Monday, September 19, 2016

दिलीप घोष से मुलाकात

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आज इतवार की छुट्टी थी। दिलीप घोष जी को फ़ोन किया यह पता करने के लिये कि उनका बाहर जाने का कोई कार्यक्रम तो नहीं है। आज मौसम कुछ गड़बड़ाया हुआ था सो उनका मेडिकल कालेज जाना स्थगित हो गया था। हम उनको बताकर फ़टफ़टिया स्टार्ट करके निकल लिये।

घर के बाहर निकलते ही देखा कि एक दस-बारह साल का बच्चा साइकिल के कैरियर बैठा साइकिल चला रहा था और उसकी गद्दी पर एक छोटे दो-तीन साल के बच्चे को बैठाये चला रहा था- एक संरक्षक की तरह। आवास विकास गेट से बाहर निकलकर नहरिया के किनारे-किनारे होते हुये स्वराज आश्रम पहुंच गये।
आश्रम के बाहर ही एक महिला बाहर पड़ी सीमेन्ट की बेंच के नीचे लेटी - ’दे दे, अल्लाह के नाम पर दे दे’ का आवाज लगाती हुई बोले चले जा रही थी। पता चला कि वह मुस्लिम महिला शहर में कहीं भीख मांगती थी। उसको शहर के अधिकारी यहां छोड़ गये थे। मांगने की आदत ऐसी हो गयी है कि खाना खाने के तुरन्त बाद भी खाने को मांगती रहती है। आश्रम में भी दिन भर बाहर मांगने की आवाज लगाती रहती है। फ़िर शाम को अंदर आकर सो जाती है।
वृद्धाश्रम में कई लोगों से मिले लेकिन पहले दिलीप घोष जी के बारे में। पिछली बार जब गये थे मोबाइल की बैटरी खल्लास हो गयी थी। इसलिये फ़ोटो नहीं ले पाये थे। इस बार बैटरी पूरी लबालब करके ले गये थे। दिलीप घोष जी से खूब बातें हुई। कई फ़ोटो भी लिये उनके। एक वीडियो भी बनाया। उसको भी दिखायेंगे आपको।
मैंने सबसे पहले घोष जी को उनके मित्र दुलाल कृष्ण चटर्जी (https://www.facebook.com/profile.php…) के बारे में जानकारी दी। दो दिन पहले दुलाल कृष्ण चटर्जी जी ने मेरी पोस्ट में लिखा था:
"बहुत अच्छा लगा। दिलीप घोष के बारे में बताइए। वह मेरा क्लासमेट रह चुका है। उड़ती उड़ती खबर मिली थी कि वह किसी वृद्धाश्रम में है। आपके पोस्ट से कन्फर्म हुआ। दिलीप घोष के बारे में जानने के लिए बहुत उत्सुक हूँ। आपके पास कोई खबर हो तो बताएं।"
घोष जी ने बताया कि दुलाल उनके बचपन का मित्र है। दुलाल जी आर्डनेन्स फ़ैक्ट्री, अम्बाझरी से रिटायर्ड हैं। उनका नम्बर मांगा है, उनको घोष जी का नम्बर दे दिया है। आशा है जल्दी ही दोनों मित्रों में बात होगी।
आज जाने से पहले बता दिया था सो घोष जी हमारा इन्तजार कर रहे थे। फ़ोन पर किसी से प्रायिकता (probalibilty) के बारे में कुछ बता रहे थे। कुछ देर बात होने के बाद फ़िर हमसे गुफ़्तगू हुई और खूब हुई। और कोई किस्सा सुनाने से पहले आइये आपको उनके बारे में कुछ बता दिया जाये।
