Saturday, June 09, 2018

तेल और तेल के दाम


तेल फिर चर्चा में हैं । हमेशा रहता है। तेल के दाम चंद्रमा की कलाओं की तरह बढ़ते हैं। चन्द्रमा तो छोटा बड़ा होता है। लेकिन तेल के दाम को छोटा होना पसंद नहीं। कभी मजबूरी में घटना भी पड़ता है तो दोगुना बढ़कर हिसाब बराबर कर लेता है।
तेल का महत्व जगजाहिर है। तेल खुद को जलाकर दूसरों के लिए ऊर्जा पैदा करता है। वोट बैंक की तरह समझिये तेल को। किसी लोकतंत्र में दबे-कुचले , वंचित लोग चुनाव में महत्वपूर्ण हो जाते हैं। वैसे ही जमीन में मीलों नीचे दबा- कुचला, काला-कलूटा , बदसूरत तेल जमीन पर आते ही महत्वपूर्ण हो जाता है। लोग इस पर कब्जे के लिए मारपीट करने लगते हैं।
वोट बैंक पर कब्जे के लिए अपने देश में भाषणबाजी, आरोप-प्रत्यारोप या फिर दंगा-फसाद आदि का चलन है। तेल पर कब्जे के लिए शांति का हल्ला मचाना पड़ता है। ताकतंवर , गुंडे टाइप के देश किसी तेल वाले देश में लोकतंत्र को खतरे में बता देते हैं। उस देश में घुसकर उसकी सरकार गिरा देते हैं। शांति की स्थापना के लिए अशांति मचा देते हैं।
तेल ऊर्जा पैदा करने के साथ ही घर्षण कम करता है। घर्षण कम होने से भी ऊर्जा बचती है। जहां तेल लग जाता है वहां घर्षण कम हो जाता है। कम मेहनत में ज्यादा काम हो जाता है। लोग इस वैज्ञानिक सत्य को इतना ज्यादा जानते हैं सारी ऊर्जा तेल लगाने में ही लगा देते हैं। मेहनत करने वाले टापते रह जाते हैं। तेल लगाने वाले बहुत आगे निकल जाते हैं।
हमारे एक मित्र को 'तेल लगाऊ' विधा में महारत हासिल है। वे अपने बॉस की कई दिन मिजाज पुर्सी करते रहे। असर न हुआ। तेल का असर न हुआ। मेहनत लगने लगी। हलकान हो गए। तेल लगाकर काम निकालने वाले का पसीना निकल आया। अंततः सीधे पूछ ही लिया एक दिन बॉस से -'साहब हम इतना तेल लगाते हैं, आप पर कुछ असर नहीं होता। '
पूछने का अंदाज भी तेल लगाऊ ही था। लेकिन बॉस उसमें मिली निरीहता और छद्म आकुलता से पसीज गए। बताया -'आप तेल लगाते कहाँ हैं, आप तो तेल बहाते हैं। बहुत तेल बर्बाद करते हैं। तेल दिन पर दिन मंहगा हो रहा है। आप इतना तेल लाते कहां से हैं। इतनी बर्बादी देखकर मेरा दिल दहल जाता है।'
तेल मध्यवर्गीय समाज की चौपाल है। मंहगाई की नपनी है तेल के दाम। पहले लोग गेंहू , चावल के दाम से मंहगाई नापते थे। आज तेल मंहगाई मीटर हो गया है। कभी तेल के दाम किसी की उम्र से जुड़ जाते हैं , कभी किसी और नाम से। सब नापें फेल हो जाती हैं। तेल के दाम कंचनमृग की तरह इधर-उधर होते रहते हैं।
लोग आज के समय में तेल के बढ़ते दामों से परेशान दिखते हैं। आज जब भी कोई परेशानी दिखती है तो उसे अपने अतीत के आईने में देखने का चलन है। सबको पता है कि रामायण , महाभारत काल में अपना समाज बहुत उन्नत था। इंटरनेट, सर्जरी सब था। फिर भी उस समय लड़ाई घोड़ों, हाथियों से हुई । ऐसा थोड़ी था कि उस उन्नत समाज में टैंक वगैरह न हों। लेकिन उस समय तेल के दाम इतने ज्यादा थे कि लोगों ने घोड़े-हाथियों से लड़ाई लड़ना उचित समझा।
देवता लोग इसीलिये पावरफुल हैं क्योंकि उनके सारे वाहन बिना तेल के चलते हैं। अपने परम भक्त गज को ग्राह से बचाने के लिए भगवान नंगे पांव पैदल भगे चले आये। समझ लीजिए कितना मंहगा रहा होगा उन दिनों।
कवि यहां कहना यह चाहता है कि तेल के अगर दाम बढ़ रहे है तो हमको दुखी नहीं होना चाहिए। हमको यह मनाना चाहिए कि यह और बढ़े। इतना बढ़े कि हमारी पहुंच से बाहर हो जाये। हमारा तेल से तलाक हो जाये। हम बिना तेल के रहना सीख लें। देवता हो जाएं।
लेकिन मनचाहा हमेशा होता कहां हैं। अभी - अभी खबर आई कि तेल के दाम तीस पैसे कम हो गए। हसम्भावित देवत्व से फिर दूर हो गए। मनुष्य योनि में ही रहने को अभिशप्त। तेल के दाम पर स्यापा करने को मजबूर। तेल लगाने , तेल बहाने वाले समाज में सांस लेना ही होगा।
लेकिन हमें पूरा भरोसा है कि तेल के दाम फिर बढ़ेंगे। हचककर बढ़ेंगे। हम तेल से दूर होते जाएंगे। हम कीड़ो -मकोड़े की जिंदगी जीते हुए भी देवत्व के नजदीक पहुंचेंगे। देखते-देखते उल्लू, गरुड़, घोड़े, गधों पर चलने लगेंगे।
आपको यह बेवकूफी की बात लगती होगी। हमको भी लगती है। लेकिन जहां इतनी बेवकूफाना बातों के साथ जी रहे हैं, वहाँ एक और सही। बेवकूफियों को स्वीकारे बिना जीना असंभव है। तेल के दाम गए , तेल लेने। अभी तो अगली सांस ले ली जाए। इसके बाद जो होगा , देखा जाएगा।

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