Thursday, September 12, 2019

मंडी हाउस की चाय और व्यंग्य का महाउपन्यास

 


आज दिल्ली में Subhash Chander जी से मिलना हुआ। जगह मंडी हाउस। व्यंग्य के प्रकांड पंडित सुभाष जी के लिए सितम्बर का महीना ' सहालग' का महीना होता है। कहीं मुख्य अतिथि तो कहीं विशिष्ट वक्ता। कहीं विषय प्रवर्तक तो कहीं उपसंहार कर्ता। पूरे महीने कहीं से आ रहे होते हैं या कहीं जा रहे होते हैं।

आज भी जब बात हुई तो गुड़गांव से आ रहे थे, मेट्रो सेंटर जा रहे थे। इसी 'कार्यक्रम ब्रेक' में मंडी हाउस पधार कर मुलाकात भी अंजाम कर डाली। चलते समय बताया कि गाड़ी उठा के निकल लिए हैं। आधे घण्टे में पहुंचते हैं। जो लोग सुभाष जी को हल्के में लेते हैं उनको समझना चाहिए जो व्यंग्यकार, आलोचक 300 किलो की गाड़ी उठाकर निकल लेता है उसका जलवा कितना वजनदार होगा।
मंडी हाउस में चाय पीते हुए दोस्तों से मिलना सुलभ होता है। यहां चाय चरचा के दौरान कई किताबों के मसौदे तय हुए। पिछली बार कमलेश पांडेय जी Kamlesh Pandey, आलोक पुराणिक जी Alok Puranik के साथ बतियाते हुए तीनों की एक-एक किताब फाइनल हुई थी। इस बार दोनों लोग गोल हो गए। मजबूरन हमको अकेले अपनी किताब फाइनल करनी पड़ी। बाद में सुभाष जी से हमने पूछा -'आप 49 किताबों पर कब तक अटके रहेंगे। पचासा कब लगेगा। इस पर सुभाष जी ने बताया कि पचास नहीं सीधे 51 किताबों पर पहुंचेंगे। मतलब उनकी दो किताबें आएंगी इस साल।
सुभाष जी ने आते ही चाय-समोसे आर्डर किये। हमने पैसे देने का नाटक किया। जिसे सुभाष जी ने सीनियारिटी का रोब दिखाते हुए मना कर दिया। बोले -'ये तो नहीं चलेगा यहां।' ये वरिष्ठ लोग अपने आगे किसी की चलने नहीं देते।
मौके का फायदा उठाते हुए हमने सुभाष जी से व्यंग्य के इतिहास के अगले संस्करण में अपने लिए थोड़ी ज्यादा जगह, थोड़ी ज्यादा स्याही और थोड़ी तारीफ की गुंजाइश निकालने की बात की। इस बात को वरिष्ठ आलोचक महोदय ने गर्म समोसे को मुंह में ठंडा करने की कोशिश करते हुये हवा में फूंक मारकर उड़ा दिया। बड़े कठकरेजी होते हैं आजकल के आलोचक।
इस बीच सन्तोष संतोष त्रिवेदी जी को फोन किया। पता चला मास्टर साहब कोई इम्तहान ले रहे थे। शायद किसी को नकल कराकर फेल कराने का इन्तजाम कर रहे थे।हमने पूछा -'आजकल कोई लफड़ा क्यों नहीं कर रहे। बड़ी बदनामी हो रही है। इमेज चौपट हो जाएगी।' इस पर मास्टर साहब ने भुनभुनाते हुए कहा -'सारा बवाल हम ही करेंगे क्या जी? बाकी लोग भी अपनी जिम्मेदारी निभाएं। हमारे भरोसे ही न रहें। '
आलोक पुराणिक जी भी किसी मीटिंग में होंगे, बात नहीं हुई। अलबत्ता कमलेश पांडेय जी जरूर बताएं कि वो अहमदाबाद में हैं। रमेश तिवारी जी से बात नहीं हो पाई।

आधे घण्टे की यात्रा करके आये सुभाष जी से दस मिनट की मुलाकात हुई । इस बीच उन्होंने अपने दो अधूरे उपन्यासों का हवाला दिया। झटके में 30-35 पेज लिखे गए। फिर थम गए। फोन पर बातचीत में Shashi Pandey जी ने भी अपने उपन्यास के दस पेज के बाद ठहराव की बात बताई। Arvind Tiwari जी भी एक उपन्यास में ठहरे हुए हैं। गरज यह कि हिंदी व्यंग्य में जिस भी लेखक से बात की जाए तो पता चलता है कि उसका कोई उपन्यास कहीं ठहरा हुआ है। इस लिहाज से यह भी माना जा सकता है कि सच्चा व्यंग्य लेखक वही है जिसका कम से कम एक उपन्यास ठहरा हुआ है। उसी कड़ी में यह तय किया जा सकता है कि जिसके सबसे ज्यादा अधूरे उपन्यास हैं वह उतना बड़ा लेखक।
क्या ही अच्छा हो कि इन सब आधे-अधूरे, ठहरे-ठिठके उपन्यासों को मिलाकर एक महाउपन्यास तैयार किया जाए - व्यंग्य की महापंचायत की तरह। इसके प्रकाशन के बाद उसकी जमकर तारीफ करी जाए। इसे अपने ढंग का अनूठा उपन्यास बताते हुये कुछ इनाम झपट लिए जाएं। हो सकता है कोई कहे कि यह उपन्यास किस कोने से से है, समझ में नहीं आता। इसका जबाब यह होगा कि इस उपन्यास का सहयोगी लेखक होने के पहले तक हमको भी यही लगता था लेकिन अब समझ में आया कि यह अपने समय से बहुत आगे का उपन्यास है। इस पीढ़ी को नहीं , अगली पीढ़ी को समझ में आएगा।
चाय की दुकान के बाहर एक बुढ़िया डस्टबिन से पन्नियां बीन रही थी। ऐसे जैसे अपन कभी-कभी अपने कुछ व्यंग्य लेखों से पंच-छंटाई करते हैं।डस्ट बिन के बाहर आकर पन्नियां साफ और शरीफ हो गई थीं। दुकान वाला शायद उनको वापस ले जाने के लिए मोलभाव कर रहा था।
इस बीच हमारे ड्रॉइवर साहब ने भी खाना खाया। चाय के लिए पूछा तो बोले -' हम चाय नहीं पीते। शाम वाली गरम चाय पीते हैं।' रोज 100 रुपये का पउवा ठिकाने लगा देते हैं। कल 1000 खर्च हो गए दोस्तों के साथ। परिवार गांव में है। बातचीत के दौरान शादी के पहले के अपने संसर्ग के किस्से निस्संग भाव से बताए। उनको सुनते हुये मैं सोच रहा था कि जिससे संसर्ग हुए क्या वे भी इतनी ही सहजता से किसी अजनबी को अपने किस्से सुना सकती हैं।
यह बात लिखते हुये आइडिया आया कि इसी बात पर दस-पन्द्रह पन्ने घसीट दिए जाएं। कुछ नहीं तो कम से कम अपना भी एक ठहरा हुआ उपन्यास तो हो जाएगा। नाम आलोक पुराणिक तय कर ही देंगे। भूमिका किससे लिखवाई जाए यह तय होते ही अटका देंगे उपन्यास।
चौराहे पर एक लड़का छोटी बच्ची के साथ कुछ करतब दिखाते हुए कुछ मांगने की कोशिश कर रहा था। ड्रॉइवर ने उनको देखकर कहा -'कुछ काम सीखना चाहिए इसको। छह महीने में ड्राइवरी ही सीख जाता। मांगने से तो अच्छा कुछ काम करना।'
हमारा कहने का मन हुआ कि जब देश-दुनिया के तमाम कर्ण धार करतबों के सहारे अपना जलवा कायम किये हैं तो उस बालक को क्या समझाना। लेकिन हमने कुछ कहा नहीं। इस बेफालतू की सोच का टेंटुआ दबाकर उसको निपटा दिया। बाहर आती तो बबाल ही मचता।
देखते-देखते ट्रेन चल दी। दिल्ली पीछे छूट गयी। दिल्ली के किस्से भी।

