Wednesday, April 23, 2014

आसमान अपने को शायद बड़ा पवित्र समझता है



  

दिल्ली से कलकत्ता के लिए जैसे ही जहाज में बैठे तो देखा सूरज भाई बाहर चमक रहे थे। हमने कहा-बोले साथ चलेगे। हमने कहा अन्दर आ जाओ भाई! वो बोले -टिकट नहीं लिया! और फिर काहे को पैसा फूंकना? इसी जहाज की छत पर लद के चलेंगे। फ्री फंड में।

देखते-देखते जहाज उड़ा और उचक कर शहर के बाहर हो लिया। नीचे सड़क,मकान,मैदान सब छोटे होते चले गए।

ऊपर पहुंचते समय सूरज की रोशनी कम साफ़ दिखाई दी। हम पूछे -यार सुरज भाई तुम हमको नीचे तो एकदम चमकदार रौशनी भेजते हो। लेकिन यहाँ मटमैली धुप कैसे? वो बोले-ऊपर उठने में सब जगह गंदगी होती है भाई! हमें लगा वे फिलासफी वाले मूड में हैं तो हम चुप मार गए।

ऊपर से जमीन ऐसे दिख रही थी जैसे कोई बहुत बड़ा कैनवास पसरा है जमीन पर और उस पर कोई नौसिखुआ कलाकार चित्रकारी करता जा रहा हो। तरह-तरह के रंग की कलाकारी ! धूसर,मटमैले,हरे,नीले रंग की आकृतियाँ। कहीं-कहीं तो रंग मिला दिए ताकि नया रंग दिख सके।

धूसर मटमैले कैनवास के ऊपर नीला आसमान तना हुआ है। आसमान अपने को शायद बड़ा पवित्र समझता है सो उसने कैनवास और अपने बीच एक मोटी सफ़ेद पट्टी सरीखी खींच रखी है। जैसे वो कलाकार से कह रहा हो-" ये हमारे तुम्हारे बीच की लक्षमण रेखा है। इसे पार किया तो तुमको भी नीला कर देंगे।"

लेकिन धीरे-धीरे धरती का कैनवास बढ़ता जा रहा है।आसमान के नीले रंग को धकियाकर पीछे करता जा रहा है। देखते-देखते दोनों रंग एक दुसरे में घुल-मिल गए जैसे चुनाव के समय एक दुसरे की धुर विरोधी विचार धारा वाले गठबंधन बना लेते हैं।

देखते-देखते कोलकाता पहुंच गए अपन। नीचे के पेड़ पौधे मकान साफ नजर आने लगे। आयताकार खेत मैदान ऐसे दिख रहे थे कि उनका क्षेत्रफल निकालने का मन किया। लेकिन कुछ करते इसके पहले ही जहाज धड से हवाईपट्टी पर उतर गया। परिचारिका कलकाता के नेताजी सुभाष चन्द्र एयरपोर्ट पर स्वागत करते हुए सामान समेटने को कह रही है।

सामान समेट के उतरे तो सूरज भाई लपककर गले मिले और बोले -कोलकाता में स्वागत है।कोलकाता में चमकीली धूप पसरी थी। सुबह की।



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