Saturday, October 07, 2006

गलत हिंदी लिखने के कुछ सरल उपाय

http://web.archive.org/web/20110925155003/http://hindini.com/fursatiya/archives/196

गलत हिंदी लिखने के कुछ सरल उपाय

हम सबेरे-सबेरे फुरसतिया को देखे तो लगा उनका चेहरा घड़ी में बदल गया है और उस पर दोनों सुइयां बारह बजा रही हैं- सरदार संतासिंह -बंतासिंह का सौत-समय। पहले तो हम खुश हो लिये कि चलो कम से कम चेहरे की कुछ तो कीमत बढ़ी लेकिन जब सामाजिक शिष्टाचार का चश्मा लगाकर देखा तो पता चला कि ऐसे में खुश होना तो पाप की बात है। पाप नही बल्कि घोर पाप। फुरसतिया हमारे मित्र हैं, रोज का उठना-बैठना है उनके साथ। नमस्कारी-नमस्कारा है और कभी-कभी जब अंग्रेजी बोलने का मन करता है तो हाय-हलो भी कहकर जी हलका कर लेते हैं दोनो।
एक दिन तो ऐसा अंग्रेजी बोलने का शौक चढा़ कि किताब की दुकान पर जाकर ‘रैपिडेक्स इंगलिश स्पीकिंग कोर्स’ किताब को घंटो उसी तरह सहलाते रहे जैसे अमेरिकाजी अपने पाकिस्तान को दुलराते रहते हैं या फ़िर जगमोहन डालमिया सौरभ गांगुली को सालों लड़ियाते रहे। हम भावुक होकर किताब खरीदने ही वाले थे कि हमें फुरसतियाजी ने इशारे से रोक दिया। दुकान का मालिक सटा खड़ा था तो हमने आंख के ही इशारे से पूछा-क्या बोलता तू? तब तक दुकान का मालिक दूसरी ग्राहक, जो कि स्वाभाविक रूप से महिला ही होनी चाहिये न!, से नजदीकी बढा़ते हुये सेवा प्रदान करने के प्रयास में जुट गया। उस मरदूद को यह पता ही नहीं है कि सटने में भारत सरकार कोई टैक्स नहीं लगाती है लेकिन सेवा पर टैक्स सटा देती है, पूरे आठ प्रतिशत और सरचार्ज अलग से।
बहरहाल, तो फिर आगे हुआ यह कि फ़िर हम लोगों ने अंखियॊं ही अंखियॊं के इशारे में बात करने के लिये मध्यस्थ के रूप में फुसफुसाहट को भी शामिल कर लिया और यह तय किया कि इतवार को चलेंगे परेड मैदान में। वहां तमाम लोग अपनी ‘रैपिडेक्स’मय अंग्रेजी के आधे दाम पर बेंच जाते हैं वहीं से औने-पौने में किताब मिल जायेगी और मोल-तोल का मजा अलग से। यहां तो ‘एक दाम’ का स्टिकर चिपका है जो खरीदारी को रूटीनी और बोझिल बना देता है। फ़िर हमने अपने जीवन के तमाम कार्यक्रमों की तरह ‘रैपिडेक्स इंगलिश स्पीकिंग कोर्स’ किताब खरीदने का विचार भी स्थगित कर दिया और परिणाम आजतक भुगत रहे हैं- अपनी बात हिंदी में ही कह पा रहे हैं।
यह बहुत साधारण सी लगने वाली बात हमने इसलिये बतायी कि आपको पता लग सके कि हमारे जीवन में फुरसतिया जी का कितना दखल है। जिस देश में लोग अपने पेट काट कर अपने बच्चों को अंग्रेजी सिखाने के लिये जागरूक होकर लगे हों उसी देश की एक किताब की दुकान मैंने लगभग खरीद ली किताब इसलिये नहीं खरीदी क्योंकि फुरसतियाजी की उसमें सहमति नहीं थी।
तो हमारे जीवन में इतना दखल रखने वाले फुरसतिया जी जब हमको इतना उदास टाइप दिखे तो उदासी का कारण पूछना हमारी जिम्मेदारी हो गयी और हमने उनके लटके हुये चेहरे पर पहले दो-चार हल्के-फुल्के डायलाग के छींटे मारे और जब इसपर भी वे अपना चेहरा लटाकाये ही रहे तो हमने द्स-बारह चुटकुलों का ‘जैक’ लगाकर उनके चेहरे को ऊपर उठा दिया। फिर बतकहाव शुरू हुआ। जो बातचीत हुयी वह सवाल-जवाब के रूप में यहां पेश है:-
सवाल: ये अपने चेहरे पर बारह काहे बजाये हो? और कोई टाइम का वाल पेपर लगाऒ न! कोई न मिले तो दसबजकर दस मिनट वाला सटा लो।
जवाब:- हमसे मजाक मत करो आज हम मजाक के मूड में नहीं हैं।
सवाल:- तो फिर कौन से मूड में हो? क्या कोई नया मूड आया है दीवाली आफर में जो उसी में धंस लिये?
जवाब:- हमें ये पता होता कि हम किस मूड में हैं तो हम बता ने देते! हमें खुदै नहीं पता कि कौन से मूड में हैं हम!
सवाल:- अच्छा ये बताऒ ये तुम्हारा ब्लाग-स्लाग कैसा चल रहा है? कुछ लिख-पढ़ रहे हो आजकल?
जवाब:- पढ़ तो हम रहे हैं लेकिन लिखने में डर लगता है।
सवाल:- डर! क्या के रे हो? किससे डर गये? भूल गये जो डर गया सो मर गया?
जवाब:- अरे हमारा वो वाला डर नहीं है जो रामगढ़ वालों का था? हमारा डर दूसरे किस्म का है। हम डरते हैं कि कहीं लिखने में कुछ गड़बड़ी न हो जाये। जहां कोई गड़बड़ी हुयी नहीं कि कोई मीनमेख निकालने वाला आ जायेगा और हमारी इज्जत का फालूदा निकल जायेगा।
सवाल:- तो गलती मत किया करो। सावधान रहा करो। सावधानी हटी,दुर्घटना घटी को याद रखो हमेशा।
जवाब:- अरे यार ये सब हमें पता है लेकिन गलती हो ही जाती है। समझ नहीं आता कि कोई ऐसा उपाय है क्या कि गलती भी करें लेकिन पकड़े न जायें।
ये चाहत अनोखी थी फुरसतियाजी की लेकिन मित्र की चाहत को पूरा करना एक सच्चे मित्र की जिम्मेदारी होती है। इसलिये हमने तमाम किताबों को खोज कर गलती करने और पकड़े जाने से बचने के कुछ तरीक बताये हैं। ये तरीके जनहित में जारी किये गये हैं। जनता जनार्दन से आशा है कि इसमें अपने अनुभवों से कुछ जोड़ती रहेगी।
१. ब्लाग में लिखने में गलती करने से बचने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि ब्लाग लिखना बंद कर दें। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी।
२. अगर ब्लाग लिखना बहुत जरूरी है तो दो ब्लाग बनायें। एक नारद में रजिस्टर करायें दूसरा ऒसामा बिन लादेन की तरह आजाद रखें। जब भी कोई पोस्ट लिखें तो दूसरे वाले में लिखें और जो ब्लाग नारद में रजिस्टर है उसमें दूसरे वाले का लिंक दें।
आमतौर पर लिंक से जाने ब्लाग को कोई खास तवज्जो नहीं देता और आपकी गलती छिप जायेगी। अगर दो में भी नहीं बच पाते तो तीन-चार-पांच ब्लाग का गुट बनायें ताकि गलती खोजने वाला आपके ब्लाग तक आते-आते थक जाये और कहे- करो, यार जो करना है।
