Monday, February 12, 2024

पुस्तक मेले में

 पुस्तक मेला जाना हुआ कल। नोएडा में एक मांगलिक कार्यक्रम में रहना जरूरी था। गए भी। लेकिन फिर घण्टे भर बाद क्लास बंक करने की तरह निकल लिए प्रगति मैदान।जिन दोस्तों को सुचित भी किया था उनमें से कुछ पहुँच भी गए। बाकी ने हमारे इस विश्वास की रक्षा की कि किसी न किसी कारण पहुंच न पाएंगे। कुछ ने मेसेज रात में देख पाने की बात भी बताई।

इस बार हमारी किताब भी आई थी -चयनित व्यंग्य। न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन से। जितनी संख्या में व्यंग्यकारों के चयनित व्यंग्य आये हैं न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन से उससे यह कहे जाने की संभावना भी बनती है कि व्यंग्यकार वही जिसके चयनित व्यंग्य न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन से आ गए हैं। इस बात की तसदीक Alok Puranik जी ने करते हुए सूचना दी कि वे भी अपने चयनित व्यंग्य न्यूवर्ल्ड से छपवाने के लिए छाँट रहे हैं ताकि लोग उनको सिर्फ आवारा घुम्मकड़ ही न समझें।
चयनित व्यंग्य छपने के साथ ही अपन ने दो प्रतियां मंगवा ली थीं। आते ही श्रीमती जी से विमोचन करवा लिया था। विमोचन करने के बमुश्किल तैयार हुई श्रीमती जी ने कड़क हिदायत दी थी कि उनके विमोचन की फ़ोटो कहीं लगाई न जाये। उनको इस बात का अंदेशा था कि कहीं लोग उनको भी मिशनरी 'पुस्तक विमोचक' न समझ लें जो रोज किसी न किसी किताब को सीने से सटाये विमोचन करते पाया जाता है।
एक प्रति के साथ विमोचन के बाद दूसरी प्रति भेंट की गई आयुध निर्माणी कानपुर के कार्यकारी निदेशक अजय सिंह जी को। शनिवार को किताब भेंट करने के कारण उन्होंने इसे पढ़ने की तस्दीक़ करते हुए कुछ लेखों का ज़िक्र करते हुए मजे भी लिए यह कहते हुए कि आपके लेख पढ़ते हुए परसाई जी की याद आती है। हम कुछ बोले नहीं। मित्रों की बात का बुरा नहीं माना जाता।
अजय सिंह ने मजे लेते आगे भी कहा -‘आप इतने काम-धाम के साथ इतना सब लिख कैसे लेते हैं?’ इस मज़ाक़ का मतलब आप समझ ही गए होंगे।
नोयडा से प्रगति मैदान किराए की कार से गये। 20 किलोमीटर की दूरी के चार सौ रुपये खर्च हुए। मतलब 20 रुपया प्रति किलोमीटर । चयनित व्यंग्य की किताब 225 रुपये की किताब मेले में 200 रुपये में मिल रही थी। दो किताब के बराबर खर्च करके मेले में पहुंचे।
पुस्तक मेले में गेट पर ही यादव जी के मशहूर शुध्द शाकाहारी छोले के कई ठेले लगे हुए थे। सब पर दनादन छोले बिक रहे थे। बिना विमोचन।
गेट नम्बर 5 से जाना था पुस्तक मेले। लम्बी, घुमावदार, ढीली-ढाली टाइप लाइन लगी थी मेले के अंदर जाने के लिए। टिकट हमने पहले ही खरीद लिया था। आन लाइन। बड़ों का 20 रुपये का। बच्चों का 10 रुपये का। हमको लगा कि काश बच्चे होते तो दस रुपये बचते। बाद में जब पता चला कि सीनियर सिटीजन के लिये मुफ्त व्यवस्था है मेले में आने की तो लगा काश वरिष्ठ नागरिक हो गए होते। पहले दस और बाद में बीस रुपये के लालच में बच्चा और फिर बूढ़ा हो जाने की ललक लिए हम जैसे लोग ही अपने माननीयों के दलबदल की आलोचना करते हैं। कितनी खराब बात है।
मेले के अंदर पहुंचने तक किसी ने हमारा टिकट चेक नहीं किया तो लगा कि टिकट बेफालतू ही लिया। लेकिन बाद में काम आया वही टिकट। उसकी कहानी आगे।
मेले में हमारी कितबिया हाल नम्बर एक में थी। सबसे आखिर में हाल था। भीड़ भारी थी। लोग आते-जाते दिख रहे थे। हमको लगा कि मेला साल में कई बार लगना चाहिए। लेकिन हमारे लगने से क्या होता है।
मेले में मित्रों से हमने तीन बजे पहुंचने को लिखा था। पहुंचते हुए 4 मिनट कम तीन बजे गए थे। हाल में घुसते ही वाणी प्रकाशन के स्टाल के किनारे की बरामदे टाइप की जगह पर किसी किताब पर विमोचन के बाद वाली बातचीत हो रही थी। सवाल-जबाब का सिलसिला चल रहा था। हम बातचीत को उड़ती-उचटती निगाह से देखते हुए आगे बढे और न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन के स्टाल पर पहुंचे।
स्टॉल पर Arifa Avis मौजूद थीं। आरिफ़ा से वर्षो की फेसबुकिया मित्रता के बावजूद यह पहली मुलाकात थी। आरिफा के आग्रह के कारण ही यह चयनित व्यंग्य आया। वहीं पर एम.एम. चन्द्रा भी टहलते हुए पाए गए। एम एम चंद्रा पहले डायमंड बुक्स में थे। दो साल से न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन शुरू किया है। बताया कि करीब 500 किताबें निकाल चुके हैं। कई कवियों-व्यंग्यकारों के चयनित-संकलित संकलन दिखे स्टॉल पर।

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पुस्तक मेला जाने के पहले किताब का विमोचन

 