8 जून, 1949 को कानपुर में जन्मे घोष जी की बचपन की पढाई एक बंगाली स्कूल में हुई। बीएससी की एक फ़ोटो दिखाई उन्होंने। क्राइस्टचर्च कालेज से सन 1962-63 की वह फ़ोटो पीरोड स्थित प्रसिद्ध फ़ोटोग्राफ़र कपूर स्टूडियो वालों ने खींची थी। अभी भी वह दुकान पीरोड पर है।
बीएससी के बाद एम.एस.सी. किये और फ़िर आई.आई.टी से पी.एच.डी. करते हुये क्राइस्टचर्च कालेज में पढ़ाने भी लगे। 19 साल की उमर में पढ़ाना शुरु किया। सबसे युवा अध्यापक थे। मेडिसिनल केमेस्ट्री में पीएचडी करने के बाद अमेरिका चले गये घोष जी। 20 साल वहां रहे। फ़िर लंदन चले गये। वहां पीएचडी करने के बाद दस साल अंग्रेजी पढाया। फ़िर फ़्रांस चले गये। पेरिस में पांच साल एटामिक इनर्जी की फ़ील्ड में काम करने के बाद भारत चले आये। आई.आई.टी. में 12 साल पढाया और अब रिटायर होकर यहां वृद्धाश्रम में आ गये।
हमारे मित्र Gaurav Srivastava ने जानना चाहा कि आज जब लोग अमेरिका जाने के लिये परेशान रहते हैं तो घोष जी वहां बीस साल रहने के बाद लौट क्यों आये? यह सवाल जब मैंने घोष जी पूछा तो उन्होंने कहा -’हमको अमेरिका पसंद नहीं आया। वहां का खाना नहीं अच्छा लगा। अमेरिका में जब तक आप काम लायक तब तक आप GOD हैं जैसे ही आपकी यूटिलिटी कम हुई आप DOG हो जाते हैं।’
हमने पूछा आपके जीवन का सबसे अच्छा समय कौन सा बीता ? उन्होंने बताया - ’एक तो क्राइस्टचर्च कालेज में पढाई का समय। उसके बाद लंदन में बिताया समय। ये सबसे अच्छे समय रहे हमारे जीवन के।’
”वृद्धाश्रम में कैसे रहने आये?’ इस सवाल के जबाब में घोष जी ने बताया कि वे रिटायरमेन्ट के बाद स्वरूप नगर में एक बिल्डिंग के दसवें माले में रहते थे। वहां एक बुजुर्ग की मौत हुई तो तीन दिन बाद जब लाश सड़ने लगी तब लगा कि वहां रहे तो मर जायेंगे और किसी को पता भी नहीं चलेगा। उसके बाद यहां चले आये। यहां रहते हुये चार साल हो गये। माताजी (आश्रम की संचालिका मधु भाटिया जी) हमेशा ख्याल रखती हैं।
हमसे बतियाते हुये घोष जी को लगातार हिचकी सी आ रही थीं। बताया कि उनको गैस की समस्या है। उनको कोई भी ऐसी चीज खाने की मनाही है जिससे गैस बनती हो। चाय के भयंकर शौकीन लेकिन गैस के चलते चाय मना है। मेडिकल कालेज भी जब पढाने जाते हैं तो वहां के प्रोफ़ेसर भी चाय पर पाबंदी लगाये हुये हैं। बीच-बीच में पास में रखे जग से पानी पीते हुये, हिचकी और गैस पर नियंत्रण की कोशिश करते हुये घोष जी और हम बतियाते रहे।
