Wednesday, November 02, 2005

ढोल,गंवार,शूद्र,पशु,नारी…

http://web.archive.org/web/20110925143539/http://hindini.com/fursatiya/archives/63


रामचरितमानस का पारायण हम बचपन से ही करते आ रहे हैं। शुरुआत में तो अंत्याक्षरी में अपने जौहर दिखाने के लिये। उन दिनों हमारे गुरुजी कविताओं तथा रामचरितमानस की चौपाइयों के आधार पर अंत्याक्षरी कराते। कवितायें तो गिनी-चुनी याद थीं लेकिन चौपाइयों-दोहे की संपदा दिन-पर-दिन बढ़ती गई। बाद में देखा कि हर खुशी के मौके पर लोग ‘रामायण’ का अखंड पाठ कराते। पाठ दो दिन चलता। श्रद्धालु लोग कभी द्रुत, कभी विलम्बित लय में मानस का पाठ करते। तमाम हनुमान भक्त हर सोमवार को सुंदरकाण्ड का पाठ करते हैं।
बाद में मानस से और जुड़ाव होता गया। नीति संबंधी दोहे-चौपाइयों का रामचरितमानस में अद्भुत संकलन है। हमने भी तमाम प्रश्नों के उत्तर रामशलाका प्रश्नावली में खोजे। रामचरित मानस लोकमंगलकारी ग्रन्थ के रूप में जाना जाता है। लेकिन समय-समय पर इसके तमाम अंशो पर सवाल उठाये जाते रहते हैं। इसमें से एक चौपाई जिसका सबसे ज्यादा जिक्र होता है वह है:-
ढोल,गँवार ,सूद्र ,पसु ,नारी।सकल ताड़ना के अधिकारी।।
अक्सर इस चौपाई को लेकर दलित संगठन,महिला संगठन तथा कभी-कभी मानवाधिकार संगठन भी अपना आक्रोश जताते हैं। कुछ लोग इसे रामचरितमानस से निकालने की मांग करते हैं। कभी मानस की प्रतियां जलाते हैं। तुलसीदास को प्रतिगामी दलित,महिला विरोधी बताते हैं। अगर आज वे होते शायद तस्लीमा नसरीन की तरह या सलमान रस्दी की तरह देशबदर न सही तो जिलाबदर तो कर ही दिये जाते।
वैसे तुलसीदास जी के रचे तमाम प्रसंगों से ऐसा लगता है कि गोस्वामी जी आदतन स्त्री विरोधी थे। शायद अपने जीवन के कटु अनुभव हावी रहे हों उनपर। नहीं तो वे राम के साथ सीताजी की तरह लक्ष्मण के साथ उर्मिलाजी को भी वन भेज देते या फिर रामचन्द्रजी से सीता त्याग की बजाय सिंहासन त्याग करवाते तथा रामचन्द्रजी को और बड़ा मर्यादा पुरुषोत्तम दिखाते।
बहरहाल यह चौपाई बहुत दिन से मेरे मन में थी तथा मैं यह सोचता था कि क्यों लिखा ऐसा बाबाजी ने। मैं कोई मानस मर्मज्ञ तो हूं नहीं जो इसकी कोई अलौकिक व्याख्या कर सकूं। फिर भी मैं सोचता था कि ‘बंदउं संत असज्जन चरना’लिखकर मानस की शुरुआत करने वाला व्यक्ति कैसे समस्त ‘शूद्र’ तथा ‘स्त्री’ को पिटाई का पात्र मानता है।
कल फिर से मैंने यह चौपाई पढ़ी। अचानक मुझे स्व.आचार्य विष्णु कांत शास्त्री जी का एक व्याख्यान याद आया। दो साल पहले उन्होंने किसी रचना पर विचार व्यक्त करते हुये सारगर्भित व्याख्यान दिया था । तमाम उदाहरण देते हुये स्थापना की थी कि श्रेष्ठ रचनाकार अपने अनुकरणीय आदर्शों की स्थापना अपने आदर्श पात्र से करवाता है। अनुकरणीय आदर्श ,कथन अपने श्रेष्ठ पात्र के मुंह से कहलवाता है।
इस वक्तव्य की रोशनी में मैंने सारा प्रसंग नये सिरे से पढ़ा। यह प्रसंग उस समय का है जब हनुमानजी सीता की खबर लेकर वापस लौट आये थे। तथा राम सीता मुक्ति हेतु अयोध्या पर आक्रमण करने के लिये समुद्र से रास्ता देने की
विनती कर रहे थे। आगे पढ़ें:-
विनय न मानत जलधि जड़ गये तीन दिन बीत।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होय न प्रीत ।।

(इधर तीन दिन बीत गये,किंतु जड़ समुद्र विनय नहीं मानता। तब रामजी क्रोधसहित बोले- बिना भय के प्रीति नहीं होती)
लछिमन बान सरासन आनू।सोषौं बारिधि बिसिख कृसानु।।
सठ सन बिनय कुटिल सम प्रीती।सहज कृपन सन सुंदर नीती।।

(हे लक्ष्मण! लाओ तो धनुष-बाण। मैं अग्निबाण से समुद्र को सोख डालूं। मूर्ख से विनय, कुटिल के साथ प्रीति, कंजूस से उदारता की बात)
ममता रत सम ग्यान कहानी।अति लोभी सन बिरति बखानी ।।
क्रोधिहिं सम कामिहि हरि कथा।ऊसर बीज बएँ फल जथा ।।

(ममता में डूबे व्यक्ति से ज्ञान की कहानी,लोभी से वैराग्य का वर्णन,क्रोधी से शान्ति की बात और कामी से भगवान की कथा, इनका फल वैसा ही व्यर्थ होता है जैसा ऊसर में बीज बोने से होता है)
अस कहि रघुपति बान चढ़ावा।यह मत लछिमन के मन भावा ।।
संधानेउ प्रभु बिसिख कराला।उठी उदधि उर अंतर ज्वाला ।।

(ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजी ने धनुष चढ़ाया। यह मत लक्ष्मणजी के मन को बहुत अच्छा लगा। प्रभु ने भयानक अग्निबाण सन्धान किया,समुद्र के हृदय में अग्नि की ज्वाला उठी)
मकर उरग झष गन अकुलाने।जरत तुरंत जलनिधि जब जाने।।
कनक थार भरि मनि गन नाना।बिप्र रूप आयउ तजि माना।।

(मगर,सांप तथा मछलियों के संमूह व्याकुल हो गये। जब समुद्र ने जीवों को जलते जाना तब सोने के थाल में अनेक रत्नों को भरकर अभिमान छोड़कर वह ब्राह्मण के रूप में आया)
काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।।

(चाहे कोई कितने ही उपाय कर ले पर केला तो काटने पर ही फलता है । नीच विनय से नहीं मानता वह डांटने पर ही रास्ते पर आता है।)
सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे।छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।
गगन समीर अनल जल धरनी।इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।।

(समुद्र ने भयभीत होकर प्रभु के चरण पकड़कर कहा-हे नाथ! मेरे सब अवगुण क्षमा कीजिये। हे नाथ! आकाश, वायु, अग्नि ,जल और पृथ्वी- इन सब की करनी स्वभाव से ही जड़ है।)
तव प्रेरित माया उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।
प्रभु आयसु जेहिं कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।।

(आपकी प्रेरणा से माया ने इन्हें सृष्टि के लिये उत्पन्न किया है,सब ग्रन्थों ने यही गाया है। जिसके लिये स्वामी की जैसी आज्ञा है,वह उसी प्रकार रहने में सुख पाता है।)
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही।मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।।
ढोल , गँवार ,सूद्र ,पसु नारी।सकल ताड़ना के अधिकारी।।

(प्रभु ने अच्छा किया जो मुझे दण्ड दिया। किंतु मर्यादा(जीवों का स्वभाव भी आपकी ही बनायी हुई है। ढोल,गँवार,शूद्र,पशु और स्त्री -ये सब दण्ड के अधिकारी हैं)
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई।उतरिहि कटकु न मोरि बढ़ाई।।
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई।करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई।।

(प्रभु के प्रताप से मैं सूख जाऊँगा और सेना पार उतर जायेगी,इसमें मेरी मर्यादा नहीं नहीं रहेगी। तथापि आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं हो सकता । ऐसा वेद गाते हैं । अब आपको जो अच्छा लगे, मैं तुरंत वही करूँ।)
अंत में समुद्र ने विधि बताई कि नल-नील नामक दो भाई हैं जिनके स्पर्श से पत्थर तैरने लगते हैं। उनके हाथ से पुल बने जिसके ऊपर से वानर सेना लंका जा सकती है।
बहरहाल यह तय हुआ कि यह विवादास्पद चौपाई राम ने नहीं कही। अत: यह तुलसीदास जी का मंतव्य नहीं था। यह किसी भी तरह से उनका आदर्श नहीं था। यहां समुद्र अधम पात्र के रूप में चित्रित है। अधम माने आज के विलेन टाइप के। या फिर कैरेक्टर रोल की तरह जो शुरु में खराब रहते हैं तथा बाद में सुधर जाते हैं। तो ऐसे पात्र के मुंह से कही बात कवि का आदर्श नहीं हो सकती। अत: इस चौपाई के ऊपर लोगों का अपने कपड़े फाड़ना शायद जायज नहीं है।
शायद आप यह समझें कि मैं तुलसीदास के नकारात्मक मूल्यों को सही ठहराना चाहता हूं। लेकिन ऐसा कतई नहीं हैं। मैं तो चीजों को उनके संदर्भ में रखने की कोशिश कर रहा हूं। आप सहमत हों तो ठीक । न हों तो आपकी मर्जी।
यह भी सवाल उठाया जा सकता है कि अगर राम का आदर्श नहीं था यह तो उन्होंने इसका प्रतिवाद क्यों नहीं किया। इस पर मैं यही कहूंगा कि जिस पति को अपनी पत्नी को दूसरे की कैद से छुड़ाने की पड़ी हो उसको यह होश कैसे रह सकता है कि वह दूसरे के कहे की उचित-अनुचित की स्थापना के लिये मगजमारी करे। क्या पता मगजमारी की भी हो जिसे लिखना गोस्वामी जी हड़बड़ी में या गैरजरूरी मानकर भूल गये हों।