पुस्तक मेला जाना हुआ कल। नोएडा में एक मांगलिक कार्यक्रम में रहना जरूरी था। गए भी। लेकिन फिर घण्टे भर बाद क्लास बंक करने की तरह निकल लिए प्रगति मैदान।जिन दोस्तों को सुचित भी किया था उनमें से कुछ पहुँच भी गए। बाकी ने हमारे इस विश्वास की रक्षा की कि किसी न किसी कारण पहुंच न पाएंगे। कुछ ने मेसेज रात में देख पाने की बात भी बताई।
इस बार हमारी किताब भी आई थी -चयनित व्यंग्य। न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन से। जितनी संख्या में व्यंग्यकारों के चयनित व्यंग्य आये हैं न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन से उससे यह कहे जाने की संभावना भी बनती है कि व्यंग्यकार वही जिसके चयनित व्यंग्य न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन से आ गए हैं। इस बात की तसदीक Alok Puranik जी ने करते हुए सूचना दी कि वे भी अपने चयनित व्यंग्य न्यूवर्ल्ड से छपवाने के लिए छाँट रहे हैं ताकि लोग उनको सिर्फ आवारा घुम्मकड़ ही न समझें।
चयनित व्यंग्य छपने के साथ ही अपन ने दो प्रतियां मंगवा ली थीं। आते ही श्रीमती जी से विमोचन करवा लिया था। विमोचन करने के बमुश्किल तैयार हुई श्रीमती जी ने कड़क हिदायत दी थी कि उनके विमोचन की फ़ोटो कहीं लगाई न जाये। उनको इस बात का अंदेशा था कि कहीं लोग उनको भी मिशनरी 'पुस्तक विमोचक' न समझ लें जो रोज किसी न किसी किताब को सीने से सटाये विमोचन करते पाया जाता है।
एक प्रति के साथ विमोचन के बाद दूसरी प्रति भेंट की गई आयुध निर्माणी कानपुर के कार्यकारी निदेशक अजय सिंह जी को। शनिवार को किताब भेंट करने के कारण उन्होंने इसे पढ़ने की तस्दीक़ करते हुए कुछ लेखों का ज़िक्र करते हुए मजे भी लिए यह कहते हुए कि आपके लेख पढ़ते हुए परसाई जी की याद आती है। हम कुछ बोले नहीं। मित्रों की बात का बुरा नहीं माना जाता।
अजय सिंह ने मजे लेते आगे भी कहा -‘आप इतने काम-धाम के साथ इतना सब लिख कैसे लेते हैं?’ इस मज़ाक़ का मतलब आप समझ ही गए होंगे।
नोयडा से प्रगति मैदान किराए की कार से गये। 20 किलोमीटर की दूरी के चार सौ रुपये खर्च हुए। मतलब 20 रुपया प्रति किलोमीटर । चयनित व्यंग्य की किताब 225 रुपये की किताब मेले में 200 रुपये में मिल रही थी। दो किताब के बराबर खर्च करके मेले में पहुंचे।
पुस्तक मेले में गेट पर ही यादव जी के मशहूर शुध्द शाकाहारी छोले के कई ठेले लगे हुए थे। सब पर दनादन छोले बिक रहे थे। बिना विमोचन।
गेट नम्बर 5 से जाना था पुस्तक मेले। लम्बी, घुमावदार, ढीली-ढाली टाइप लाइन लगी थी मेले के अंदर जाने के लिए। टिकट हमने पहले ही खरीद लिया था। आन लाइन। बड़ों का 20 रुपये का। बच्चों का 10 रुपये का। हमको लगा कि काश बच्चे होते तो दस रुपये बचते। बाद में जब पता चला कि सीनियर सिटीजन के लिये मुफ्त व्यवस्था है मेले में आने की तो लगा काश वरिष्ठ नागरिक हो गए होते। पहले दस और बाद में बीस रुपये के लालच में बच्चा और फिर बूढ़ा हो जाने की ललक लिए हम जैसे लोग ही अपने माननीयों के दलबदल की आलोचना करते हैं। कितनी खराब बात है।
मेले के अंदर पहुंचने तक किसी ने हमारा टिकट चेक नहीं किया तो लगा कि टिकट बेफालतू ही लिया। लेकिन बाद में काम आया वही टिकट। उसकी कहानी आगे।
मेले में हमारी कितबिया हाल नम्बर एक में थी। सबसे आखिर में हाल था। भीड़ भारी थी। लोग आते-जाते दिख रहे थे। हमको लगा कि मेला साल में कई बार लगना चाहिए। लेकिन हमारे लगने से क्या होता है।
मेले में मित्रों से हमने तीन बजे पहुंचने को लिखा था। पहुंचते हुए 4 मिनट कम तीन बजे गए थे। हाल में घुसते ही वाणी प्रकाशन के स्टाल के किनारे की बरामदे टाइप की जगह पर किसी किताब पर विमोचन के बाद वाली बातचीत हो रही थी। सवाल-जबाब का सिलसिला चल रहा था। हम बातचीत को उड़ती-उचटती निगाह से देखते हुए आगे बढे और न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन के स्टाल पर पहुंचे।
स्टॉल पर Arifa Avis मौजूद थीं। आरिफ़ा से वर्षो की फेसबुकिया मित्रता के बावजूद यह पहली मुलाकात थी। आरिफा के आग्रह के कारण ही यह चयनित व्यंग्य आया। वहीं पर एम.एम. चन्द्रा भी टहलते हुए पाए गए। एम एम चंद्रा पहले डायमंड बुक्स में थे। दो साल से न्यूवर्ल्ड पब्लिकेशन शुरू किया है। बताया कि करीब 500 किताबें निकाल चुके हैं। कई कवियों-व्यंग्यकारों के चयनित-संकलित संकलन दिखे स्टॉल पर।