३.अभी मीन-मेख अभियान शब्दों की चूक पकड़ने तक सीमित है। तो जो शब्द आपको अच्छी तरह आते हैं वे वैसे लिखें और जिनके बारे में ज़रा से भी संदेह वे ‘कोष्ठक’ में लिखना शुरू कर दें चाहें तो उसे बोल्ड भी कर दें। अगर शब्द सही हुआ तो कौनौ बातै नहीं और अगर गलत हुआ तब भी कोई टोके तो आप आराम से कह सकते हैं ये तो हमने जानबूझकर लिखा था क्योंकि जिसके बारे में लिखा गया था वे ऐसे ही बोलते हैं। आप ऐसा भी कर सकते हैं कि सारे शब्द ‘कोष्ठक’ में लिखें या बोल्ड में। जिन-जिन शब्दों के बारे में निश्चित होते जायें कि वे सही हैं उनको ‘कोष्ठक’ हटाते जायें और ‘बोल्डनेस’ को विदा कर दें। हफ्ते भर के बाद तो आप बिना गलती सुधारे भी सारे कोष्ठक हटा सकते हैं क्योंकि हफ्ते भर बाद कोई आपका ब्लाग नहीं पढता चाहे खुद आप ही क्यों न हों।
४.अपने ब्लाग में जो लिखें वो दूसरे के माध्यम से लिखें। शुरुआत में ही किसी पात्र को थमा दें बातचीत की बागडोर और कहें रामलाल बोले, श्यामलाल कहिन। जब कभी कोई गलती पकड़ी जाये तो कह दें कि रामलाल या श्यामलाल कोई और ऐसे ही बोलता है। अब उसकी भाषा पर लगाम मैं कैसे लगा सकता हूं।
इस नियम की व्यापकता इस बात से समझी जा सकती है कि आज आजादी के साठ साल बाद भी हम अपने देश के किसी भी मामले में कमी को अंग्रेजी राज के ऊपर थोपकर चैन की वंशी बजाते हैं। इसी नियम की आड़ में स्व.राही मासूम रजा अपने उपन्यासों( आधा गांव वगैरह में) मल्लाही गालियां अपने पात्रों से ऐसे बकवा के चले गये जैसे उनके मुंह से गालियां नहीं फूल झर रहे हैं। कुछ आलोचकों ने टोका तो बोले- क्या मैं अपने पात्रों की जबान छीन लूं? उनको गूंगा बना दूं?
५.शब्द चयन में स्वाबलंबी बने। अपने डिजाइनर शब्द गढ़ें। मानक शब्द, मानक भाषा प्रयोग करना किसी राजमार्ग पर चलने जैसा हैं जहां आपकी हरकतों पर सैकड़ों कैमरों की निगाह रहती है। गलती हुई नहीं कि पकड़े गये। स्वाबलंबन के बल पर आप अपने जुगाड़ू शब्द अंदाज़ में साधिकार जो मन आये वो लिख सकते हैं। अब जैसे आपको यह नहीं समझ में आ रहा है कि आप किसी को बदतमीज कहें या बत्तमीज़ याब़द्तमीज़ तो आप काहे सर खपाते हैं। अपने ककहरा की कच्चा माल लीजिये और लफंडूस, लफद्दर, परम जैसे किसी भी डिजाइनजर शब्द से नवाज दीजिये। हर शहर के अपने डिजाइनर शब्द उन लोगों ने गढ़े हैं जिनके पैर मानक शब्दों के राजमार्ग पर चलने में थरथराते रहे।
६. अगर आप सही में नहीं चाहते कि कोई आपको लिखने के मामले में टोंके तो आप लेख लिखना त्यागकर कविता लिखना शुरू कर दें। कविता अव्वल तो कम लोग पढ़ने की हिम्मत करते हैं और जो करते भी हैं वे कोई कमी निकालने में संकोच करते हैं। क्योंकि हो सकता है कि शब्द किसी ने गलत लिखा हो लेकिन मात्रा, छंद की मांग पूरी करने के लिये वह गलती करने के अलावा और कोई चारा नहीं रह जाता। अब जैसे आप लेख में लिखते हैं कि आसमान में पक्षी तिरते हैं तो मीनमेख वाले आपको कारण बताओ नोटिस थमा देंगे लेकिन कविता में आप चाहे आसमां में पक्षी तीरते हैं लिखें या फिर आसमा में पक्षी विचरते हैं लिखें या तैरते हैं लिखें या उड़ते हैं लिखें आपकी वाह-वाह तय है। मतलब कविता वह राजमार्ग है जहां आप अपनी गलतियों का टैंक घरघराते हुये बिना किसी अपराधबोध के दौडा़ सकते हैं।
७.अगर आप में थोड़ा सा भी ‘बोहेमियनपन’ है तो आप कह सकते हैं- “मैं जिंदगी, भाषा के नियम-अनुशासन का पालन करते हुये ऊब चुका हूं। अब मैं उन्मुक्त जीवन और उन्मुक्त लेखन का आनन्द उठाना चाहता हूं।” इसके साथ ही आप कुछ ऐसी ऊटपटांग बाते लिखें जिसका कोई सिर-पैर आपको भी न पता हो। मुझे नहीं लगता कि इसके बाद आपके ब्लाग पर कोई मीन मेख निकालने का मन बनायेगा- नंगे से खुदा भी डरता है।
८.अगर आपको गलतियां पकड़े जाने का कुछ ज्यादा ही डर है तो आप आंचलिक भाषा के बीहड़ में उतर जाइये। जैसे बीहड़ में उतरे डाकू को पुलिस कुछ नहीं कहती वैसे ही आंचलिक भाषा के ब्लाग की गलती बताने का रिवाज अभी हुआ नहीं है।
९.आप अपनी पोस्ट लिख्नने के बाद अंत में लिखें कि उसमें आपने कुछ गलतियां जानबूझ कर छोड़ी हैं, पूरे होशोहवास में। जो
उन गलतियों को खोज लेगा उसे उचित इनाम उचित समय पर दिया जायेगा। अगर कोई गलती बताता है तो उसे शाबास कह दीजिये और अगली पोस्ट में फिर यही सिलसिला दोहराइये। इस्से आपकी गलतियां भले पकड़ी जायें लेकिन आपकी शान में
कोई बट्टा नहीं लगेगा। हो सकता है कि कभी गाहे-बगाहे इस बात के लिये इनाम मिल जाये कि आपने हिंदी ब्लाग जगत में
हो रही भाषा संबंधी सुधारों की शुरुआत के लिये अभिनव तरीका अपनाया।
१०. गलती होने से बचाने का एक मुफीद तरीका यह है कि कोई पोस्ट पहले आप अपने दिमाग में लिखें। उसे दिमाग में अंतिम रूप देने के बाद उसे कागज पर उतारें। कागज पर ड्राफ्ट को अंतिम रूप दें। फिर टाइप करके एक सप्ताह अपने पास सुरक्षित रखें। एक सप्ताह बाद अव्वल तो आप वह पोस्ट करने का मन ही बना पायेंगे और अगर आपने और कोई काम न होने की स्थिति में उसे पोस्ट भी कर दिया तो ऐसी पोस्ट की बातें आम तौर पर समाचारों से जुड़े होने के कारण बासी हो चुकी होती हैं। कोई उसकी गलतियां खोजने की बात तो छोड़िये पढने से भी जी चुराता है।
११.आप यह भी कर सकते हैं कि कोई भी पोस्ट दो बार लिखें। जिस वाली पर आपकी गलतियां पकड़ जाती हैं उसे मिटाकर दूसरी वाली बची रहने दें। अब चूंकि कापी/पेस्ट में कोई पैसा तो लगता नहीं है सो हो सकता है कि मीनमेख निकालने वाला दोनों में गलती निकाल दे। ऐसे में आप तू डाल-डाल मैं पात-पात की ऐतिहासिक सूक्ति का अनुसरण करते हुये तीसरी, चौथी पोस्ट लिखें जब तक कि मीनमेख निकालने वाला थक नहीं जाता।
उपरोक्त सभी उपाय केवल उन लोगों के लिये हैं जिनको लगता है वे गलतियां सुधारने के पचड़े में न पड़ते हुये इज्जत के साथ ब्लागिंग करना चाहते हैं। मतलब कि वे गलती करें और न उनको पता चला न उसको जिसको वे दिखा रहे हैं कि देखो यार,हमारा ब्लाग दुनिया भर में पढ़ा जाता है। इन उपायों की ताजगी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अभी इनमें से एक का भी किसी ने प्रयोग नहीं किया है। आप इनमें से किसी भी उपाय का एक-एक करके या फिर एक साथ प्रयोग कर सकते हैं। अगर किसी कारणबस आपको इन उपायों से आराम नहीं मिलता और तब भी आप ब्लाग लिखना ही चाहते हैं तो आपकी समस्या गंभीर है। उसके लिये दूसरे उपाय हैं जो पूछने पर बताये जा सकते हैं।

