगा। ’सीवीसी क्लियर’ फ़ाइलों वाले केस पर बाद में कोई जांच न होगी।
5. सारे निर्णय लेने का काम किसी विदेशी कम्पनी को आउटसोर्स कर दिये जायें। अगर कोई निर्णय गलत हो जाये तो उस कम्पनी को ब्लैकलिस्ट कर दिया जाये। दूसरी कम्पनी को निर्णय लेने के काम का ठेका दिया जाये। इससे और कुछ हो या न हो कम से कम कोई अपने लोगों को भ्रष्टाचारी तो न कहेगा।
उपरोक्त सुझावों पर अभी कोई अन्तिम निर्णय नहीं लिया जा सका है। लोगों का कहना है कि इनमें से किन सुझावों पर अमल करना है इस बारे में जनता की राय ले लेनी चाहिये। कुछ लोगों का मानना है कि हम कोई राजनीतिक लोग थोड़ी हैं जो जनता के पास जायें।
मामला अटका हुआ है। लोग इस बारे में संबंधित नियम की खोज में लगे हुये हैं कि इस समस्या का क्या हल निकाला जाये? सबका मामना है कि इस मामले में सर्वसम्मति से ही निर्णय लिया जायेगा। काम का हर्जा भले हो लेकिन हड़बड़ी में कोई निर्णय लेने के खिलाफ़ हैं लोग।
यह लोकपाल का (एक) साइड इफ़ेक्ट है।

6 responses to “लोकपाल के साइड इफ़ेक्ट”

  1. प्रवीण पाण्डेय
    मुम्बई में एक व्यवस्था है, टिकट बीमा की। व्यक्ति कुछ पैसे प्रतिमाह जमा करता है, एक एजेन्सी को और बिना टिकट ट्रेन में यात्रा करना प्रारम्भ कर देता है। पकड़े जाने की स्थिति में एजेन्सी ही भरपाई करती है। लगता है इसी तरह की बीमा योजना न आ जाये, यहाँ पर भी।
    प्रवीण पाण्डेय की हालिया प्रविष्टी..रिक्त मनुज का शेष रहेगा
  2. संतोष त्रिवेदी
    वाह।
  3. दीपक बाबा
    पाण्डेय सर की टीप पर गौर किया जाए. जबरदस्त आइडिया है सरजी.
    दीपक बाबा की हालिया प्रविष्टी..वो बाबु संभल संभलकर कदम रखता है
  4. arvind mishra
    सभी सुझाव बड़े काम के हैं
    arvind mishra की हालिया प्रविष्टी..ह्रदय का रिक्त है फिर एक कोना!
  5. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    एक साल का काम चार साल में करने का सुझाव उस नियम से बाधित होता है जो कुछ कामों को एक ही वित्तीय वर्ष में पूरा करने को अनिवार्य बनाता है। अब तो आगे कुंआ पीछे खाई वाली हालत होने वाली है। :)
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की हालिया प्रविष्टी..दहलीज़ पे बैठा है कोई दीप जलाकर (तरही ग़जल)
  6. Satish Tewari
    अति सुंदर व्याख्या!