मेरी पसंद


सो न सका कल याद तुम्हारी आई सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात

मेरे बहुत चाहने पर भी नींद न मुझ तक आई
ज़हर भरी जादूगरनी-सी मुझको लगी जुन्हाई
मेरा मस्तक सहला कर बोली मुझसे पुरवाई
दूर कहीं दो आँखें भर-भर आई सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात
गगन बीच रुक तनिक चन्द्रमा लगा मुझे समझाने
मनचाहा मन पा लेना है खेल नहीं दीवाने
और उसी क्षण टूटा नभ से एक नखत अनजाने
देख जिसे तबियत मेरी घबराई सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात
रात लगी कहने सो जाओ देखो कोई सपना
जग ने देखा है बहुतों का रोना और तड़पना
यहाँ तुम्हारा क्या, कोई भी नहीं किसी का अपना
समझ अकेला मौत मुझे ललचाई सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात
मुझे सुलाने की कोशिश में जागे अनगिन तारे
लेकिन बाज़ी जीत गया मैं वे सबके सब हारे
जाते-जाते चाँद कह गया मुझसे बड़े सकारे
एक कली मुरझाने को मुसकाई सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात
-स्व.रमानाथ अवस्थी

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

22 responses to “ढोल,गंवार,शूद्र,पशु,नारी…”

  1. जीतू
    देखो भइया,
    तुम्हारे इस लेख मे तुम चाहे जितना तुलसीदास का बचाव कर लो, लेकिन तुलसीदास जी रामायण मे ही कई कई जगह चूके हैं। इसलिये यह कहना कि ढोल,गंवार….. वाला वाक्य, उनका नही…. मै नही मानता। मेरे विचार से इस वाक्य का प्रयोग करना, उस समय की सामाजिक व्यवस्था का चित्रण है। फिर भी कोई इतिहासविद ही इस बात को साबित कर सकेगा। हम तो बस इतना ही कहेंगे कि कथवस्तु मे इस वाक्य को कहे बिना भी काम हो सकता था। क्या कहते हो गुरु?
  2. Tarun
    Tulsidas ne jo keha wo h tab ke sandarf me keha aur bilkul thik keha: ढोल , गँवार ,सूद्र ,पसु नारी।सकल ताड़ना के अधिकारी।। kyonki us daur me ye Aadam (mard jaat) is logon ko isi laayak maanta tha aur aisa hi vyavhar karta tha aur yehi sab unhone bataya. Raha sawal logo ka to woh is baat ka halla karenge bazar me aur phir raat ko ghar jaake haath uthayenge naari per.
    Aue Jitu bhai itni galtiyon ke baavjud Janta ne Ramayan ko sir aankhon me bhaithaya hai Agar bilkul hi vishud hoti to kya hota….soch lo.
  3. Aul
    सबसे पहले प्रदूषित भाषा के लिए क्षमा।
    बिना कोई मीमांशा किये इतिहास का चीरहरन करके वितंडा करना हम हिंदुस्तानियो की लत हो गई है और तमाशा करते करते हम खुद तमाशा बन जाते हैं। एकदिन उमाभारती कहती हैं “श्रीकृष्ण ने जैसे जरासंघ को फाड़ा वैसे राजद को फाड़ देंगे।” अगले दिन चँद्रवँशी समाज नमूदार हो गया। लग गयी धार्मिक भावनाओ को ठेस। जरासँघ का अपमान माने चँद्रवँशियो का अपमान। अब इन उल्लू के पठ्ठे चँद्रवँशियो से पूछो कि पँद्रह साल से लालू उल्लू बना रहा था तब नही तुम्हारे पिछवाड़े पे ठेस। लगे हाथ मुल्लो की भी धुलाई करने की तबीयत है, सलमान रश्दी कुछ लिखते है लँदन में, बिना पढे लिखे जाहिल अपनी ही टाकीज अपनी ही बसे जला डालते हैं। सच तो यह है कि हम सब धर्म के नाम पर ढकोसला करते हैं, धूर्त है हम सब। अगर धार्मिक भावनाऐ होती तो इतने उदार होते हम कि इन जरा जरा से मुद्दो से ठेस नही लगती। ठेस लगती है धर्म के समाज के उन ठेकेदारो को जिनके पिछवाड़े राजगद्दी पर बैठने के लिए खुजलाते रहते हैं और गधी जनता विकास की गाजर देख कर आगे नही बढना चाहती वह आत्मसम्मान के नाम पर सहर्ष उल्लू बन जाती है। सौ की सीधी एक बात सम्मान उसका होता है जिसमे क्षमता हो। हम तो आत्मसम्मान की धार्िमक मर्यादा की ढपली पीटते रहते हैं पर कोई सुनता है दुनिया मे हमारी?
  4. kkpandey
    का शुकुल् रामायण की चौपाइ लइके बैठ गयो, सुनेव नही तुम्हरे सुक्लो लिखै मां बाधा आगयी है दलित जन कोरट्वा मा केस बनाय है कि ई ऊच जात वाले शुकुल, मिश्र, चौधरी, लिख के हमार इज्जत खराब करत है. तवन एइसा होय कि कौनो अपने नमवा के आगे कुछो ना लिख सकै. बचावा भाई खतरा बहुत मड्ररात है.
  5. kkpandey
    का शुकुल् रामायण की चौपाइ लइके बैठ गयो, सुनेव नही तुम्हरे सुक्लो लिखै मां बाधा आगयी है दलित जन कोरट्वा मा केस बनाय है कि ई ऊच जात वाले शुकुल, मिश्र, चौधरी, लिख के हमार इज्जत खराब करत है. तवन एइसा होय कि कौनो अपने नमवा के आगे कुछो ना लिख सकै. बचावा भाई खतरा बहुत मड्ररात है.
  6. भोला नाथ उपाध्याय
    अतुल भाई की भाषा प्रदूषित ही सही पर बात एकदम काँटे की है| रही बात तुलसी दास की तो भाई लोगों, बीबी के लतियाये हुए व्यक्ति की भँडास है यह वाक्य |न तो इसका कोई बचाव करना चाहिये और ना ही इसे किसी काल विशेष का चल मानना चाहिये| सच कहा जाय तो रामचरित मानस हिन्दुओं का धर्मिक ग्रन्थ तो होना ही नहीं चहिए |इसे बस एक कवि (भले ही लतियाने के बाद बने हों)की रचना के तौर पर ही देखना चाहिये| एक काव्य संग्रह के रूप मे यह निःसन्देह एक श्रेष्ठ रचना है| जैसा कि विदित है, हर एक कथानुमा रचना के लिये एक हीरो की जरूरत होती है| अतः तुलसी दास ने राम को हीरो बनाने के लिय ढेर सारी कल्पनिक घटनाँएं जोड दी थीं काव्य सन्ग्रह में और यह इतना लोकप्रिय हुआ कि लोग इस रचना के पहले की रचनाओं मे लिखी बातों को भूल कर इसमें लिखी बातों को ही ऐतिहासिक सत्य मानने लगे| ऐसा केवल इसी केस में नहीं हुआ है | एक उदाहरण और है जब हमनें लोकप्रियता के चलते एक अमौलिक कथनक को मौलिक और ऐतिहासिक माना है | शकुन्तला दुष्यन्त की कहानी भी सैकडो साल पहले एक संसकृत साहित्य के जरिये कही गयी थी ( कवि का नाम याद नहीं आ रहा है अगर चाहें तो बी०ए० सन्सकृत के किसी छात्र से पूछ सकते है)जिसमें दुष्यन्त को एक ऐसे राजा के रूप में दर्शाया गया है जो अपनी वासना की पूर्ति के लिये शकुन्तला से शादी करता है और बाद मे लोक लाज के डर से उसे भूल जाने का नाटक़ करता है इस रचना के सैकडो साल बाद कालिदास ने इस कथा को दुबारा अपने नाट्य रचना के लिये चुना और लिखा | अब चूँकि उन्हें दुष्यन्त को हीरो दिखाना था अतः ऋषि का स्राप और अन्गूठी को मछली के द्वारा निगलने की काल्पनिक घटना जोड दी | आज आलम यह है कि हम मूल रचना को भूल ही चूके हैं और कालिदास की रचना को ही प्रामाणिक मानने लगे हैं| इसी तरह अगर हम रामचरितमानस को बाल्मिकी रामायण से ही कम्पेयर करें तो हम देखेन्गे कि दोनो रचनओं में काफी अन्तर है | वैसे फुरसतिया भाई साहब एक बहुत ही विचारात्मक लेख लिखा है जिसके लिये वे बधाई एवं सराहना के पात्र हैं |पढ कर मज़ा आ गया | मगर उनके तर्क से कई लोग असहमत हो सकते हैं जिसमें हम भी शामिल हैं| लेकिन उन्होंनें तो पहले ही लिख दिया है “आप सहमत हों तो ठीक । न हों तो आपकी मर्जी।