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Sunday, January 28, 2024

पटना की खुदाबख्श लाइब्रेरी



हमको दीपक नें अपनी मोटरसाइकिल पर बैठाकर खुदाबख्श लाइब्रेरी तक छोड़ दिया। मजे की बात जब हमने प्लेन में मिली बालिका से खुदाबख्श लाइब्रेरी के बारे पूछा तो उसको लाइब्रेरी के बारे में कुछ नहीं पता था। मुझे कुछ अचंभा नहीं हुआ। एक बड़ी आबादी अपने शहर में मौजूद ऐतिहासिक महत्व की इमारतों के बारे में नहीं जानती।
पटना की खुदाबख्श लाइब्रेरी के बारे में बचपन से पढ़ते आये थे। लेकिन इसके बारे में पता नहीं था कि किसने शुरू करवाई । लाइब्रेरी देखकर आ गए तब भी जानकारी नहीं की। आज जब लिखने बैठे तो खोजा इसके बारे में। पता चला कि खुदाबख्शजी के पिता जी को किताबें पढ़ने और जमा करने का शौक था। उनकी आमदनी का बड़ा हिस्सा किताबे खरीदने में जाता था। उनका निधन 1876 में हुआ । तब तक उनके पास 1700 किताबें जमा हो गयीं थीं।
1876 में जब वे अपनी मृत्यु-शैय्या पर थे उन्होंने अपनी पुस्तकों की ज़ायदाद अपने बेटे को सौंपते हुये एक पुस्तकालय खोलने की इच्छा प्रकट की।
खुदाबख्श ने अपने पिता द्वारा सौंपी गयी पुस्तकों के अलावा और भी पुस्तकों का संग्रह किया तथा 1888 में लगभग अस्सी हजार रुपये की लागत से एक दोमंज़िले भवन में इस पुस्तकालय की शुरुआत की और 1891 में 29 अक्टूबर को जनता की सेवा में समर्पित किया। उस समय पुस्तकालय के पास अरबी, फारसी और अंग्रेजी की चार हजार दुर्लभ पांडुलिपियाँ मौज़ूद थीं। क़ुरआन की प्राचीन प्रतियां और हिरण की खाल पर लिखी क़ुरानी पृष्ठ भी मौजूद हैं।
1908 में अपने निधन तक खुदाबक्श ने लाइब्रेरी के काम को लगातार आगे बढ़ाया। पुस्तकों के निज़ी दान से शुरू हुआ यह पुस्तकालय देश की बौद्धिक सम्पदाओं में काफी प्रमुख है। भारत सरकार ने संसद में 1969 में पारित एक विधेयक द्वारा इसे राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थान के रूप में प्रतिष्ठित किया।।यह स्वायत्तशासी पुस्तकालय जिसके अवैतनिक अध्यक्ष बिहार के राज्यपाल होते हैं, पूरी तरह भारत सरकार के संस्कृति मन्त्रालय के अनुदानों से संचालित है।
लाइब्रेरी में घुसते ही काउंटर पर एक रजिस्टर रखा था। उसमे दस्तखत कराये गए। हमसे पहले आठ-दस लोग दस्तखत कर चुके थे। अधिकतर के आने का उद्धेश्य रिसर्च लिखा था। अन्दर घुसने से पहले बैग रखवा लिया गया। हमने बताया उसमें लैपटाप भी है। काउंटर पर बैठे शख़्स ने कहा -'रख दो चिंता न करो।' हमने उसकी पहली बात मान ली। बैग रखा दिया लेकिन दूसरी बात पूरी नहीं मानी- ' थोड़ी -थोड़ी चिंता करते रहे।'
लाइब्रेरी के हाल में कुछ लोग बैठे किताबें पढ़ रहे थे। कुछ के सामने किताबों का ढेर लगा था। वे शायद नोट्स ले रहे थे।
हमने सोचा था कि लाइब्रेरी में बड़ा सा हाल होगा जिसमे किताबें ही किताबें दिखेंगी। लेकिन वहां ऐसा नहीं था। पता लगा कि किताबो की सूची कम्प्यूटर में दर्ज है। आप अपनी पसंद की किताब कंप्यूटर से खोजकर बताइये तो लाइब्रेरी के लोग किताब लाकर आपको देंगे फिर आप उसको पढ़ सकते हैं। खुद किताबें देखने की अनुमति नहीं है। हाल में पीछे की तरफ दुर्लभ किताबों का कमरा भी दिखा लेकिन वहां भी जाने की अनुमति नहीं नहीं थी लाइब्रेरी देखने का मजा कम हो गया। किताबें खुद उलट-पलट के न देख सकें तो काहे की लाइब्रेरी।
पता चला कि लाइब्रेरी में करीब तीन लाख किताबें हैं उनमें से बमुश्किल तीस हजार किताबें सर्कुलेशन में हैं मतलब नियमित रूप से पढी जाती हैं। बाकी किताबें न जाने कब से पाने पढ़े जाने का इन्तजार करती रहती होंगी। कभी वीआइपी रहीं किताबों को अब कोई पूछने वाला नहीं।
बहरहाल कुछ देर हाल में इधर-उधर देखते रहे। कंप्यूटर में किताबें देखी। क्लिक करने पर किताब का विवरण दिख जाता। लेकिन हमको बैठकर किताबें पढ़नी तो थीं नहीं। देखनी थी लाइब्रेरी। कुछ देर में हाल से बाहर आ गए।
हाल से बाहर आते हुए शौचालय दिखा। हमने उसका भी उपयोग किया। देशी स्टाइल के शौचालय में पानी के लिए प्लास्टिक के टोंटीदार बड़े लोटे रखे थे। नल में तो पानी आ रहा था लेकिन फ्लस जलविहीन था। क्या फर्क पड़ता है किसी को। हर जगह पानी कम हो रहा है आजकल।
बाहर आकर हमने पहले तो बैग अपने कब्जे में किया। फिर पूछा कि हम यहाँ अकबर की लिखाई देखने आये हैं। सबने नकार दिया कि ऐसी कोई लिखाई मौजूद है यहाँ। हमने शाजी जमां की किताब का कवर दिखाया कि इस किताब के लेखक ने एक बातचीत में कहा है कि यहाँ अकबर की लिखाई का नमूना मौजूद है। लेकिन किसी ने माना नहीं। लोगों ने वहां मौजूद तमाम मुगलकालीन बादशाहों के दरबारों के फोटो दिखाते हुए कहा -'यहाँ तो यही है' उनके कहने का मतलब था -'इसी को देखकर काम चलाओ।'
हम उन सबको देख लिए। तमाम पुरानी वस्तुएं तो राजे-महाराजे-बादशाह-नवाब और उनकी रानियाँ उपयोग में लाती थी वहां मौजूद थीं। एक जगह महात्मा गांधी और रवीन्द्रनाथ टैगोर जी की हस्तलिपि में लिखे उनके उदगार मौजूद थे जो उन्होंने लाइब्रेरी आने पर लिखे थे। करीब सौ साल पहले की अंगरेजी में लिखे सन्देश। गांधी जी ने अपने सन्देश में लिखा था कि करीब नौ साल पहले उन्होंने लाइब्रेरी के बारे में सुना था। लाइब्रेरी देखकर होने वाली खुशी उन्होंने बहुत उदारता पूर्वक जाहिर की थी।
लाइब्रेरी में ही मोबाइल की बैटरी ख़त्म होती दिखी। वहीं काउंटर के पास चार्जर में लगा दिया मोबाइल। बतियाने लगे वहाँ मौजूद लोगों से। पता चला क़रीब चालीस लोग काम करते हैं लाइब्रेरी में । हम बतिया रहे थे कि मोबाइल हिला और छिपकली की तरह पेट के बल जमीन पर गिरा । गनीमत कि टूटा नहीं। हम सामान समेट के बाहर निकल आये।
बाहर लाइब्रेरी के दूसरे हिस्से में कम्पटीशन के लिए पढ़ने वाले बच्चों के लिए बैठने और पढ़ने की व्यवस्था थी। सैकड़ों बच्चे मोबाइल, किताबें, कम्पटीशन की पत्रिकाएं लिए जुटे थे पढ़ने में। एक हिस्सा लड़कियों के पढ़ने के लिए आरक्षित था। कुछ बच्चे खुसफुसाते हुए बतिया रहे थे। क्या पता हाल ही में पेपर आउट होने की कारण निरस्त हुए इम्तहान की चर्चा कर रहे हों -'फिर देना होगा इम्तहान।'
वहीं पास में एक आँगन नुमा जगह में खुदाबख्श के परिवार के लोगों की कब्रें मौजूद थीं। उसके बगल में भी पढ़ने की जगह पर बच्चे पढ़ रहे थे। जन्नतनशीन खुदाबख्श जी अपनी बनवाई लाइब्रेरी में बच्चों को पढ़ते देख जरुर खुश होते होंगे।
लाइब्रेरी के सामने संकरी सड़क पर भारी भीड़ थी। ओवरब्रिज बन रहा था। पता चला ओवरब्रिज के कारण लाइब्रेरी का कुछ हिस्सा तोड़े जाने के निर्णय का भरपूर विरोध स्थानीय लोगों ने किया है। विरासत की क़ीमत पर विकास का विरोध। लाइब्रेरी से जुड़ी तमाम रोचक और आत्मीय जानकारी के लिए फेसबुक में 'खुदाबख्श' सर्च करके पढ़ें।
लाइब्रेरी में कैसे किताबें इशू होती हैं इस बारे में इस पोस्ट के बाद साझा की गयी पोस्ट पढिये।
हम कुछ देर लाइब्रेरी परिसर में टहलने में के बाद बाहर आ गए।

