Wednesday, June 20, 2018

कानपुर के इतिहास के बीच

चित्र में ये शामिल हो सकता है: वृक्ष, पौधा, आकाश, बाहर और प्रकृति
तिलक हाल देश के स्वतंत्रता की अनगिनत घटनाओं की गवाह इमारत

उस दिन शाम को घूमने निकले। साइकिल माल रोड से शिवाला वाली गली में घुसा दी। ईद का दिन था। ज्यादातर दुकाने बन्द थीं। केवल चाय-पानी, मिठाई की दुकानें गुलजार थीं। लोग-बाग नये कपड़ों में इधर-उधर टहल रहे थे। कहीं-कहीं गले भी मिलते दिखे लोग। वैसे ज्यादातर गला -मिलन सुबह हो चुका होगा। हम उसे देखने से वंचित रहे। आलस्य के साथ गठबंधन किये पढे रहे। जब आलस्य की सरकार गिरी तब तक शाम हो चुकी थी।
बुजुर्ग लोग घरों के बाहर गली के चबूतरों, दुकान के बाहर बेंचों पर बैठे थे। लोग आते, सलाम करते, दुआयें लेते, ईद मुबारक कहकर निकल लेते। बुजुर्ग लोगों को वैसे भी आशीर्वाद देने का लाइसेंस मिलता है।
साहित्य में भी बुजुर्ग लोग आशीर्वाद देते रहते हैं। लेकिन तमाम लोगों को शिकायत है कि यहां आशीर्वाद में ’लालफ़ीताशाही’ है, ’इंस्पेक्टर राज’ है। बिना जुगाड़ आशीर्वाद इशू नहीं करते बुजुर्ग। लेकिन हमको यह बात सिरे से गलत लगती है। बुजुर्गों को बदनाम करने की साजिश की तरह। वैसे यह भी सच है कि अपने यहां साहित्यिक बुजुर्ग अल्पसंख्यक ही हैं। उमर और अनुभव से जो बड़े हैं वे अपने लड़कपन से बुजुर्गियत को स्वीकार करने से मना करते हैं। खुद अपने से कम उम्र के लोगों से आशीर्वाद , शुभकामनाएं, समर्थन झटकते रहते हैं।