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Tuesday, September 10, 2019

जो कुछ मिलना है अपनी क्षमताओं से, अपने संघर्ष से और अपने धैर्य से ही मिलना है -आलोक पुराणिक



[इंसान के व्यक्तित्व निर्माण में उसके बचपन का बड़ा हाथ होता है। आलोक पुराणिक के साथ भी अलग नहीं हुआ। कम उमर में पिता के न रहने पर बकौल आलोक पुराणिक ही

’ बचपन यूं कहें कि बहुत आरामदेह नहीं बीता, आठ साल की उम्र में पिता को खो देने के बाद एक झटके से मेच्योर्टी आ गयी है। एकदम से बहुत बड़ा हो गया। लोगों की बातों और कर्मों के फर्कों को बहुत जल्दी समझने लगा।’
आज के सवाल-जबाब की कड़ी में आलोक पुराणिक के बचपन से जुड़ी कई यादें जिनसे उनकी मानसिन बनावट के ताने-बाना का पता चलता है।]
सवाल 1: बचपन की कैसी यादें है आपके मन मे। क्या खास याद आता है बचपन का?
जवाब: बचपन आगरा का है, आगरा ब्रज क्षेत्र का का बहुत खास शहर है। जमुना किनारे वेदांत मंदिर के अहाते में घर था, उसी घर में पिताजी ने आखिरी सांसें ली थीं। बाद में अतिक्रमण अभियान में वह घर ढहा दिया गया, मंदिर बचा रह गया। बंदों की रिहाईश खत्म हो गयी, भगवान के घर की चिंता भरपूर रखी गयी। जमुना किनारे आगरा एत्माद्दौला मकबरे के इस पार घर था। व्यंग्य जो मेरे अंदर है, वह आगरा के संस्कार की वजह है। टेढ़ा देखना, आगरा के कुछ मुहल्ले हैं-भैंरो नाला, पथवारी, बेलनगंज( बेलनगंज लैनगऊशाला में तो आठ वर्ष की उम्र से 20 वर्ष की उम्र तक रहा) इन मुहल्लों में आम बातचीत में व्यंग्य रहता है। ब्रज की धरती एक तरह से व्यंग्य का संस्कार देती है। दिल्ली आने के दस साल बाद मुझे पता चला कि मेरे अंदर व्यंग्य भी है और वह आगरा की देन है। बचपन यूं कहें कि बहुत आरामदेह नहीं बीता, आठ साल की उम्र में पिता को खो देने के बाद एक झटके से मेच्योर्टी आ गयी है। एकदम से बहुत बड़ा हो गया। लोगों की बातों और कर्मों के फर्कों को बहुत जल्दी समझने लगा।
सवाल 2: पिता को बचपन में खो दिया आपने। उनसे जुड़ी यादें कैसी हैं आपके मन में।
जवाब: पिता बैंक में थे, मेरी मां को पिता की जगह नौकरी मिली बैंक में, पर बहुत देर से। आर्थिक संकट थे। मां मेरी बहुत जिद्दी, दबंग हैं। उन्होने अपने पिता से सहायता लेने की जगह उन्होने बुनाई की मशीन पर काम करना शुरु किया। स्वेटर बुनती थीं मां मशीन पर धड़ाधड़, कुछेक महीने में बहुत एक्सपर्ट हो गयीं। जिद्दी थीं किसी की नहीं सुनती थी। अब भी नहीं सुनतीं। मैं मोटे तौर पर अब भी मां के अलावा किसी से नहीं डरता। मां से बहुत डरता हूं, कभी भी शराब पीने की हिम्मत नहीं हुई, सिर्फ इसलिए कि मां ने पूछ लिया -ये क्या हो रहा है, तो क्या जवाब दूंगा। मेरे अंदर एक हद तक मां का यह गुण आ गया है कि बहुत जिद्दी हूं। संघर्ष की ज्यादा बात करना मुझे अश्लील जैसा लगता है, अबे जो किया अपने लिया किया, काहे बताना दूसरों को कि ये किया वो किया। संक्षेप में कक्षा ग्यारह से ट्यूशन पढ़ाना शुरु कर दिया और फिर जिंदगी की गाड़ी चल निकली। जो कुछ मिलना है अपनी क्षमताओं से, अपने संघर्ष से और अपने धैर्य से ही मिलना है-यह बात आठ-दस साल की उम्र में समझ में आ गयी थी। पिता मेरे अपने ढंग के अलग व्यक्ति थे। मेरी उम्र के आठ साल का साथ तक का साथ रहा, पर जो समझा यही पता लगा कि अलग रंग-ढंग था। सेना से रिटायर होकर बैंक ज्वाइन किया बैंक की नौकरी के साथ बांसुरी बजाते थे, वायलिन बजाते थे और उन्होने एक प्रयोग करके एक पानी का ईजाद किया था, जिसे लगाकर कई लोगों का एग्जीमा ठीक हो जाता था। बहुधंधी व्यक्ति थे, कुछ कुछ बेचैन आत्मा जैसे, पर रचनात्मकता के गहरे तत्व थे, विकट संवेदनशील थे। मां बताती हैं कि एक बार परिवार के साथ एक फिल्म देखने गये, मैं, बड़ी बहन मां साथ थीं। मैंने शायद रोना-धोना मचाया फिल्म में, उन्होने गुस्से में मुझे चांटा मारा, बाद में वह उस चांटे को लेकर इतने नाराज हो गये खुद से कि कभी भी फिल्म ना देखने का फैसला किया। और फिर कभी फिल्म देखी ही नहीं। अलग थे वह, खालिस बैंककर्मी नहीं थे।
सवाल 3: आप अपने स्वास्थ्य के प्रति काम भर के जागरुक रहे। फिर आपके वजन ने शतक के पास पहुंचने की जुर्रत कैसे की ?
जवाब: 2009 में एक विकट बीमारी से घिरा मैं, इतनी विकट कि उस दौर में मैंने अपने सामान्य होकर जीवित रहने की उम्मीद छोड़ दी थी। आलस्य, बीमारी का असर उस सबके चलते वजन बढ़ता चला गया।
सवाल 4: आपके साल भर में 25-30 किलो वजन कैसे कम किया?
जवाब: एक दिन फैसला कर लिया कि अब यह नहीं चलेगा। मेरे परिचय की एक बहुत काबिल डाइटिशियन हैं रुपाली कर्जगीर, उन्होने मुझे गाइड किया, योग और घूमना, वजन कम हो गया। मूल बात फैसले की होती है, एक बार फैसला कर लो, तो सब हो जाता है। खान-पान का ध्यान में अब लगातार रखता हूं। वजन कम करना आसान है, वजन को कम बनाये रखना बहुत मुश्किल काम है।
सवाल 5: आपके पिता के न रहने पर आपके जीवन में क्या बदलाव आए?
जवाब: बहुत अजीब सी बात कह रहा हूं कि पिताविहीन बच्चे ज्यादा तेजी से मेच्योर हो जाते हैं। मेच्योर्टी यह आ जाती है कि बेट्टे कोई बेकअप नहीं है। प्लान बी है ही नहीं। जहां कूदो सोच समझकर कूदो। बचानेवाला कोई नहीं है। एक छाता सा हट जाता है सिर पे। धूप, बारिश सीधे आ रही है आप तक, सीधी बारिश और धूप परेशान करती है, पर पर पर वही आपको दूसरों के मुकाबले मजबूत भी बना देती है। जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी है-यह भाव आते ही जिंदगी के फैसले लेने में गुणात्मक परिवर्तन आ जाता है। मैं मां औऱ बड़ी बहन, ये तीन मेंबर, घऱ में बचे, थोड़े बहुत इधर उधऱ के विचलनों के बाद मैं बहुत जिम्मेदार बालक हो गया। पैसे की वैल्यू और रिश्तेदारों का अर्थ, इंसानी दोगलापन, इंसानी टुच्चापन थोड़ा जल्दी समझ में आ गया।
सवाल 6: दिन में बहुत समय आप लेखन, गजियाबाद दिल्ली आवागमन और अध्यापन में गुजार देते हैं। परिवार के लिए समय बहुत कम मिलता होगा। हड़काये नहीं जाते ?
जवाब: मेरे घरवाले बहुत सहयोगी हैं, पर मैं आपको बता दूं- दोनों बेटियों को जहां जब मेरी जरुरत है, मैं हमेशा हूं। पत्नी और मां की शिकायतें छोटी मोटी तो हो सकती हैं, पर आम तौर पर मैं एक जिम्मेदार पति और बाप और बेटा हूं। टाइम मैनेजमेंट की बात है। हर चीज के लिए वक्त निकाला जा सकता है, अगर बेकार की चीजों में वक्त जाया ना किया जाये।
सवाल 7: घर के काम काज में भी कुछ हाथ बटा पाते हैं ?
जवाब-जी नहीं अभी घर के कामकाज में मेरा रोल कोई नहीं है। भविष्य में घर के कामकाज में अपने योगदान को लेकर कुछ य़ोजनाएं हैं।