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

23 responses to “गलत हिंदी लिखने के कुछ सरल उपाय”

  1. अमित अग्रवाल
    बहुत ही बढिया लेख है, बीच बीच में २-३ बार तो जोर से हंसी आ गयी।
    चिठ्ठा वगैरा बहुत दिनों से सुन रहा हूँ, कभी लिखा नहीं है, शायद हिम्मत नहीं हुई।
    लेकिन पिछले कुछ दिनों से पढना तो जरूर शुरू कर दिया है, आशा है कि टिप्पणी लिखते लिखते
    अपना ब्लाग भी लिख दूँगा।
  2. अमित अग्रवाल
    अरे भाई, आप तो लगता है कि डीआरडीओ में हैं ?
    यदि हाँ तो हमसे संपर्क करें, हमारा मेल पता
    profamit@yahoo.co.in
  3. संजय बेंगाणी
    आपने तो मीन(मिन)-मेख निकालने वाले भाई के हौसलें पस्त करने का पूरा इंतजाम कर दिया हैं.
  4. रवि
    …अगर किसी कार वस आपको इन उपायों से आराम नहीं मिलता और तब भी आप ब्लाग लिखना ही चाहते हैं…
    फ़ुरसतिया जी ऊपर कारण की जगह ग़लती से या टाइपो कहें, कार हो गया है. पहली ग़लती मैंने निकाल दी. अब शाबासी की दरकार है.
    फुरसतिया से एक करबद्ध प्रार्थना है. काहे को वे अपनी ऊर्जा चिट्ठा चर्चा में वेस्ट करते हैं. उसके बदले वे नित्य इसी तरह की धुँआधार पोस्ट लिखा करें.
  5. पंकज बेंगाणी
    यह अच्छा बताया फुरसत से !!! अब बुद्धि आ गई कि अंट शंट हिन्दी को कैसे खपाएँ! :-)
  6. जीतू
    एक और अचूक रामबाण है।
    गलतिया बताने वाले ब्लॉग को अपनी पठनीय ब्लॉग लिस्ट से हटा दें। यानि फिल्टर कर दें। यदि ब्लॉगर साहित्यकार और भाषाविद बन जाएंगे तो साहित्यकार क्या तेल बेचेंगे?
    इसलिए अपने ब्लॉग को अपनी आत्मा की आवाज बनाइए और जो मन मे आए, लिख डालिए। ज्यादा फुरसतिया शुरसतिया के मात्रा, व्याकरण मे पड़ेंगे तो नारद की रेटिंग मे निचली पायदान पर पहुँच जाएंगे।
  7. जीतू
    अधूरी पोस्ट कर दी थी…आगे पढे.
    ज्यादा फुरसतिया शुरसतिया के मात्रा, व्याकरण मे पड़ेंगे तो नारद की रेटिंग मे निचली पायदान पर पहुँच जाएंगे। फिर ऐसा ना हो कि गाना पड़ जाए:
    “मै और मेरी तन्हाई, अक्सर ये ब्लॉग पढते है, व्याकरण ना होती तो क्या होता, ये मात्रा इधर लगती, वो मात्रा उधर से हटती, काश ब्लॉग पर लोग आते, पढते, कमेन्ट करते। मै और मेरी तन्हाई, अक्सर ये बाते करते है।”
  8. जगदीश भाटिया
    वाह जी वाह, आज तो आपने ठहाके लगवा दिये हमारे। बहुत खुल के हंसे इसे पढ़ कर। :D
    बहुत पहले एक पाकिस्तानी नाटक देखा था जिसमे एक व्यक्ति ट्रक को ट्रंक बोलता था। जब सामने वाले ने बोला कि ट्रक में नून (न) नहीं लगता तो अकड़ के बोला मेरे वाले में लगता है।
    बाकी यह बात ठीक है कि अब टाईप करते समय हम भी सतर्क हो गये हैं और लापरवाही से होने वाली भूलों में कमी भी आई है।
  9. विनय
    हा हा। मज़ेदार है। और धन्यवाद भी। उम्मीद है कि आपके इस लेख से “मीन-मेख निकालने वालों” का काम आसान होगा।
    और सच तो यह है कि मैं अभी से ब्लॉगों पर वर्तनी के मामले में एक अच्छा खासा सकारात्मक फ़र्क़ महसूस कर रहा हूँ।
  10. विनय
    आपने ख़ुद अपने बताये उपायों में से कुछ का प्रयोग कर लिया है, इसलिये बताने लायक ग़लतियाँ तो वैसे ही कम हो गई हैं :) । फिर भी कुछ टाइपो नज़र आए हैं, देखियेगा:
    नही – नहीं
    दोनो – दोनों
    हटी,दुर्घटना – हटी, दुर्घटना
    स्वाबलंबी – स्वावलंबी
    टोंके – टोके
    इस्से – इससे
    पढने – पढ़ने
    कारणबस – कारणवश
  11. समीर लाल
    “मतलब कविता वह राजमार्ग है जहां आप अपनी गलतियों का टैंक घरघराते हुये बिना किसी अपराधबोध के दौडा़ सकते हैं।”
    –सही है, अन्य सुझाव भी काफी उपयोगी हैं लेकिन आपकी पोस्ट में कोष्ठकों और बोल्ड शब्दों का आभाव खटकता रहा. वैसे विनय भाई के अभियान के बाद सतर्कता बढ़ गई है हर तरफ. :)
  12. ratna
    बहुत दिन बाद वही पुराना अंदाज़ दिखा। रवि भाई सच कहते है –काहे को अपनी ऊर्जा चिट्ठा चर्चा में वेस्ट करते हैं. उसके बदले नित्य इसी तरह की धुँआधार पोस्ट लिखा करें.
    नारद फिर से बढ़िया काम करने लगा है,बेहतर हैै चिट्ठा चर्चा सप्ताह में एक बार पठनीए पोस्टों का विवरण दें, नाकि नारद पर आने वाली पोस्टों की “रनिंग कमैन्टरी” ।
  13. SHUAIB
    बढिया :D
  14. प्रेमलता
    एक टिप्पणी पहले भी की थी वह न जाने कहाँ ग़ायब होगयी?
    पुनः- बहुत ही बढ़िया लिखा है। हम पहले भी कह चुके हैं आपका लिखा पढ़ने की भूख लगती है। सो जल्दी । -प्रेमलता
  15. रवि
    …नारद फिर से बढ़िया काम करने लगा है,बेहतर हैै चिट्ठा चर्चा सप्ताह में एक बार पठनीए पोस्टों का विवरण दें, नाकि नारद पर आने वाली पोस्टों की “रनिंग कमैन्टरी”…
    मेरा यही कहना था. जिन्हें जो चिट्ठा पढ़ना है, वे तो ढूंढ कर पढ़ेंगे, फरमाइशी लिखवाएँगे. जिन्हें नहीं पढ़ना है, कितनी ही चर्चा कर लें, नहीं ही पढ़ेंगे.
    पुनर्विचार हेतु आवेदन प्रस्तुत :)
  16. mitul
    अनूप भाई, सही लेख है।
  17. प्रत्यक्षा
    जन कल्याण का काम बढिया रहा :-)
  18. प्रियंकर
    गच्छतः स्खलनं क्वापि भवत्येव प्रमादतः ।
    हसन्ति दुर्जनास्तत्र समादधति पण्डिताः ॥
    ( चलते हुए प्रमादवश कोई भी फिसल सकता है । उस स्थिति में दुर्जन
    हंसते हैं और पण्डित समाधान करते हैं )
    मुश्किल तब है जब फिसलना किसी की फ़ितरत हो और प्रमाद स्थाई भाव बन जाए । वाह पण्डितराज ! मजमा ऐसे ही जमाए रखो ।
  19. फ़ुरसतिया » चिट्ठाचर्चा,नारद और ब्लाग समीक्षा
    [...] प्रियंकर on गलत हिंदी लिखने के कुछ सरल उपायप्रत्यक्षा on गलत हिंदी लिखने के कुछ सरल उपायmitul on गलत हिंदी लिखने के कुछ सरल उपायरवि on गलत हिंदी लिखने के कुछ सरल उपायप्रेमलता on गलत हिंदी लिखने के कुछ सरल उपाय [...]
  20. Mukul
    Shuklaji,
    Ab kya kahen! Hindi pehle se hi kamzor hai upar se sabhya bhaasha mein taaref karni pad rahi hai…kambakht shabd hi nahin mil rahe hai…. bahut hi rochak aur manoranjak lekh raha….des se door hindi pade hue mahino ho jaate hain…aise main aapki is maulik shaili ke lekh pad kar man prafullit ho jaata hai. Hindi mein maine kam pada hai lekin phir bhi yeh keh sakta hoon ki “Self-deprecatory Humor” maine sirf aapke hi chitthon mein dekha hai
    Apna lekhni chalne dijiye isi tarah…rukiye nahin….
    Bhavdiya
    Mukul
  21. Ashish
    शुक्ल जी, बहुतै सही लिक्खे हो। गलत हिन्दी या अंग्रेज़ी का भी अपना ही अलग मज़ा है।
  22. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] 2.विकिपीडिया – साथी हाथ बढ़ाना… 3.गलत हिंदी लिखने के कुछ सरल उपाय 4.चिट्ठाचर्चा,नारद और ब्लाग समीक्षा [...]

