Friday, December 12, 2014

किताब खरीदने से बचने के चंद बहाने

अनूप शुक्ल ने किताब प्रकाशित की है 'पुलिया पर दुनिया'। यह भी बताया है कि इसको ऑनलाइन खरीदा जा सकता है। उनके इस आह्वान से बचने के कुछ सटीक तर्क ये हैं:
1.अरे हम तो आपको रोज ऑनलाइन पढ़ते रहते हैं। अब किताब में क्या कुछ नया तो है नहीं।

2. भाईसाहब हमको अपनी हस्ताक्षर सहित प्रति भेजिए न --सस्नेह। हमसे भी पैसा लेंगे?

3.हमारे यहां पैसे का भुगतान ही नहीं हो रहा। बहुत कोशिश की। हो ही नहीं रहा।

4.हमको पीडीएफ फ़ाइल भेजिए हम आपको रॉयल्टी का पैसा भेजते है 37.50 रुपया। पोथी.कॉम को काहे का फालतू भेजना।

5.इस वीकेंड को करते हैं खरीद। अभी जरा बिजी हैं।

6.मुझे इलेक्ट्रानिक ट्रांजेक्शन आता नहीं। बेटा,पति आएंगे वही करेंगे।

7.ये किताब तो ठीक है। आप अपनी व्यंग्य वाली छपवाईए। हम उसको खरीदेंगे। पक्का।

8.कितनी बिकी ? 18 . गुड। मैं 100 वीं प्रति खरीदूंगा।

9.आप मुझे किताब भेज दीजिये। मैं पैसे मनीआर्डर से भेज दूंगा।

10.क्या भाई, तुम्हारी किताब भी पैसे देकर खरीदनी पड़ेगी?तब तो हो चुका। भेजो यार पहली प्रति।

11.वाह लिखने से कमाई भी करने लगे।ये बढ़िया। अब नौकरी छोड़ कर फूल टाइम लेखन करने लगो। खूब बिकेंगी किताबें। हम भी खरीदेंगे तब। गुड लक।

12.पचास रूपये दाम तो ज्यादा हैं। हमने तो अपनी मुफ़्त में भेजी थी यार। कम से कम मुझे तो भेजो 'रिटर्न गिफ्ट'।

13.यहाँ 50 रूपये के भुगतान के लिए 100 रुपया ट्रांजैक्शन फीस लग जाती है।भारत आएंगे तब खरीदेंगे।

14.वो उसने खरीदी है न! उसी के कम्प्युटर पर पढ़ लेंगे।

15.बच्चों के इम्तहान हो जाएँ फिर छुट्टियों में आराम से खरीद कर पढ़ेंगे।

इनमें से कोई भी अपना कर आप मजे में अनूप शुक्ल की किताब खरीदने से बच सकते हैं।

 लेकिन अगर खरीदने का मन करे तो इस लिंक पर आकर खरीद सकते हैं। कीमत मात्र 50 रुपये।

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