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इतवार को लगभग 13 किमी साइकिल चली। घण्टे भर से भी कम पैडलियाये होंगे। लेकिन फोटो खूब हुईं। न केवल फोटो बल्कि बयानबाजी भी। बयानबाजी साइकिलिंग के समर्थन में। हमारे नाम से कई अखबारों में साइकिलिंग के प्रचार के लिए बयान छपे। पढिये आप भी। शुरू कर दीजिये साइकिलिंग। कुछ फोटो भी हैं देखिये।
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हंगरी में मैंने योरोपीय ज्ञान, उदारता , दक्षता और प्रोफ़ेशनलिज्म को देखा और जाना जिसकी धाक पूरी दुनिया में जमी हुई है। हंगेरियन हालांकि अपने को पूरा योरोपियन नहीं मानते पर फ़िर भी जर्मनी के बहुत निकट रहने के कारण वे पूरी तरह योरोपियन हो गये है। कुछ रोचक प्रसंग हैं जिनके माध्यम से हंगरी के समाज को थोड़ा बहुत समझा जा सकता है। सन 1988-89 में जब पूर्वी और केन्द्रीय योरोप रूस के प्रभाव और समाजवादी सत्ता से बाहर निकला तो बहुतेरे देशों के शहरों में जो कम्युनिस्ट समय के नेताओं और विचारकों की मूर्तियां आदि लगी थीं उन्हें तोड़ दिया गया था। लेकिन हंगरी में ऐसा नहीं किया गया। हंगेरियन लोगों ने शहरों के केन्द्रों या अन्य स्थानों पर लगी कम्युनिस्ट युग की मूर्तियों को उखाड़ा और बुदापैश्त के बाहर एक मूर्ति पार्क बनाकर उन सब मूर्तियों को वहां लगा दिया। इसी तरह बुदापैश्त के पुराने के पुराने गिरजाघर की पुताई करने के सिलसिले में जब पिछली पुताई की परतें साफ़ की जा रही थी तो अचानक गिरजाघर के मुख्य भाग की दीवार पर कुरान की आयतें लिखी मिलीं। तुर्की ने हंगरी पर लगभग 200 साल शासन किया था और गिरजाघरों को मस्जिदें बना दिया था। तुर्की का शासन खत्म होने के बाद मस्जिदें पुन: गिरिजाघर बन गई थीं। इस गिरिजाघर में भी कभी मस्जिद थी। इसी कारण कुरान की आयतें लिखीं मिल गईं थी। गिरिजाघर में लिखी, कुरान की आयतों को मिटाया नहीं गया बल्कि वह जगह उसी तरह छोड़ दी गई।
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हमारे कानपुर की Anita Misra सामाजिक , खासकर महिलाओं-बच्चों से जुड़े , मुद्दों पर, निरन्तर लिखती रहती हैं। सामाजिक विसंगतियों को रेखांकित करते हुए सवाल उठाती रहती हैं। उनकी दोस्त Bhavna Mishra भी इसी घराने की हैं और कानपुर में होने वाले साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों से जुड़ाव रखती हैं। अनिता बहुत दिन बाद फेसबुक पर वापस लौटी तो शुरुआत खुराफात से की।कनपुरिया अंदाज में सोशल मीडिया पर धमाल मचाने वाले शायर फिजूल एफ ट्विटरी साहब का इंटरव्यू लिया। शायर की भूमिका में हैं भावना मिश्रा के सुपुत्र राघव। सुनिए / देखिये । मौज की पक्की गारंटी।
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माचिस की तीली के जलने का सिद्धांत यह है कि उसके सिरे पर लगे फास्फ़ोरस पर साधारण तापमान की हवा यानी ऑक्सीजन के संपर्क में आने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं होती. जब हम डिब्बे के एक तरफ की खुरदरी सतह पर तीली को घिसते हैं तो घर्षण से दोनों के बीच की हवा का तापमान बढ़ जाता है जिसके नतीजे में तीली के सिरे पर लगा फास्फ़ोरस एक छोटे विस्फोट से जल उठता है.
पिछले कई दिनों से देख रहा हूँ कि लोग हमसे बिना पूछे हमारा प्यार और शुभकामनाएं और यहां तक कि आशीर्वाद तक उठा के ले गए। बिना बताए। अब चूंकि यह सब हमारे पास इफरात में रहता है इसलिए कभी इसका हिसाब नहीं रखा लेकिन बिना बताए कोई हमारा सामान ले जाये तो बुरा लगता है न!
महामारियों में समाज का व्यवहार शायद एक जैसा रहता है। पिछली शताब्दी में प्लेग महामारी को केंद्र में रखकर अल्बैर कामू ने उपन्यास लिखे उपन्यास ' प्लेग' को पढ़ते हुए लगा कोरोना काल की स्थितियां भी ऐसी ही हैं। कुछ अंश देखिये:
1. एक तो शहर को बन्द कर दिया गया था और बंदरगाह में दाखिल होने की मनाही थी, और दूसरे, चूंकि वे एक विशिष्ट मन:स्थिति में थे और हालांकि अपने दिलो की गहराई में वे अब भी अपने ऊपर आई मुसीबत की भयंकरता को स्वीकार करने में असमर्थ थे, वे यह अनुभव किये बिना न रह सके थे कि कोई चीज निश्चित रूप से बदल गयी है। फिर भी, अधिकांश लोग अभी भी यह उम्मीद यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि यह महामारी जल्द ही गुजर जाएगी और वे और उनके परिवार सुरक्षित बच जाएंगे। इसलिए वे अभी तक अपनी आदतों में कोई परिवर्तन करने की जरूरत नहीं महसूस करते हैं। उनके लिए प्लेग एक अनयाचित आगंतुक की तरह थी जो उसी तरह अचानक चली जायेगी जिस तरह आयी थी। वे घबराये तो थे , लेकिन अभी तक हताश नहीं हुए थे कि प्लेग उन्हें अपने अस्तित्व के दुर्निवार तंतु के रूप में दिखाई देती और अब तक उन्होंने जिस जिंदगी का उपयोग किया था , उसको ही भूल जाते।
2. ऐसे मौकों पर चीन के लोग प्लेग के देवता के आगे डफली बजाने लगते हैं, यह मत प्रकट किया कि यह बताना मुमकिन नहीं है कि क्या सचमुच व्यवहारतः छूत रोकने की एहतियाती कार्यवाहियों के मुकाबले डफली ज्यादा कारगर साबित होती थी?
-अल्बैर कामू के उपन्यास 'प्लेग' से
प्लेग उपन्यास राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है।
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