Monday, October 02, 2006

विकिपीडिया – साथी हाथ बढ़ाना…

http://web.archive.org/web/20110926000304/http://hindini.com/fursatiya/archives/195

विकिपीडिया – साथी हाथ बढ़ाना…

आज है दो अक्टूबर का दिन आज का दिन है बड़ा महान
आज के दिन दो फूल खिले थे जिनसे महका हिंदुस्तान।
आज दशहरा के कारण छुट्टी का दिन है नहीं तो आज के दिन यह गाना पूरे देश में सबसे ज्यादा बजने वाला गाना होता है। कल दक्षिण अफ्रीका में गांधी के आन्दोलन के सौ वर्ष पूरे होने के अवसर पर कार्यक्रम हुये। आज पूरा देश अपने दो महापुरुषों महात्मा गांधी और लालबहादुर शास्त्री के प्रति अपने श्रद्धासुमन अर्पित कर रहा है। इस अवसर पर मैं भी इन दोनों महापुरुषों के प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। सभी मित्रों, पाठकों, शुभचिंतकों को दशहरा, दुर्गापूजा और नवरात्र की शुभकामनायें देता हूं।
अपनी पोस्ट में मैंने पुस्तक चर्चा की बात की थी। सभी मित्रों ने इसके प्रति उत्साह दिखाया है और हर संभव सहयोग देने की बात कही है। तमाम नाम भी सुझाये गये हैं। इतने नामों में से एक नाम चुनना मंत्रिमंडल से प्रधानमंत्री चुनने जैसा काम है। सबसे ज्यादा लोगों ने प्रत्यक्षाजी द्वारा सुझाये नाम -किताबी कोना का समर्थन किया है। लिहाजा यही नाम तय करना शायद सबसे ज्यादा ठीक रहेगा। लेकिन हमारे एक मित्र, पाठक ने एक और नाम सुझाया है -किताबनामा। यह भी नाम बढ़िया लगता है। अब तमाम दूसरे अच्छे और बहुत अच्छे नामों, जिनमें मेरा प्रस्तावित नाम ‘पुस्तक चर्चा’ भी शामिल है, को सहेजकर रखकर इन्हीं दो नामों में से एक तय करने का मेरा सुझाव है।
अब प्रत्यक्षाजी अपना कैमरा चाहे जिसके सुझाव पर खरीदें लेकिन किताबों की चर्चा के लिये नाम उनको ‘फाइनल’ करना है। बाकी साथी किताबी कोना और किताबनामा मे से कौन सा नाम तय हो इसके लिये राय जाहिर कर सकते हैं लेकिन अंतिम चुनाव का अधिकार प्रत्यक्षाजी को है। वे अपने काम को जिम्मेदारी से निभाते हुये तय करें कि नाम क्या रखा जाये-‘किताबी कोना’ या फिर ‘किताबनामा’। आपका समय शुरू होता है अब!
किताबों के बारे में बातचीत कहां की जाये इस बारे में कम लोगों की राय आयीं। लेकिन जितनी आयीं उतनी निर्णय लेने भर को काफी हैं। पहले मेरा विचार ब्लागस्पाट या फिर वर्डप्रेस में नया ब्लाग बना कर चर्चा शुरू करने का था लेकिन हमारे स्वामीजी ने सुझाया कि ब्लागस्पाट या वर्डप्रेस पर नये ब्लाग बनाने की बजाय किसी साईट पर यह काम किया जाये तो बेहतर होगा।
प्रसंगत: यह बता दें कि नारद के बैठ जाने का मुख्य कारण ब्लागों की अनियंत्रित संख्या भी रही। लोगों ने अपने चिठ्ठे बनाये, स्वागत कराया और फिर बैठ गये। परिणामत: बंद चिठ्ठों की परिक्रमा करते-करते नारद भी थककर बैठ गये। बइठे तो अइसे बइठे कि अभी तक उठने के लिये सेठों, चौधरियों का मुंह ताक रहे हैं। देखिये कब खड़े होते हैं दुबारा नारदजी!
अब जब साइट पर पुस्तक चर्चा की बात आयी तो अधिकतर साथियों का मत था कि यह काम ऐसी साइट पर होना चाहिये जिससे सबका लगाव, जुड़ा़व हो। इसलिये यह तय हुआ कि नारद की साइट जब बन जायेगी तब उसी पर पुस्तक चर्चा के लिये एक ब्लाग बनाया जायेगा जिसमें सभी इच्छुक लोगों को अपने लेख खुद प्रकाशित करने की सुविधा होगी। जो लोग यदा-कदा लेख लिखना चाहें वे भी और जो सदा सर्वदा करना चाहते हैं वे भी वहां अपनी पढ़ी पसंदीदा किताबों के बारे में चर्चा कर सकते हैं। साथी लोग ई-मेल से भी अपने लेख भेज सकते हैं। उन प्रकाशित किया जा सकता है।
इस साइट को सजाने-संवारने की जिम्मेदारी हमारे तकनीकी दिग्गजों की होगी। इसके लिये स्वामीजी मेहनत करें और साज-सिंगार की व्यवस्था करने-करवाने का जुगाड़ करें।
कालजयी किताबों के बारे में तो हम लोग लिखेंगे ही लेकिन मेरा सुझाव यह भी है कि हम विभिन्न प्रकाशकों को अपने पुस्तक चर्चा अभियान के बारे में लिखें। उनसे कम से कम दो प्रतियां भेजने के लिये कहें। एक प्रति चर्चा करने वाले लेखक के पास और एक अपने पास रखने के लिये। यह जो अपने पास रखने वाली बात है वह इसलिये ताकि जो पुस्तकें इस तरह जमा हों उनको हम समय-समय पर अपने चिठ्ठाकार साथियों को किसी न किसी तरह उपहार में देने की सोचें।अब कैसे दें,कब दें यह बाद में सोचा जायेगा। वैसे मौका कोई भी हो सकता है- जन्मदिन या फिर कुछ और। यह भी हो सकता है कि हम किसी आयोजन में जैसे कि इंडीब्लागीस प्रतियोगिता या फ़िर किसी अन्य अवसर पर इनाम देने के लिये उनका उपयोग कर सकते हैं। यह मेरा सुझाव है ,अमल में लाने के लिये सबकी सहमति जरूरी है।
मुझे तो पुस्तकों से बड़ा कोई उपहार नहीं लगता। अपने विवाह के अवसर पर मिले तमाम उपहार हमसे विदा ले चुके हैं, स्कूटर पुराना होकर बिक गया, रेडियो, टेप बंद पड़े हैं लेकिन उस अवसर पर अपनी पत्नी की बड़ी दीदी द्वारा उपहार में मिलीं दो पुस्तकें ययाति (लेखक-विष्णु सखाराम खाण्डेकर)और चित्रप्रिया(लेखक-अखिलन) अभी भी मेरी सबसे बड़ी धरोहर के रूप में मेरे पास हैं।
किताबों की चर्चा कैसे की जाये यह समय तय करेगा लेकिन जो सुझाव जीतेंद्र ने दिये उसमें लगभग सब कुछ आ जाता है। तो साथियों आप शुरू हो जाइये और अपनी पसंदीदा किताब के बारे में लिखिये न। फिलहाल अपने ब्लाग पर और बाद में नारद की साइट बन जाने के बाद उस पर।
यहां पर मेरी बात समाप्त हो जानी चाहिये लेकिन नहीं अभी तो बात शुरू भी नहीं हुयी है। यह तो मुख्य बात शुरू करने के पहले की भूमिका है। मेरा विचार यह है कि हम सभी किसी न किसी तरह हिंदी के प्रति अपने मन में प्यार रखते हैं, लगाव रखते हैं। अपने ब्लाग में तमाम तरह से इस भावना को जाहिर भी करते रहते
हैं। लेकिन इंटरनेट पर हिंदी की बढो़त्तरी के लिये कुछ और कर सकते हैं जो हम नहीं कर रहे हैं- कम से कम मैं अपने बारे में तो यह बात की-बोर्ड पर हाथ रखकर कह सकता हूं।
योगदान का ऐसा है कि जो है वह बिखरा-बिखरा है। हमने अपने ब्लाग पर तमाम सारा लिखा लेकिन वह् हमारे ब्लाग तक ही सीमित है। जो है उसके हम ही मालिक हैं हम ही रखवैया। अगर कोई उसमें कुछ सुधार करना चाहे तो उसे हमारी शरण में आना पड़ेगा। जबकि यह सारा कुछ ऐसी जगह होना चाहिये जिससे कि इसमें जो चाहे वह सुधार कर सके, जो चाहे और सुधार कर सके। पढ़ तो खैर सब सकें ही।
ऐसी जगह आजकी तारीख में एक ही है वह है विकिपीडिया।