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सन्तोष की सांस

 कल घर से निकलते समय हमने अपनी गाड़ी का मुखड़ा देखा। दफ़्तर से लौटते समय एक आटो अनजान तरीके से मेरी गाड़ी को रगड़ता चला गया था कुछ ऐसे जैसे भीड़ भरी बसों में मर्दाने लोग जनानी सवारियों पर हाथ/बदन साफ़ करते चलते हैं। मेरी गाड़ी सही सलामत थी। मैंने ईश्वर को लाख-लाख शुक्रिया दिया। लेकिन फ़िर याद आया कि शुक्रिया तो खुदा को दिया जाता है। ईश्वर तो धन्यवाद ग्रहण करते हैं। भन्ना न गये हों कहीं धन्यवाद की जगह शुक्रिया देखकर। हमने फ़ौरन ईश्वर को डेढ-डेढ लाख धन्यवाद रवाना किया और अनुरोध किया कि हमारे शुक्रिया वापस कर दें ताकि हम उनको खुदा के हवाले कर दें। लेकिन शुक्रिया वापस आया नहीं। जमा हो गया होगा कहीं गुप्त खाते में ईश्वर के। बहुत गड़बड़झाला है ऊपर वाले के यहां।

जब निकले तो तीन बच्चियां स्कूल जाते दिखीं। कन्धे पर हाथ धरे बतियाती, खिलखिलाती चली जा रही थीं। उत्फ़ुल्ल, उमंग भरी बच्चियों को स्कूल जाते देखकर मन खुश हो गया।
ओएफ़सी फ़ैक्ट्री के बाहर सड़क पर बैठी महिला की बिटिया उसके जुयें बीन रही थी। महिला टांग फ़ैलाये बैठी थी। उसका छुटका बच्चा उसकी पीठ से सटा इधर-उधर ताक रहा था। महिला जिस तरह बैठी थी आराम से उससे लग रहा था कि अपने आंगन में बैठी है । सड़क उसका आंगन ही तो हो गया है।
बगल में तमाम छुटपुट सामान बेचने वाले अलग-अलग कम्पनियों का छाता लगाये धूप से बचते हुये अपना बिक्री-बोहनी में जुटे थे। जिस कम्पनी का छाता था सामान सबका उस कम्पनी से अलग था। उसई तरह जैसे किसी पार्टी द्वारा दिये लैपटाप पर चलने वाले सोसल मीडिया के सहारे विरोधी पार्टी उसको चुनाव में पटक देती है।
आगे एक बुजुर्गवार बीच सड़क को अपना बाथरूम बनाये हर-हर गंगे कर रहे थे। पीछे मंदिर था, उसके पीछे फ़ुटपाथ। मतलब सड़क पर भगवान के भक्त कब्जा किये धर्म का प्रचार करने में जुटे हुये थे। धर्म का धंधे से सहज जुड़ाव धर्म के प्रसार में सुविधाजनक होता है।
ध्यान से देखा तो हर पन्द्रह-बीस कदम पर एक मंदिरनुमा अतिक्रमण सड़क पर दिखा। धार्मिक स्थल आजकल कमाई के स्थाई और कम खर्चे में लगाये जाने वाले धंधे बन गये हैं। क्या पता है कल को फ़लाने क्या करते हैं ? का जबाब लोग देना शुरु करें-" उनका अपना मंदिर है। अंधाधुंध कमाई है। दरोगा खुद वहां पूजा करता है। सोचते हैं हम भी गली के मुहाने पर एक मंदिर डाल लें।"
घर से निकलने में जरा देर हो गयी थी कल इसलिये जरा स्पीड से चल रहे थे। आगे वाली हर गाड़ी को दायें- बायें से ओवरटेक करते हुये निकलते जा रहे थे। कोई पैदल सवारी दिखती तो डर लगता कि कहीं उसको बीच से ओवरटेक करने का मन न हो जाये। यह सवारी का असर भी बहुत बुरा होता है। जितना आदमी उन पर चढता है उससे ज्यादा वे आदमी के सर पर सवार हो जाती हैं।
क्रासिंग भी खुली मिली जबकि हमने इसके लिये रेलवे मिनिस्टर को ट्विट भी नहीं किया था। एक ट्रक आगे इतना धीमे चल रहा था मानो सामने जयमाल के लिये कोई वाहन इंतजार कर रहा हो उसका। उसके बगल में एक खड़खड़ा वाला अपने घोड़े को उचकाता हुआ चला जा रहा। उसी खड़खड़े पर पीछे एक लड़का हाथ में थामे स्मार्टफ़ोन में मुंडी घुसाये चला जा रहा था। दुलकी चाल से जाते घोड़े को हमने हार्नियाया तो भड़ककर पहले थोड़ा बीच में फ़िर ज्यादा किनारे हो गया। हम फ़ुर्र से आगे निकल लिये।
आगे पंकज बाजपेयी जी को देखकर हार्नियाये तो वे निपटान मुद्रा से उठकर खड़े हो गये। खिड़की खोलकर हाथ मिलाया। बोले-" जार्डन वाले लोग आये हैं। बच्चे खा जाते हैं। जयप्रकाश मिश्रा के बेटे को ले गये थे। कोहली के आदमी हैं। झकरकटी पुल के नीचे पकड़े गये हैं। कोई गन्दी चीज दे तो खाना नहीं।"
इसी तरह की बाते करते हैं बाजपेयी जी। एक दूसरे से संबद्ध-असंबद्ध। लेकिन भागते-दौड़ते बस दुआ सलाम ही हो पाती है। कभी तसल्ली से मिलने की प्रयास किया जायेगा। उनसे नमस्ते करते हम जो निकले तो सीधे दिहाड़ीखाने की चौखट पर ही रुके। समय से पांच मिनट पहले पहुंचने पर जो सांस ली उसे लोग संतोष की सांस कहते हैं।
फ़िलहाल इतना ही। शेष अगली पोस्ट में। 🙂
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Tuesday, September 03, 2019

