Sunday, April 15, 2018

शहर में इधर-उधर घूमते हुये


चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग, लोग बैठ रहे हैं और बच्चा
लूडो खेलता परिवार
कल पंकज बाजपेयी से मिलकर वापस लौटे अफ़ीमकोठी की तरफ़ से। सामने जो सड़क दिखी उसमें घुस गये। जगह-जगह चाय और रोजमर्रा के सामान की दुकानें। एक गाड़ी में तमाम मुर्गे फ़ड़फ़ड़ा रहे थे। मुर्गों के पंख पकड़कर लड़के गाड़ी से उतारकर पिंजड़ों में बंद कर रहे थे। पिंजरे में पहुंचकर मुर्गे शान्त होकर कुकडूंकूं टाइप करने लगे।
एक गली में घुस गये। मोहल्ले का नाम दिखा दलेलपुरवा। जिन्दगी में पहली बार इस मोहल्ले आये। ऐसा मेरे ख्याल से सबके साथ होता है। जिस शहर में जिन्दगी बिता दी उसके सब मोहल्ले नहीं घूमे होते हैं। सब सड़कें नहीं नापी होती हैं।
कई हफ़्तों से मैं सोच रहा हूं चमनगंज जाकर वहां की सड़क पर एकाध घंटे टहलूं। चाय-शाय पिऊं। लेकिन हर बार टलता जाता है मामला। सोचा तो यह भी था कि मोहल्लों के नाम जो हैं वो क्यों पडे इनके बारे में जाना जाये। अब यह काम हमारे नामराशि Anoop Shukla बढिया से कर सकते हैं। वे कानपुर के चलते-फ़िरते-टहलने इनसाक्लोपीडिया हैं। उनसे अनुरोध करेंगे कि वे सिलेसिलेबार मोहल्लों के नामकरण का इतिहास लिखें। इसकी फरमाइश बहुत पहले Indra Awasthi मुझसे कर चुके हैं।

बहरहाल कल मूलगंज की से गुजरते हुये चौराहे पर लोगों की भीड़ देखी। ये मजदूर थे जिनको रोजगार की तलाश थी। लोग मोलभाव करके उनमें से कुछ को अपने साथ ले जा रहे थे। मुझे अंसार कंबरी का यह शेर याद आया:
“अब तो बाजार में आ गये हैं कंबरी
अपनी कीमत को और हम कम क्या करें?”
एक आदमी अपने दोनो हाथ पीछे विश्राम की मुद्रा में बांधे लगातार चला रहा था। करीब आधा किलोमीटर उसके पीछे चलते हुये मैंने देखा कि उसके हाथ पीछे ही रहे। संतुलन बनाने के लिये वह गर्दन एक तरफ़ झुकाये हुये था। आगे चलते हुये गर्दन झुकाये हुये वह विश्राम मुद्रा में ही एक गली में गुम हो गया। उसके मुडने के पहले मन में आया कि कहीं से राष्टगान बज जाये तो शायद वह विश्राम से सावधान मुद्रा में आ जाये। लेकिन तब शायद हमको भी फ़टाक से गाड़ी से निकलकर बाहर आ जाना पड़ता। इसलिये लगा अच्छा ही हुआ कि कहीं राष्ट्रगान नहीं बजा।
चौराहे के आगे एक आदमी सड़क किनारे अपनी साइकिल धरे उसकी आड़ में अपने नोट गिन रहा था। कुछ देर में नोट गिनकर उसने अपने कुर्ते की जेब के हवाले किये और चल दिया। हम भी आगे बढे।
एक जगह एक लड़का ऊंघाया हुआ मुर्गा बेंच रहा था। हममें उसको कोई ग्राहक सा दिखा। वह चैतन्य सा हुआ। उसकी चैतन्यता की इज्जत रखते हुये हमने मुर्गे के गोस्त के दाम पूछ लिये। उसने बताये साठ रुपये किलो। यह भी बताया कि हर मुर्गा लगभग दो किलो का है मतलब 120/- रुपये का। हमको फ़ोकटिया समझकर वह बालक फ़िर ऊंघनें तल्लीन सा हो गया।
एक झोपड़ी के पास दो बच्चियां अपने भाईयों और शायद अपनी मां के साथ बैठी लूडो खेल रही थीं। हम कुछ देर उनको खड़े देखते रहे। बच्चियों की गोटियां खुल गयीं थी। आगे बढ रहीं थीं। बच्चे और उसकी मां का खाता खुला नहीं था। वे पांसे को बार-बार हिलाकर 'लूडो की पिच ' पर डाल रहे थे। जैसे ही उनका खाता खुला वे चहकने लगे। महिला के हंसते हुये 45 डिग्री ऊपर की तरफ़ उठे पीले दांत ऐसे लग रहे थे जैसे किसी पान की गुमटी का पल्ला ऊपर उठ गया हो। खाता खुल जाने के बाद वे सब फ़िर अपनी-अपनी गोटियों को आगे बढाने में लग गये। हम चल दिये।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग, लोग बैठ रहे हैं, साइकिल और बाहर
कल नुमाईश में मिला वो चीथड़े पहने हुए
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान हूँ।
दोपहर को एक आदमी करेंट बुक डिपो के सामने सड़क पर दिखा। तिपहिया पर सो रहा था। कपड़े एकदम मैले। नाखून बढे। बिजली का एक गले में होल्डर माला की तरह पहने हुये। उसके पास कुछ देर तक खड़े रहे। बात करने की कोशिश की। लेकिन उसने कोई ’लिफ़्ट’ नहीं दी। हम दुष्यन्त कुमार का यह शेर दोहराते हुये आगे बढ गये:
"कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है।"
घर से कुछ दूर जाने के लिये पैदल निकले। बाहर ही रिक्शे वाला मिल गया। हाथ में कुष्ठ रोग है। हाल-चाल बोहनी-बट्टा के बारे में पूछा तो बोला-’ दस रुपये कमाई हुई। 28 रुपये खर्च हो गये खाने-पीने नाश्ता करने में। हमने कहा -’तो अब यहां आराम काहे कर रहे। सड़क पर निकलो। कुछ सवारी मिलेंगी।’
बोला-’ आज छुट्टी का दिन सवारी नहीं मिलेंगी। स्कूल भी बन्द है।’
उसके सवारी न मिलने वाले दावे को खारिज करते हुये हमने पैदल जाना स्थगित कर दिया। खुद सवारी बन गये। वह लगभग बेमन से हमको लादे हुये चौराहे तक ले गया। हमने उसको उसको पैसे देकर कहा- ’थोड़ी देर रुको तो हम वापस चलेंगे। कोई और सवारी मिले तो चले जाना लेकर।’
लेकिन बुजुर्ग रिक्शेवाला किसी सवारी को लादने के मूड में नहीं था शायद। बोला -’अब वापस जाकर वहीं आराम करेंगे। यहां धूप बहुत है। ’
थोड़ी देर बाद वापस लौटकर देखकर कि बुजुर्ग रिक्शेवाला रिक्शे में गुड़ी-मुड़ी होकर सो रहा था। हालांकि सर्दी नहीं थी लेकिन जगह की कमी के कारण जिस तरह पैर को सिकोड़े सो रहा था मुझे दुष्यन्त कुमार का शेर याद आया:
न हो कमीज़ तो पाँओं से पेट ढँक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग और लोग बैठ रहे हैं
न हो कमीज तो पावों से पेट ढंक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए।
शाम को शहर में जाम टाइप लग गया था। फ़ूलबाग में अम्बेदकर जयन्ती कार्यक्रम हो रहा था। हमने स्मार्टनेस दिखाते हुये एक गली में गाड़ी धंसा दी। सोचा कि फ़ूलबाग चौराहे पर निकलेंगे जाकर। गली आगे जाते हुये संकरी होती गयी। कहीं-कहीं तो इतनी कि गाड़ी की चौड़ाई भर की जगह बमुश्किल बची थी।
उसी गली के दो छोर पर दो बच्चियां प्लास्टिक के रैकेट टाइप लिये खड़ी थीं। गाड़ियों की आवाजाही के बीच सड़क खाली होने का इंतजार करती हुई बैडमिंटन टाइप कुछ खेल रहीं थीं। हमारी भी गाड़ी जब आगे निकल गयी तो देखा कि वे खेलने में मशगूल हो गयीं थीं। गली से निकलती गाड़ियों से उनका खेल प्रभावित नहीं हो रहा था।

