Sunday, June 10, 2018

मेरे दिल का गया करार रे

सूरज भाई से सुबह की नमस्ते
सुबह की शुरुआत चाय बाजी से हुई। बच्चा बाहर जा रहा है। ओला वाले अनुराग आधे घण्टे पहले आ गए। चाय की तारीफ सुनने के लिए हमने पूछा -'चाय कैसी लगी?' बोले -'डेढ़ साल में पहली बार किसी ने चाय पिलाई।'
हम चाय की तारीफ का इन्तजार ही करते रहे। असल में हमारी चाय की लोग इतनी तारीफ करते हैं कि मन करता है कि चाय की दुकान खोल लें। हालांकि रोज चाय बनवाने का उपाय मात्र है यह। लेकिन आज तारीफ न मिलने से चाय की दुकान खोलने का इरादा कुछ कम हो गया।
बच्चे के साथ हम भी लग लिए शुक्लागंज तक। पुल पार बालक को विदा किया। आगे बढ़े। स्टेशन की तरफ। सूरज भाई ने ड्यूटी ज्वाइन कर ली थी। चमक रहे थे। मुसाफिर कंधे, हाथों में बैग लिए लपके जा रहे थे। सड़क के किनारे दुकानें आबाद थीं। दुकानों में बकौल श्रीलाल शुक्ल -' प्राय: सभी में जनता का एक मनपसन्द पेय मिलता था जिसे वहां गर्द, चीकट, चाय, की कई बार इस्तेमाल की हुई पत्ती और खौलते पानी आदि के सहारे बनाया जाता था।'
चित्र में ये शामिल हो सकता है: पौधा और बाहर
रेलवे के स्लीपर मतलब गरीब का बिस्तर भी और बाथरूम भी
सड़क किनारे कंक्रीट के रेलवे स्लीपर पड़े थे। उनमें एक आदमी सोया था। उसके पैताने दूसरा आदमी स्लीपर को पनघट बनाये अपने कपड़े धो रहा था।
स्टेशन पर अंग्रेजों के जमाने का टिकट काउंटर था। उसमें मुंडी घुसाए लोग टिकट खरीद रहे थे। काउंटर के ठीक सामने डिजिटल टिकट मशीन खराब पड़ी, हिंदुस्तान की डिजिटल प्रगति की मुनादी कर रही थी।
स्टेशन पर गाड़ी के इंतजार में बैठे लोग गप्पाष्टक हांक रहे थे। एक यात्री ने एल सी की वीरता का करते हुए बताया-'काल्हि इत्ती जोर आई एल सी कि पैसेंजर का पीट दिहिस।' हमको Devendra Kumar के लोहे के घर के किस्से याद आये।
पटरी किनारे चलते हुए वापस आये। पटरियों के जिन हिस्सों पर पहिये चलते हैं वो चमक रहे थे। बाकी काले। लगा कि चमकता वही है जो रगड़ खाता है।

