Wednesday, April 25, 2018

एटीएम में नकदी


हल्ला मचा हुआ है कि एटीम से पैसा फ़रार है। जैसे ही खबर दिमाग तक पहुंची उसने दिल से पूछा -’बताओ इस खबर को सच मानें कि अफ़वाह? इसे दुख के खाने में धरें कि आनन्द महल में बैठायें?’
आम तौर पर बेवकूफ़ी की बात कहने के लिये बदनाम दिल ने समझाइश दी -’ ’ आज के समय में सच और अफ़वाह में कोई अंतर नहीं रहा । अफ़वाह कब सच में बदल में जाये और सच कब अफ़वाह साबित हो जाये इसे कोई जानता नहीं। इसलिये दोनों ही मानो इसे। जैसा मौका आये वैसा उपयोग करे।’
’सच और अफ़वाह एक कैसे हो सकते हैं भाई !’ - दिमाग ने तार्किक होने की कोशिश करते हुये पूछा।
अरे भाई जब गुंडे-बदमाश- माफ़िया लोग जनता की सेवा कर सकते हैं तो सच और अफ़वाह एक क्यों नहीं हो सकते। सच आखिर क्या है- ’डंके की चोट पर बोला जाने वाला झूठ ही तो। जो झूठ वायरल हो जाता है वही तो सच का बाप कहलाता है।’
हम इस सिरीमान दिल की ऊंची बात छोड़कर एटीएम से बतियाने लगे। उससे पूछा -’ ये नोट आपके पास टिकते क्यों नहीं हैं ? कहां चले जाते हैं?’
’आजकल जिसे देखो उसे बाजार पहुंचने का चस्का लगा है। हर आदमी बाजार पहुंचना चाहता है। बिकता चाहता है। फ़िर बाजार तो नोट का मायका होता है। जहां मौका मिलता है उछलते हुये पहुंच जाता है बाजार।
’पहले और आजकल के नोट के व्यवहार मेंं कोई अंतर आया है क्या?’ - हमने एटीएम से पूछा।
अरे पहले के नोट बड़े संस्कारी टाइप होते थे। दो-दो, तीन-तीन दिन साथ रहते थे। आजकल के नोटों की तो पूछो ही मती। इनकी हरकतें देखकर लगता है सही में जमाना बड़ा खराब आ गया है। आज के नोट बहुत मनचले टाइप के होते हैं। जहां एटीएम में आये नहीं बाहर भागने के लिये उतावले रहते हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है नकदी नकदी न होकर जेल आया कोई वीआईपी हो जिसकी जेल बाद में होती है, बेल पहले होती है। आजकल का पैसा इतना मनचला होता है कि आते भी जाने का जुगाड़ खोजता है।
’लेकिन अगर एटीएम तो हमेशा नकदी निकालने के लिये होते हैं। नोट अगर एटीएम में न रहे तो एटीएम का उपयोग क्या ?’ -हमने एटीएम से पूछा।
आप तो समझदारों की तरह सहज बेवकूफ़ी की बात कर रहे हैं। आज के समय में जिसका जो काम होता है वह करता कहां है? अपना काम करना आजकल के फ़ैशन के खिलाफ़ है। फ़िर एटीएम से आप कैसे आशा करते हैं कि उसमें पैसे रहेंगे?
’अच्छा पैसे जब एटीएम में रहते नहीं तो कैसा लगता है आपको? ’ -हमने एटीएम जी से पूछा।
लगता कैसा है कैसे बतायें? आप ऐसा समझ लो कि अगर बगल के एटीएम में पैसे हुये और अपन खाली हुये तो ऐसा लगता है जैसे किसी किसी विधायक को मंत्री पद मिलने पर उसके साथ के विधायक को लगता होगा। जब बगल वाले में भी पैसे नहीं होते तो ऐसा लगता है जैसे किसी पार्टी के मार्गदर्शक मंडल के सदस्यों को महसूस होता है।
हम एटीएम से बतिया ही रहे थे कि किसी ने अपना कार्ड उसके मुंह में ठूंस दिया। एटीएम का मुंह बंद हो गया। मन किया कि ठहरकर देख लें कि उसका पैसा निकला कि नहीं लेकिन फ़िर देखा नहीं। देखने में सच और अफ़वाह में कोई एक सही साबित हो जाता। हमारे जीने के सहारों में से एक कम हो जाता। हमारी ताकत आधी हो जाती। अभी तो सच भयावह लगता है तो उसको अफ़वाह मान लेते हैं। अफ़वाह मन को सुकून देती है तो उसको सच मानकर खुश हो लेते हैं। दोनों में से कोई एक भी न रहा तो बवाल हो जायेगा। जीना और मुश्किल हो जायेगा। है न !

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