Wednesday, September 07, 2016

मॉल मे दबा हमारा मुफ़्त का सामान



इतवार को करने को खूब सारे काम जमा हो जाते हैं करने को। 6 दिन के कामकाजी दिन जो तमाम काम छोड़ देते हैं वो बेचारे इतवार को निपटाने होते हैं। बहुत बड़ा बोझ होता है इतवार के मासूम कन्धों पर। नौकरीशुदा लोग इतवार का इंतजार उसी तरह करते हैं जैसे लोग अपने समाज के कष्टों के निवारण के लिये किसी अवतार का इंतजार करते हैं। लेकिन अकसर होता है कि इतवार भी अवतारों की तरह ऐसे ही निकल जाता है और लोग फ़िर अगले इतवार/अवतार का इंतजार करने लगते हैं।
कामकाजी लोगों के लिए इतवार का सबसे बड़ा काम होता है खरीदारी का। हफ्ते भर जो कमाया वो हिल्ले लगाने का। बाजार कहता है लाओ वो सब माल मत्ता वापस जो हमसे बचा के धर लिया अपने पास। हफ्ते भर में जो पैसा बच जाता है खर्च होने से वह बाजार जाने के लिए उसी तरह हुड़कता है जैसे महिलाएं शादी के बाद मायके जाने के लिए हमेशा तैयार रहती हैं।
इतवार को जब मॉल गए तो 10 बजे थे। एक बार फ़िर से पता चला 11 बजे खुलता है मॉल । हम टहलने लगे अंदर घुसकर। मॉल में सन्नाटा पसरा था। एक कपडे की दुकान पर एक मैनीक्वीन देखी। बिना गर्दन की मैनिक्वीन देखकर लगा कि क्या कोई इसकी गर्दन काट के ले गया रात को।
एस्केलेटर शांत थे। चुपचाप पसरे पड़े थे धूप में सूखने को डाले गए कपड़ों की तरह!
कुछ देर में मॉल की नींद टूटी। लोग पैसे खर्चने के लिये आने लगे मॉल में। लेकिन हमने सोचा हम खर्च नहीं करेंगे, पैसा बचायेंगे। हम एक कॉफ़ी की दुकान के पास खड़े हो गये। सोचा कॉफ़ी पियें लेकिन फ़िर नहीं पिये। बचा लिये 100 रुपये। बहुत दिन से जूते खरीदने की सोच रहे थे। सोचा आयें हैं तो खरीद ही लें। लेकिन नहीं खरीदे और बचा लिये 5000 रुपये। इस तरह घंटे भर में हमने करीब दस हजार रुपये तो बचा ही लिये होंगे। मल्लब मॉल में आना वसूल हो गया।
जब इत्ते पैसे बचा लिये तो सोचा इसको सेलेब्रेट भी किया जाये। सेलेब्रेट करना मतलब खर्चा करना। आजकल बिना खर्चे के लोग खुशी को खुशी नहीं मानते। खुशी मतलब खर्चा। जिनके पास पैसा इफ़रात है उनका तो मानना है - ’खर्च माने खुशी।’ ऐसे लोग अगर कभी खर्च नहीं कर पाते तो बीमार पड़ जाते हैं।
खर्चे वाली बात तो ठीक लेकिन मॉल के बचे पैसे मॉल में ही खर्च करना ऐसा ही हुआ न कि चाय पानी के लिये घूस लेकर देने वाले को ही चाय पिलाई जाये। इसलिये सोचा बाहर सड़क पर खड़े होकर चाय पीते हैं , मॉल की तरफ़ मुंह करके। पांच रुपये की चाय पियेंगे और मॉल को चिढायेंगे कि देख बचा लिये तुमसे बचाये ४५ रुपये। लेकिन फ़िर सोचा किसी की इत्ती भी बेइज्जती करना ठीक नहीं। बेचारा रुंआसा हो जायेगा।
जब तक दुकानें खुलतीं तब तक सोचा जरा टहल लिया जाये। सोच पर फ़ौरन अमल भी कर दिया। टहलने लगे। बंद दुकाने आहिस्ता-आहिस्ता खुलने लगी थीं। सामने शौचालय दिखा तो वहीं सोच भी आ गई कि इसका उपयोग भी किया जाये। लेकिन शौचालय बंद था। शायद मॉल वालों को डर लगा रहता होगा कि बाहर सड़क से आकर शौचालय का उपयोग न कर जाये। कोई सड़क वाला मॉल में निपट के चला जाये तो मॉल की बेइज्जती होगी न ! इसीलिये शौचालय के पट भी 11 बजे ही खुलते होंगे।