भारत के आखिरी गांव तक

 


हुन्डर से अगला पड़ाव था भारत का आखिरी गांव । पहले यह तुरतक था। लेकिन 1971 की लड़ाई के बाद थांग भारत का आखिरी गांव हो गया।
गेस्ट हाउस सुबह निकले। रास्ते में सेना और बॉर्डर रोड आर्गनाइजेशन के कैम्प दिखे। कुछ स्कूल भी। ये स्कूल सेना की मदद से चलाए जाते हैं। कुछ स्कूलों में बच्चे कक्षाओं के बाहर खेल रहे थे। मस्तिया रहे थे।
रास्ते में जगह-जगह पहाड़ से उतरते झरने मिले। हर झरना अपने में अनूठा। मस्तियाता। पानी ठुमकते हुए , इठलाते हुए नीचे उतरता चला जा रहा था। प्रदूषण रहित एकदम सफेद पानी। झरने के पत्थर पानी को थोड़ा रोकते। लेकिन पानी मुस्कराकर पत्थर को बगलियाते हुए आगे बढ़ता जाता।
अपन हर झरने के पास रुककर उनको देखते। उनके साथ वीडियो बनाते। इसके बाद देरी की बात सोचते हुए आगे बढ़ते। ड्राइवर लखपा ने भी कई जगह हमारी फोटो लीं।

जगह-जगह बने छोटे-छोटे पुल देखकर लगता था कि इतनी दुर्गम जगहों पर पुल बनाना कितना कठिन रहा होगा। लेकिन पुल बने। देखकर यही लगा :
कुछ कर गुजरने के लिए
मौसम नहीं मन चाहिए।
आगे सड़क कुछ सपाट हुई। गाड़ी थोड़ा सरपट हुई। बगल में सड़क के साथ श्योक नदी भी सरपट भागती साथ चल रही थी। उसका पानी कुछ मटमैला हो गया था। शायद पहाड़ की मिट्टी मिलकर। नदी में पानी बढ़ता गया। नदी का आकार भी। लोगों ने बताया कि यह नदी पाकिस्तान जाती है। वहाँ के लोग इसके पानी से प्यास बुझाते होंगे, सिंचाई करते होंगे।
रास्ते में जगह-जगह बाइकर्स मिले। हेलमेट लगाए, धड़धड़ाते हुए सड़क से गुजरते। कुछ के हेलमेट में कैमरा भी लगा था। मोटरसाइकिल चलाते हुए वीडियो बनाने के लिए।

आगे सीमा पास का गांव पड़ा। लोग सड़क किनारे खेतों में काम करते दिखे। कोई बैठा हुआ। कोई बतियाता हुआ। एक जगह बच्चे स्कूल से आते दिखे। सड़क किनारे जाते कुछ लोगों के फोटो हमने चलती गाड़ी से लिये। कुछ बच्चियां घास के गट्ठर सर पर लादे आ रहीं थी। हमने उनके फ़ोटो लेने की कोशिश की तो उन्होंने घास के गट्ठर को कैमरे के सामने कर दिया या फिर पीठ कैमरे की तरफ कर दी।
सीमा के गांव पर हमारे परमिट जांचे गए। परमिट कई जगह देखे गए। लखपा ने कई कापियां करा रखी थीं परमिट की। जहां मांगी जाती निकाल कर थमा देते।
तुर्तक गांव में एक जगह कुछ बच्चे सड़क किनारे छोटे तालाब में नहाते दिखे। एक महिला सड़क किनारे लगे नल से अपने बच्चे को नहला रही थी। हमने उससे बात करनी चाही। वह मुस्करा कर बच्चे को नहलाने में लगी रही। लेकिन मुस्कान का आदान प्रदान अपने आप में सबसे बेहतरीन गुफ्तगू होती है। उसने फोटो लेने से टोंका नहीं।


तुर्तक में सेना की चौकी है। वहां सेना के लोग दूरबीन की सहायता से आसपास को चोटियों के बारे में बता रहे थे। यह चोटी हिंदुस्तान की है वह पाकिस्तान की। यहां पर पहले पाकिस्तान का कब्जा था। वह ऊंचाई पर बंकर है। ऊपर पहुंचने में दो-तीन दिन लगते हैं। स्थानीय लोगों की सहायता के बिना सेना का काम चलना मुश्किल। सेना के सहयोग के बिना स्थानीय लोगों की जिंदगी दुश्वार। दोनों एक दूसरे के सहयोगी।
सीमा के आखिरी गांव थांग का किस्सा वहां लोगों ने सुनाया। पहले यह गांव पाकिस्तान में था। थांग और पहारू गांव जुड़वा गांव थे। 1971 की लड़ाई में थांग गांव पर हिन्दुस्तान का कब्जा हुआ। पहारू गांव पाकिस्तान में रह गया। दोनों गांव में रहने वाले लोग बिछुड़ गए। पति पत्नी अलग हो गए, बाप बेटे अलग हो गए। एक ही परिवार के साथ में रहने वाले लोग दो अलग देशों में रहने को मजबूर हो हो गए। मजबूरी का आलम यह कि अलग -अलग देशों में रहने वाले एक ही परिवार के लोग एक दूसरे को देख सकते थे लेकिन मिल नहीं सकते। कुछ लोग जो भारत की तरफ से अपने परिवार से मिलने पाकिस्तान के कब्जे वाले गांव में पहुंचे उनको जासूस समझकर गिरफ्तार करके जेल में बंद कर दिया गया।

रमानाथ अवस्थी जी ने विभाजन की त्रासदी पर एक कविता पढ़ी थी। उसकी पंक्तिया हैं:
धरती तो बंट जाएगी लेकिन
उस नील गगन का क्या होगा
हम तुम ऐसे बिछुड़ेंगे तो
फिर महामिलन का क्या होगा।
क्या हाल हुए होंगे उन इन गांवों में रहने वाले लोगों के एक गांव से दूसरे गांव सहज रूप में गए होगे। लेकिन 16-17 दिसम्बर को इस तरह अलग हुए कि मिलना तक सम्भव न हुआ।
हाल यह कि मिनटों की दूरी पर दूसरे देश के परिजन से मिलने कुछ लोग हफ़्तों की यात्रा करके वीसा के जरिये उस पार पहुंचे । मुलाकात करके आये। लोगों ने बताया कि उधर की सेना का रवैया उनके इलाके में रह रहे लोगों के साथ इतना दोस्ताना नहीं जितना इस तरह की फौज का।