  7. भोला नाथ उपाध्याय
    अतुल भाई की भाषा प्रदूषित ही सही पर बात एकदम काँटे की है| रही बात तुलसी दास की तो भाई लोगों, बीबी के लतियाये हुए व्यक्ति की भँडास है यह वाक्य |न तो इसका कोई बचाव करना चाहिये और ना ही इसे किसी काल विशेष का चल मानना चाहिये| सच कहा जाय तो रामचरित मानस हिन्दुओं का धर्मिक ग्रन्थ तो होना ही नहीं चहिए |इसे बस एक कवि (भले ही लतियाने के बाद बने हों)की रचना के तौर पर ही देखना चाहिये| एक काव्य संग्रह के रूप मे यह निःसन्देह एक श्रेष्ठ रचना है| जैसा कि विदित है, हर एक कथानुमा रचना के लिये एक हीरो की जरूरत होती है| अतः तुलसी दास ने राम को हीरो बनाने के लिय ढेर सारी कल्पनिक घटनाँएं जोड दी थीं काव्य सन्ग्रह में और यह इतना लोकप्रिय हुआ कि लोग इस रचना के पहले की रचनाओं मे लिखी बातों को भूल कर इसमें लिखी बातों को ही ऐतिहासिक सत्य मानने लगे| ऐसा केवल इसी केस में नहीं हुआ है | एक उदाहरण और है जब हमनें लोकप्रियता के चलते एक अमौलिक कथनक को मौलिक और ऐतिहासिक माना है | शकुन्तला दुष्यन्त की कहानी भी सैकडो साल पहले एक संसकृत साहित्य के जरिये कही गयी थी ( कवि का नाम याद नहीं आ रहा है अगर चाहें तो बी०ए० सन्सकृत के किसी छात्र से पूछ सकते है)जिसमें दुष्यन्त को एक ऐसे राजा के रूप में दर्शाया गया है जो अपनी वासना की पूर्ति के लिये शकुन्तला से शादी करता है और बाद मे लोक लाज के डर से उसे भूल जाने का नाटक़ करता है इस रचना के सैकडो साल बाद कालिदास ने इस कथा को दुबारा अपने नाट्य रचना के लिये चुना और लिखा | अब चूँकि उन्हें दुष्यन्त को हीरो दिखाना था अतः ऋषि का स्राप और अन्गूठी को मछली के द्वारा निगलने की काल्पनिक घटना जोड दी | आज आलम यह है कि हम मूल रचना को भूल ही चूके हैं और कालिदास की रचना को ही प्रामाणिक मानने लगे हैं| इसी तरह अगर हम रामचरितमानस को बाल्मिकी रामायण से ही कम्पेयर करें तो हम देखेन्गे कि दोनो रचनओं में काफी अन्तर है | वैसे फुरसतिया भाई साहब एक बहुत ही विचारात्मक लेख लिखा है जिसके लिये वे बधाई एवं सराहना के पात्र हैं |पढ कर मज़ा आ गया | मगर उनके तर्क से कई लोग असहमत हो सकते हैं जिसमें हम भी शामिल हैं| लेकिन उन्होंनें तो पहले ही लिख दिया है “आप सहमत हों तो ठीक । न हों तो आपकी मर्जी।

  8. भोला नाथ उपाध्याय
    अतुल भाई की भाषा प्रदूषित ही सही पर बात एकदम काँटे की है| रही बात तुलसी दास की तो भाई लोगों, बीबी के लतियाये हुए व्यक्ति की भँडास है यह वाक्य |न तो इसका कोई बचाव करना चाहिये और ना ही इसे किसी काल विशेष का चलन मानना चाहिये| सच कहा जाय तो रामचरित मानस हिन्दुओं का धर्मिक ग्रन्थ तो होना ही नहीं चहिए |इसे बस एक कवि (भले ही लतियाने के बाद बने हों)की रचना के तौर पर ही देखना चाहिये| एक काव्य संग्रह के रूप मे यह निःसन्देह एक श्रेष्ठ रचना है| जैसा कि विदित है, हर एक कथानुमा रचना के लिये एक हीरो की जरूरत होती है| अतः तुलसी दास ने राम को हीरो बनाने के लिय ढेर सारी कल्पनिक घटनाँएं जोड दी थीं काव्य सन्ग्रह में और यह इतना लोकप्रिय हुआ कि लोग इस रचना के पहले की रचनाओं मे लिखी बातों को भूल कर इसमें लिखी बातों को ही ऐतिहासिक सत्य मानने लगे| ऐसा केवल इसी केस में नहीं हुआ है | एक उदाहरण और है जब हमनें लोकप्रियता के चलते एक अमौलिक कथनक को मौलिक और ऐतिहासिक माना है | शकुन्तला दुष्यन्त की कहानी भी सैकडो साल पहले एक संसकृत साहित्य के जरिये कही गयी थी ( कवि का नाम याद नहीं आ रहा है अगर चाहें तो बी०ए० सन्सकृत के किसी छात्र से पूछ सकते है)जिसमें दुष्यन्त को एक ऐसे राजा के रूप में दर्शाया गया है जो अपनी वासना की पूर्ति के लिये शकुन्तला से शादी करता है और बाद मे लोक लाज के डर से उसे भूल जाने का नाटक़ करता है इस रचना के सैकडो साल बाद कालिदास ने इस कथा को दुबारा अपने नाट्य रचना के लिये चुना और लिखा | अब चूँकि उन्हें दुष्यन्त को हीरो दिखाना था अतः ऋषि का स्राप और अन्गूठी को मछली के द्वारा निगलने की काल्पनिक घटना जोड दी | आज आलम यह है कि हम मूल रचना को भूल ही चूके हैं और कालिदास की रचना को ही प्रामाणिक मानने लगे हैं| इसी तरह अगर हम रामचरितमानस को बाल्मिकी रामायण से ही कम्पेयर करें तो हम देखेन्गे कि दोनो रचनओं में काफी अन्तर है | वैसे फुरसतिया भाई साहब ने एक बहुत ही विचारात्मक लेख लिखा है जिसके लिये वे बधाई एवं सराहना के पात्र हैं |पढ कर मज़ा आ गया | मगर उनके तर्क से कई लोग असहमत हो सकते हैं जिसमें हम भी शामिल हैं| लेकिन उन्होंनें तो पहले ही लिख दिया है “आप सहमत हों तो ठीक । न हों तो आपकी मर्जी।

  9. Laxmi N. Gupta
    प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही।मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।।
    ढोल , गँवार ,सूद्र ,पसु नारी।सकल ताड़ना के अधिकारी।।
    आपने ध्यान दिया कि तुलसीदास जी ने रामचन्द्र जी से, “मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही” का विरोध नहीं कराया। तो रामचन्द्र जी इस बात का tacit समर्थन कर रहे हैं। रमानाथ अवस्थी जी की यह कविता पहले पढ़ रखी थी; फिर से पढ़ कर बहुत अच्छा लगा। अच्छा स्तम्भ लिखा है। धन्यवाद।
  10. आलोक कुमार
    कही भले ही न हो राम ने, लेकिन जिस प्रकार प्रेमचन्द छाप लेखक अनमोल वचन बोल जाते हैं – “फूल हम घर में भी सूँघ सकते है लेकिन वाटिक में अलग ही आनन्द होता है” – (बूढ़ी काकी?) – वे लेखक की विचारधारा को ही प्रकट करते हैं।
    सो चलिए मान लेते है कि राम दोषी नहीं थे, तुलसीदास ही दोषी थे, हमें आपत्ति नहीं! :)
  11. आलोक कुमार
    वैसे काफ़ी शोध करके सफ़ाई पेश की है आपने। साधुवाद।
  12. आशीष
    हम्म …..
    मेरा मानना तो यही है कि किसी भी रचना मे लिखा गया कोई भी कथन चाहे वो नायक द्वारा कहा गया हो, खलनायक द्वारा हो या प्रतिनायक के द्वारा हो लेखक के विचार ही होते है।
    यदि नायक और प्रतिनायक के कथन विरोधाभाषी हो तो भी यह लेखक के मन मे चल रहा एक प्रतिद्वंद होता है।
    खैर मै तो राम को भी मर्यादा पुरुषोत्तम नही मानता ! जो पुरुष अग्नी परिक्षा के बाद भी अपनी पत्नी का साथ नही दे सका काहे का मर्यादा पुरुषोत्तम ?
  13. सतीश पंचम
    बहुत सुंदर लेख और वैसी ही सुंदर टिप्पणीयां।
  14. डा. अमर कुमार

    हमारे स्व.पंडित सुन्दर लाल जी ने एक अलग व्याख्या दी थी,
    ढोल का तात्पर्य ढोल
    गँवार शूद्र और पशु नारी अलग रखे गये ।
    गँवार शूद्र = अशिक्षित व कमतर सोच वाला
    पशु नारी = पशुवृत्ति की स्त्री ( नैतिक अनैतिक को नकारने वाली )
    आज यह नयी किसिम की व्याख़्या मिली ।
    शायद ठीक ही हो..
    पर आलेख संग्रहणीय है ।
    मुला, ई आलेखवा संग्रह कईसे किया जायेगा, हो ?

