Friday, November 28, 2025

सांप्रदायिकता : प्रकृति, कारण और निदान' - परसाई

कुछ कटु पर सत्य वास्तविकताओं को स्वीकार करना होगा। अभी भी हिंदू मन में एक विजित जाति की हीनता की भावना है। मुसलमान में भी यह भावना है कि हम विजेता जाति के हैं और हमने इन पर हुकूमत की है। हिंदू और मुसलमान दोनों पर अंग्रेजों ने हमला किया। दोनों पर हुकूमत की। अंग्रेज़ ईसाई हैं। उन्होंने हिंदू-मुसलमान दोनों पर अत्याचार कम नहीं किए। मगर अंग्रेज़ों से न हिन्दू नफ़रत करता है न मुसलमान। स्वतंत्र भारत का पहला गवर्नर जनरल ईसाई अंग्रेज़ था। इसे हिंदू-मुसलमान दोनों ने सलाम किया। अंग्रेज़ मूर्तिपूजक हैं। वे ईसा के बुत की पूजा करते हैं। मगर मुसलमान इन बुतपरस्तों से नफ़रत नही करता। अंग्रेज़ साम्राज्यवादी थे। मुसलमान साम्राज्यवादी नहीं थे हैं। वे भारतीय ही हो गए। मगर हिंदू साम्राज्यवादी शोषक अंग्रेज से नफ़रत नहीं करता, उसे आदर्श मानता है, उसकी रहन-सहन में नकल करता है। अंग्रेजी साम्राज्य समाप्त हुआ, तो उसकी जगह ली नए प्रकार के अमेरिकी साम्राज्यवाद ने। अमेरिकी भी ईसाई है। मगर हिंदू जाति के बड़े-बड़े रहनुमा अमेरिका के भक्त हैं। यह क्या विरोधाभास है? कौन सा तर्क है इसमें?

हारे हुए निराश हिंदू मन ने अपने प्राचीन गौरव की याद की, उसका सहारा लिया और उस 'यूटोपिया' में जीकर, आधुनिकता का विरोध किया। उसने पुरातनवाद में जातीय गौरव की रक्षा खोजी। इस भावना ने उसे संकीर्ण, ज्ञान-विज्ञान विरोधी, अतीतजीवी और क्षुद्र बनाया। उधर मुसलमान के हाथ से हुकूमत अंग्रेजों ने छीनी। उसे गुलाम बनाया। वह हीनता की भावना से ग्रस्त हुआ, तो उसे भी इस्लामी अतीत की याद आयी कि उसने यूरोप और एशिया को रौंद डाला था। इस्लामी बिरादरी की याद आई। वह भी बुनियादी इस्लाम में पहुँचा और 7 वीं सदी के मक्का-मदीना में रहने लगा। वह खबाब देखने लगा फिर इस्लामी साम्राज्य की स्थापना के, क्योंकि -'उठता है फिर मुसलमां हर करबला के बाद।' मुसलमानों के कट्टर रहबर भी अमेरिकी साम्राज्यवाद के समर्थक हैं। 

-परसाई 

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