सीमा चौकी पर कुछ ढाबे बने हुए है। सबमें चाय, मैगी , चाउ मीन जैसे खाने के सामान। दुकानें थांग गांव के लोगों हैं। उनमें आपस में ग्राहकों को कब्जियाने की कोई ललक नहीं। बल्कि जिस दुकान में हम रुके उसके मालिक ने ही हमको बताया - 'उस दुकान में खा लीजिये। उम्दा है।' हम उनकी सहजता के मुरीद हो गए और हमने कहा हम तो जो होगा यहीं खाएंगे ।
अब्दुल कादिर नाम था उस युवा का। उसने अपने गांव और आसपास के बारे में तमाम जानकारियां दीं। यह भी की कारगिल की लड़ाई के समय यहां एक तोप का गोला गिरा था जिससे एक खच्चर मर गया। और कोई नुकसान नहीं हुआ।
अब्दुल कादिर ने बताया कि जरूरत का सब सामान सेना के सहयोग से मिलता है। दुकानें मार्च से सितम्बर तक ही चलती है। बाकी सीजन बन्द। हर तरफ बर्फ की दुकान चलती है उस दौरान।
अब्दुल कादिर के ढाबे में तिरंगा फहरा रहा था। हमने साथ में फोटो लिए। दुकान पर दूसरे यात्री आ गए थे। कादिर उनको निपटाने में लग गए।
लौटते हुए फिर कैमरे के मुंह खुल गए। जो भी दृश्य जरा सा भी अलग दिखा उसको झपट कर कैद कर लिया। डाल लिया कैमरे की मेमोरी में । अब जब देख रहे हैं तो वो सारे क्षण फिर से जीवित हो उठे हैं।
लौटते हुए एक जगह सड़क खुदती हुई दिखी। केबल पड़ रहे थे। जियो के केबल। शायद मोबाइल के लिए। पूरी दुनिया मुट्ठी में करने के लिए।
प्रकृति यह सब देखकर मुस्करा रही थी। सूरज भाई भी हंस रहे थे। हम भी सबको मजे से देखते हुए गेस्ट हॉउस लौट आये।

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Thursday, August 29, 2019

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती


कल हमने लेह-लद्दाख सीरीज में एक नौजवान का जिक्र किया । हुन्डर के पास रेत की टीलों के पास एक नदी बहती है। पांच- छह मीटर चौड़ी। उसको फांदकर पार करने की चुनौती उछाल दी किसी ने।
तमाम तमाशबीनों और मोबाईलधारियों के बीच एक युवा ने चुनौती स्वीकार की और कमीज उतार कर छलांग लगाई। एकदम किनारे पानी में गिरा। एक बार गिरा साफ पार नहीं हो पाया तो दुबारा फिर कोशिश की। दुबारा फिर वहीं गिरा।

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इसके बाद उसने कोशिश नहीं की। उसकी कोशिश देखकर अच्छा लगा। वह पार नहीं हो पाया लेकिन कोशिश की उसने। और कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।
कल वीडियो लगा नहीं पाया। लेकिन किसी ने टोंका भी नहीं। वैसे भी लोग लम्बी पोस्ट्स जिसमें फोटो लगीं हों , देखी ही जाती हैं। पढ़ी कम जाती हैं।
देखिये ये वीडियो।

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Wednesday, August 28, 2019

रेत के टीले और बहती नदी



पिछली पोस्ट में फोन के बंद होने की बात बताई । दोस्तों ने पूछा -फोन का क्या हुआ। हुआ यह कि हमने कई बार फोन को दबाया, सहलाया, पुचकारा। वह चला नहीं। फिर निराश होकर उसको धर दिया। सुबह उठे तो आदतन उसको फिर आन किया। ताज्जुब कि वह चला और लाल अक्षरों में वार्निंग देने लगा - बैटरी बहुत कमजोर है। मतलब फोन की सांस वापस आ गयी। फ़ौरन चार्जिंग पर लगाया। थोड़ी देर में टनाटन चलने लगा। यह पोस्ट भी उसी फोन से लिख रहे।


हुन्डर पहुंचकर शाम को पास ही स्थित रेत के टीले देखने गए। नुब्रा घाटी पर इस जगह पता नहीं कैसे रेत आई होगी। रेत आई तो ऊंट भी आये। हो सकता है पहले ऊंट आये हों। उनके लिए रेत का इंतजाम किया हो कुदरत ने।


यहां के ऊंट खास तरह के होते हैं। दो कूबड़ वाले। शायद पृकृति ने एक के साथ एक फ्री वाली योजना में इन ऊँटो को बनाया हो। चूंकि ऊंट अलग तरह के तो उनको रखने का इंतजाम भी अलग किया होगा। वरना क्या पता रेगिस्तान में एक कूबड़ वाले ऊंट इनको चिढ़ा-चिढ़ाकर हलकान कर देते। क्या पता उनकी चिढ़ से आजिज आकर कोई ऊंट अपना एक कूबड़ कटवा देता।या फिर एक ऊंट वाले इलाके में कोई 'कूबड़ कटवा' अपना आतंक मचा देता। ' कूबड़ कटवे' को एक कूबड़ वाले ऊंट सम्मानित करते।

नकटों के शहर में जिंदा रहने के लिए नाक कटाकर जीना पड़ता है।
बहरहाल इस जगह अनेक लोग ऊंट की सवारी कर रहे थे। 200-300 रुपये में एक चक्कर। समय के हिसाब से रेट। ऊंट बेचारे बहुत दुबले-पतले दिख रहे थे। निरीह, बेबस। शायद भर पेट खाने को न मिलता हो। दिहाड़ी के मजदूरों के ठेकेदार जिस तरह उनको न्यूनतम मजदूरी भी नहीं देते ऐसे ही लगता है ऊंटों को भी न्यूनतम भोजन नहीं मिलता। खत्तम होते अनुदान वाली संस्थाओं जैसे खत्तम होते लगे ऊंट। उन पर दया आई। सवारी करने का मन नहीं हुआ।

सवारी भले न की हो लेकिन उनके साथ फोटो खूब खिंचाई। अगल में, बगल में, आगे खड़े होकर, पीछे से। मने कोई कोना नहीं छोड़ा मुफ्तिया फोटो का। अनन्य ने फोटो खींची ऊंट के काफिले की। और भी।
एक ऊंटनी को जरा सा अवकाश मिला तो वह काफिले से किनारे आकर खड़ी हो गयी। उसका बच्चा भागता हुआ आया और उसके थन में मुंह अड़ा दिया। ऊंटनी वात्सल्य भाव से बच्चे को दूध पिलाती रही। जुगाली करती हुई। अब ऊँटो के कार्यस्थल पर कोई अलग से पालनाघर तो होते नहीं ।