  15. NITIN KUMAR PARMAR
    MERE HISAB SE TULSIDASH NE EKDUM SAHI KAHA HAI KUNKI JO BAAT AAJ SE 60 SAAL PAHLE BURI LAGTI THI AAJ WO EKDUM SAHI HOTI JA RAHI HAI
    YE DHOL, SHUDRA ,GAMAR PASHU NAARI YE SAB PEETENE KE LIYE HI HAI.
    DEKHTE NAHIN HAIN AAJ SHUDRA KITNE ATYACHAR KAR RAHEN HAIN. HINDU MARYADAYEN HINDU DHARM KO NASHT KARNE KI KITNI KOSHISH KAR RAHE HAIN. TULSIDASH PAR HUNGAMA KARTE HAIN LEKIN US KANSHIRAM KO BHUL JATE HAIN JISHNE “(TILAK TARAJU AUR TALWAR INMAIN MARO JUTE CHAR)” KAHA THA WO KISI KUTTE KO BURA NAHIN LAGTA HAI. ISH HINDUSTAN MAIN HINDU AUR THAKUR KI BAAT KARNA HI BAHUT BADHA GUNAH HAI.
  16. Dr.Adhura
    AGAR AAP RAMCHRITMANS KO EK JIVIT TAM KI KATHA MANTE HO TO RAM MARYADA PURSOTAM NAHI THE .OR ISE AAP TUSIDASS KI RACHNA MANTE HO TO YH US SMAY DASA KO BATA HAI . AAJ BHI LIKHA JATA HAI VH AAJ THIK HAI .KAL GALT HO SAKTA HAI .APNE ITIHAS KO MITANA YA US PAR KOI AAPTI KARNA TO PAGAL AADMIO KA KAM HOTA HAI .JO SAMAJ ANPAD KO FUSLA KAR APNA JUTHA ROB BNANA CHATE HAI VHI AAPTI KARTE HAI.MUDA ROTI SEKNE VALO KE LIYE ACHHA HAI.
  17. anju
    very good
  18. ePandit
    आपने बहुत अच्छे तरीके से तथ्यों को पेश किया। कई बार लोगों को लिखते सुना है कि तुलसीदास ने अपनी सोच को श्रीराम के कथन के रुप में पेश किया, ऐसा लिखने वाले लोगों ने शायद मानस पढ़ी ही नहीं, वरना आपकी तरह सच समझ जाते।
    जो लोग ऊपर कह रहे हैं कि चाहे विलेन के मुख से कहलवाया हो पर यह तुलसीदास की ही सोच है वे यह बतायें कि अनेक रचनाओं में विलेन कई गलत बातें कहता है क्या वे सब रचनाकार की सोच होती हैं?
    रही बात भोला जी के विचार कि रामचरितमानस को हिन्दू ग्रन्थ मानना ही नहीं चाहिये तो जिस ग्रन्थ को भगवान विश्वनाथ ने खुद सर्टिफाइ किया हो उसे कैसे हिन्दू ग्रन्थ न माना जाय। जिसे पता नहीं वो ये घटना पढ़े।
    ePandit की हालिया प्रविष्टी..ऑपेरा मिनी – सामान्य फोन नॉन-स्मार्टफोन हेतु सर्वश्रेष्ठ वेब ब्राउजरMy ComLuv Profile
  19. RAM PRASANN PANDEY
    जब छोटा था तो पिता जी साथ कभी कभी हाई वे सड़को पर जाया करता था तो वो सड़के बहत चौड़ी दिखाई देती थी
    और उस समय के हिसाब से थी भी क्योकि उस समय में यातायात के साधन और जनसँख्या आज के अपेक्षा बहुत ही कम थे मगर आज वो सड़के इतनी पतली लगती है की जैसे गली मोहल्लो की सडको की तरह आज तो फॉर लेन सडको का जमाना है लेकिन वो पुरनी सडक भी अपने जबाने की फॉर लेन से कम नहीं थी तुलसी दास ने जो कहा वो अच्छा है या नहीं ए फैसला करने वाले हम कौन होते है अच्छा क्या है बुरा क्या है कौन जनता है जो हमारे अनुकूल होता है उसे हम अच्छा कह देते है प्रतिकूल है तो बुरा क्या हम भी एक मानस लिख सकते है क्या तुलसीदास की रचनाओ की तरह हम भी रचनाये कर सकते है किसी की बात काटने के लिए उसके बराबर योग्यता होनी परिवर्तन प्रकृति का नियम है चाहिए छोटी मुह बड़ी बात नहीं होनी चाहिए ज्ञानियो की बात ज्ञानी ही समझ सकते है धर्म आस्था की चीज है न की तर्क की और हम लोग तो कुतर्क कर रहे है भय मुक्त नारी दुराचारी होती है आज के दौर में हम समझौता कर के जी रहे है नारीओ के अनुकूल रह रहे है अगर अपने अनुकूल उन्हें रक्खे तो चौपाई
    तुलसी की याद आ जाएगी रहा सवाल ढोल का तो बिना पिटे बजती नहीं और जहा तक बात सुद्रो की है तो सूद्र किसी एक जाती का नाम नहीं बल्कि वर्ण का नाम है जिसके अंतर्गत वे सभी आते है जिनकी सोच और कर्म नीच होता है नीच सदैव जड़ होता है उन्हे मार्ग पर लाने के लिए थोडा भय जरुरी है और पशु तो ………
  20. MANISH SINGH
    मैं इस लेख को लिख रहा हूँ और किसी से क्षमा नहीं मांगूंगा क्योंकि जो इस से सहमत हैं वे ही मुझे प्रिय हैं
    और ……………….धरम न अरथ न काम रूचि , गति न चहौं निर्वान .
    जनम जनम रति रामपद यह वरदान न आन .
    ये जो नए आशीष नाम के लेखक पैदा हुए हैं जिन्होंने इसी के ऊपर टिप्पणी की है ये लगता है की औरतो में ही पले बढे हैं.
    अब आप ही बताइये की अग्नि परीक्षा तो बंदरो के सामने हुई थी . फिर जैसे आज आपके सामने कोई वैज्ञानिक दावा करता है तो आप तुरंत तो मान नहीं लेते हैं .देखने पर ही मानते हैं उसी तरह तुम्हारे पूर्वजो ने ही माँ सीता पर आरोप लगाए थे .ये जो धोबी की जात है उसी ने तो ये महान काम किया था.किसी राजपूत या ब्राह्मण ने तो नहीं न. और फिर कोई राजा कैसे बनता है ? राजा का बड़ा बेटा ही न बनता है. तो सब लोगो का राजा बन ने के लिए साफ़ भी तो होना चाहिए की ये राम जी का ही बेटा है. मै अपने भक्त भाइयों से माफ़ी चाहता हूँ ऐसे लिखने के लिए मगर .राम जी में ही क्या कमी थी जो उनको धनुष उठा के दिखाना पड़ा .वो तो यूं भी उतने ही बलवान थे जितना की नहीं उठाने पर. और फिर सुग्रीव के कहने पर ताड़ काटने और हड्डी मारने की क्या जरूरत थी .फिर भी उन्होंने ये सब कर के दिखाया. shri राम जी ने जो कुछ किया वो सब नहीं करते और पैदा हो के मर जाते तो क्या उतना नाम होता.उसी तरह अगर सीता जी परीक्षा नहीं देती तो क्या कोई उनको शुद्ध मान लेता.
    अगर राम जी ने ऐसा नहीं किया होता तो सीता जी पर आज तक उंगलिया उठ रही होती .उन्होंने ही सीता जी की पवित्रता को सबके सामने जाहिर किया .
    और रही बात मर्द-औरत की तो जब दुनिया का सबसे बलवान .सबसे सुन्दर .पुरुष जब विवाह करने के लिए परीक्षा देगा तो क्या औरत परीक्षा नहीं देगी. और हाँ , ये परीक्षा उन्होंने तब दी थी जब वे साल भर दूसरे के यहाँ रही थीं .और कितने लोग जानते थे की वे वाटिका में हैं .महल में नहीं .और अगर कोई कह देता की {बन्दर} हनुमान जी के कहे का क्या भरोसा तब ?सबके सामने अगर वो अयोध्या में परीक्षा नहीं देतीं तो बाद में लव कुश के पिता को लेकर गृहयुद्ध भी हो सकता था तो आशीष बचाने जाते सबको न. झगडा शांत करवाने ये जाते.
    जब समुद्र आदमी बन सकता था .जब बन्दर बोल सकता था .जब आदमी उड़ सकता था .जब पत्थर तैर सकता था तब ऐसी विषम परिस्थितियों में एक उतने बड़े साम्राज्य की महारानी ने अभूतपूर्व घटना के लिए अग्नि परीक्षा दे दी तो कौन सी बड़ी बात है .
    लज्जा फिल्म में माधुरी जो डायलोग बोलती है की औरत क्यों परीक्षा देगी वो तो हसी का सीन लगता है . सीता जी भी वियोग में थी राम जी भी थे .राम जी ने सब किया तो परीक्षा कौन देगा मैडम ? फिर वही . और राम जी ने कहा कहा था अग्नि परीक्षा देने के लिए .उन्हीने कहा की परीक्षा दो मेरे साथ रहने के लिए नहीं तो लक्षमण सुग्रीव किसी से शादी कर लो .वो तो सटी थीं की परिक्सा दे दी और दुनिया पूजती है नहीं तो माधुरी को आप्शन मिलता तो वो दूसरा ही चुनतीकैमरे का जमाना है नहीं तो इसे कोई जानता क्या?
    और हाँ .
    जैसे कोई कुत्ता मालिक के कहने पर काम करे वही वफादार है न की वो कुत्ता संगठन बना ले . और आदमी को नोचने लगे .२ ही दिन में आदमी दुनिया को कुता मुक्त कर देगा या पहले ही बाकी कुत्ते फिर गुलामी मान लेंगे .वही चीज औरतो को भी समझनी चाहिए की वो अपने को कुत्ते बिल्लियों से ऊपर मानती है और उन्हें रसोई से भगा देती है उसी तरह आदमी भी औरत से बलवान है और उसे उपेक्षित करता है. ये तो संसार का नियम है. हम बलवान ही पैदा हुवे है तो हम अपने ही मन की न करेंगे .
    वीर भोग्या वस्स्स्ससुन्धरा .
    भगवान जिस दिन औरतो को बलवान बना देंगे उस दिन वे राज करेंगी .मगर भगवान् को हमसे क्या चिढ है ? उं? अबलाओ को सहारा दे दे भगवान् .जय हो जय हो
  21. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] खुशियों का त्योहार है 2.ढोल,गंवार,शूद्र,पशु,नारी… 3.तुम मेरे होकर रहो कहीं… 4.शरमायें [...]

