Tuesday, April 17, 2018

नरोना चौराहे की सुबह


चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, साइकिल और बाहर
नरोना चौराहे पर सुबह नींद लेते रिक्शेवाले
सबेरे-सबेरे बंदर बगीचे में आ गये। हर खाली जगह पर आसन जमाने लगे। देखते ही हमने उनको दौड़ाया। वे पूंछ उठाकर फ़ूट लिये। उपद्रवियों को देखते ही दौड़ा लो तो ठीक। वर्ना वे दौड़ायेंगे जमने के बाद।
सड़क पर निकले। सामुदायिक शौचालय के बाहर तख्त पर एक आदमी बैठा अखबार पढ रहा था। साथ की महिला झुककर , खबर की तरह अखबार से चिपकी हुई थी। अखबार में शायद हत्या, बलात्कार, दुष्कर्म की खबरें देखकर अखबार से बाहर निकल आई। सड़क ताकने लगी। शायद कुछ बेहतर दिखे।
दो कुत्ते एक-दूसरे पर भौंकते हुये आपस में खेल रहे थे। मित्रता-पूर्वक लड़ते भी जा रहे थे। भौकते हुये एक-दूसरे को दांत भी दिखा रहे थे। उनको आपसे में भौकते देखकर लगा मानो किसी टेलिविजन चैनल में जारी बहस में विरोधी पार्टियों के प्रवक्ता अपना मत जाहिर कर रहें। कुछ देर भौंकने, गुर्राने, लड़ने और खेलने के बाद दोनों कुत्ते इधर-उधर हो गये।
चौराहे पर कुछ रिक्शे वाले अपने रिक्शों पर सुबह की नींद-मलाई चांप रहे थे। एक मां अपनी बच्ची को हाथ पकड़कर स्कूल भेज रही थी। बच्ची के आंख में काला चश्मा था। हाव- भाव से लग रहा था कि उसको दिखता नहीं है। लेकिन वह सर उठाकर इधर-उधर देखते हुये अपनी मां के साथ आगे बढ रही थी।
एक बुजुर्गवार अपनी पत्नी के साथ टहल रहे थे। महिला को चलने में परेशानी हो रही थी। एक कदम चलने के बाद चार कदम ठहरते हुये चल रही थी। पास ही के घर में रहते हैं दोनों। महिला को चलने में कष्ट था लेकिन वह मुस्करा रही थी। पुरुष को तकलीफ़ नहीं लेकिन उसके चेहरे से भन्नाहट झलक रही थी। शायद सुबह-सुबह पत्नी के साथ जबरियन टहलने की दुख चेहरे पर चिपका हुआ था।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग, वृक्ष और बाहर
1941 की इमारत अभी भी बुलंद है
कोने की बिल्डिंग पर नाम लिखा था 'शफ़ी बिल्डिंग'। 1941 में बनी थी। मने भारत छोड़ो आन्दोलन के एक साल पहले। 77 साल की बुजुर्ग इमारत अभी भी मजबूत दिख रही थी। पुताई-सुताई हो जाये तो चमकने भी लगे। मोहन खस्ता भण्डार और चाट पैलेस की तरह।
चौराहे पर राधा ठंडा पानी की ठेलिया खड़ी थी। एक रुपये का पाउच। राधा पाउच अकेले बिक रहा था। श्याम पाउच नदारद। पीछे कोने की जमीन पर पीपलेश्वर मन्दिर काबिज हो गया था। किसी की रोजी-रोटी का जुगाड़ हो गया होगा इस अतिक्रमण से। अब तो मन्दिर हो गया। जुगाड़ स्थाई हुआ समझा जाये।
गणेश शंकर विद्यार्थी जी मूर्ति के पास बैठा एक आदमी किसी से फ़ोन पर बतिया रहा था। विद्यार्थी जी बेचारे चुपचाप सामने बिछी गिट्टी, कोलतार और सड़क को देख रहे होंगे। आते-जाते न जाने कितने नजारे देखते होंगे। अपनी छतरी के नीचे अनगिनत अवैध काम होते देखते हों। साम्प्रदायिक बातें सुनते हों। लेकिन मूर्ति में बदल जाने के चलते अब लिख नहीं पाते होंगे। शायद अफ़सोस करते हों।
महापुरुषों के साथ यह त्रासदी होती है। उनके जाने के बाद उनके ही अनुयाई उनका जुलूस निकालते हैं। महापुरुष जैसे तो बन नहीं पाते। महापुरुष को अपने जैसा बना लेते हैं।
महापुरुषों वाली यह यह बात शायद समाज के हर तबके में लागू होती है। साहित्य में भी। बड़े साहित्यकारों के चेले साहित्यकारों के गुजर जाने के बाद उनके नाम ऐसा गदर काटते हैं कि साहित्यकार बेचारा शर्मा जाये। जिस बात के लिये कभी साहित्यकार से डांटे जाते होंगे उसके जाने पर उससे भी गड़बड़ हरकतें उसके प्रति प्रेम में डूब करते हों। उसके नाम पर इनाम स्थापित करके जुगाडू पिछलग्गुओं में बांटते हैं। साहित्यकारों से नजदीकी को सीढियों के रूप में इस्तेमाल करते हैं।
आसमान ऐसे दिख रहा था जैसे हवाई यात्राओं में जहाजों से दिखता है। किसी बहुत बड़े टब में घुले घोल की तरह। टब के वासिंग पाउडर में सारी दिशाओं को धो-फ़ींचकर सूरज भाई फ़ैला देते होंगे।
बड़ी होर्डिंग में अक्षय कुमार फ़ार्चून तेल बेंचते दिखे। तेल बेंचने के लिये वे कह रहे हैं- ’फ़ार्चून में हर खाना घर का खाना होता है।’ इससे लगता है आदमी लोगों ने किचन संभाल लिये हैं। लेकिन ऐसा है नहीं। बाजार पुरुषों के इस्तेमाल की चींजे महिलाओं से बिकवाता है। महिलाओं के काउंटर पर आदमियों को खड़ा कर देता है। पहले सब सामान केवल महिलायें बेंचती थीं। सेविंग क्रीम से लेकर ट्रक के टायर तक। अब सौंदर्य के हलके में आदमियों को भी प्रवेश मिलना शुरु हुआ है। आदमियों ने तेल बेंचना शुरु कर दिया।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: बाहर
मार्गदर्शक इमारत में दाना पानी। बुजुर्गा इमारत के सामने अपन की साइकिल सुंदरी।
नुक्कड़ की इमारतें सौ साल से पुरानी हैं। एक में 'खाना-पानी' रेस्टोंरेंट खुला है। दूसरी में 'दाना-पानी।’ मतलब रेस्टोरेंट भी लगता है तुक्कड़ कवियों के हैं।
एक आदमी बताता है- ’सौ साल से पुरानी हैं ये बिल्डिंगे। पारसियों की थीं। अब सब छोड़कर चले गये। दो-ढाई हजार पारसी परिवार बचे होंगे देश भर में।’ हमने संख्या पर एतराज जताया कि इतने कम नहीं होंगे। लेकिन वह दो-ढाई हजार से आगे बढने को राजी ही नहीं हुआ। हम चुप हो गये।
एक इमारत पर जो लिखा था उससे लगता है वह सन 1822 की है। मतलब इमारतों के कुनबे के हिसाब से ’बिल्डिंग नातियों वाली’ कही जायेगी। 