तमाम लोग वहां फोटो खिंचवाने को आतुर थे। घर परिवार वाले जबरियन आत्मीय और कुछ तो रोमान्टिक भी होते पाए गए। मेरे सामने अपने जोड़ीदार को झिड़ककर हड़काने वाली महिला उसी के साथ फ़ोटो खिंचाते हुए इतना मुलायम मुद्रा में हो गयी कि कोई फ़ोटो देखता तो कहता -'लवली कपल। मेड फार इच अदर।'


वहीं एक नदी बह रही थी। पांच - छह मीटर या कुछ और ज्यादा ही चौड़ी। किसी ने उसको भागकर फांदने का चैलेंज उछाल दिया। एक लड़के ने अपनी शर्ट उतारी और भागते हुए छलांग लगाई। आधे मीटर पहले पानी में गिरा छपाक। पार नहीं कर पाया। लेकिन कोशिश की। उकसाने पर दुबारा उसने कोशिश की। फिर कुछ दूरी से किनारा चूक गया। भीग गया। लेकिन उसका हौसला देखकर खुशी हुई। असफल होने की पूरी आशंका के बावजूद उसने कोशिश की यह कितनी अच्छी बात है। आजकल हम लोग तो असफल होने के डर से कोई काम शुरू ही नहीं करते। उसका वीडियो देखिये अच्छा लगेगा।


तमाम देर आसपास के नजारे देखते हुए वापस लौट आये। अगले दिन हमको आगे जाना था। भारत के आखिरी गांव।

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Tuesday, August 27, 2019

खरदुंग ला से हुन्डर



खरदुंग ला में दुनिया की सबसे ऊंची सड़क पर हम करीब दो घंटे रहे। मन तो कर रहा था कि कुछ देर और रहें लेकिन आगे के मोर्चे हमको आवाज दे रहे थे । हम आगे बढे। हमारी आगे की मंजिल नुब्रा घाटी में हुन्डर थी।
खरदुंग ला तक हमारा फ़ोन टनाटन काम कर रहा था। एयरटेल का पोस्ट पेड कनेक्शन। प्रि पेड फ़ोन यहां काम नहीं करते। पोस्ट पेड में भी बीएसएनएल के फ़ोन यहां काम करते हैं। बाकी मिल गये तो मिल गये वर्ना नेटवर्क इच्छा। अभी तक हमारा फ़ोन घरवालों के फ़ोन के मुकाबले वीआईपी बना हुआ था। लेकिन खरदुंग ला से आगे बढते ही न जाने क्या हुआ कि हमारा फ़ोन ’शान्त’ हो गया। स्क्रीन गोल।

कई बार स्टार्ट, रिस्टार्ट करने के बावजूद फ़ोन की स्क्रीन काली ही बनी रही। कुछ दिन पहले ही खरीदे गये प्ल्स 7 फ़ोन की बोलती बन्द। हमें लगा खरदुंग ला की ऊंचाई में सांस फ़ूल गयी होगी, ठंड से हाल बेहाल हो गये होंगे -कुछ देर में गर्माहट से ठीक हो जायेगा। लेकिन फ़ोन एक बार रूठा तो रूठा ही रहा।
इधर फ़ोन बन्द हुआ उधर आशंकाओं की फ़ौज ने हमारे दिमाग में सर्जिकल स्ट्राइक कर दी। फ़ोन बन्द होने से संबंधित तमाम आशंकायें हमारे दिमाग में बिना अनुमति लिये घुस गयीं। लगा कि किसी ने हमारा खाता हैक कर लिया होगा। इधर फ़ोन बन्द हुआ उधर हमारे खाते से नेटबैंकिग से पैसे विदा हो रहे होंगे, कोई हमारे क्रेडिट कार्ड से अपने लिये ऐश के सामान खरीद रहा होगा। इन आशंकाओं को जितना भी परे धकेलते वे उतने ही आजिजी से वापस आकर दिमाग में पसरती जातीं।


आशंकाओं की अंतिम विदा तब हुई जब हमने हुन्डर में पहुंचते ही वहां जम्मू कश्मीर बैंक के एटीएम अपने खाते के बैलेन्स को चेक किया। खाते के पैसे यथावत खाते में शरीफ़ बच्चों की तरह मौजूद थे।
तेजी से आधुनिक और जटिल होती जा रही दुनिया में किस तरह की चिंतायें दिमाग में कब्जा करती हैं इसका अंदाज खरदुंग ला से लेकर हुन्डर तक की यात्रा में एहसास हुआ। जिन सुविधाओं ने हमारा जीवन आसान टाइप किया है वही साथ में नयी तरह की चिंतायें भी लायीं हैं। सुविधा के साथ चिंता भी मुफ़्त में।
खाते में पैसे सुरक्षित होने की चिंता जब विदा हुई तो अपना चार्ज दूसरी चिंता को दे गयी। पैसे की चिंता से हटकर अब चिंता इस बात की होने लगी कि फ़ोन कैसे ठीक होगा। कन्हैयालाल बाजपेयी जी कविता पंक्तियां याद आईं:
संबंध सभी ने तोड़े लेकिन,
पीड़ा ने कभी नहीं तोड़े।
सब हाथ जोड़कर चले गये,
चिंता ने कभी नहीं जोड़े॥

चिंता एक के साथ एक फ़्री वाले अंदाज में आती हैं इसका एहसास तब हुआ शर्ट की जेब में रखा मोबाइल जेब से निकलकर जमीन पर गिर पड़ा। उसके गिरने के अंदाज से लगा मानो बारबार दबाने के बावजूद सेवा न दे पाने की शर्म के चलते उसने जेब से कूद कर आत्महत्या की कोशिश की हो। जमीन पर गिरने से मोबाइल के माथे पर गुलम्मा पड़ गया। हमने प्यार से सहलाते हुये पुचकार कर मोबाइल को जेब में रखा। इसके बाद उसको दबाया नहीं। मोबाइल चुपचाप पड़ा रहा जेब में।
खरदुंग ला से हुन्डर के रास्ते में दिस्किट बौद्ध स्थल पड़ा। एक पहाड़ी पर बुद्ध की ऊंची प्रतिमा करीब 32 मीटर है। कई दर्शक यहां इसे देखने आ रहे थे। हमने भी देखा। वहीं पर ब्रिटेन से आये एक बुजुर्ग दम्पत्ति से मुलाकात हुई। नजारा और मूर्ति देखकर उनका कहना था - अद्भुत। इसके अलावा फ़्रांस से आये एक मोटर साइकिल सवार से भी बतकही हुई। अपनी सहेली के साथ फ़्रास से भारत घूमने आये करीब 35 साल के जवान ने बताया कि वो हर साल भारत घूमने आता है। लेह लद्दाख के इस हिस्से के बारे में उसका कहना था कि दुनिया में इतनी खूबसूरत जगह कोई और नहीं।



