Monday, September 05, 2016

ये वाला पेड़ हमको फ़ैलने नहीं देता



आज सबेरे निकले तो घर के बाहर ही एक कुत्ता पीठ के चारो टांग ऊपर किये सड़क से पीठ खुजा रहा था। पीठ के जिस हिस्से में खुजली हो रही थी उस हिस्से को सड़क पर रगड़ने के लिये वह इधर-उधर हो रहा था। चारो पैर आसमान की तरफ़ नागिन वाले डांस की मुद्रा में उठे हुये थे। सूरज भाई उसके खुले पेट पर किरणों की बौछार करते हुये विटामिन डी का छिड़काव कर रहे थे। कुत्ता खुजली और धूप का एक साथ आनन्द लेते हुये मस्त था। कौन उसको दफ़्तर जाना था।
कुत्ते के बगल से गुजरते हुये मैंने सोचा अगर कहीं यह भी फ़ेसबुक पर होता तो अपने मित्रों को टैग करते हुये चैलेन्ज करता । फ़िर उसके मित्र सड़क पर पीठ खुजाते हुये छाती धूप में सुखाते हुये ’चैलेंज एक्सेप्टेड’ का बवाल काटते। लेकिन थैंक गाड ,मल्लब शुक्र खुदा का, यानि की भगवान की दुआ से ये कुत्ता फ़ेसबुक पर नहीं है ।
स्कूल के पास दो बच्चे साइकिल के कैरियर पर बैठे बतिया रहे थे। बच्चे उमर में छोटे थे लेकिन अपनी उमर से बडे लग रहे थे। उनकी मुद्रा से लग रहा था शायद वे आपस में इस बात की चर्चा कर रहे हों -’यार ये मास्टर लोग पढ़ाना कब सीखेंगे।’ शायद अगला कह रहा हो-’मास्टर को कन्या विद्याधन, मिड डे मील, जनसंख्या और चुनाव ड्यूटी से फ़ुरसत मिले तब तो पढाये।’
आगे सड़क पर एक बच्चा पीठ पर बस्ते को बम की तरह लादे एक संटी सड़क से सटाये रगड़ता हुआ चला आ रहा था। ऐसा लगा कि स्कूल पहुंचते ही उस मास्टर को पीट देगा जिसके जिम्मे बच्चों को पुस्तक वितरण का काम है। दो महीने हो गये अभी तक मुफ़्त बंटने वाली किताबें नहीं बंटी। आईं ही नहीं अब तक छपकर। जिम्मेदार कोई हो -पिटना तो मास्टर को ही है।
अस्पताल चौराहे पर एक बच्ची को कोई स्कूटर सिखाता दिखा। बच्ची ने हेलमेट लगा रखा था। सिखाने वाला नंगे सर। लगता है उनका समझौता हुआ है सड़क से कि गिरेंगे तो उनको चोट नहीं लगेगी।
सड़क एकदम खाली थी। सामने दूर-दूर तक पेड़ किनारे खड़े पेड़ ऊपर के आसमान पर कब्जा करने की कोशिश में सड़के के ऊपर छाये हुये थे। बांय़े तरफ़ का एक पेड़ दायीं तरफ़ के पेड़ के आसमान पर छाया हुआ था। दायीं तरफ़ का आसमान पीछे होकर हिलते हुये उसको गरिया सा रहा था। शायद कह रहा हो- ’ये वाला पेड़ हमको फ़ैलने नहीं देता।’
जरीब चौकी के पास बायीं तरफ़ एक बुजुर्ग वार सूरज को जल चढा रहे थे। लोटा सर के ऊपर किये उपर से जलधार सड़क पर छोड़ते जा रहे थे। जल सीधे सूरज तक पहुंचे इसलिये थोड़ा सा उचकते भी जा रहे थे जल चढाते हुये। जिस जगह पानी गिर रहा था सड़क पर उस जगह की धूल अकबकाकर अगल-बगल भागी। जो नहीं भाग पायी वह भीग गयी। भीगने के बाद फ़िर वह वहीं पड़ी रही। उसको लग रहा होगा -"कपड़े भीगने के बाद भागेगी तो कोई फ़ोटो खैंचकर फ़ेसबुक पर अपलोड कर देता तो भद्द होती न!" बड़ी आफ़त है सार्वजनिक जीवन में आधी आबादी के लिये।
पंकज बाजपेयी अपनी जगह पर बैठे दिखे। देखते ही गुडमार्निंग हुआ। बोले-’ विदेशी आये हुये हैं। बजरिया थाने में पकड़े गये हैं। बच्चों को पकड़ के ले जा रहे हैं। जार्डन से आये हैं। बच्चों को बचा के रखना। अकेले मत निकलना। सावधान रहना।’ हम उनसे हाथ मिलाकर चले आये। वे वहीं सूरज भाई की तरफ़ मुंह करके बैठ गये।
टाट मिल के आगे चौराहे पर बच्चे सड़क पर खेल रहे थे। सड़क और बिखरा समाज ही उनका गुरु है। शिक्षक दिवस के दिन कभी गुरु को याद करने का मौका मिला तो यही सब याद करेंगे बच्चे। उनको देखते हुये हम आगे चलते हुये समय पर दाखिल दफ़्तर हो गये।
यह फ़ोटो जो लगाई वह कल की है। इसके बारे में फ़िर कभी। वैसे ठग्गू के लड्डू का डायलाग लगता है आज सबने अपना लिया है:
ऐसा कोई सगा नहीं,
जिसको हमने ठगा नहीं।

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