Tuesday, November 01, 2005

हम फिल्में क्यों देखते हैं?

http://web.archive.org/web/20140419051026/http://hindini.com/fursatiya/archives/70


Akshargram Anugunj
फुरसतिया भागते चले आ रहे थे- गब्बरसिंह की तरह जिसे धर्मेन्दर दौड़ा रहा हो। हांपते हुये बोले- गुरु बताओ आप फिल्में किस किये देखते हो?
शुकुल गुरु बोले- हम देखते ही नहीं फिल्में।
फुरसतिया: फिर भी बताना है कि फिल्में काहे देखते हो?
गुरु: अरे जब नहीं देखते तो काहे बतायें? जिस रस्ते जाना नहीं उसके कोस गिनने से क्या फायदा?
फुरसतिया: नहीं गुरु बताना तो पड़ेगा । आज नहीं बताया तो बेइज्जती खराब हो जायेगी।मिर्ची सेठ बोलेगा- बताया नहीं।
गुरु: हम बतायेंगे लेकिन हिंदी में। तुम अनुवाद कैसे करोगे अंग्रेजी में? हिंदी तो ऊ लोग समझ नहीं पायेंगे!
फुरसतिया: अरे नहीं गुरु, वो तो दूसरा लफड़ा है। वो जो हिंदी न जानने वाले हैं वो तो बहुत ज्ञानी लोग हैं। ऊंचे लोग ऊंची पसन्द टाइप। वो सारे देश के लोगों की बात है वहां विद्वान लोग हिंदी में अटकते हैं। यहां अभी ऐसा नहीं है। कुछ दिन बाद शायद इतना विकास हो जाये कि अंग्रेजी में ही लोग समझ पायें। अभी तो यहां हिंदी की खिचड़ी ही पकती है।
गुरु: अच्छा ये मामला है। चलो अच्छा पूछो सवाल हम लिखाये देते हैं जवाब।
फुरसतिया: गुरु,पहला सवाल तो वही है कि आप फिल्में क्यों देखते हैं?
गुरु: फिल्में बनती हैं इसलिये देखी जाती हैं। न बने तो कौन देखेगा जाकर?
फुरसतिया: बनता तो बहुत कुछ है गुरु। एटम बम भी बनते हैं ,चरस ,स्मैक भी तो क्या सबका प्रयोग किया जाता है?
गुरु: देखो बालक सवाल के जवाब में सवाल वर्जित है आज की सभा में। फिर भी जवाब यह होगा कि जो अपनी पहुंच में होगा उसे ही तो प्रयोग में लाया जायेगा। अब मानो तुमसे कहा जाये अंग्रेजी लिखने को तो लिये भार्गव डिक्शनरी पड़े रहोगे हफ्ते भर लेकिन लेकिन दो पन्ना नहीं लिख पाओगे। सो फिल्में हमारी पहुंच में हैं मनोरंजन का साधन है सो देख लेते हैं।
फुरसतिया: और कोई फायदा नहीं मसलन शिक्षा , आदर्श आदि?
गुरु: शिक्षा का तो ऐसा है कि देखते-देखते आ जाये तो है। वर्ना खाली उपदेश तो क्लासरूम का लेक्चर हो जाता है। पब्लिक सो जाती है।
फुरसतिया: गुरु भारतीय सिनेमा के बारे में कुछ ‘परकास’ डाल दिया जाये।
गुरु:हम का डालें? देखो ये किताब लिखी है आश करण अटल ने -सिनेमा पुराण। वे कहते हैं- काफी समय से हमारी फिल्मों के कथानक में ठहराव सा आ गया है। पानी हो या कथानक ठहराव उसे गंदला कर देता है। कोई विदेशी हमारी फिल्में देखे तो यही सोचेगा कि भारत में या तो प्रेमी बसते हैं या गुंडे। दिन भर की विज्ञापन फिल्में देखकर लगता है कि हमारे बालों में डेंड्रप और कीटाणु भरे हैं, कपड़ों पर मैल जमा हुआ है, पसीना बदबू मार रहा है और तो और हमें केवल पेप्सी या कोका कोला ही पीना चाहिये। इतना दोहराव ? इतना ठहराव? हमारे छोटे और बड़े दोनों पर्दों पर?
फुरसतिया: हां वो जो आता है विज्ञापन कोका कोला का -पियो सर उठा के तो लगता कि सर झुक गया। लगता है जो पियेगा उसी का सर उठेगा बाकी का कटेगा। अच्छा आम आदमी का क्या विचार है इस बारे में? वो काहे देखता है सिनेमा?गुरु:लेखक ,निर्देशक अभिनेता चन्द्रप्रकाश द्विवेदी कहते हैं- सिनेमा के बाजार ने अपने दर्शन को जन्म दिया कि हिंदुस्तान का सर्वहारा,मजदूर ,मेहनत कश,थका-हारा, रोजमर्रा की परेशानियों में सच को सच ,यथार्थ को यथार्थ में नहीं देखना चाहता। वह इस सबसे भागना चाहता है। वह इस सबसे भागना चाहता है। वह ऐसे सपने देखना चाहता है,जहां असंभव भी संभव हो। वह मन बहलाने के लिये पागलपन की हद तक गुजर जाना चाहता है। इसलिये ऐसे सपनों का ताना बाना सिनेमा ने बुना जो खूब चला। उन सपनों में रचने-बसने वाला दर्शक वहीं रहा। मजदूर वहीं रहा। सपना देखने वालों की जेबें खाली होतीं रहीं। सपना दिखाने वाले जेबें भरते रहे। आवाम के अंतिम आदमी तक पहुंचने के नाम पर सिनेमा मानसिकता की सबसे निचली सीढ़ी पर पहुंचा और बदले में अपने लिये धन की सबसे ऊपरी सीढ़ी निश्चित कर ली।
फुरसतिया: अच्छा कुछ बातें आपके फिल्म प्रेम के बारे में पूछ लेता हूं। इससे आपकी अभिरुचि पता चल जायेगी कि आप कितने पानी में हैं?
गुरु : हां पूछ लो।
फुरसतिया: सबसे पहले यह बतायें कि आपने सबसे पहले कौन सी फिल्म देखी तथा कैसे?
गुरु: हमें याद है हमारा एक दोस्त था। वह भी जीतेंदर टाइप था। खूब पिक्चर देखता था। एक दिन घर से पैसे चुरा के वह ब्लैक में ‘वक्त’ की टिकट लाया। जैसे ही वह जाने वाला था अंदर कि उसका ‘बउआ’ टाइप का एक दोस्त किसी सनसनीखेज
सिनेमा की दो टिकटें ले आया। वो मेरे दोस्त को ले गया। उसने मुझे अपना टिकट दे दिया मुफ्त में। सो पहली फिल्म हमने मुफ्त में देखी किसी को मजबूरी से उबारने के लिये। राजकुमार का डायलाग मुझे अभी तक याद है- जानी,जिनके घर कांच के बने होते हैं वे दूसरों के घर पत्थर नहीं फेंकते।
फुरसतिया: यह शुरुआत फिर आगे बढ़ी?
गुरु: न कहीं। हमारे हिस्से में सिनेमा हाल में देखी गई फिल्मों का औसत प्रति साल एक सिनेमा से भी कम आता है।पता नहीं कैसे हमें यह ज्ञान हुआ कि यह सब बकवास है। तब से हम वही पिक्चर देखते हैं जो जनता कहती है कि देखने लायक है। हम इस मामले में सबसे पहले होने के लालच में नहीं पड़ते। क्या फायदा कोलम्बस बनने से?
फिर तो बेकार है सर खपाने से आपके पास। चलता हूं भगवान आपका भला करे। हमें यह लेख आज पोस्ट करना है वैसे ही देर हो गई।यह कह कर फुरसतिया भाग लिये पता नहीं किस ओर!

