Wednesday, September 21, 2016

व्यंग्य के बहाने-3


आज अरविन्द तिवारी जी ने लिखा:
"हमें तेरा व्यंग्य दिखता है तुझे मेरा नहीं ।तेरा छपना छपना है मेरा छपना फ़र्ज़ी है।बेट्टा जिस दिन दिए हुए एक ही विषय पर हम दोनों लिखेंगे ईश्वर शर्मा और लतीफ़ घोंघी की तरह उस दिन तेरी औक़ात सामने आ जायेगी।बहुत प्रतिभाशाली बन रहा है।"
यह पढ़ते ही गए अपने किताबों के मोहल्ले में- ’व्यंग्य की जुगलबन्दी’ खोजने। इधर-उधर, दायें-बाएं खोजने-खाजने पर भी जब नहीं मिली तो फर्श पर ही धम्म से बैठगये फसक्का मारकर। मुंडी झुकाकर एक-एक किताब खोजे तो मिल गयी लतीफ घोंघी और ईश्वर शर्मा की 'व्यंग्य की जुगलबन्दी'।
यह जुगलबन्दी व्यंग्य के क्षेत्र में एक अनूठा प्रयोग था। लतीफ घोंघी और ईश्वर शर्मा ने व्यंग्य के नियमित स्तम्भ के रूप में एक ही विषय पर व्यंग्य लिखे। उनको अमृत सन्देश, रायपुर और अमर उजाला बरेली-आगरा अख़बारों ने प्रकाशित किया। बाद में 1987 में सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली ने इस जुगलबन्दी को छापा।
व्यंग्य की जुगलबन्दी में 17 विषयों पर व्यंग्य हैं। आदरणीय, फायरब्रिगेड, प्रश्नचिन्ह, जूता, चिंता, पतझड़, क्रिक्रेट, पूंछ, बेशरम, फ़िल्म, सम्भावना, अनशन, आश्वासन, अस्पताल, शवयात्रा, श्रद्धांजलि, बिदाई विषयों पर दोनों लेखकों ने लिखा है। व्यंग्य के नमूने के रूप में एक फ़ोटो संलग्न है।
आज व्यंग्य तो बहुत लिखा जा रहा है लेकिन इस तरह के प्रयोग नहीं दीखते। व्यंग्य बहुतायत में लिखे जाने के साथ चिरकुट हरकतें भी थोक के भाव हो रहे हैं। लेकिन इस तरह के खिलंदड़े प्रयोग नहीं हो रहे। सबको आगे , बहुत तेजी से आगे बढने की जल्दी है।
हम अपने तमाम व्यंग्य के साथियों से आह्वान करते हैं कि व्यंग्य की जुगलबन्दी जैसा प्रयोग करें। अपना लेखक साथी तय करें। हर हफ्ते या जैसी जमे वैसी जुगलबन्दी करें। विषय पहले से खुद तय कर लें। पिछली जुगलबन्दी पर पाठक कुछ सुझाते हैं तो उस विषय पर लिखें। फेसबुक या जो भी अड्डा तय हो उस पर एक ही दिन और हो सके तो एक ही समय साझा करें। जो जुगलबन्दी साल भर करें उसे छपवा लें और व्यंग्य के खजाने में हीरे, जवाहरात या कूड़ा की मात्रा में इजाफा करें।
जोड़ी बनाते सम्भव है तो ऐसे के साथ बनायें जिससे आपकी पटती हो। जोड़ीदार के बीच आपसी समझ हो। एक दुसरे को झेल सकने की क्षमता हो।
मैं इतवार को व्यंग्य की जुगलबन्दी करने को तैयार हूँ। सुबह सात बजे अपना व्यंग्य फेसबुक पर पोस्ट कर दूंगा। अब हम अपना जोड़ीदार खोज रहे हैं। बताइये कौन बनेगा हमारा साथी लेखक। पहले साथी तय होगा फिर उसके साथ बकिया बातें भी तय हो जाएंगी। है कि नहीं ?
अभी अपनी तरफ से बातें ज्यादा नहीं कर रहा। साथियों की प्रतिक्रियाओं के हिसाब से आगे का प्रोग्राम तय होगा।


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