चित्र में ये शामिल हो सकता है: बाहर
1822 की जमुना बिल्डिंग में खाना-पानी
बुजुर्गा इमारत पर नाम लिखा था - ’जमुना कोठी प्रोप्राइटर एच डी भार्गव।’ 1822 की बनी है बिल्डिंग। मतलब चार साल बाद अपना दो सौंवा जन्मदिन मनायेगी। बर्थ डे केक काटेगी।
एक कोने में पान मसाले के खिलाफ़ नारा लिखा है:

"जर्दा खाकर थूक रहा है,
मौत के आगे कूद रहा है।"

मतलब जर्दा खाना मौत के आगे कूदने जैसा है। लेकिन यह इश्तहार ऐसी जगह है कि आम इंसान को पढने में न आयें। क्या पता लोग बिना पढे इसी पर जर्दे थूकते हों।

आगे सुरेन्द्र नाथ सेन बालिका विद्यालय की बच्चियां स्कूल आ रही थीं। बच्चियों के सभी संस्थानों की तर्ज पर स्कूल का मुख्य द्वारा बंद था। बच्चियां छोटे गेट से स्कूल के अंदर जा रहीं थी।

एक स्कूल के रिक्शे में कुछ बच्चे स्कूल जा रहे थे। दो बच्चे रिक्शे के पटरे पर चौकीदारों की तरह खड़े थे। बगल से गुजरते हुये हमने पूछा-’ तुमको बैठने को नहीं मिला। बच्चे शर्माने और फ़िर मुस्कराने लगे।’

लौटते हुये सुबह देखा कि सूरज भाई आसमान पर मुस्तैद च चुस्तैद हो चुके थे। सुबह हो चुकी थी।

( नरोना चौराहे का यह क़िस्सा Alok Puranik की इस बात को ध्यान में रखते हुए कि किसी एक जगह पर ठहरकर डिटेलिंग का मजा है। Anoop Shukla से अनुरोध की जमुना कोठी और अन्य बुजुर्गा इमारतों का कुछ किस्सा पता तो बताएं।।  )

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