10 responses to “हम फिल्में क्यों देखते हैं?”

  1. सारिका सक्सेना
    बहुत बढिया लिखा है..
  2. eswami
    ये डबल-रोल/स्कीट्जोफ्रेनिया/ईगो-अल्टर-ईगो सँवाद स्टाईल में पहला लेख लिखे हो गुरुदेव. मुझे लगता था मैं अकेला ही हूँ जिसकी खोपडी में आवाजों का सराउँड साऊँड बजता है.
  3. अक्षरग्राम  » Blog Archive   » अवलोकन अनुगूँज १५ - हम फिल्में क्यूँ देखते हैं
    [...] ��ए जा सकने वाले स्टाईल में अपनी बात गूरु जी के मुंह से कहलवाई व मानते हैं कि फि� [...]
  4. रजनीश मंगला
    बहुत मज़ा आया पढ़कर। बहुत सही लिखा है। अभी भी यह ठहराव है या गाड़ी आगे बढ़ रही है?
  5. Laxmi N. Gupta
    सब से पहिले जो फिलम हमने देखी थी, उसका नाम था, “हन्टर वाली” या “चाबुक वाली” और गुरू शायद मेरी बगल में बैठे थे क्योंकि तब तक उन्हें यह ज्ञान नहीं आया था कि वही पिक्चर देखें जो जनता देख रही हो। हमेशा की तरह बढ़िया लिखा है।
  6. अक्षरग्राम  » Blog Archive   » १५वीं अनुगूँज की सर्वश्रेष्ठ प्रविष्टि
    [...] ��ेन्द्र   आलोक   संजय   नितिन   फुरसतिया   कालीचरण   सारिका   शशि   द� [...]
  7. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] 1.हम फिल्में क्यों देखते हैं? 2.रहिमन निज मन की व्यथा 3. (अति) आदर्शवादी संस्कार सही या गलत? 4.(अति) आदर्शवादी संस्कार सही या गलत? 5.(अति) आदर्शवादी संस्कार सही या गलत? 6.गरियाये कहां हम तो मौज ले रहे हैं! 7.क्षितिज ने पलक सी खोली 8. ‘मुन्नू गुरु’ अविस्मरणीय व्यक्तित्व 9.जाग तुझको दूर जाना! 10.मजा ही कुछ और है 11.इलाहाबाद से बनारस 12.जो आया है सो जायेगा 13.कनपुरिया अखबार की कतरन [...]
  8. link
    Is there a website that means it is simple to follow web sites and podcasts? I don’t offer an ipod touch, does that subject? .
  9. anonymous
    What websites for political commentary are you willing to encourage me to look at?

दीपावली खुशियों का त्योहार है

http://web.archive.org/web/20110925232903/http://hindini.com/fursatiya/archives/62