विकिपीडिया के बारे में जानने के लिये निरंतर पर मितुल का लेख देखिये। विकिपीडिया जानकारी का ऐसा खजाना है जिसमें आप भी अपना योगदान दे सकते हैं। आप भी लिख सकते हैं, लिखे हुये को संसोधित कर सकते हैं, संसोधित को पुन: संसोधित कर सकते हैं। जितनी बार चाहें उतनी बार, जैसे मन चाहे वैसे। विकिपीडिया में काम करना अपना ब्लाग लिखने से भी ज्यादा आसान है। आप विकिपीडिया में जाइये और अपना खाता खोलिये। खाता खोलने के लिये आपको कुछ नहीं चाहिये केवल खाता नाम(यूजर आई डी), पासवर्ड और ईमेल पता। जहां आपने यह भरा नहीं कि आप ज्ञान के समुद्र के किनारे पहुंच गये। आपका जैसे मन करे वैसे इसका आनंद उठायें। स्वयं आनंद लें और दूसरों को आनंद दें।
आप क्या योगदान दे सकते हैं यह सवाल अगर आपके मन में है तो उसका मुस्कराता हुआ जवाब यही है कि आप क्या नहीं दे सकते हैं। आपके पास जो भी जानकारी है उस सबका उपयोग करिये और उसे यथा संभव अच्छे तरीके से यहां सौंप दीजिये। आपकी सारी जानकारी यहां काम की है, स्वागत योग्य है, कुछ भी बेकार नहीं है।
आप क्या कर सकते हैं यह बताने से पहले मैं यह बता दूं कि मैंने अब तक क्या किया। मितुल और स्वामीजी के उकसाने पर मैंने विकिपीडिया में अपना खाता खोला और अपने प्यारे राष्ट्रपति कलाम साहब का पन्ना खोला। उसमें हमने देखा कि कलाम से साथ (खिलाफ) जो चुनाव लड़ीं थीं वे हैं कैप्टन (डा.)लक्ष्मी सहगल। लेकिन वहां पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार ऐसा लग रहा था कि लक्ष्मी सहगल कोई पुरुष हैं और नाम भी लिखा था लक्षमी सहगल। बस हमने तुरंत लागिन किया और संपादन वाला बटन दबाकर संपादन कर दिया। हमारे पल्ले विकिपीडिया में संसोधन का सुख जुड़ गया और साथ ही संकल्प भी कि कैप्टन (डा.) लक्ष्मी सहगल से मिलकर उनके बारे में पूरी जानकारी विकिपीडिया में डालनी है। आखिर वे हमारे शहर का गौरव हैं।
अब आप क्या कर सकते हैं यह आप अपने आप तय कर सकते हैं। लेकिन अगर आप हमसे ही सुनने के लिये उतावले हैं तो सुनिये। आप विकीपीडिया में जिलों की सूची देखें। अगर आपका जिला इसमें है ही नहीं तो पहले जिला जोड़ें। फिर अपने जिले के बारे में जो भी जानकारी आपको पता हो वह डाल दीजिये। पूरी न पता हो तो अधूरी सही , सही न पता हो नाम सही, जैसी भी पता हो डालिये तो सही। कोई न कोई आयेगा उसे ठीक करने के लिये। इमारतें, व्यक्तित्व, साहित्य, साइंस, सिनेमाघर, सड़कें, बाग-बगीचे, स्कूल, कालेज, विश्विद्यालय, खान-पान, अलां-बलां, अटरम-शटरम जो मन आये डाल दीजिये। सब सुधर जायेगा अगर गलत होगा। शरमाइये नहीं शुरू तो करिये। आपको अच्छा लगेगा।
अपने शहर के बारे में लिखना जहां आपने शुरू किया तो न जाने किन-किन सूत्रों से होते हुये आप पूरी दुनिया से जुड़ जायेंगे। फर्ज कीजिये आप महात्मा गांधी के बारे में कुछ लिखना शुरू करते हैं तो फिर आप पोरबंदर, गुजरात, दक्षिण अफ्रीका, नेल्शन मंडेला, क्रांतिकारी आंदोलन, चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह, जालियांवाला बाग, पंजाब, चंडीगढ़, इलाहाबाद, नेहरूजी, निराला, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, हालैंड हाल, हाईकोर्ट, सुप्रीमकोर्ट, संसद, धूमिल, संविधान, मूल अधिकार, अभिव्यक्ति की आजादी से होते-होते कब ब्लागिंग तक पहुंच जायेंगे आपको पता ही नहीं चलेगा। यह तो हमने बताया रास्ता। हम लौट आये ब्लागिंग पर काहे से कि हमें आगे लिखना है लेकिन आपको जितना मन आये जहां मन आये वैसे, वहां विचरण करिये। जितनी देर मन आये उतनी देरे रहिये और जब मन आये तब वापस अपने घर। फिर जब मन आये आप पसंदीदा पेज, जगह पर पहुंच जाइये और कर दीजिये शुरू खुटुर-पुटुर। यह वह जगह है दोस्तों जहां आपके हर योगदान का स्वागत है।
लिखने को जो हम लोग अभी लिख रहे हैं उसमें से ही बहुत कुछ विकिपीडिया में जोड़ा जा सकता है। कुछ जस का तस कुछ मामूली संसोधन के साथ। रत्नाजी अपने रसोई के पकवान वहां पेश करें, रचना बजाज खरगौन को वहां गुलजार करें, अतुल-जीतेंद्र देखें कि कानपुर का पन्ना बिल्कुल सूना है और तुम्हारे योगदान को तरस रहा है। स्वामीजी ने बहुत पहले भोंपू कथा लिखी थी और आशीष गर्ग ने सौर ऊर्जा और जल संयचन के बारे में लेख लिखे हैं वे सब वहां डाले जा सकते हैं। वंदेमातरम के साथी तो अपना हर लेख यहां डाल सकते हैं। सुनील दीपकजी विकलांगों के यौनजीवन के बारे में अपने शोध को जोड़ सकते हैं तो नीरज दीवान पत्रकारिता के दिग्गजों के बारे में जानकारी दे सकते हैं। लक्ष्मी गुप्तजी बचपन में सुनी कहावतों का संग्रह करें तो निधि अपने नाना के बारे में लिखें। अफला तून जी के पास तो पूरा बनारस है, बीएचयू है, रामनगर की रामलीला है लिखने के लिये। बनारस का तो हर कोना-अतरा फन्ने खां लोगों से अटा पड़ा है। लिखिये न! और हमारे तकनीकी वीरों को क्या बताना वे तो जो चाहें सो करें। सूरज को क्या दिया दिखाना!
हमारे जीवन के हर पहलू की जानकारी हम डाल सकते हैं विकीपीडिया में। बहुत पहले स्वामीने एक डायलाग मारा था:-
जब देखो हिन्दी ना पढे जाने का स्यापा करते हैं. ऐसे नही होगा, जब तक आपकी माताजी आपकी धर्म-पत्नी को हिन्दी मे अचार बनाने की विधी पीसी से हिंदी मे ना भेज सकें ये सारी ब्लागबाजी व्यर्थ है. पहले तकनीक आसान करो और जनजन तक फ़ोकट में पहुंचाओ – क्या समझे?
यानि कि नेट की सार्थकता तब होगी जब सास अपनी बहू को अचार डालने की तरकीब पीसी/ नेट से निकाल के दे दे और सास बिना बहू को परेशान किये अपने मतलब की नयी से नयी जानकारी नेट से ले सके। तो यह कैसे होगा? तभी न जब ये सारी जानकारियां नेट पर अपनी भाषा में मौजूद होंगी। और यह तभी होगा जब हम-आप-सब लोग अपने-अपने स्तर से प्रयास करके नेट पर अपनी भाषा में जानकारी उपलब्ध करें। यह हमारे अपने लिये है, हमारी आगामी पीढ़ियों के लिये है। यह किसी के ऊपर अहसान नहीं है। हमें भाषा विरासत में मिली है। अब हमारा यह दायित्व है कि जो हमें विरासत में मिला उसमें हम कुछ तो अपनी तरफ से जोड़ें कुछ तो ‘वैल्यू एडीशन’ करें।
जानकारी के लिये बता दें कि आज की तारीख में विकिपीडिया में उपलब्ध कुल सामग्री का पचास प्रतिशत अंग्रेजी में है जिसके लगभग १४ लाख पेज हैं। हिंदी के कुल जमा पेज तीन हजार से भी कम हैं। यह हमारी हिंदी की स्थिति है। अन्य भारतीया भाषाओं में स्थिति भी कमोबेश यही होगी। अब यह सच है इसके
लिये दुखद, दयनीय, सोचपूर्ण, दुर्भाग्यपूर्ण जैसी बातें करने का न कोई मतलब नहीं है न जरूरत। ऐसे समय के लिये ही शायद हमारे सिकरी नरेश राजेश कुमार सिंह ने कविता लिखी है-
हम जहां हैं,
वहीं से आगे बढ़ेंगे।

