Monday, February 10, 2014

ओस की बूंदें सूरज भाई के छूने से खिलखिलाने लगीं

आज ‪#‎सूरज‬ भाई जरा और आराम से दिखे। हमने उलाहना दिया तो हंसने लगे। बोले यहां की बात अलग है यार ! वहां जबलपुर में तो धड़ल्ले से कमरें में घुस आते हैं। यहां घर है। सब तरफ़ से बन्द। फ़िर बरामदा भी। अन्दर कैसे आते? खिड़की से इशारा कर रहे थे लेकिन तुम अलसाये पड़े रहे। खैर आओ तुमको आज बगीचे का नजारा दिखाते हैं। इसके बाद तो सूरज भाई हमको हमारे ही बगीचे में गाईड सरीखा घुमाते रहे। बोले देखो- ये फ़ूल ऐसा नहीं लग कि एकदम कि रोशनी के एंटीना सरीखे खड़े हैं। सब रोशनी पहले ये रिसीव करेंगे फ़िर दुनिया भर में ट्रांसमिट करेंगे। घास पर चमकती ओस की बूंदों को छूकर बताते हुये बोले- पुराने जमाने में और आजकल नये-नये कविता लिखने वाले कवि लोग इनको तुहिन कण कहते हैं। ओस की बूंदें सूरज भाई के छूने से खिलखिलाने लगीं। इंद्रधनुष सा बन गया कईयों पर। फ़ूल, पौधे, पत्तियां, घास सब हिल-हिलकर सूरज भाई के स्वागत में मुस्कराने लगे। सूरज भाई यह सब देखकर डबल मुस्करा रहे थे। गजब जलवा है अगले का यार।

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