रेलवे का फाटक स्थाई रूप से बंद है। मोटरसाइकिल वालों ने बीच के हिस्से को उठाकर ऊंचा कर लिया है। मुंडी झुकाकर बैठे-बैठे निकल जाते हैं। हर बाधा को पार करने का शार्ट कट है अपने यहां। कविता भी है न:
देखकर बाधा विविध बहु विघ्न घबराते नहीं।
गंगा दुबली हो गयी है। बालू की हड्डियां दिख रही हैं। नदी कई धाराओं में बंटी है। कौन असली पता नहीं चलता। बीच पुल से खड़े होकर धार देखते हुए सोचे कि यहां सीढ़ी होती तो उतर कर नहा लेते। कई लोग डुबकी लगा रहे हैं। बीच बालू तमाम लोग सो रहे हैं। गंगा किनारे अनगिनत लोगों के शयनकक्ष हैं।
सूरज भाई अपने पूरे कुनबे के साथ गंगा नहा रहे हैं। पानी सुनहरा हो रहा है। सूरज की संगत का असर है। सुनहरा पानी हिलडुल कर और खूबसूरत लग रहा है।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग, पौधा, वृक्ष, बाहर और प्रकृति
जैनब की झोपड़ी, गंगा का किनारा
जैनब अपनी झोपड़ी के बाहर अपनी बिटिया के साथ नदी निहार रही है। तन्वंगी गंगा देखकर लगता है उसने भी 'चैलेंज एक्सेप्ट' किया और ढांचा हड्डी कर लिया। बताया संदीप कल रात खाना खाकर निकला। अभी तक नहीं आया। आएगा।
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राधा मजे से अपने तख्त पर
राधा अपने ठीहे पर विराजी है। रिक्शे वाले घर चले गए हैं। चूल्हा उजाड़ गए हैं। जैसे कोई राजनयिक बंगला खाली करते हुए उजाड़ जाए। राधा बताती है -'ये सब गांजा , शराब पीते हैं। हल्ला करते हैं।'
हमने कहा -'तुम भी तो पीती हो गांजा, शराब।'
बोली-'शराब कभी-कभी। गांजा पी लेते हैं। बीड़ी कितनी पी सुबह से उसका हिसाब नहीं। '
आज सुबह ही उठ गई थी राधा। मुर्गा बोलने से पहले। आसपास कोई मुर्गा अलबत्ता मुझे दिखा नहीं। पास खड़े हुए थे तो बैठा लिया। गाना सुनाने लगी। 'मन डोले रे तन डोले रे, मेरे जी का गया करार' रे। बेसुरे सुर में गाना पूरी तन्मयता से गाती राधा एक के बाद दूसरे गाने पर इतनी तेजी से शिफ्ट हो रहीं थी जितनी तेजी से नेता लोग अपने बयान भी नहीं बदल पाते।
सीतापुर मिश्रिख के रिक्शे वालों के चूल्हे जले हुए थे। एक आदमी रोटियां थाप रहा था। दूसरा सेंक रहा था। भारी हैवीवेट रोटियां। बगल में दाल पक रही थी। रोटियों पर बात चली तो एक ने कहा -'ये खा कर ही क्विंटल भर का रिक्शा खींचने की ताकत आती है।' दूसरे ने हमको चैलेंज भी दिया कि रोटी खा लो। कहा यो खा लो था लेकिन मतलब खाकर दिखाने से था। हमने चैलेंज स्वीकार नहीं किया।
चूल्हे की रोटी से बात गैस की चली। लोगों ने बताया उनके यहां खाना गैस पर बनता है। एक ने कहा -'गैस मोदी दिहिन।' दूसरे ने बताया -'अखिलेश दिहिन।' अच्छी बात यह हुई कि दोनों ने इस पर कोई बहस नहीं की। कामगारों और प्राइम टाइम वाले पार्टी प्रवक्ताओं में यही अंतर होता है।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, बाहर
कैंची साइकिल सीखती बच्ची
आते समय एक लड़की कैंची साइकिल चलाना सीखती दिखी। बार-बार कोशिश करती। थोड़ी दूर चलाती। उतर जाती। फिर चलाती। सीखने की प्रबल इच्छा चेहरे पर साफ दिख रही थी। 'कोई काम नहीं है मुश्किल जब किया इरादा पक्का' का इश्तहार लग रहा था बच्ची का चेहरा।
महीनों से बने ओवरब्रिज पर मिट्टी बराबर की जा रही थी। लग रहा है अब पुल बन ही जायेगा।
हेयर कटिंग सैलून की दुकान खुल गयी है। एक बंदर दुकान से लोरियल डाई का डब्बा उठा लाया है। उसे खोलने की कोशिश करते हुए डब्बे पर बनी हीरोइन को बार-बार चूम टाइप रहा है। हमने फोटो खींचने की कोशिश की तो खौखिया पड़ा मुझ पर। ऐसे लगा जैसे किसी अराजक स्वयंसेवक की फोटो लेने पर वह कैमरा तोड़ने को झपटे। हम सहम गए। सहमते हुए ही हमने उस पर आभासी गुम्मा चलाने का एक्शन किया। वह भी पीछे हट गया। दो बांके वाले अंदाज में दोनों अपने-अपने रस्ते चल दिये।
इतवार की सुबह हो गयी। हम दफ्तर को चल दिये। आप मजे करो।

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