तो साथियों अगर आप मेरी बात से सहमत हों तो तुरंत अपना खाता खोलें विकिपीडिया में। हिंदी में और अपनी मातृभाषा में भी और इसके अलावा हर उस भाषा में जिससे आप लगाव-जुड़ाव महसूस करते हैं। खाता खोलने के साथ ही आप दुनिया के साथ जुड़ेंगे और जिस भाषा में भी योगदान देंगे उस भाषा से आपका लगाव बढ़ेगा और निश्चित तौर पर आप उस भाषा के बोलने-बरतने वाले लोगों से लगाव-प्यार-अपनापा महसूस करने लगेगें। चोरी-चुपके कब आपके मन में
लोगों के लिये प्यार पनपने लगेगा, आपको पताइच नहीं लगेगा। आप भी कहेंगे कि विकिपीडिया तो प्यार की खेती है।
विकीपीडिया में योगदान का मतलब यह नहीं है कि आप अपना लिखना स्थगित कर दें या कम कर दें। अरे न भाई ऐसा ‘कत्तई’ नहीं। हम तो कहते हैं आप वो भी करो ये भी। ब्लाग भी लिखें, विकीपीडिया में लेख भी डालें और पुराने पड़े लेखों में संसोधन,संवर्द्धन भी करें बोले तो बकौल स्व. मनोहर श्याम जोशी “ये में ले, वो में ले, वो हू में ले”। मतलब इसमें भी लिखें, उसमें भी लिखें और उसमें भी।
अब बात फिर किताब की। आपसे अनुरोध है कि आप जो किताब पढ़ें उसके बारे में लिखें जरूर। सौ पेज अगर लेखक ने लिखे तो उसके बारे में एक पेज तो लिख ही सकते हैं। सो आप लिखें और फिलहाल अपने ब्लाग में लिखें। अपने लेख को जैसा बने विकिपीडिया में डाल दें। किसी न किसी तरह लोगों को इस बारे में बतायें। अपनी ब्लाग-पोस्ट में या फिर ई-मेल से। आप देखेंगे कि देखते ही देखते आपका लेख आकर्षक से आकर्षक होता जायेगा। कभी-कभी तो ऐसा भी कि आपको भी विश्वास करने में समय लगेगा कि उस लेख की अनगढ़ शुरुआत आपने ही की थी। दुनिया की सबसे आकर्षक चीजों की शुरुआत ही अनगढ़ता से होती है। जब हम लोगों की साइत बन जाइयेगी तो उसमें आपका लेखा शामिल कर लेंगे। ठीक है न!
यह लेख मैंने अपने उन साथियों के लिये लिखा है जिनको विकिपीडिया के बारे में जानकारी नहीं है। ज्ञानीजनों, विद्वानों को इसमें तमाम खामियां नजर आयेंगी। ऐसे विद्वानों से अनुरोध है कि वे इसमें सुधार करें और बतायें कि कैसे नेट पर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाऒं को बढ़ाया जा सकता है। जो साथी हमारी बात से सहमत हैं उनसे अनुरोध है कि तुरंत अपना योगदान शुरू कर दें गांधीजी को याद करके जिनका मूल मंत्र ही था स्वाबलंबन, स्वदेशी, सत्य, अहिंसा।
यह लेख लिखने का कितना असर हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाऒं को आगे बढाने में होगा इसके बारे में मैं स्वेट मार्टन के अहा! जिंदगी पत्रिका में छपे शब्द दोहराता हूं-


याद रखो कि जो कुछ तुम विश्व-चेतना से कहते हो, उसे तुम्हारे शरीर के सेल भी सुनते हैं, इसलिये अधिकार पूर्वक बात करो, सेल तुम्हारा आदेश मानेंगे। जो कुछ तुम्हें मिलता है, विश्व भंडार से मिलता है, इसलिये विश्व भंडार से कह देने भर की जरूरत है, जो कुछ तुम चाहते हो वह मिल जायेगा।

तो हमारा पूरे मन से आवाहन है – साथी हाथ बढ़ाना, निज भाषा हित कुछ कर जाना।
संदर्भ:-१. निरंतर पर मितुल का लेख विकिपीडिया:हिन्दी की समृद्धि की राह
२. हिंदी विकिपीडिया
३.विकिपीडिया पर अपना खाता खोलें
४.अपने शहर की सूची देखें, जोड़ें
मेरी पसंद
कुछ कर गुजरने के लिये
मौसम नहीं, मन चाहिये!
थककर बैठो नहीं प्रतीक्षा कर रहा कोई कहीं
हारे नहीं जब हौसले
तब कम हुये सब फासले
दूरी कहीं कोई नहीं
केवल समर्पण चाहिये!
हर दर्द झूठा लग रहा सहकर मजा आता नहीं
आंसू वही आंखें वही
कुछ है गलत कुछ है सही
जिसमें नया कुछ दिख सके
वह एक दर्पण चाहिये!
राहें पुरानी पड़ गयीं आखिर मुसाफिर क्या करे!
सम्भोग से सन्यास तक
आवास से आकाश तक
भटके हुये इन्सान को
कुछ और जीवन चाहिये!
कोई न हो जब साथ तो एकान्त को आवाज दें!
इस पार क्या उस पार क्या!
पतवार क्या मंझधार क्या!!
हर प्यास को जो दे डुबा
वह एक सावन चाहिये!
कैसे जियें कैसे मरें यह तो पुरानी बात है!
जो कर सकें आओ करें
बदनामियों से क्यों डरें
जिसमें नियम-संयम न हो
वह प्यार का क्षण चाहिये!
कुछ कर गुजरने के लिये मौसम नहीं मन चाहिये!
-स्व.रमानाथ अवस्थी

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

16 responses to “विकिपीडिया – साथी हाथ बढ़ाना…”

  1. समीर लाल
    विकिपीसिया के विषय मे इतनी सरल जानकारी देने के लिये धन्यवाद. हम भी निश्चित तौर पर आज ही खाता खोलते है.
    पुस्तक चर्चा का नाम तो अब प्रत्यक्षा जी तय कर ही देंगी, दोनो ही आकर्षक हैं.
    स्व. रामनाथ अवस्थी जी की रचना बहुत पसंद आई:
    “हारे नहीं जब हौसले
    तब कम हुये सब फासले
    दूरी कहीं कोई नहीं
    केवल समर्पण चाहिये!”

