Saturday, April 07, 2018

अंगूठे के नाखून पर कीड़ा




चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग और बाहर
अंगूठे के नाखून पर कीड़ा
धूप में बैठे चाय पी रहे थे। साथ में मित्रों से फोनियापा भी चल रहा था। चाय और फोन दोनों 'फिनिश' हुए तो देखा बायें हाथ के अंगूठे पर टिड्डे जैसी आकृति का कीड़ा टाइप बैठा है। कीड़े की उमर का अंदाजा नहीं। यह भी नहीं पता कि वह अपनी दुनिया का नर है या मादा। लेकिन मजे से बैठा है।

उमर की बात तो अलग लेकिन 'बैठा' है लिखते ही मैं उसका 'कीड़े' का जेण्डर तय सा कर देता हूँ। पहली नजर में ही उसको नर बना देता हूँ। यह सोचते हुए कि सबेरे-सबेरे जैसे अपन निठल्ले बैठे हैं वैसे ही यह भी टहल रहा होगा। क्या पता यह अपनी दुनिया के हिसाब से 'ब्रिस्क वाकिंग' या 'मार्निंग फ्लाइंग' पर निकला हो।

कीड़ा हमारे अंगूठे के नाखून पर ऐसे बैठा है गोया किसी हेलीपैड पर हेलीकॉप्टर खड़ा हो। हमने अंगूठा हिलाया लेकिन कीड़ा हिला नहीं। जैसे धरती अपनी धुरी पर घूमती रहती है लेकिन हमको और तमाम लोगों को पता नहीं चलता उसी तरह कीड़ा भी हमारे अंगूठा हिलाने से निर्लिप्त आराम से बैठा है।

थोड़ी देर बाद कीड़े ने अंगड़ाई टाइप ली। शायद कविता याद आ गई हो उसे भी :
ले अंगड़ाई उठ हिले धरा
करके विराट स्वर में निनाद।


अंगड़ाई के बाद कीड़े ने अपने बदन को कई जगह से मोड़ा। तोड़ा-मरोड़ा। फिर तसल्ली से बैठ गया। शायद वर्जिश टाइप कुछ की हो। कपालभाति जैसी कोई क्रिया। कुछ पता नहीं। अपने आसपास के जीवों के बारे में हम कितना कम जानते हैं।

कुछ देर कीड़े को निहारने के बाद हमने उसकी फ़ोटो ली। फिर अनूठे (अंगूठे) को झटक दिया। यह इंसानी फितरत का नमूना है। काम निकलने के बाद झटक दिया। आशीर्वाद से पद पाकर सटक लिया।

कीड़ा न्यूटन के किसी नियम का पालन करते हुए जमीन पर गिरा। धप्प से गिरा या लदद से यह पता नहीं। लेकिन हमारी तुलना में वह इतना स्लिम-ट्रिम था कि वह धरती पर लैंड किया होगा। सेफली। लैंड करने के बाद किधर गया पता नहीं।

लेकिन लगता है कि कीड़ा बहादुर टाइप का होगा। यायावर भी। निकल पड़ा अकेले सुबह-सुबह। किसी को साथ लिए बिना। क्या पता अपने समाज में वापस जाकर 'नाखून आरोहण' कथा बताये जाकर। अपने इलाके का कोलम्बस, हिलेरी, तेनसिंग, वास्कोडिगामा कहलाये।

होने को हो तो यह भी सकता है कि हमारे घर की जासूसी करने आया हो। अखबार बांचकर गया हो जिसमें खबर छपी है कि सलमान को सजा सुनाने वाले जज का तबादला हो गया। शायद इस पर मेरी बाईट लेने आया हो। हमारे अंगूठे के साथ सेल्फी ली हो और अपने मन मर्जी का बयान मेरे नाम से छाप दिया हो।

यह सारा सोच कीड़े के नर होने की कल्पना के बाद का है। क्या पता है वह मादा हो। अगर ऐसा होगा तो हमारा सारा विमर्श बदल जायेगा। सौंदर्य के नए आयाम खोजे जाएंगे उसके बैठने, अंगड़ाई लेने और बेखौफ विचरने में। ऐसा 'कीड़ा समाज' वाकई बहुत उन्नत समाज होगा जहां की मादाएं बेखौफ किसी दूसरी प्रजाति के अंगूठे पर निडर बैठकर यायावरी कर सकें।

फिलहाल अपना समय-समाज इससे इससे ज्यादा लिखने की अनुमति नहीं देता। इसलिए फिलहाल इतना ही। बकिया फिर।

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