हम सोचने लगे कि यार बताओ एक ये आदमी है जो हर साल लेह लद्दाख घूमने आता है, वह भी मोटरसाइकिल से और एक हम हैं जो पचास पार होने के बाद पहली बार आ पाये। सोचने के अलावा और किया भी क्या जा सकता था।
हुन्डर में बार्डर रोड के गेस्ट हाउस में रुके। रुकने की व्यवस्था हमारे दोस्त अंकुर ने की थी। वे पहले यहां काम कर चुके थे। गेस्ट हाउस में काम करने वाले लोग उनकी याद कर रहे थे।
गेस्ट हाउस के आसपास की पहाड़ियों पर शाम उतर आई थी। सामने की पहाड़ी पर बनी आकृतियां ऐसी लग रही थीं मानो कोई मियां बीबी किसी बात पर भन्ना कर एक दूसरी के उल्टी तरफ़ सर करके लेट गये हों। पत्थर दिल जोड़े में से कोई किसी को मनाने की कोशिश भी नहीं कर रहा था। लेटे थे चुपचाप। पहाड़ पर मौन पसरा था। मन किया उनको अंसार कम्बरी की कविता सुनायें:
पढ सको तो मेरे मन की भाषा पढो,
मौन रहने से अच्छा है , झुंझला पडो।
लेकिन फ़िर छोड़ दिये। पत्थरों को कविता क्या सुनाना।
कुछ देर बाद हम लोग पास में स्थित रेत के टीलों को देखने गये। उसका किस्सा अलग से। लौटकर फ़िर इंगलैंड-न्यूजीलैंड के बीच का मैच देर रात तक देखते रहे। हमारी सहानुभूति और समर्थन शुरुआत से ही न्यूजीलैंड के साथ रहा। आखिर में जब वह हारा तो हम दुखी होकर सो गये। उठे तो सुबह हो गयी थी।

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Monday, August 26, 2019

दुनिया की सबसे ऊंची सड़क पर



लेह में आने के अगले दिन नुब्रा घाटी के लिये निकलना था। ड्राइवर लखपा ने सुबह जल्दी चलने की बात कही। हमने हां भर ली। लेकिन निकलते हुये देर हो ही गयी। तसल्ली से नाश्ता करते हुये निकले।

जहां हम रुके थे उसके आसपास सेना के कई संस्थान थे। एक यूनिट के बाहर तिरंगा फ़हरा रहा था। सेना की गाड़ियों की आवाजाही हो रही थी। इन सबको देखते हुये हम आगे बढे।
लेह से निकलने कुछ देर बाद तक तो सड़कें सीधी रहीं। इसके बाद बल खाने लगीं। चक्करदार चढाईयां। अगल में पहाड़। बगल में पहाड़। नीचे घाटियां। थोड़ी-थोड़ी दूर पर आबादी। इन सबके ऊपर पूरा खुला आसमान जिसमें सूरज भाई पूरा ’रोशनी कवरेज’ देते हुये साथ में।

रास्ते में कुछ स्कूल दिखे। बच्चे स्कूल के मैदान में खेलते। सभी स्कूल सेना की यूनिटों के सहयोग से चलते हैं। इतनी कठिन परिस्थिति में सेना के सहयोग के बिना सहज जीवन मुश्किल। सेना को भी स्थानीय लोगों का पूरा सहयोग मिलता है।
जैसे-जैसे ऊंचाई बढती गयी , पहाड़ बर्फ़ से ढकते गये। बर्फ़ पहाड़ों के कुछ हिस्सों को ढके हुये उनको सफ़ेद बना रही थी। बर्फ़ का हिस्सा नीचे से गलते हुये पानी में बदलता जा रहा। पानी जहां जगह मिली वहां से नीचे बहता जा रहा था। कहीं पहाड़ के किनारे से, कहीं बीच सड़क से, कहीं दोनों तरह से। बीच सड़क से गुजरते हुये पानी सड़क के हिस्से को भी अपने साथ लेती जा रही थी - ’चल मेरी गुइय़ां’ कहते हुये। जगह-जगह सड़क उखड़ गयी थी।

बर्फ़ को देखने के लिये शायद बादल भी उतावले थे। जगह-जगह उमड़ते हुये बर्फ़ के ऊपर टहल रहे थे। सूरज भाई भी रोशनी की सर्चलाइट मारते हुये सबको चमकाते हुये सब पर निगाह रखे थे।
लेह से करीब 35 किमी दूर और लगभग 2 किमी की ऊंचाई पर जगह का नाम है -खरदुंग-ला । खरदुंग-ला दर्रा की सड़क दुनिया की सबसे ऊंची सड़क है जहां गाड़ियां चलती हैं। दुनिया भर के मोटर साइकिलिस्ट यहां चलना एक उपलब्धि मानते हैं।
खरदुंग-ला में पहाड़ चारो तरफ़ बर्फ़ से ढंके थे। यात्रियों के जत्थे के जत्थे अकेले , परिवार सहित यहां आने की यादें सुरक्षित रखने के लिये तरह-तरह से फ़ोटो खिंचा रहे थे। कोई सेल्फ़ी ले रहा था, कोई ग्रुप फ़ोटो। वहीं पर ’बार्डर रोड आर्गनाइजेशन’ की तरफ़ से यह सूचना देते हुये खम्भा लगा है कि यह सड़क दुनिया की सबसे ऊंची सड़क है। उस खम्भे के पास खड़े होकर फ़ोटो खिंचवाने की लोगों में होड़ लगी थी। जिस तरह विवाह मंडप में दूल्हे-दुल्हन के साथ बराती-जनाती फ़ोटो खिंचाने का इन्तजार करते हैं उसी अदा में लोग बारी-बारी फ़ोटो खिंचा रहे थे। खम्भा एक फ़ोटो खिंचाने वाले अनेक। अलग-अलग मुद्रा में फ़ोटो खिंचाने की ललक में उसी खम्भे के पास इकट्ठा थे।

कुछ लोगों ने तो पहाड़ पर चढकर फ़ोटो खिंचाई। कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने बर्फ़ पर लेटकर भी यादें कैमरे में कैद की। सभी जी भरकर इन क्षणों को समेट लेना चाहते थे। पता नहीं फ़िर कभी आना हो या न हो !
खम्भे की तरफ़ जाते हुये कुछ लोग बर्फ़ में फ़िसल गये। कुछ रपट गये फ़िर संभल गये। कुछ हुये धड़ाम भी। अपन ने भी मौका मिलने पर फ़ोटोबाजी की। इस बीच आसपास की बर्फ़ से ढंकी चोटियों के नजारे भी जी भर के देखे। देखने में कोई शुल्क और जीएसटी तो लगी नहीं थी। माले मुफ़्त -दिले बेरहम। सारी चोटियां बार-बार देखीं, कई बार देखीं।

वहीं पर एक चाय की दुकान थी। वहां से चाय पी गयी। इतनी ऊंचाई पर भी चाय के दाम मात्र 40 रुपये। बड़ी कागज की ग्लास में चाय दी चाय वाले ने। दो चाय के साथ तीसरा ग्लास मुफ़्त में। यहां शहर में किसी माल में इतनी चाय डेढ सौ से कम में न दे कोई, ग्लास अलग से देने की तो बात भूल ही जाइये।
उसी जगह सेना के ट्रुक भी चलते दिखे। सभी वाहन निर्माणी जबलपुर के बने। इनमें से कुछ जरूर तब के बने होंगे जब हम वाहन निर्माणी जबलपुर में थे। देखकर बहुत अच्छा लगा। देश भर में जहां भी सेना की कोई भी यूनिट है वहां वाहन निर्माणी जबलपुर के ट्रक हैं।
खरदुंग-ला पर तमाम मोटर साइकिल वाले भी जमा थे। वे लेह से लद्दाख घूमने निकले थे। कोई अकेले , कोई समूह में। कुछ समूहों में लड़कियां भी दिखीं। लगा कि यार जिंदगी और जवानी जो है सो यही है। बाकी तो सब बेफ़ालतू की बाते हैं। वहीं खड़े-खड़े तय किया कि एक यात्रा तो इस इलाके की मोटरसाइकिल से भी करनी है। अब तय करने को तो कर लिया, अब देखिये इस पर अमल कब होता है।
इस बीच पानी भी बरसने लगा। हमारे ड्राइवर ने हमसे आगे चलने के लिये कहा। हम उनकी बात मानकर कुछ देर में आगे चल दिये। आगे की मंजिल नुब्रा घाटी थी।