हमको दिखाने के लिये घोष जी ने कई फ़ोटो निकालकर रखे थे। एक में छुटके बच्चा, दूसरे में पहली पीएचडी का फ़ोटो. तीसरी में तीन दोस्तों का फ़ोटो और क्राइस्टचर्च कालेज का एक ग्रुप फ़ोटोग्राफ़। तीन दोस्तों वाला जो फ़ोटो था उसमें से एक के बारे में बताया -’ ये आलोक डे है। आज इंडिया में स्टेटिस्टिक (सांख्यकी) की फ़ील्ड में सबसे बड़ा नाम है। हम लोग साथ में पढ़ते थे। देश-विदेश ऐसे आता-जाता रहता है जैसे हम लोग एक कमरे से दूसरे में जाते हैं।’ आलोक डे के बारे में आगे बताने के पहले घोष जी ने स्टेटिस्टिक्स के बारे में मजेदार अंदाज में बताया -’दुनिया में तीन झूठ में से सबसे बड़ा झूठ स्टेटिस्टिक्स होता है।’ मजे लेने के बाद यह भी बताया कि स्टेटिस्टिक्स के निष्कर्ष इस बात पर निर्भर करते है कि जिन आंकडों के आधार पर कोई निष्कर्ष निकाला जा रहा है वे आंकड़े कितनी ईमानदारी से इकट्ठा किये गये हैं।
आलोक डे के बारे में बताया कि इसके हाईस्कूल में गणित में 100 में 28 अंक आये थे। पांच अंक का ग्रेस लेकर पास हुआ था यह। उसके बाद ऐसा लगन से पढाई किया कि आज इंडिया का टाप स्टेटिस्टीसियन है।
हमने फ़िर उनसे उनके जीवन में आई महिलाओं की चर्चा की। पूछा कि जीवन में कोई तो ऐसी रही होगी जिसका साथ अभी तक याद आता होगा। बताया -’ कालेज में एक लड़की थी। बहुत खूबसूरत। मोहनी साहिनी नाम था उसका। उससे हमारी बहुत अच्छी दोस्ती थी। खूबसूरत इतनी थी कि प्रोफ़ेसर लोग बहाने से उसको छू्ने की कोशिश करते। बाद में जब वह चली गयी । शादी हो गयी उसकी।’
’फ़िर बाद में कभी मुलाकात हुई उससे’- मैंने पूछा। बोले -" हां। हम एक दिन दिल्ली में थे तो कालेज के समय के एक दोस्त ने बुलाया और एक लेडी से मिलवाया। मोटी , उड़े हुये बाल गंजे सर वाली महिला को कि तरफ़ इशारा करते हुये पूछा -इनको पहचाने ? हमने कहा नहीं? फ़िर उसने महिला से पूछा - तुम इसको पहचानी? वो बोली - हां , ये दिलीप घोष है। फ़िर हमसे बोला- अबे साले बंगाली ये वही मोनिका साहनी है जिसके साथ बैठने के लिये तुम कुर्सी साझा करते थे।"
एक और बंगाली महिला का जिक्र भी किया बताया-" वह बहुत खूबसूरत थी और दिमाग भी बहुत अच्छा था। घर वाले भी एक-दूसरे को जानते थे। शादी की भी बात चली लेकिन हुई नहीं। हमने ही मना कर दिया। क्योंकि वह बहुत घमंडी थी। हमने कहा -इससे हमारी पटेगी नहीं। बाद में उसकी शादी हो गयी। अभी वह कोलकता में रहती है कहीं। अपने बच्चों और पति के साथ।"
घोष जी परिवार में चाचा और चचेरी भाई , बहन हैं। कलकत्ता में वर्धमान में 50 एकड पैतृक जमीन है। जमीन का बंटवारा होना है। चाचा लोग कहते हैं कि सारी जमीन बाढ में बह गयी। लेकिन पड़ोस का आदमी बताता है कि उस जमीन पर 8000 क्विंटल धान पैदा हुआ है। जमीन के बंटबारे की कोशिश में लगे हैं घोष जी। बंंटवारा हो गया तो अपने हिस्से की जमीन बेंचकर यहां कानपुर में जमीन खरीदकर इंजीनियरिंग कालेज खोलने की बात कर रहे थे घोष जी।
बताया कि उनके कई रिश्तेदार मुंबई में रहते हैं। बुलाते हैं इनको। कहते हैं यहां आ जाओ। लोगों को इंगलिश पढ़ाना और मजे से रहना। लेकिन घोष जी को मुंबई का मौसम पसंद नहीं है। बोले-" दिन भर पसीना बहता रहता है वहां ह्यूमिडी के चलते। हमको पसंद नहीं है। यहां देखिये अभी कितना अच्छा मौसम है। मुंबई में होते तो पसीना बहा रहे होते।"