चित्र में ये शामिल हो सकता है: बाहर और पाठ
श्रद्धानन्द पार्क अनगिनत सभाओं का इतिहास
बहरहाल, शिवाले के आगे निकले तो एक गली में श्रद्धानन्द पार्क का बोर्ड दिखा। श्रद्धानन्द पार्क का जिक्र स्वतंत्रता के इतिहास में कई जगह हुआ है। पार्क बहुत छोटा सा लगा। हमारे घर के बगीचे से थोड़ा ही बड़ा होगा। खड़े होकर देखते रहे। सोचते रहे। कद में इतना छोटा पार्क इतिहास में इतना जबर दखल किये है। लेकिन फ़िर यह भी सोचा कि इतिहास में जगह कद, काठी, रोब उआब से नहीं तय होती। मायने यह रखता है कि आपने किया क्या है, आपसे हुआ क्या है?
श्रद्धानंद पार्क के पीछे ही तिलक हाल दिखा। इस हाल की भी कानपुर और भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास में उल्लेखनीय स्थान है। तमाम राष्ट्रीय घटनाओं का गवाह रहा है यह हाल। जिधर से देखा वह कभी सामने का हिस्सा रहा होगा। अब वह पिछवाड़ा हो गया है। गेट के सामने कूड़ा पडा था। वहीं पत्थर पर लिखा था:
" जमीन खरीदी सन 1925
पंडित जवाहर लाल ने नींव रखी 24-09-31
महात्मा गांधी ने उद्घाटन किया 24-07-34
निरीक्षक श्री तुलसी दास कोचर
निर्माण कर्ता - मेसर्स धनीराम प्रेम सुख ठेकेदार
प्रबन्धक- श्री नारायण प्रसाद अरोड़ा"
कुछ देर खड़े होकर इस ऐतिहासिक इमारत को देखते रहे। बाग में एक आदमी बचे पौधों को पानी दे रहा था। इमारत राष्ट्रीय धरोहर की तरह ही लग रही थी।निस्तेज, उदास, मार्गदर्शक मंडल की सदस्य सरीखी। बरामदे में टूटी कुर्सियां गंजी पड़ी थीं।
सामने से इमारत को देखने आये। गेट बंद था। खुला होता तो अंदर के नजारे देखते। सामने दूध, मिठाई की दुकाने आबाद थीं। एक दुकान का नाम मजेदार दिखा- ’डबल हाथरस वाले’। हमने पूछा -’क्या कोई सिंगल हाथरस वाले भी हैं यहां?’ बताया -’ हां चौक में पहली दुकान है हमारी उसका नाम हाथरस मिठाई भण्डार है।’
बाजार में इस तरह के टोटके बहुत चलते हैं। बाजार शुरुआत करता है। फ़िर लोग अपनाते हैं। बाजार सबका गुरु है। गुरु क्या गुरु घंटाल है पक्का। इसी से सीख कर लोग ’निंदा’ के बाद ’कड़ी निंदा’ और फ़िर ’सबसे कड़ी निंदा’ टाइप मुलायमियत वाले बयान जारी करते हैं। बड़ी बात नहीं कि कल को ईमानादार सरकार के बाद कोई ’डबल ईमानदार सरकार’ ,’ट्रिपल राष्ट्रवादी सरकार’ , ’मल्टीपल देशभक्त’ सरकार’ बनाकर देश के लोगों की जबरियन सेवा करने लगे।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: बाहर
इस गली में तिलक हाल है
गली से लौटकर सड़क पर आये तो आर्यसमाज का होम्योपैथिक अस्पताल दिखा। घुस गये अंदर। कम रोशनी वाला बल्ब जल रहा था। आर्यसमाज से जुड़े तमाम लोगों के चित्र दीवार में। वहीं तख्त पर एक बुजुर्ग बैठे थे। उनसे बतियाने लगे।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: Udbhrant Sharma, खड़े रहना और चश्मे
आर्यसमाज के सहज प्रचारक रवीन्द्र पांडेय जी
पता चला बुजुर्गवार सुल्तानपुर के रहने वाले हैं। अब इलाहाबाद में घर है। आर्यसमाज के प्रचार-प्रसार का काम करते हैं। निशुल्क। देश घूमे हुए हैं। कुछ दिन वकालत भी की लखनऊ में। जमी नहीं तो छोड़ दी। नाम बताया रवीन्द्र पाण्डेय। बातचीत के दौरान उन्होंने अपने मोबाइल का जिक्र किया। बोले -’इसका उपयोग सीखना है। खासकर फ़ोटो खींचना।'
पुराना माडल वाला नोकिया का नया मोबाइल था। सस्ता और टिकाऊ घराने का। हमने उनको फ़ोटो खैंचना सिखाया। ब्लू टूथ का उपयोग सिखाया। कुछ देर बाद बात करते हुये वे अंग्रेजी के वाक्य बोलने लगे। शायद यह सोचते हुये कि हमको अंग्रेजी जमती हो। लेकिन अंग्रेजी में अपन का हाथ और पैर क्या पूरा शरीर हमेशा तंग रहता है। अंतिम विकल्प के रूप में ही अंग्रेजी की छतरी खोलते हैं। छुट्टी के दिन और दफ़्तर के बाहर अंग्रेजी बोलना फ़िजूल खर्ची भी लगा हमें। इसलिये हम हिन्दी से ही चिपके रहे। पाण्डेय जी अलबत्ता बीच-बीच में और किनारे-किनारे भी अंग्रेजी उवाचते रहे। बाद में जब हमने बताया कि हम इलाहाबाद से पढाई किये हैं तो इलाहाबाद और तेलियर गंज में रहने के दिनों की यादें भी साझा हूईं।

बातचीत के बीच में आर्य समाज के बारे में तमाम बाते हुयीं। इसी बीच वहां पुजारी जी आ गये। पंडित कृपा शंकर शुक्ल। वे हमको उस बिल्डिंग के बारे में कुछ बातें बताने लगे। हमने फ़ौरन अपने कनपुरिया इन्साइक्लोलीडिया हमनाम अनूप शुक्ल Anoop Shukla को फ़ोन मिलाकर स्पीकर आन कर दिया। अनूप शुक्ल ने उस बिल्डिंग की ऐसी रनिंग कमेंट्री करी कि तीनों श्रोता विस्मित च चकित हो गये। हमको जो याद रहा वह मात्र इतना कि यह भवन 'खुर्द महल' कहलाता था। वह किसी नबाब की दूसरी पत्नी का महल था। हमने फ़ौरन यह जिम्मेदारी अनूप शुक्ल के ऊपर डाल दी कि इस बारे में विस्तार से लिखें।
लिखने की जिम्मेदारी की बात चलने पर अनूप शुक्ल ने बताया मुंशी ज्वाला प्रसाद जी ने मेस्टन रोड का के पचास वर्ष का इतिहास लिखा है। वहां लगे बोर्ड के अनुसार मुंशी जी इस संस्था के 1903 से 1930 तक मंत्री रहे। पुरोहित जी ने इस किताब के बारे में बताया कि इसकी दो-तीन प्रतियां बची हैं शहर में। वे कोशिश करेंगे कि इसके बारे में पता करें। तय हुआ कि वे एकाध दिन में किताब खोजेंगे। उसकी फ़ोटोकॉपी हम करायेंगे फ़िर हमारे इन्साइक्लोपीडिया अनूप शुक्ल लिखने का काम संभालेंगे।
आर्य समाज से बाहर निकलकर हम चमनगंज की तरफ़ बढ गये। ईद के मौके पर आगे के मोर्चे हमको आवाज दे रहे थे।

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