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Friday, August 09, 2019

अनुशासित यातायात के लिए सहयोग करें


शहरों में जाम एक आम समस्या है। भीड़ से ज्यादा लोगों का रवैया ज्यादा जिम्मेदार है जाम के लिए। हर आदमी हड़बड़ी में है। सोचता है एक मिनट का काम उल्टी तरफ से निकल लेते हैं। इस चक्कर में कभी-कभी घण्टों फंस जाता है और दूसरों को जाम के लिए कोसता है।

हमारे घर के पास सालों से ओवर ब्रिज बन रहा है। लगता है सालों तक अभी और बनेगा। दो स्कूल हैं एक बाईं तरफ दूसरा दाईं तरफ। स्कूल शुरू होने और बन्द होते समय गजब भभ्भड़ मचता है। लोग अपने बच्चों को छोड़ने आते हैं और जहां भी जगह मिलती है , गाड़ी घुसा देते हैं। इस चक्कर में सुबह और दोपहर रोज जाम लगता है। जिस दिन नहीं लगता है , लगता है कुछ गड़बड़ हुई।
पिछले कुछ दिनों से रोट्रेक्ट क्लब से जुड़े कुछ लोग जाम कम करने में सहयोग करने के लिए सुबह पुल की शुरुआत पर खड़े होकर लोगों को सही तरफ़ से जाने के लिए समझाते दिखे। उनको देखकर उल्टी तरफ से जाते देखकर सीधे हो गये लोग। कुछ लोग फुर्ररर से उल्टी तरफ निकल गए। शायद आगे जाकर सेलिब्रेट भी किया हो।
आज Raghvendra मिले पुल के मुहाने पर। सीने पर यातायात अनुशासन का पोस्टर चिपकाए हुए। रोट्रेक्ट क्लब क्लब वाले इस अभियान में लगे हैं। राघवेंद्र से बतियाते । पता चला कि थिएटर से जुड़े हैं। मुम्बई में 'इप्टा'। कई नाटक कर चुके हैं। भगत सिंह पर केंद्रित पीयूष मिश्रा के प्रसिद्ध नाटक 'गगन दमामा बाजयो' में सुखदेव का रोल कर चुके हैं। उसे देखकर पीयूष जी ने उनको मुम्बई बुलाया कहते हुए -'अब तुम मुम्बई आने लायक हो गए। '
एक और यादगार प्रस्तुति बताई चेखव की एक कहानी के नाट्य रूपांतर 'जांच पड़ताल' पर अभिनय की। पीपीएन से पढ़कर थियटर से जुड़े हैं।

फेसबुक पर राघवेंद्र का परिचय का अंदाज भी कनपुरिया है-"जोकर, घुमक्कड़ी मानुष, कड़क कनपुरिया, लौंडा कलाकार"। उनके दोस्त उनके इस परिचय को कनपुरिया अंदाज में उनको सुनाते होंगे। आप भी कल्पना कीजिये।
नाटक के चलते घुमक्कड़ी करते हुए राघवेंद्र 20-25 प्रदेश घूम चुके हैं।
कनपुरिया ट्रैफिक की अराजकता को सुधारने की कोशिश करते हुए उन्होंने मुम्बई, मिजोरम आदि के अनुशासित ट्रैफिक के किस्से सुनाये। वहां आदमी लाइन में लगकर बस में चढ़ता है। यहां लोग लगी हुई लाइन तोड़ देते हैं।
राघवेंद्र के बोर्ड को देखकर कुछ लोग सीधी तरफ से गए। कुछ ने बच्चों को मोड़ पर उतार दिया। लेकिन कुछ लोग झांसा जैसा देकर सरपट निकल गए। एक ने तो मोटर साईकल धीमे की । लगा कि वहीं उतर जाएगा। लेकिन फिर बुत्ता देकर बगलियाते हुये निकल गया।
एक उत्साही सवार ने वहीं खड़े-खड़े राघवेंद्र को तमाम हिदायतें दे डालीं। ऐसे करना चाहिए, वैसे करना चाहिए। कुछ इस तरह जैसे चाय की दुकानों पर चुश्कियाँ लेते हुए विराट कोहली को खेलना सिखाते हैं। हमें लगा कि कहीं वह इस स्वयंसेवक को लापरवाही के आरोप में सस्पेंड न कर दे। लेकिन शायद उसको जल्दी दी इस लिए बिना कठोर अनुशासनिक कार्यवाही के सिर्फ हिदायत देकर चला गया।
राघवेंद्र ने बताया कि वो होटलों में बचा हुआ खाना इकट्ठा करके भूखों को भोजन कराने वाली संस्था 'रॉबिनहुड आर्मी ' से भी जुड़े हैं। र होटलों , रेस्तराओं से बचा हुआ खाना इकट्ठा करके गरीबों को खिलाते हैं। 100- 150 लोग जुड़े हैं इससे।
राघवेंद्र मूलतः हास्य-व्यंग्य से जुड़े हैं। राजू श्रीवास्तव, सुनील पाल आदि कनपुरिया सेलिब्रिटी के साथ जुड़े हैं। नाटक भी किये हैं उनके साथ। खुद भी लिखते हैं।
अभी मुम्बई से कानपुर अपनी माँ की बीमारी में इलाज के लिए आये थे । ऑपरेशन हुआ तो यह ट्रैफिक वाला काम थमा दिया गया। कल से मेघदूत होटल के पास ट्रैफिक सीधा करेंगे।
राघवेंद्र को देखकर मन किया कि हम भी सुबह सुबह घर से निकल कर ओवरब्रिज के पास खड़े होकर ट्रैफिक सुधार में सहयोग करें। सुना है किरण बेदी जी के पति रिटायरमेंट के बाद कुछ देर ट्राफिक चौराहे पर सहयोग करते थे। हम पहले ही करने लगें। 🙂
लेकिन सोचने और करने में फर्क होता है। फिलहाल तो यही तय किया कि ट्राफिक में शॉर्ट कट नहीं मारेंगे। सीधी तरफ से जाएंगे। जाम का झाम बचाएंगे।
आपका भी मन करने लगा होगा न इसी तरह का संकल्प लेने का। तो ले लीजिए। कोई फीस नहीं है अभी संकल्प लेने में। संकल्प लीजिये कि ट्राफिक नियम का पालन करेंगे। अच्छा संकल्प लेने में कभी घबराना नहीं चाहिए। क्या पता अमल भी हो जाये।
हम लोगों ने सुबह-सुबह एक बढ़िया संकल्प लिया। इतना कम है क्या?

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