[यह लेख मैंने अभिव्यक्ति के लिये लिखा था। छपने के लिये भेजा था। लेख तो छपा अभिव्यक्ति में लेकिन इसकी सारी चर्बी छांट दी पूर्णिमा जी ने। लेख को स्लिम-ट्रिम बना दिया। यह शायद अपनी कहानी से न्याय करते हुये भी किया पूर्णिमा जी ने जिसमें दर्जी की दुकान है,कैंची है तथा कारीगर भी हैं। आप लोग भी देखें कि एक बस यूं ही नुमा ब्लाग पोस्ट कैसे एक रचना में तब्दील होती है। पूर्णिमा जी का शब्दांजलि में छपा साक्षात्कार भी पढ़िये और अपनी राय बतायें। आप सभी को दीपावली की मंगलकामनायें]
दीपावली खुशियों का त्योहार है। सुनकर ऐसा लगता है कि दीपावली के बगैर किसी को खुश होता देख पुलिस पकड़ लेगी। गोया किसी बच्चे को खुशी देख उसे मां कोसे-भगवान तुझ जैसा लापरवाह,फिजूलखर्च बेटा किसी को न दे। अगर अभी सारी खुशी खर्च कर देगा तो दीपावली के दिन क्या करेगा?
ऐसा माना जाता है कि दीपावली के दिन रामचन्द्र अपनी पत्नी सीता के साथ १४ वर्ष के बाद वनवास से वापस लौटे थे। रावण-वध के कारण जनता में उसी तरह हीरो बन गये थे जिस तरह बाद में अप्रत्याशित रूप से विश्वकप जीतकर कपिलदेव नायक बन गये थे। अयोध्या वासियों ने उनके आगमन की खुशी में नगर को खूब सजाया और खुशियां मनायी। उसी की याद में न्यूटन के जड़त्व के नियम का पालन करते हुये लोग आज तक खुशी मनाने की परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं।
वैसे कुछ खोजी लोगों ने इस कथा के कुछ क्षेपक खोजे हैं। जब भरत ने १४ वर्ष तक खड़ाऊं शासन कर लिया और राम के वापस लौटने का समय आया तो उनके मुंहलगे सलाहकारों ने समझाया- महाराज, आपने १४ साल तक अपना खून-पसीना एक कर दिया। अब राम को सत्ता सौपने का क्या मतलब? वैसे भी आपकी मां ने राजपाट तो आपके लिये मांगा था। राम के लिये वनवास मांगा था । ये थोड़ी के उनके लौटने के बाद आप सड़क पर आ जायें। सदाचारी,सूर्यवंशी भरत के मन में कोई लोभ नहीं था फिर भी सलाहकारों के अनुरोध पर इस दिशा मेंविचार मग्नावस्था को प्राप्त हुये। एक तरफ उनके रावण-वध के तेज से लबलबाते बड़के भइया थे दूसरी तरफ राजपाट। वे मतिभ्रम का शिकार हुये।
अंत में उन्होनें कौन बनेगा करोड़पति की तर्ज पर जनता की राय जानने के लिये सर्वे कराया। जनता के दो वर्ग उनसे नाराज थे। एक वह वर्ग था जिसके काम उन्होंने नहीं कराये थे तथा दूसरा वर्ग वह वर्ग था जिनके विरोधियों के काम भरत ने करा दिये थे। जाहिर है कि चौदह साल में ये दोनों वर्ग बहुमत में में आ गये थे। इसके अलावा तीसरा वर्ग भी था। ये वो लोग थे जो खुश रहते-रहते ऊब गये थे तथा शासन में बदलाव चाहते थे। १४ वर्ष के राज पाट की एकरसता को तोड़ने की जबरदस्त मांग थी। सब कुछ सोचते हुये भरत ने राम को राजपाटसौंप दिया। दुनिया में बंधु-प्रेम की मिसाल बने।
राम के राजा बनने पर अयोध्या वासियों ने जमकर खुशी मनाई।खूब दावतें उड़ाईं। सोमरस पान किया। नृत्यानंद लिया। जुआ खेला।अपना बना खाना छोड़कर होटलों में ऐश की। यहां तक तो ठीक था।राम भी बड़े खुश कि अयोध्या वासी उनके राजा बनने से खुश हैं।
लेकिन राम की खुशी काफूर हो गयी जब उन्होंने पाया कि सारे अयोध्यावासियों के खर्चे के बिल उनके नाम आने लगे। रोज बोरे-बोरे भर के बिल भुगतान के लिये आते तथा तकादगीर भी तकादा करने लगे। उन दिनों माहौल आज की तरहलोकतांत्रिक नहीं था कि नेता की रैली का बिल जनता चुकाये। सो सारे रामनामलूट के बिल रामधाम में आ गये।भरत के १४ वर्ष के राज्य के चलते खजाना खाली था फिर भी राजा रामचंद्र जी ने सारे बिल वीरतापूर्वक चुकाने का निश्चय किया तथा खर्चे कम करने की गरज से धीरतापूर्वक अपनी पत्नी सीता को जंगल भेज दिया। इससे सारे स्वयं राम,अयोध्यावासी तथा सीताजी परम दुखी हुई। दुख में लोग खर्च करना भूल गये तथा राज्य की हालत में सुधारहुये।
बाद में बाजारवादी ताकतों ने यह अफवाह फैलाई की रामचन्द्रजी ने खर्चे बचाने की गरज से नहीं वरन्‌ सीता पर लगे आरोपों के चलते उन्हें जंगल भेजा था। अफवाह के धुआंधार प्रचार की वजह से यह बात उसी तरह सच मान ली गई जिस तरह से यह मान लिया गया है कि लाइफब्वाय साबुन से नहाने मात्र से आदमी स्वस्थ हो जाता है या फिर लक्स कोजी बनियान पहनने से ही आदमी लोहे की तरह मजबूतबन जाता है।
दीवाली पर लोग जमकर खुशियां मनाते हैं। कुछ लोग तो इतना खुशी होते हैं कि दूसरे की खुशी भी मना लेते हैं। इससे दोनों को दुखमिलता है।
दीपावली पर घर-घर रोशनी होती है। दिये जलाये जाते हैं। लक्ष्मी-गणेश की पूजा होती है। खिलौने खरीदे जाते हैं।पहले सब कुछ मिट्टी से बनते थे। दीवाली में कुम्हार वैसे ही व्यस्त हो जाते है चुनाव में नेता,वर्षान्त में चार्टेड एकाउन्टेन्ट या परीक्षा में विद्यार्थी। उनके भाव बढ़ जाते ,वे बेभाव कमाते। वक्त का तकाजा, आज वे बेभाव हो गये। दिये को मोमबत्तियों ,बिजली की झालरों ने तथा मिट्टी के खिलौनों की एक क्षत्र सरकार को प्लास्टिक,प्लास्टर आफ पेरिस और तमाम अगड़म-बगड़म की गठबंधन सरकार ने अपदस्थ कर दिया। कुम्हारों की हालत स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की तरह हो गयी। शरीर और आत्मा के गठबंधन को बनाये रखने के लिये उन्होंने चाट-पकौड़े,छोले-भटूरे आदि की दुकानें लगा लीं। अपनी जगहें कैफे, पीसीओ, एटीएम,पिज्जा-बर्गर आदि-इत्यादि की दुकानों को किराये पर उठा दिया।
हम यह सब सोच ही रहे थे कि हमारे दोस्त मिर्जा कमरे में किसी वायरस की तरह घुसे। राकेट की तरह लहराते हुये कमरे की कक्षा में स्थापित हुये और चटाई बम की तरह तड़कने लगे। घर में रोशनी के अनार फूटने लगे। मिर्जा चकरघिन्नी की तरह नाचकर सबसे मिले। बच्चों को पुचकारा, चाय का फरमाइसी आर्डर उछाला और हमारी पीठ पर धौल जमाते हुये बोले-मियां क्या चेहरे पर मुहर्रम सजाये बैठे हो? कौन तुम्हारी कप्तानी छिन गई है जो गांगुली बने बैठे हो? काहे प्रवासियों की तरह देश से दूरहोने की बात का रोना रोने वाले अंदाज में दिये की जगह दिलजलाने के मूड में बैठे हो?
हमने अपने दीवाली चिंतन से उन्हें अवगत कराया। मिर्जा महताब की तरह रोशन हो गये। अचानक चाय का आखिरी घूंट लेकर बोले- बरखुरदार,अपने को पायजामें के अंदर कर लो।चलो आज किसी दिये का इन्टरव्यू लेते हैं।देखें जो रोशनी देता है, वो कैसा महसूस करता है।
हमारी सहमति-असहमति को तवज्जो दिये बगैर मिर्जा हमको टांग के वैसे ही चल दिये जैसे अमेरिका ब्रिटेन के साथ करता है। रास्ते में एक पेशेवर साक्षात्कार सेवा कंपनी से एक इंटरव्यू लेने वाली सुंदरी को साथ ले लिया। वह तुरंत अपने नाज, नखरे, लिपिस्टक, पाउडर, अल्हड़ता, चश्मा, अदायें और माइक समेट कर साथ चल दी।
हम इंटरव्यू लेने लायक दिये की खोज में भटकने लगे। जिस मुस्तैदी से विकसित देश आतंकवादी खोजते हैं या बेरोजगार रोजगार टटोलते हैं या फिर जवान लड़की का बाप अपनी कन्या हेतु वर खोजता है उसी तन्मयता से हम नये-पुराने,समूचे-टूटे, छोटे-बड़े दिये की खोज में थे। हर भूरी,गोल दिखती चीज पर साथ की महिला माइक अड़ा देती- क्या आप दीपकजी हैं?
सारे रास्ते पालीथीन,प्लास्टिक,पाउच और पार्थेनियम(गाजर घास)से पटे पड़े थे। उत्साही पालीथीन के टुकड़े उड़न तस्तरियों से कूड़े के ढ़ेरों की परिक्रमा कर रहे थे। कूड़े के ढेर के ये उपग्रह आपस में टकरा भी रहे थे,गिरकर फिर उड़ रहे थे। गाजरघास विदेशी पूंजी सी चहक रही थी। जितना उखाड़ो-उतना फैल रही थी। सांस लेना मुश्किल।लेकिन हम इन आकर्षणों के चक्कर में पड़े बिना दीपक की खोज में लगे थे। हमें नयी दुनिया की खोज में कोलम्बस के कष्ट का अहसास हो रहा था। सब कुछ दिख रहा था। गोबर के ढेर,पान की पीक,सड़क पर गायों की संसद,कीचड़ में सुअरों की सभा केवल दिया नदारद था- नौकरशाही में ईमानदारी की तरह।
अचानक मिर्जा के चेहरे पर यूरेका छा गया। वे एक नाली के किनारे कुड़े के ढेर में दिये को खोजने में कामयाब हो गये। इन्टरव्यू-कन्या को इशारा किया । कन्या मुस्कराई। अपना तथा माइक का टेप आन किया ।बोली-
दीपकजी आप कैसे हैं? आई मीन हाऊ आर यू मिस्टर लैम्प?
उधर से कोई आवाज नहीं आई। सुंदरी मुस्कराई , कसमसाई, सकुचाई, किंचित झल्लाई फिर सवाल दोहराई-
आप कैसे हैं? क्या आप मेरी आवाज सुन पा रहे हैं दीपकजी?
जवाब नदारद। कन्या आदतन बोली- लगता है कुछ संपर्क टूट गया है।
इस बीच मिर्जा पास के पंचर बनाने वाले को पकड़ लाये जो कि पहले बर्तन बनाता था। और दीपक तथा कन्या के बीच वार्ता अनुवाद का काम पंचर बनाने वालेको सौंप दिया। इस आउटसोर्सिंग के बाद इंटरव्यू का व्यापार धड़ल्ले से चलने लगा।कन्या दीपक को कालर माइक पहले ही पहना चुकी थी।
सवाल:-दीपकजी आप कैसे हैं? कैसा महसूस कर रहे हैं?
जवाब:- हमारी हालत उस सरकार की तरह है जिसका तख्ता पलट गया हो। मैं पहले पूजा गया। फिर महीनों रोशनी देता रहा। आज घूरे पर पड़ा हूं। कैसा महसूस कर सकता है कोई ऐसे में। मेरी हालत ओल्ड होम में अपने दिन गिनते बुजुर्गों सी हो गयी है।
सवाल:- आप यहां कब से पड़े हैं? मेरा मतलब कब से यहां रह रहे हैं?जवाब:- अब हमारे पास कोई घड़ी या कैलेंडर तो है नहीं जो बता सकें कि कब से पड़े हैं यहां। लेकिन यहां आने से पहले मैं सामने की नाली में पड़ा था। हमारे ऊपर पड़े तमाम कूड़े-कचरे के कारण नाली जाम हो गई तो लोगों ने चंदा करके उसको साफ कराया तथा मुझे कूड़े समेत यहां पटक दिया गया। तब से यहीं पड़ा हूं।
सवाल:-आप पालीथीन,पार्थेनियम वगैरह के साथ कैसा महसूस करते हैं?डर नहीं लगता आपको अकेले यहां इनके बीच?
जवाब:- यहां तो सब कुछ कूड़ा है। यहां कूड़े में जातिवाद,सम्प्रदायवाद तो है नहीं जो किसी से डर लगे। लेकिन हमारा पालीथीन का क्या मेल? हमें कोई ठोकर मारेगा हम खतम हो जायेंगे। वे बहुतों कि खतम करके तब जायेंगी। ये जो बगल की पालीथीन देख रहीं हैं ये तीन गायों की ,उनके पेट में घुस कर,निपटा चुकी है ।
सवाल:- आपकी इस दुर्दशा के लिये कौन जिम्मेदार है?
जवाब:- माफ करें,इस बारे में हमारी और मिट्टी के दूसरे उत्पादों की दुर्दशा के संबंध में एक जनहित याचिका पांच साल से विचाराधीन है इसलिये इस बारे में मैं कुछ नहीं बता पाऊंगा।
सवाल:-आपमें और उद्‌घाटन के दिये में क्या अंतर होता है?
जवाब:- वही जो एक नेता और आम आदमी में होता है। जैसे आम जनता का प्रतिनिधि होते हुये भी नेता आम जनता के कष्टों से ऊपर होता है वैसे ही उद्‌घाटन का दिया दिया होते हुये भी हमेशा चमकता रहता है। उसे तेल की कोई कमी नहीं होती। उसके कंधों पर अंधेरे को भगाने का दायित्व नहीं होता। वह रोशनी में रोशनी का झंडा फहराता है। हमारी तरह अंधेरे से नहीं लड़ता। हम अगर आम हैं तो वह खास ।
सवाल:- दीपावली पर आप दिये लोग कैसा महसूस करते हैं?जवाब:- इस दिन हमारी पूछ चुनाव के समय में स्वयंसेवकों की तरह बढ़ जाती है। हमें भी लगता है कि हम अंधेरे को खदेड़कर दुनिया को रोशन कर रहे हैं। यह खुशनुमा अहसास मन में गुदगुदी पैदा करता है। वैसे हम सदियों से रोशनी बांटते रहे यह कहते हुये:-
जो सुमन बीहड़ों में,वन में खिलते हैं
वे माली के मोहताज नहीं होते ,
जो दीप उम्र भर जलते है
वे दीवाली के मोहताज नहीं होते।