मुंबई के ही मुलुंड इलाके के एक बैंक लाकर में घोष जी की सारी डिग्रियां रखी हैं। बोले - ’हमने बैंक को लिखित निर्देश दे रखे हैं कि हमारे मरने की खबर पाने पर मेरी डिग्रियां जला दी जायें।" हमने कहा -’क्यों जला क्यों देंगे।’ बोले -’ और क्या करना मरने के बाद डिग्रियों का? लड़के लोग डिग्री में रखकर समोसा खायें इससे अच्छा तो जला दी जायें।
इस बीच लंच का समय हो गया। हमने घोष जी से कहा-’ आप खाना खा लीजिये।’ बोले - ’मैं इतवार, मंगलवार और वृहस्पतिवार खाना नहीं खाता।’ इतवार और मंगलवार भले ही कुछ जूस, फ़ल पी खा लूं लेकिन वृहस्पतिवार को किसी भी तरह नहीं खाता। मेरी मां को वृहस्पतिवार के ही दिन खाना खाते समय दिल का दौरा पड़ा था और वह कौर मुंह तक ले जाने के पहले ही दिल के दौरे से बेहोश हो गयी और मर गयी। इसलिये हम वृहस्पतिवार को बिलकुल खाना नहीं खाते।
फ़ल के बारे में भी एकदम चूजी हैं घोष जी। केवल चार फ़ल खाते हैं - आम, लीची, संतरा और अनानास। इसके अलावा और कोई फ़ल खाना पसंद नहीं करते।
घोष जी के पास बहुत पुराना लोहालाट घराने का नोकिया का मोबाइल है। उसमें बैलेन्स उनके स्टुडेंट डलाते रहते हैं। छात्र जो कि इंजीनियर हैं, डाक्टर हैं और चार्टेड एकाउंटेंट हैं। स्मार्टफ़ोन के बारे में उनका कहना है- ’ ये घिसने वाले वाले मोबाइल हमको पसंद नहीं हैं।’ नोकिया के 220 माडल के बारे में किसी ने बताया है उनको कि वो उनको पसंद आ जायेगा।
हमने उनसे पूछा -अब जीवन के इस पड़ाव पर आकर जीवन को किस तरह देखते हैं- बोले -’आई फ़ील दैट आई हैव बीन चीटेट इन माई लाइफ़। मुझे लोगों ने धोखा दिया। मैंने लोगों पर भरोसा करके लोगों के लिये बहुत कुछ किया लेकिन लोगों से मुझे हमेशा धोखा मिला।’
हमने पूछा -आपने शेक्सपियर को बहुत पढा है। शेक्सपियर के किस पात्र से अपने को कोरिलेट (संबंद्ध ) कर पाते हैं। एक मिनट सोचने के बाद बोले- ’ मैं अपने को किंग लेयर से रिलेट करता हूं। जिस तरह किंग लेयर को उसके साथ वाले लोगों ने परेशान किया उसी तरह का हाल मेरा भी रहा।’
घोष जी से बात करते हुये और बाद में भी मैं सोचता रहा कि जीवन कितना बहुरंगी होता है। एक ही इंसान के जीवन में कैसे-कैसे मोड़, उतार चढाव आते रहते हैं।
न जाने कितनी बातें और हुई घोष जी से। करीब तीन घंटे गपियाये। बात करते हुये कुछ देर बाद अचानक घोष जी को याद आया और बोले-" अरे आपसे बात करते हुये हिचकी बंद हो गया।’
घोष जी के बारे में फ़िलहाल इतना ही। बकिया फ़िर कभी। 

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