  2. सागर चन्द नाहर
    वैसे किताबी कोना ज्यादा अच्छा लग रहा है, फ़िर प्रत्यक्षा जी के उपर।
    विकी पीडिया पर में भारत रत्न की डिजाईन बनाने वाली एक महान महिला सावित्री बाई खानोलकर पर लेख लिखा है, जिसे पहले मेरे चिट्ठे पर भी लिखा था। मुझे इस बात का गर्व है कि सावित्री बाई के बारे अन्तर्जाल पर हिन्दी में अगर कोई सामग्री मौजूद है तो उसमें मेरा भी योगदान है।
  3. जगदीश भाटिया
    मैंने भी अपना खाता खोला है और एक दो जगह पर सुधार भी किये।
    बहुत ही आत्मसुख मिला मिला यह सोच कर कि आने वाली पीढीयों के लिये हम कुछ योगदान कर सकेंगे।
  4. अफ़लातून
    अनूप की बताई दशा और दिशा का निष्ठापूर्वक पालन होगा.वीकिपीडिया में योगदान देने वालों के मन में एन्साइक्लोपीडिया की निर्माता जमात का आदर्श है.विनोद कानूनगो नामक एक व्यक्ति ने ओडिया में ग्यानकोश तैयार किया,प्रकाशित किया.औपचारिक शिक्षा ज्यादा न होने के बावजूद व्यापक अध्ययन किया और विषेशग्यों से लिखवाया भी.वह अब ओडिया की अमूल्य निधि है.कई वर्ष लगा कर वाराणसी के मंडलजी ने हिन्दी थिसॊरस बनाया.उनकी तो मृत्यु हो चुकी है ,अभी प्रकाशन नहीं हुआ.
  5. eswami
    विकीपिडिया में योगदान कैसे करें, अपने लेखों को प्रभावी कैसे बनाएं और लेखन की शैली, विकी की नीतियां आदी पर मितुल एक लेख तैयार कर रहे हैं. तब तक आप इस अंग्रेजी वाली कडी से ( http://en.wikipedia.org/wiki/Wikipedia:Contributing_to_Wikipedia ) सूचना पा सकते हैं. यह लेखन की एक खास, मजेदार और अच्छी शैली है – जिसे कोई भी जल्दी ही सीख सकता है. बहुत कुछ सीखने को मिलता है – लेखन के बारे में, विषय के बारे में और सामूहिक कार्यक्रम के बारे में.
    हां अक्षरग्राम के नए सर्वर पर पुस्तक-चर्चा के लिए स्थल जरूर होगा ही – आदर्श तौर पे पहले लेख विकी पर डले फ़िर पुस्तक चर्चा में और कुछ भी डालने से पहले देख लें की उस विषय पर क्या काम हुआ है क्या बचा है – हुआ भी है या नहीं. चर्चा में उस पर प्रतिक्रियाएं हों और फ़िर वही पुस्तक पढने वाला कोई और विकी को मजबूत करे.
  6. पंकज बेंगाणी
    अनुपजी,
    पहले से ही विकि पर अपना योगदान देने की सोचता था। पर आलस कर जाता था, लेकिन आज आपने राह दिखा दी है और आँखे भी खोल दी है. अब यथा सम्भव योगदान देने को तत्पर हुँ
  7. प्रत्यक्षा
    विकिपीडिया पर आपका लेख कई लोगों को योगदान देने के लिये उकसायेगा । मुझे भी ।
    अभी खाता खोलते हैं ।
    जहाँ तक नाम का सवाल है मुझे ‘पिटारा ‘नाम बहुत अच्छा लगा था , हर बार कौतुहल से देखते कि इस बार पिटारे से कौन सी पुस्तक चर्चा निकली है । पर चूँकि ज्यादा वोट किताबी कोना को मिली है तो जनमत सर्वोपरि रहे । चलिये नाम बता कर हम भार मुक्त हुये , बहुत काम कर लिया आज :-)
  8. आशीष
    हम इस मामले कुछ अलग काम कर रहा हूं। एक अलग चिठ्ठा ही बनाया है। इस मे चुने हुये विषयो पर एक लेख माला होगी जब लेखमाला पूरी हो जायेगी एक साथ चढा देंगे। और नयी लेखमाला पर काम शुरू कर देंगे।
    मुसीबत ये है कि दो लेख लिखे है तिसरे की घोषना कर दी और बेचारा चिठ्ठा महीने भर से रास्ता ताक रहा है :(
  9. rachana
    अनूप जी,धन्यवाद ‘विकिपीडीया’ के बारे मे बताने के लिये..
  10. प्रियंकर
    ‘किताबनामा’ नाम ज्यादा अच्छा है . क्योंकि ‘किताब’शब्द से आप जैसे ही ‘किताबी’ विशेषण बनाते हैं एक नकारात्मक अभिप्राय ध्वनित होने लगता है . सो ‘किताबी कोना’ थोड़ा कम रुचता है . अब नाम बार-बार तो रखे नहीं जाते . इसलिए थोड़ा सोच-विचार ज़रूरी है . सम्भवत: प्रत्यक्षा भी इस बात से सहमत हों . बहरहाल जो भी नाम हो इसमें योगदान देने की इच्छा बलवती है .
  11. फुरसतिया » ब्लागर मीट बोले तो जनवासे में बराती
    [...] जानकारी के लिये बता दूं तमाम ब्लागर साथी विकिपीडिया में अपनी-अपनी रुचि के पन्ने अपडेट करते रहते हैं। यह अभी से नहीं है, पिछले दो-तीन सालों से कर रहे हैं। अब और साथी भी इसमें योगदान दें तो अच्छा है। इस बारे में मैंने एक लेख भी लिखा था जिसमें यह बताया गया है कि विकिपीडिया में कैसे योगदान कर सकते हैं। [...]
  12. फुरसतिया » ब्लागर मीट बोले तो जनवासे में बरात
    [...] जानकारी के लिये बता दूं तमाम ब्लागर साथी विकिपीडिया में अपनी-अपनी रुचि के पन्ने अपडेट करते रहते हैं। यह अभी से नहीं है, पिछले दो-तीन सालों से कर रहे हैं। अब और साथी भी इसमें योगदान दें तो अच्छा है। इस बारे में मैंने एक लेख भी लिखा था जिसमें यह बताया गया है कि विकिपीडिया में कैसे योगदान कर सकते हैं। [...]
  13. प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर
    अनूप जी कई बार कोशिश की ….कुछ किया भी अपने फतेहपुर के पृष्ठ पर |
    पर विकिपीडिया पर लिखने की सही तकनीकी शिक्षा माला के बगैर हमेशा मन मुताबिक पृष्ठ तैयार नहीं कर पाया ?
    कोई सहयता उपलब्ध हो नेट पर तो बताये !!
  14. : फ़ुरसतिया-पुराने लेखhttp//hindini.com/fursatiya/archives/176
    [...] कान से होकर कलेजे से उतर जायेंगे 2.विकिपीडिया – साथी हाथ बढ़ाना… 3.गलत हिंदी लिखने के कुछ सरल उपाय [...]
  15. : हिंदी विकि में लेखों की संख्या एक लाख के पार
    [...] फ़िर ज्यादा कुछ कर नहीं पाये। केवल एक लेख लिखकर रह गये जिसमें हिंदी विकिपीडिया [...]
  16. चंदन कुमार मिश्र
    अच्छा। पढ़ा। समय लगता है हर लेख में।
    चंदन कुमार मिश्र की हालिया प्रविष्टी..नीतीश कुमार के ब्लॉग से गायब कर दी गई मेरी टिप्पणी (हिन्दी दिवस आयोजन से लौटकर)My ComLuv Profile

Sunday, October 01, 2006

कान से होकर कलेजे से उतर जायेंगे

http://web.archive.org/web/20110101200329/http://hindini.com/fursatiya/archives/194

कान से होकर कलेजे से उतर जायेंगे



वक्त के पांव अनायास ठहर जायेंगे,
गौर से देखो तो कुछ और नजर आयेंगे।
डूब के सुनोगे जो रफ़्ता – रफ़्ता,
कान से होकर कलेजे से उतर जायेंगे।

यह गीत पंक्ति हमने कल सुनी अपने क्लब में। गीतकार थे राजेश मिश्र। मौका था हिंदी माह के समापन का। पितर पक्ष हफ्ते भर पहले समाप्त हो चुके थे। पितरों का तर्पण हो चुका था माता हिंदी का बाकी था। पितरों के तर्पण के एक सप्ताह बाद हिंदी का तर्पण होता देखकर यही लगा कि भारत दैट इज इंडिया में,लाख नजरें चुराने के बावजूद, लैंगिक भेदभाव के नजारे यदा-कदा दिख ही जाते हैं।
बहरहाल, काम की बात यह कि कल हम जमा हुये कवितागीरी करने के लिये। चंद कवि और कवियों से कुछ चंद ही अधिक श्रोता। बंद हाल और चायपानी की खुली
व्यवस्था ने श्रोताऒं का बाहर जाना मुश्किल कर दिया था। कल के बाद से हम साल भर के लिये हिंदी की चिक-चिक से मुक्त होने वाले थे। इसके बाद साल भर तक हिंदी को याद करने की मजबूरी से मुक्ति का अहसास हमारे मन में गुदगुदी मचा रहा था। हम गुदगुदायमान के साथ गदगदायमान थे।
कुछ ही देर में कवि सम्मेलन शुरू हो गया। या कुंदेंदु तुषार हार धवला वगैरह हुआ। इसके बाद तो कवि सम्मेलन धलल्ले से शुरू हो गया।
कवि गण कुल जमा सात थे। हमें भी कहा गया था कविता पढ़ने के लिए लेकिन हमने नखरे दिखाते हुये मना कर दिया- अरे हम कहां कविता लिखते हैं। अनुरोध करने वालों ने हेंहेंहें करते हुये सूचित किया कि वे हमारे बारे में सब जानते हैं। इस पर हमने कहा कि जानते हो तो काहे कह रहे हो कविता सुनाने को! वह फिर बोला हम जानते हैं आपको।
कवियों का चयन अधिकारियों ने किया था। उन अधिकारियों को कविता और कवि के बारे में केवल इतना ही पता था जितना कि हमें इस बात का कि आज के दिन,इस समय ऒसामा बिन लादेन जी। बहरहाल हर व्यक्ति सर्वइस चयन में चयन प्रकिया ऐसी थी कि कोई भी कायदे का कवि धंस न जाये, वो तो खास तौर जिसको लोग सुनना चाहते थे। । हर व्यक्ति सब कुछ् नहीं जानता। अज्ञानता पर सबका समान अधिकार है।
पहले कवि ने पढ़ी हास्य कविता और काफ़ी जमा। लोगों ने तालियां बजाईं। संचालिका खुश। बोली -आगाज़ अच्छा है। इस अच्छे आगाज़ का अंजा़म यह हुआ कि मुख्य अतिथि उठ लिये। उनको एक दूसरी पार्टी में जाना था। हम कविता सुनते,तालियां बजाते रहे। तीन कवि खत्म होते-होते कवि सम्मेलन हमारे स्तर तक आ गया। हमें लगा कि हमें तो मंच पर होना चाहिये। इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा अपनी कविता सुनाने का। लिहाजा हम टेढ़े-मेढ़े होते हुये सीधे आयोजक साथी को
अपनी तत्काल लिखी एक कुंडली दिखा दी। परिणमत: कुछ् ही देर में हम मंच पर थे। कुछ ही देर में माइक हमारे हाथ में था और हम कह रहे थे:-