सवाल:- आजकल आप लोगों की संख्या इतनी कम कैसे हो गई?क्या आप लोग भी परिवार नियोजन अपना रहे हैं?
जवाब:- तमाम कारण हैं। कटिया की बिजली की सहज उपलब्धता ने तथा तेल की कीमतों में लगातार बढोत्तरी ने हमें उसी तरह बाहर कर दिया है जिस तरह विकसित देश की कंपनियां अपने कर्मचारियों को ‘ले-आफ’ कर देती हैं। लेकिन आप लोगों ने जो भी किया हो अंधेरे के डर से हमें जब भी याद किया गया हम कभी अपने काम से नहीं चूके।
सवाल -जवाब शायद और चलते लेकिन तेज हवा के कारण दिया कूड़े से सरककर गहरी नाली में जा गिरा। वहां तक माइक का तार नहीं पहुंच पा रहा था।
सुंदरी का समय भी हो चुका था। थैंक्यू कहकर अपनी मुस्कराहट व माइक समेट लिया।
हम वापस लौट पड़े। मिर्जा कुछ उदासी के पाले में पहुंचकर मेराज फैजाबादी का शेर दोहरा रहे थे:-
चांद से कह दो अभी मत निकल,
ईद के लिये तैयार नहीं हैं हम लोग।

लेकिन घर पहुंचते ही पटाखे छुड़ाते बच्चों को देखते ही मिर्जा उदासी को धूल की तरह झटककर कब फुलझड़ी की तरह चमकने लगे पता ही न चला।
मेरी पसंद
मेरे पंख कट गये हैं
वरना मैं गगन को गाता।
कोई मुझे सुनावो
फिर से वही कहानी,
कैसे हुई थी मीरा
घनश्याम की दीवानी।
मीरा के गीत को भी
कोई विष रहा सताता
कभी दुनिया के दिखावे
कभी खुद में डूबता हूं,
थोड़ी देर खुश हुआ तो
बड़ी देर ऊबता हूं।
मेरा दिल ही मेरा दुश्मन
कैसे दोस्ती निभाता!
मेरे पास वह नहीं है
जो होना चाहिये था,
मैं मुस्कराया तब भी
जब रोना चाहिये था।
मुझे सबने शक से देखा
मैं किसको क्या बताता?
वह जो नाव डूबनी है
मैं उसी को खे रहा हूं,
तुम्हें डूबने से पहले
एक भेद दे रहा हूं।
मेरे पास कुछ नहीं है
जो तुमसे मैं छिपाता।
मेरे पंख कट गये हैं
वरना मैं गगन को गाता।
-स्व.रमानाथ अवस्थी

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

15 responses to “दीपावली खुशियों का त्योहार है”

  1. Manoshi
    लेख बहुत बढिया है मगर पुर्णिमा जी की समझदारी व एक अच्छे सँपादक होने की दाद दिये बिना भी नही रहा जा रहा| आपका लेख बहुत सुगठित तरीके से लिखा गया है पर पूर्णिमा जी ने उसमे ब्से उतना ही लिया जितना सचमुच व्यँग्य और बिना किसी को ठेस पहुँचाये प्रकाशित किया जा सकता है| as a writer आपने और as an editor उन्होने बहुत अच्छा काम किया है| लेख प्रकाशित होने की बधाई आपको|
  2. eswami
    गुरुदेव, एक और शानदार लेख लिखने के लिए बधाई!
    कविता बहुत सुँदर है.
  3. जीतू
    बहुत शानदार लेख है, हास्य के साथ, व्यंग की चोट भी बहुत गहरी है। और हाँ, हमारे मिर्जा साहब को वापस कुवैत की फ़्लाइट मे हिफ़ाजत से बिठा देना। यहाँ भी उनका इन्तज़ार हो रहा है, उनके बिना जी नही लगता।
  4. sarika
    बहुत अच्छा लिखा है अनूप जी! जीतू जी सही कह रहे हैं -आपके व्यंग्य की चोट भी बहुत गहरी होती है।
    दीपावली की शुभकामनायें!!
  5. प्रत्यक्षा
    बहुत अच्छे !बडा चुटीला व्यंग. छुट्टी का अच्छा सदुपयोग.
    अब समझ में आया इन्टरवियू लेने की विद्या में आप कैसे पारंगत हो रहे हैं
    :-)
    प्रत्यक्षा
  6. बॄजेश
    पूर्णिमा जी ने सम्पाद्कीय धर्म का निर्वहन किया है जो काबिले तारीफ़ है.
    आप द्वारा प्रस्तुत दोनो साक्षात्कार लाजवाब है, जहां एक ओर व्यंग की अद्भुत छ्टा है तो दूसरी तरफ़ व्यक्तित्व की अनूठी झलक.
  7. रवि
    अभिव्यक्ति पर दीपक का साक्षात्कार पढ़कर महसूस हुआ कि अरसे बाद कोई ढंग का व्यंग पढ़ने में आया. भारतीय व्यंग्य तो लगता है कि परसाईँ के साथ ही चला गया…
    बधाइयाँ !
  8. फ़ुरसतिया » तुम मेरे होकर कहीं रहो…
    [...] िवस के अवसर पर उन्होंने लालकिले से कविता पढ़ी:- मेरे पंख कट गये हैं वरना मैं ग� [...]
  9. ब्लॉग में क्या लिखें?
    [...] ४. साक्षात्कार: आपके गाँव, कस्बे,शहर मे कोई महान हस्ती पधारी हो। आपको उनसे मिलने की बहुत इच्छा हो, और पुलिस वाला आपको उनके आसपास फ़टकने नही दे रहा हो, बस उस हस्ती के कान तक बात पहुँचा दो कि अमरीका की ब्लागस्पाट कम्पनी की तरफ़ से इन्टरव्यू लेने आये है। फ़िर देखना चाय के साथ समौसे ना मिले तो कहना। बड़े लोगों मे इन्टरव्यू देने की एक खास बीमारी होती है जो पत्रकारों को देखकर और बढती है। बस आप कुर्ता पजामा डालकर, झोला बगल मे लटका कर, अगर कोई कैमरा हो तो उसे साफ़ सूफ़ करके निकल लीजिये साक्षात्कार लेने। बस फ़िर उसे चाँप दीजिये अपने ब्लॉग पर। कोई पढे ना पढे, आपको चाय समौसा तो मिला। है कि नही? उदाहरण के लिये यहाँ का इन्टरव्यू झेला जाय। [...]
  10. Ram dutt Dadhich
    Mr.Anoop Shukla,
    You may think your self a great writer , very great Vyangkar but you are not a true Indian.
    The readers may consider your thinking some what correct for the second part of the article you have written on the Deepak ( Diya ), although in this part also it is not clear realy what you want to convye to the readers.
    The first part on Bhagwam RAM , Maa Sita & BHARAT you were able to write because of a simple fact that you are living in INDIA and any Aera Gera Nathu Gera can write any thing on the Ideals of Hindu samaj , on the feelings of Indians without any fear like a Vidharmi or …. my culture is not allowing me to use many worst words of abusees…
    Please dare to write any such thing on the Ideals of other cultures and Dharma and you will get the reply in better way.You may become more famous.
    I opened the site to get some thing NOVEL on this festival but I got this kachara.
    Your article is very old but some thing related to Hindi Sahitya attracted me and now I am feeling ashamed of reading this part of article and so could not resist to write this .
    It may hurt you but I am trying to save my faith from such things ,which person like you are doing for Paisa and sasti fame.. Can you do any thing for these things ..???? Can you go to any limit????
    Sorry to convey in english as I do not know prently to convey my slf in hindi on computer as I donot know the hindi typing on this computer.
    With Best Regards
    RD Dadhich
  11. Ram dutt Dadhich
    Mr.Anoop Shukla,
    You may think your self a great writer , very great Vyangkar but you are not a true Indian.
    The readers may consider your thinking some what correct for the second part of the article you have written on the Deepak ( Diya ), although in this part also it is not clear realy what you want to convye to the readers.
    The first part on Bhagwam RAM , Maa SITA & BHARAT you were able to write because of a simple fact that you are living in INDIA and any Aera Gera Nathu Gera can write any thing on the Ideals of Hindu samaj , on the feelings of Indians without any fear like a Vidharmi or …. my culture is not allowing me to use many worst words of abusees…
    Please dare to write any such thing on the Ideals of other cultures and Dharma and you will get the reply in better way.You may become more famous.
    I opened the site to get some thing NOVEL on this festival but I got this kachara.
    Your article is very old but some thing related to Hindi Sahitya attracted me and now I feel ashamed of reading this part of article and so could not resist to write this .
    It may hurt you but I am trying to save my faith from such things ,which person like you are doing for Paisa and sasti fame.. Can you do any thing for these things ..???? Can you go to any limit????
    Sorry to convey in english as I do not know presently to convey my self in Hindi on computer as I donot know the Hindi typing on this computer.
    With Best Regards
    RD Dadhich
  12. Ram dutt Dadhich
    Dear Mr Anoop Ji,
    May I have a right for a simple clarification on my above obsevation please like you have a right to comment any thiong on RAM, SITA & BHARAT.
    With Best Regards
    RD Dadhich
  13. sindhu
    hai,
    it is good but in a very typical language
  14. फ़ुरसतिया-पुराने लेख
    [...] 1.दीपावली खुशियों का त्योहार है 2.ढोल,गंवार,शूद्र,पशु,नारी… 3.तुम मेरे होकर रहो कहीं… 4.शरमायें नहीं टिप्पणी करें 5.बड़े तेज चैनेल हैं… 6.गुम्मा हेयर कटिंग सैलून 7.एक गणितीय कवि सम्मेलन 8.हेलो हायकू टेस्टिंग [...]
  15. Anonymous
    PLEASE NEXT TIME IF U WRITE ANY ESSAY WRITE IT IN A PROPER WAY !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!