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Thursday, December 28, 2023

पांडिचेरी में चहलकदमी



पांडिचेरी में रहने का ठिकाने का जुगाड़ हो गया तो तसल्ली हुई । समुद्र की तरफ वाले कमरे के यहाँ एक हजार रुपये अतिरिक्त लगे थे। हमें लगा कि जो लोग समुद्र के किनारे रहते हैं वो साल भर में तीन लाख पैसठ हजार तो बचा ही लेते हैं।
इसी तर्ज़ पर कहा जा सकता है कि समुद्र तट के किनारे बसे लोग दूर बसे लोगों के मुक़ाबले अमीर होते हैं।
अपने रहने के इंतजाम के बाद ड्राइवर के लिए जुगाड़ किया गया। होटल में कोई इंतजाम नहीं था। पास ही गाडी रखने और रुकने का इंतजाम बताया ड्राइवर ने। अगले दिन मिलने की कहकर चला गया ड्राइवर।
बालकनी से समुद्र साफ़, एक दम नजदीक दिखता था। लोग किनारे की बेंचो, पत्थरों पर बैठे समुद्र की लहरों को उठते-गिरते , किनारे तक आते , किनारे से टकरा कर लौट जाते देख रहे थे। हमने भी देखा। हमको लगा समुद्र की लहरें उत्साह और उमंग से किनारे की तरफ आती हैं । ऐसे लगता है मानों लहरें किनारे से गहन आलिंगन के लिए व्याकुल होकर भागती चली आ रहीं हैं। लौटते समय वह उत्साह नहीं दिखा लहरों में। ऐसे लौटती दिखीं मानो बेमन से वापस जा रही हों। मिलन और विछोह का अंतर दिखा लहरों के आने -जाने में।
कुछ देर आराम करने के बाद खाना खाने निकले। पास ही स्थित उडुपी होटल बंद हो चुका था। थोड़ा और आगे एक रेस्टोरेंट , जिसका नाम होटल वाली बालिका ने बताया था, खुला था। पहली मंजिल पर मौजूद भोजनालय में लंचार्थियो की भीड़ थी । एक किनारे की मेज पर जगह मिली। बैठकर आर्डर दिया। बालक मोबाइल में आर्डर नोट करके चला गया। जबतक वह वापिस आया , हम अगल-बगल के और सामने मनचले समुद्र के नज़ारे देखते रहे।
आसपास अधिकतर लोग अपने मोबाइल में डूबते-तैरते-उतराते दिखे। बगल वाली टेबल वालों के साथ छोटे बच्चे थे। उन्होंने आते ही मोबाइल में वीडियो लगाकर बच्चे को थमा दिया। बच्चे मोबाइल में और वो लोग अपने में मशगूल हो गए। आने-वाले समय में मोबाइल दादी-नानी की भूमिका निभायेंगे।
खाना खाकर होटल लौटे। कुछ देर आराम फर्माने के बाद घुमने निकले। अधिकतर घूमने की जगहें, जिनका जिक्र इधर-उधर दिखा, आसपास ही , एक-दो किलोमीटर के दायरे में थीं। पैदल ही निकले। समुद्र की लहरों और आते-जाते लोगों को देखते हुए।
सड़कें लोगों, गाडियों और सड़क किनारे ठेलियों से भरी-पूरी थीं। दोनों किनारे गाड़ियों , सामान के ठेलों की लाइन। दूर-दूर तक ऐसा कोई हिस्सा नहीं दिखा सड़क का जिसके दोनों किनारों पर गाड़ियां , ठेले न खड़ी हों। सड़क के बीच में थोड़ी जगह गाड़ियों और लोगों के आने-जाने के लिए भी छोडी गयी थी। इतनी भीड़ के बावजूद कहीं कोई अफरा-तफरी, हल्ला-गुल्ला या हडबडी नहीं दिखी। लगता है सब यहाँ शान्ति के साथ ही आये हैं।
सबसे पहले अरविन्द आश्रम देखने की बात तय हुई। रास्ते में मिलने वाले भारती पार्क , म्यूजियम, रोम्या रैला लाइब्रेरी, आर्ट गैलरी से कहते गए –‘आते अभी लौटकर, कहीं जाना नहीं, इन्तजार करना।‘
अरविन्द आश्रम में अन्दर जाने के पहले जूते-चप्पल बाहर ही उतारने थे। आश्रम के सामने फुटपाथ पर मुफ्त जूते-चप्पल रखने की व्यवस्था थी। एक बुजुर्ग महिला निर्लिप्त जिम्मेदारी वाले भाव से लोगों के जूते रैक में रखकर टोकन देती । लौटने पर टोकन के हिसाब से जूते-चप्पल वापस लौटा देती।
कहीं कोई साम्य नहीं लेकिन वहां जूते-चप्पल रखने की व्यवस्था देखकर मुझे शरीर-आत्मा-यमदूत के सुने किस्से याद आये। क्या पता यमदूत इसी शरीर को आत्मा से अलग करते हुए आत्मा को एक टोकन थमाते हों। अगले जन्म में आत्मा अपने टोकन के हिसाब से शरीर धारण करके नया जीवन शुरु करती हो।
अन्दर आश्रम में फोटो लेना मना था। घुसते समय सबके मोबाइल बंद करा दिए गए। अन्दर लोग अरविंद जी और माँ मीरा की समाधि पास शान्ति से बैठे थे। समाधि पर ताजे फूल सजे हुए थे। कुछ देर वहां बैठने के बाद हम लोग बाहर आ गए।
बाहर आकर हमने अपने जूते -चप्पल वापस लिए और लौट लिए। रास्ते में अरविंदो आश्रम पोस्ट आफिस दिखा । पोस्ट ऑफिस के बाहर सूचना लिखी थी -'यह डाकघर महिला डाक कर्मचारियों द्वारा संचालित है।'
शाम होने के कारण डाकघर बंद हो चुका था। बाहर एक लड़की मोबाइल पर कुछ देख रही थी। वहीं चौराहे के नुक्कड़ पर एक महिला नारियल पानी बेंच रही थी। मन किया नारियल पानी पिया जाए। लेकिन फिर बिना पिये आगे बढ़ गए।
आगे म्यूजियम , लाइब्रेरी और आर्ट गैलरी देखी। म्यूजियम में मूर्तियाँ , सिक्के, कलाकृतियाँ , फर्नीचर, पुराने जमाने के वाहन और तमाम चीजें रखीं थीं। बाहर रखी मूर्तियों के साथ लोग फोटो खिंचा रहे थे। म्यूजियम का टिकट दस रुपये था।
म्यूजियम से बाहर बगल आर्ट गैलरी में कुछ पेंटिंग्स लगी थी। पेंटर के फोटो बाहर लगे थे। अंदर घुसकर पेंटिंग्स देखते हुए एक का फोटो भी ले लिए। गेट पर बैठे आदमी ने टोंका -'डोंट टेक फोटो।' हम थम गये। पेंटिंग्स बिक्री के लिए भी उपलब्ध थीं। हमने दाम नहीं पूछे। देखकर ही लौट आये।
बगल की रोम्यां रैला लाइब्रेरी में लोग लम्बी मेज के दोनों तरफ बैठे अखबार पढ़ रहे थे। ज्यादातर अखबार तमिल के थे। हमने वहां बैठकर फोटो खिंचाया।हमको फोटो खिंचाते देखकर सामने वाले ने हमारी तरफ अंग्रेजी का अखबार सरका दिया। उसको पता लग गया होगा कि अपन तमिल नहीं जानते।
किताबों की तरफ वाले सेक्शन ने नीचे तमिल की ही किताबें थीं। ऊपर गए तो अंग्रेजी और हिंदी के अलावा और भाषाओं की किताबें भी दिखीं। हिंदी की ढेर सारी किताबें थीं। एक किताब नामवर सिंह जी से बातचीत की थी। किताब पलटते हुए जो पन्ना खुला उसमें एक जबाब में नामवर जी ने बताया था कि उनके गुरु हजारी प्रसाद द्विवेदी जी मुक्तिबोध जी की कविता को पसंद नहीं करते थे। उस समय तय किया था कि यह किताब मंगवाएँगे।
लाइब्रेरी से वापस आते हुए वहां मौजूद लोगों से पूछा-'लाइब्रेरी कितनी पुरानी है।' सबने एक दूसरे की तरफ देखा। इधर-उधर देखते हुए एक ने दराज से एक किताबिया निकालकर हमको थमा दी। मतलब इसमें लिखा है लाइब्रेरी के बारे में। पढ़ लो।
पढ़ने पर पता चला कि पांडिचेरी में, जहां करीब तीन शताब्दियों तक फ्रांसीसियों का शासन रहा, लाइब्रेरी मूवमेंट की शुरुआत 1827 में हुई। पब्लिक लाइब्रेरी होने के बावजूद शुरुआत में इसमें केवल यूरोपीय लोगों को आने की अनुमति थी। सन 1850 में यहां किताबों की संख्या 6500 थी। आज की तारीख में करीब 334865 किताबें हैं। करीब 35000 लोग लाइब्रेरी के सदस्य हैं। साल भर में करीब 2 लाख किताबें पढ़ने के लिए इशू की जाती हैं। औसतन करीब एक हजार लोग लाइब्रेरी की सुविधा का उपयोग करते हैं।
1966 में रोम्यां रैला जी की जन्मशताब्दी के मौके पर लाइब्रेरी का नामकरण उनके नाम पर किया गया।
लाइब्रेरी से बाहर निकल कर हम वापस लौटे। शाम को सड़क और गुलजार हो गयी थी। समुद्र किनारे लोग चहलकदमी करते हुए टहल रहे थे। तमाम लोग समुद्र की लहरों को देखते हुए फोटोबाजी कर रहे थे।
अपन भी टहलते हुए एक चट्टान पर बैठ गए और समुद्र और जनसमुद्र दर्शन में जुट गए।

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Wednesday, December 27, 2023