वैसे तो कवि बदनाम होता है माइक पकड़कर खुद् या माइक के न टूटने माइक न छोड़ने का लेकिन मैं देख रहा हूं कि कुल जमा सात कवियों के सामने कम से कम ऐसे सत्ताइस लोग ऐसे बैठे हैं जिनको पास में आया /पकड़ा गया माइक छोड़ने का कोई अनुभव नहीं है। सच पूछा जाये तो वे कविता सुनने की बजाय वे इस लालच में थे कि पता नही किस बहाने माइक मिल जाये ताकि और वे अपने किस्से बयान कर सकें।

शुरू करने के पहले हमें याद आया कि कुंडलिया नरेश समीरलालजी ने मुझे बफैलो कवि सम्मेलन में याद किया था। मेरे पास बदला चुकाने का अच्छा बहाना था और फिर मैंने समीरलाल की शान में कसीदे काढ़े। लोगों ने तालियां पीटीं। फिर हमने समीरलाल जी का नाम याद करके उसी समय रची कुंडली पढ़ डाली:-


मजे-मजे में आ गये, सब कविता सुनने आज,
हमें माइक पर देखकर, कोई मत होना नाराज ।
मत होना नाराज कि हम तो सबको मौज करायेंगे,
ताली आप बजायेंगे ,तो खुद ही खुश हो जायेंगे।
खुश होकर सबके चेहरे,हो जायेंगे सजे-सजे से,
कविता सुनकर के जायेंगे,घर को सब जन मजे-मजे में।

लोगों ने कुछ तारीफ़ कर दी तो हम उड़ने लगे और कुंडली से सीधे हायकू के बारे में बताते हुये हायकू सुनाना शुरू कर दिया और सुनाया:-
दीवारें बोलीं,
आऒ उधर चलें,
कोने में मिलें।
इसके बाद मैंने अपने बारिश के मौसम के बारे में लिखे अपने हायकू सुनाना शुरू किया और सारे नहीं सुना पाये कि पब्लिक हक्का-बक्का से रह गये| हमने तुरंत मौके की नजाकत को देखते हुये हायकू-कतरन समेट लिया और कविता का पूरा थान फैला दिया| कविता पढ़ी:-

आओ बैठे कुछ देर पास में,
कुछ कह लें,सुन लें बात-बात में|
इस तरह होते करते हमारा कविता पाठ पूरा हो गया और चार-छह श्रोता भी सरक गये| उनके घर वाले उनको बुला रहे थे| रात होते-होते हम सब वापस आ गये|
आखिरी समय ७+१(=८) कवियों के लिये कुल जमा २२ लोग लगेंगे| मतलब एक कवि पर लगभग तीन श्रोता| एक औरश्रोता होता तो कवि चारो तरफ् होते| अब केवल तीन तरफ ही श्रोता थे।
खैर हमें रात के कविसम्मेल में से एक भी याद नहीं थी लेकिन समीरलाल से सबेरे बात हुयी तो बता दिया हिसाब बराबर कर दिया। हमें रात की कविता भी याद थी -राजेश मिश्र की। हमने उनको पढा़ दिया:-


वक्त के पांव अनायास ठहर जायेंगे,
गौर से देखो तो कुछ और नजर आयेंगे।
डूब के सुनोगे जो रफ़्ता – रफ़्ता,
कान से होकर कलेजे से उतर जायेंगे।

एक घंटे के बाद देखा तो हमारे मेल बाक्स पर समीरजी की कवितांजली चढ़ी थी:-


डूब के सुनोगे तो रफ़्ता-रफ़्ता ,
कान से होकर कलेजे में उतर जायेंगे
तू बता के तो देख अपनी पसंद,
उसी राग से हो मेरे गीत गुजर जायेंगे। तुम जो बैठी हो सामने मेरे ,
कितनी खुशनुमा हुई जाती है जिंदगी मेरी
जो भी लिखूँ मै कुछ शेर मेरे,
वो तेरी गज़लों मे खो कर उतर जायेंगे।

अच्छा हुआ हमने समीरजी को पूरा कवि सम्मेलन नहीं सुनाया। ऐसा होता तो वे सारे कवियों की कविताऒं का जवाबी कीर्तन कर डालते और फिर विनय उनके
ब्लाग पर छापा मार कर सारी गलतियां बरामद कर लेते।
मेरी पसंद
मेरी, कुछ आदत, खराब है
कोई दूरी, मुझसे नहीं सही जाती है,
मुँह देखे की मुझसे नहीं कही जाती है
मैं कैसे उनसे, प्रणाम के रिश्ते जोडूँ-
जिनकी नाव पराये घाट बही जाती है।
मैं तो खूब खुलासा रहने का आदी हूँ
उनकी बात अलग, जिनके मुँह पर नकाब है।
है मुझको मालूम, हवाएँ ठीक नहीं हैं
क्योंकि दर्द के लिये दवायें ठीक नहीं हैं
लगातार आचरण, गलत होते जाते हैं-
शायद युग की नयी ऋचायें ठीक नहीं हैं।
जिसका आमुख ही क्षेपक की पैदाइश हो
वह किताब भी क्या कोई अच्छी किताब है।
वैसे, जो सबके उसूल, मेरे उसूल हैं
लेकिन ऐसे नहीं कि जो बिल्कुल फिजूल हैं
तय है ऐसी हालत में, कुछ घाटे होंगे-
लेकिन ऐसे सब घाटे मुझको कबूल हैं।
मैं ऐसे लोगों का साथ न दे पाऊँगा
जिनके खाते अलग, अलग जिनका हिसाब है।
मेरी कुछ आदत खराब है।
-मुकुट बिहारी सरोज

फ़ुरसतिया

अनूप शुक्ला: पैदाइश तथा शुरुआती पढ़ाई-लिखाई, कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाने वाले शहर कानपुर में। यह ताज्जुब की बात लगती है कि मैनचेस्टर कुली, कबाड़ियों,धूल-धक्कड़ के शहर में कैसे बदल गया। अभियांत्रिकी(मेकेनिकल) इलाहाबाद से करने के बाद उच्च शिक्षा बनारस से। इलाहाबाद में पढ़ते हुये सन १९८३में ‘जिज्ञासु यायावर ‘ के रूप में साइकिल से भारत भ्रमण। संप्रति भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत लघु शस्त्र निर्माणी ,कानपुर में अधिकारी। लिखने का कारण यह भ्रम कि लोगों के पास हमारा लिखा पढ़ने की फुरसत है। जिंदगी में ‘झाड़े रहो कलट्टरगंज’ का कनपुरिया मोटो लेखन में ‘हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै‘ कैसे धंस गया, हर पोस्ट में इसकी जांच चल रही है।

5 responses to “कान से होकर कलेजे से उतर जायेंगे”

  1. संजय बेंगाणी
    दीवारें बोलीं,
    आऒ उधर चलें,
    कोने में मिलें।
    क्या बात हैं. वाह..
  2. Laxmi N. Gupta
    बहुत सुन्दर है, आपकी पसन्द:
    “मैं ऐसे लोगों का साथ न दे पाऊँगा
    जिनके खाते अलग, अलग जिनका हिसाब है।”
    सदैव की तरह बहुत अच्छा लिखा है। समीर जी से बफ़्लो में मुलाकात हुई:
    बड़े भाग्यशाली हैं वो जिनके आप आदी हैं।
    लक्ष्मीनारायण
  3. समीर लाल
    वाह अनूप भाई, यह तो मौज ली जा रही थी और छप भी गई. :)
    “आओ बैठे कुछ देर पास में,
    कुछ कह लें,सुन लें बात-बात में” बहुत सुंदर पंक्तियां हैं.
    मुकुट बिहारी सरोज जी की कविता गजब की है..
    “मैं तो खूब खुलासा रहने का आदी हूँ
    उनकी बात अलग, जिनके मुँह पर नकाब है।”
    वाह…
  4. राकेश खंडेलवाल
    आओ बैठो कुछ देर पास में
    और सुनें कुछ बात बात में
    अब भी तो बाकी है ढेरों
    थोड़ा ही था पढ़ा रात में :-)