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, बाहर
ड्रम का रूप बदलते कामगार
आज एक जगह प्लास्टिक के तमाम ड्रम देखे। कोपरगंज में। केमिकल के ड्रम खाली होने के बाद पानी और दीगर सामान रखने के ड्र्मों में बदले जा रहे थे। एक लड़का ऊपर का ढक्कन आरी से काट रहा था। दूसरा छेद कर रहा था। तीसरा लड़का ढक्कन को लगाते हुये रिबेट लगा रहा था। हमने पास खड़े होकर उनसे बतियाने की कोशिश की। वे अपने काम में जुटे रहे। फ़िर हमने उनसे पूछा कि इन बने हुये ड्रमों की कीमत कितनी होती होगी? फ़िर अपनी तरफ़ से अनुमान उछाल दिया - ’100-200 रुपये।’
ड्रम की कीमत 100-200 रुपये सुनते ही तीनों काम छोड़कर एक साथ हंस दिये। एक ने कहा- ’सौ-दो सौ में तो आजकल बाल्टी तक नहीं आती।’ फ़िर बताया -’साढे आठ सौ में बिकता है यह ड्रम।’
अपने बेवकूफ़ी के अनुमान पर उनकी हंसी की याद करके लगा कि जब नेता गण जनसभाओं में पांच-दस साल में सबको अनाज देने और सबको घर देने के वादे करता होंगे तो जनता कैसे हंसती होगी।
ऊपर की बात से परसाईजी की रचना चूहा और मैं भी याद आई जिसमें एक चूहा परसाई जी परेशान करके अपने लिये खाना सुनिश्चित करता है और परसाई जी लिखते हैं:
"मगर मैं सोचता हूँ - आदमी क्याई चूहे से भी बदतर हो गया है? चूहा तो अपनी रोटी के हक के लिए मेरे सिर पर चढ़ जाता है, मेरी नींद हराम कर देता है।
इस देश का आदमी कब चूहे की तरह आचरण करेगा?"
(लेख का लिंक कमेंट बाक्स में। यह मजे की बात कि बदलाव के लिये उकसाता यह लेख बाल साहित्य में संकलित है।)
यह किस्सा कल और आज की घुमाई का। बाकी का किस्सा फ़िर जल्ली ही। तब तक आप मजे कल्लें। ठीक न !

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