पांडिचेरी की ओर



पिछले दिनों महाबलिपुरम और पांडिचेरी जाना हुआ। पांडिचेरी इसके पहले चालीस साल पहले आये थे। इलाहाबाद से कन्याकुमारी तक साइकिल यात्रा के दौरान अगस्त , 1983 के दूसरे हफ्ते । एक दिन रुके थे। अरविंद आश्रम और समुद्र तट की बहुत धुंधली यादें थीं पिछली यात्रा की।
पिछली बार पांडिचेरी से चेन्नई की तरफ आये थे। इस बार महाबलिपुरम से पांडिचेरी जाना हुआ। पांडिचेरी को पुदुचेरी और कहीं-कहीं पोंडी भी लिखा देखा।
पांडिचेरी में रुकने के लिए होटल बुक नहीं कराया था। सोचा वहीं देखेंगे। चलने के एक दिन पहले आनलाइन बुकिंग की बात सोची तो लोगों ने बताया कि वहां सब होटल भरे हैं। कहीं कोई जगह नहीं है। हमने सोचा कि अब समय आ गया बुकिंग कराने का। यात्राओं में रोमांच लाने का यह भी एक तरीका है कि इंतजाम में देरी की जाए ताकि परेशानी आये और फिर उस परेशानी को हल करने की कोशिश की जाए।
आनलाइन बुकिंग की कोशिश की तो तमाम होटल में जगह दिखी। लगभग हर जगह एक ही कमरा बाकी दिखा रहा था। शायद हमारे लिए ही बचा रखा था। कमरे का किराया हजार-पन्द्रह सौ से लेकर पचीस-तीस हजार तक बताया जा रहा था।
बहरहाल एक कमरा बुक करा लिया । फ्रेंच कालोनी में एक विला था। कमरे के फोटो भी ठीक-ठीक ही दिख रहे थे। बुकिंग के कोई पैसे एडवांस में नहीं देने पड़े थे । सोचा अगर अच्छा नहीं होगा तो दूसरा खोजेंगे होटल।
महाबलीपुरम से पांडिचेरी की दूसरी लगभग 95 किलोमीटर है। कानपुर से लखनऊ की दूरी के बराबर। बढ़िया सड़क। सड़क के दोनों तरफ आबादी, गाँव , खेत । सबको देखते हुए पांडिचेरी की तरफ बढे। सड़क किनारे दीवारों पर इश्तहार। ज्यादातर तमिल में। कहीं-कहीं अंग्रेज़ी भी दिख जाती।
रास्ते में एक जगह चाय पी गयी। काउंटर पर मौजूद महिला तमिल ही जानती थी। लेकिन चाय लेने और पैसे देने में कोई अड़चन नहीं आई। पैसे की भाषा सबकी सबको फ़ौरन समझ में आ जाती है। दस रुपये की एक चाय । भुगतान गूगल पे से किया। आजकल पूरे देश में आनलाइन भुगतान की व्यवस्था हो गयी है।
पांडिचेरी पहुंचकर ठहरने की जगह गए। एक घर को होटल में बदल दिया गया था । अँधेरे कमरे । फ़ोटो में जितना अच्छा दिख रहा था होटल , उतना अच्छा दिखा नहीं। पास में स्थित मछली बाजार से ‘मछली गंध’ की मुफ्त व्यवस्था। मन नहीं हुआ रुकने का। दूसरा होटल खोजने निकले।
जिस भी होटल में पता किया वो भरा मिला। लोगों ने बताया कि महीनो पहले से बुकिंग कराते हैं लोग। कोई होटल खाली नहीं मिलेगा।
आसपास तमाम होटल देखने के बाद भी कहीं जगह नहीं मिली। तय किया कि जो बुक किया था उसी में रुक जाते हैं। रात को सोना ही तो है। एक दिन की बात । वापस चल दिए होटल की तरफ। उसको फोन भी कर दिए। आ रहे हैं रुकने के लिए।
लेकिन होटल की तरफ चलते हुए उसके कमरे के हाल याद आये। रुकने का मन नहीं किया। एक बार यह भी सोचा कि शाम तक घूमकर वापस लौट जायें पांडिचेरी से।
एक बार फिर होटल-होटल पूछते फिर। आनलाइन खोजा। एक होटल दिखा। हमने बुक करके पूछा तो बताया गया आ जाओ। खाली है। होटल वाले ने लोकेशन भी भेज दी। हम चल दिए।
होटल की तरफ चलते हुए उसी नाम का एक और होटल दिखा होटल वाले ने लोकेशन भी भेज दी।
होटल की तरफ जाते हुए उसी नाम का एक और होटल दिखा। हम लपके होटल वाले बताया कि एक कमरा खाली है। दाम एक हजार ज्यादा बताये। हमने पूछा इसी नाम का तुम्हारा और होटल भी है ? तो उसने बताया हाँ है ! हमने कहा आते उसको देखकर । उसने कहा- ठीक।
होटल के रास्ते में हमको यही लगता रहा कि कहीं वहां पहुँचने के पहले कमरा उठ न जाए इसलिए हम उससे बतियाते रहे। होटल पहुंचकर तसल्ली हुई कि कमरा अभी उठा नहीं था। काउंटर पर तीन लड़कियाँ थीं। उनमें से दो बाहर से यहाँ काम करने आईं थी। हर सवाल के जबाब फुर्ती से मुस्कराते हुए ' मुझे पता नहीं' कह रहीं थीं। तीसरी लड़की ने लडके को कमरा दिखाने के लिए भेजते हुए बताया -'सी फेसिंग रूम थाउजेंड एक्स्ट्रा।' कुल किराया 7499 रुपये । मतलब दिल्ली या किसी और शहर के फाइव स्टार होटल के एक कमरे के किराए के बराबर !
आखीर में जिस कमरे में सामान रखा गया समुद्र वहां से कुल जमा बीस-तीस मीटर दूर था। समुद्र की लहरें इठलाते हुए हमारा स्वागत कर रहीं थी।
इस बीच उस होटल से फोन भी आ रहा था जिसकी बुकिंग हमने महाबलीपुरम से कराई थी और जहाँ हम आने के लिए कह आये थे। जब हमने उसको बताया कि हम दूसरी जगह रुक गए हैं तो उसने कहा -'आप आनलाइन बुकिंग कैंसल कर दें।' हमने उसकी आज्ञा का पालन किया और कुछ देर में पांडिचेरी दर्शन के लिए निकल लिए।