वहीं एक लड़की अपने साथी के साथ एस्केलेटर पर चढने से डर रही थी। साथी उसको हिम्मत बंधा रहा था। लेकिन लड़की डरती जा रही थी। छुट्टी का दिन होने के चलते लड़की डरने में कोई हड़बड़ी नहीं कर रही थी। इत्मिनान से डर रही थी। लड़का भी बिना जल्दबाजी के तसल्ली से हिम्मत बंधा रहा था। हमारा मन किया लड़की को एस्केलेटर पर चढने के लिये हम भी जल्दी से थोड़ी हिम्मत बंधा दें। लेकिन फ़िर उसके अंजाम के बारे में सोचकर हमने हिम्मत को दफ़ा कर दिया। जब हमारी हिम्मत हमको टाटा करके विदा हो रही थी तब ही देखा कि लड़के की हिम्मत परवान चढ गयी। दोनों लोग मुस्कराते हुये एस्केलटर पर चले गये। उनको मुस्कराता देखकर एस्केलेटर भी मुस्कराने लगी। मॉल भी साथ लग लिया। हम भी कैसे पीछे रहते फ़िर। हमने मुस्कराते हुये सोचा - मुस्कान भी संक्रामक होती है।
11 बजे के बाद मॉल खुल गया पर वह दुकान नहीं खुली जिसमें हमको सामान लेना था। लेकिन शीशे वाले दरवाजे से दिख रहा था कि अंदर सामान बेचने वाले सज-संवर रहे थे। ज्यादातर महिलायें। पहले तो हमने सोचा कि लगता है कि इनको पता चल गया है कि हम आये हैं सामान लेने इसीलिये अच्छे से तैयार होने के बाद ही खोलेंगे लोग दुकान। यह भी सोचा कि मना कर दें कि इत्ता सब ताम-झाम काहे के लिये भाई। लेकिन फ़िर नहीं किये। सजने संवरने से किसी को क्या टोंका जाये। आजकल देख ही रहे हैं पहनने ओढने पर कोई टोंकता तो लोग कित्ता गुस्साने लगते हैं टोंकने वाले पर।
12 बजे जब सब लोग सज लिये तब मॉल खुला। हम सामने के तीन-चार पुरुषों वाले काउंटर फ़लांगते हुये एक महिला काउंटर पर पहुंचे। लेकिन उसने हमको बगल वाले पुरुष काउंटर पर भेज दिया। हमको बड़ा गुस्सा आया कि अरे वही दे देती सामान तो क्या घट जाता उनका। सोचा आगे भुगतान करते समय हिसाब बराबर हो जाये शायद लेकिन वहां भी एक बालक मिला। उसने सामान के पैसे तो लिये ही साथ में पूछकर एक रुपया और धरा लिया चैरिटी के नाम पर। दुकान वाले का कोई एनजीओ चलता है उससे बच्चों की पढाई होती है। अब बच्चों की पढाई के लिये कोई कैसे मना करे।
काउंटर पर बातचीत न हो पाने की कमी हमने लौटते समय दुकान के गेट पर तैनात महिला दरबान से बतिया के पूरी की। उसने बताया कि रात दस बजे तक खड़े-खड़े ड्यूटी बजानी होती है। अब तो आदत हो गयी है। हमको कोई भी मॉल इसई लये पसंद नहीं क्योंकि वहां कामगारों के बैठने का कोई इंतजाम नहीं होता।
दूसरी दुकान से भी कुछ सामान लेना था। वहां गये तो लगा कि किसी स्कूल की बच्चियों को मॉल वाले पकड़ लाये हैं सामान बेंचने के लिये। या फ़िर शायद छोटी-छोटी बच्चियां इतवार को स्कूल की छुट्टी के दिन अपना होमवर्क छोड़कर यहां चली आई हैं।
हर सामान में बताया गया था कि इसको खरीद लो इत्ता इसमें मुफ़्त में मिलेगा। हमारा मन किया काउंटर पर जाकर बोलें- ’ यार भाई तू ऐसा कर कि ये जो मुफ़्त वाला सामान है बस वही तौल दे हमको। हमारा काम इत्ते में ही चल जायेगा। इससे ज्यादा हमें और कुछ नहीं चाहिये।’ लेकिन मुझे पता है कि वह देगा नहीं आसानी से। आसानी से क्या मुश्किल से भी नहीं देगा।
हर मॉल वाला हमारा मुफ़्त का मिलने वाला सामान दाबे हुये हैं। हम कुछ कर नहीं पा रहे हैं। सरकारे भी चुप्प हैं।
कभी-कभी तो मन करता है कि थाने मे रिपोर्ट लिखाई जाये कि ये मॉल वाला मुफ़्त वाला हमारा सामान हमको नहीं दे रहा। इसके खिलाफ़ फ़ौरन कार्रवाई की जाये। लेकिन हमको पता है कि थाने वाला भी मिला हुआ है मॉल वाले से। इसलिये कुछ होना -जाना है नहीं।
यही सब सोचते हुये वापस चले आये। बात तो दो दिन पुरानी है लेकिन सोचा आपको बता दें।

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