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Tuesday, November 14, 2023

39 साल पुराना शुभकामना पत्र



दीवाली के मौक़े पर सैकड़ों मित्रों की शुभकामनाएँ मिली। हमने भी भेजीं। कुछेक मित्रों को छोड़कर लगभग सभी ने डिज़ाइनर ग्रीटिंग कार्ड भेजे। एक से एक खूबसूरत चित्र और मनभावन संदेश। कुछ के संदेश बाद में भी मिले। भूल हुए होंगे देना पहले।
हम भी भूल गये होंगे कुछ मित्रों को शुभकामनाएँ देना। ऐसे सभी मित्रों को फिर से दीपावली की शुभकामनाएँ। जिनको लगता है दीपावली तो तो बीत गई उनको बता दें कि हमारी दीवाली नीरज जी वाली है जिसमें वो लिखते हैं :
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,
ऊषा जा न पाए, निशा आ ना पाए
अब अंधेरे के पास कोई जीपीएस तो है नहीं न गूगल मैप जो अंधेरी गली से निकल कर रास्ता खोज लेगा।
ग्रीटिंग कार्ड की बात इसलिए कि आज हमारे कॉलेज के सीनियर Anil Srivastava जी ने दीवाली के मौक़े पर मेरे द्वारा उनको भेजा गये ग्रीटिंग कार्ड की फ़ोटो भेजी। पोस्टकार्ड पर बना हुआ ग्रीटिंग कार्ड। शायद स्केच पेन से बनाया था। दिये का स्केच और साथ में फ़्रॉस्ट की प्रसिद्ध कविता पंक्ति :
Woods are lovely dark and deep
But I have promises to keep
And miles to go before I sleep
And miles to go before I sleep.
ये कविता पंक्तियाँ नेहरू जी की पसंदीदा थीं। (संयोग से आज नेहरू जी का जन्मदिन भी है)हमने उस समय क्यों लिखा था याद नहीं। शायद अनिल सर को या ख़ुद की हौसला आफ़ज़ाई के लिए।
यह बात 1984 की दीवाली की है। हम बीई फ़ाइनल ईयर में थे। अनिल सर एमई कर रहे थे। उनके साथ के तमाम दोस्त किसी न किसी नौकरी में जा चुके थे। वे अकेले रह गये थे। पहली बार हम लोग एक ही विंग में रहने के कारण संपर्क में आये थे। देर देर तक बातें -मुलाक़ातें होती थीं। उस समय के साथ के हुबहू बयान करना मुश्किल है। लेकिन आज 39 साल पहले का यह कार्ड देखकर अनगिनत यादों के दरीचे खुल गये। कार्ड देखते ही फ़ौरन फ़ोन मिलाया अनिल सर को तमाम नई पुरानी यादें ताज़ा हुईं।
ग्रीटिंग कार्ड देखकर याद आया किं पहले अपने मित्रों को पत्र लिखने का बहुत शौक़ था मुझे। लंबे-लंबे पत्र लिखते थे। लोग भी जबाब लिखते थे। आज भी मन करता है कभी मित्रों को पत्र लिखें। लेकिन अब शायद पोस्ट कार्ड का चलन भी बंद हो गया।
मित्रों के पतों की जगह उनके फ़ोन नंबरों ने ले ली है।
39 साल पहले भेजा यह ग्रीटिंग कार्ड देखकर लगा कि दो दिन पहले भेजी गई और पाई गई शुभकामनाएँ जो ह्वाट्सऐप या अन्य माध्यमों से आईं -गई वो क्या चालीस साल बाद इसी तरह सुरक्षित रह सकेंगी जैसे यह कार्ड में भेजी शुभकामनाएँ। क्या पता तब तक व्हाटसप और सोशल मीडिया के रूप इतने बदल जायें कि संदेश खोजे न मिलें। पढ़े न जायें।
आगे की बात आगे की देखी जाएगी अभी तो तय किया है कि मित्रों को कभी -कभी पत्र लिखने का सिलसिला फिर से शुरू किया जाये। देखते हैं अमल में कितना आता है। क्या आपको भी पत्र लिखना अच्छा लगता है?

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Friday, November 10, 2023

सोशल मीडिया की रीच

 




अक्सर मित्र लोग अपनी पोस्ट की रीच कम हो जाने की बात करते हैं। इसके लिए सोशल मीडिया को कोसते हैं। चिंता व्यक्त करते हैं कि पाठक कम हो गए, टिप्पणी नहीं आती, लाइक नहीं मिल रहे।
सहज भाव है यह। पाठक कम होना, टिप्पणी कम मिलना, लाइक कम होना सोशल मीडिया में नियमित लिखने वालों को और कभी-कभी भी लिखने वालों को खराब लगता है।
जहां तक रीच कम होने की बात है तो हमको लगता है कि सोशल मीडिया इसका प्रयोग करने वालों के लिए सोशल है। इसको चलाने वालों के लिए यह कमाई का साधन है। कमाई बढाने के लिए तरह-तरह के जुगाड़ अपनाता है मीडिया। उसको इस बात से मतलब नहीं कि आपकी पोस्ट कितनी अच्छी है, कितनी समाजोपयोगी है। जिस भी तरह की पोस्टों से देखने वाले बढ़ेंगे उनको बढ़ावा देगा।
फेसबुक पर ही पहले मित्रों की तमाम पोस्टें एक के बाद एक दिखती थीं। अब उनकी जगह स्पॉन्सर्ड पोस्ट, विज्ञापन दिखते हैं। सजेस्टेड पोस्ट दिखती हैं। स्पॉन्सर्ड पोस्ट और विज्ञापन से पैसा मिलता है। सजेस्टेड पोस्ट खाता धारक की रुचि पर आधारित होती हैं।
फेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया के हाल अब अखबार सरीखे हो गए हैं जिनमें कभी पहले पेज की शुरुआत प्रमुख खबरों से होती थी। उनकी जगह अब पहले, दूसरे, तीसरे पेज तक भी खबरों की हिम्मत नहीं होती जो छप जाएं। पूरे-पूरे पेज विज्ञापनों से भरे हैं। हर जगह बाजार का हल्ला है, समाचार चुपचाप कहीं अंदर छिपा है। बाजार ही आजकल प्रमुख समाचार है।
तो मुझे तो यही लगता है कि हमारी पोस्ट कम पढ़ी जा रही है तो इसका कारण पैसा कमाऊ पोस्टों का हमसे पहले पेश किया जाना है। यही सोशल मीडिया संचालकों के लिए फायदे का आधार है।
कुछ मित्रों का मानना है कि पोस्ट्स को मित्रों को टैग करना इससे मुकाबले का उपाय है। सही है। सौ-पचास मित्रों को टैग करेंगे तो वो हमारी पोस्ट फौरन देख लेंगे। शर्मा-शर्मी टिपिया भी देंगे। लेकिन वह सब मुंह देखी बात होगी।
अपनी हर पोस्ट को टैग करके पढ़वाने की कोशिश ऐसी ही लगती है मुझे मानो किसी ट्रेन को पकड़ने के लिए लपकते इंसान का कुर्ता घसीटकर हम कहें -'ये कविता अभी-कभी लिखे हैं। जरा सुनकर तारीफ तो करिए जरा। ट्रेन फिर पकड़ लीजिएगा।'
मुझे लगता है कि अगर लोग हमारी लिखाई पसंद करते हैं तो वो देर-सबेर पढ़ेंगे ही। अपने दोस्तों को टैग करना मतलब उनका ध्यान जबरियन अपनी तरफ खींचना। यह जबर्दस्ती का मसला कवि सम्मलेन/मुशायरों में कवियों/शायरों की उस अदा की तरह है जिसमें लोग जबरियन श्रोताओं से तवज्जो चाहते हैं, ताली लूटते हैं।
हम अपने जिन मित्रों का लिखा पढ़ना पसंद करते हैं उनको खोज कर पढ़ते हैं। छूट जाता है तो बाद में पढ़ते हैं। कुछ बहुत अच्छा पढ़ने में देर होती है तो अफसोस भी करते हैं कि देर हो गई पढ़ने में।
टिप्पणी/लाइक कम होने का कारण यह भी है कि आजकल नेट पर चमक-दमक और उलझावों का सैलाब आया है। यह दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है। रील है, स्टोरी है, फ़ारवर्डेड सन्देश हैं, गुडमार्निंग है, सुप्रभात है। नित नए बनते ग्रुप हैं। आप अच्छे भले बैठे हैं, पता लगा आपको किसी ग्रुप में शामिल कर लिया गया। आप देओ हाज़िरी दिन रात।
लोगों के पास समय की कमी बहुत बड़ा कारण है टिप्पणी, लाइक कम होने का। अपन दिन भर ऑनलाइन भले रहते हों लेकिन लिखने-पढ़ने के लिए हद से हद घण्टे-दो घण्टे मिल पाते हैं। इतने में कुछ ही मित्रों का लिखा पढ़ पाते हैं। बहुत कम पर टिप्पणी कर पाते हैं। टिप्पणी के जबाब तो और भी कम , देना चाहते हुए हुए भी , बहुत कम दे पाते हैं। लाइक अलबत्ता जरूर कर देते हैं दिल वाले निशान के साथ। लाइक।किया मतलब पढ़ लिया।
कहने का मतलब यह कि अपन ऐसा सोचते हैं कि यह मुफ्त की सुविधा है। यह सुविधा कैसी मिलेगी, कितनी मिलेगी यह देने वाले की मर्जी और फायदे से तय होगी। एक बहुत बड़े बाजार में मुफ्त की ठेलिया लगाने का मौका मिलने जैसी बात है(फिलहाल यही सूझ रहा) यह अभिव्यक्ति की सुविधा। इससे यह आशा रखना कि यह हमें मुफ्त में प्रोत्साहित करेगा, खाम ख्याली होगी।
इसलिए मेरा तो यही मानना है कि लिखते-पढ़ते रहें। पढ़ने लायक लिखेंगे तो पाठक जरूर आएंगे। पढ़ेंगे भी देर सबेर।
बहुत ज्यादा तारीफ और लाइक मिलने से यह गलतफहमी भी हो सकती है कि अपन बहुत अच्छे लेखक हैं। इस गलतफहमी बचना बहुत जरूरी है।
यह हमने अपने समझाने के लिए लिखा। हो सकता है आप इससे अलग सोचते हों।

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Tuesday, November 07, 2023

सपने में सैर और किताबों में दीमक



आजकल घूमना-फिरना स्थगित है। सुबह सोचते हैं शाम को निकलेंगे, शाम को बात सुबह पर टल जाती है। बहाने ठोस और तार्किक रहते हैं तो ज्यादा अफसोस नहीं होता। लेकिन लगता तो है कि निठल्ले हो गए एकदम। जाहिल भी लिख देते लेकिन मन नहीं किया। छोड़ दिया।
तर्क ऐसा जुगाड़ है जिससे इंसान अपना बड़ा से बड़ा अपराध सही ठहरा लेता है। लाखों लोगों की हत्याओं को सही ठहराकर चैन से रह लेता है।
जो काम जगते में नहीं किया वो कल सोते में हुआ। सपने में देखा कि कहीं घूमने निकले हैं। पैदल। थक गए तो किसी सवारी की खोज करने लगे। मिली नहीं। चलते रहे। फिर कोई स्कूटर वाला दिखा। उससे लिफ्ट मांगी। कहा -'जहां तक जा रहे हो छोड़ देना।'
स्कूटर की पीछे सीट पर बैठ गए। वो अपने घर ले गया। बोला -'चाय पीकर जाओ।' हम थोड़ी देर रुके लेकिन चाय पी नहीं। चले आये। फिर इधर-उधर टहलते हुए घर आ गए। रास्ते में क्रासिंग भी मिली। बंद थी। कुछ देर बाद खुली। क्रासिंग खुलने पर लोग ऐसे भागे जैसे किसी बक्से में रखी किताबों में लगी हुई दीमक किताबें खोलने पर बिलबिला कर भागती हैं।
किताब में दीमक वाली बात मतलब बिम्ब आने का कारण यह रहा कि परसों देखा कि बक्से में रखी कई किताबों पर दीमकों ने हमला बोल दिया। गत्ते का बक्सा चाट गईं। फिर किताबें भी। कोई किताब आधी, कोई चौथाई। किसी किताब में बस घुसी ही थी लेकिन उनको खाना शुरू नहीं किया था। कुछ किताबों में तो घुसीं भी लेकिन शायद उनको खाने की हिम्मत नहीं हुई।
इससे कहा जा सकता है कि कुछ किताबें इतनी गरिष्ठ या अपठनीय होती हैं कि उनको दीमक तक नहीं खाती। यह भी हो सकता है कि कुछ दीमकें पढ़ी लिखी होती हों और वे किताबों को पढ़कर ही खाती हों। अपठनीय किताबों को छोड़ देती हों।
बहरहाल किताबों को अब धूप दिखा रहे हैं। जितनी बची हैं कोशिश कर रहे हैं उससे ज्यादा न खराब हों। इन किताबों में कुछ मित्रों द्वारा भेंट की हुई किताबें भी थीं। उनकी खुद की लिखी हुई। कुछ तो इतनी जर्जर हो गईं थीं कि उनको जलाना पड़ा। अफसोस और सुकून दोनों एक साथ हुए। अफसोस किताब जलने का, सुकून उनसे मुक्त होने का।
इतना लिखने के बाद सोच रहे हैं कि सपने में स्कूटर पर लिफ्ट देने वाले को धन्यवाद बोलना भूल ही गए थे, चाय के लिए मना करने पर उसकी घरैतिन को कैसा लगा होगा, दीमक के बारे में लिखने से वो बुरा तो नहीं मानेंगी।
पोस्ट के साथ दीमक़ खाई किताबों की फोटो लगाने के लिए फोटो खींचा था लेकिन लगाया नहीं। यह सोचकर कि दीमक़ बिना कपड़े पहने किताब पर सन बाथ टाइप ले रही है, उसकी फोटो लेकर फेसबुक पर पोस्ट करना उनकी निजता का उल्लंघन होगा।
अलबत्ता जूतों के फ़ोटो लगा रहे हैं । यह भी सोच रहे हैं कि सपने में कौन से जूते पहनकर गये थे। आप कुछ अंदाज़ा लगाकर बताएँ।

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