Tuesday, November 18, 2025

लक्षद्वीप की आख़िरी शाम


 

लैगून बीच पर टहलते हुए शाम को गई। वापस पैदल लौटे। बीच से ठहरने की जगह क़रीब पाँच किलोमीटर थी। अभी वहाँ ऐप आधारित वाहन सेवा शुरू नहीं हुई है। मतलब , इस बात की सुविधा नहीं थी कि कहीं खड़े हो गए और एप्प से सवारी बुक कर ली।
जिस रास्ते लौटे वह पतली सड़क थी। सड़क के दोनों तरफ़ घर। आगे चलकर दुकानें शूरू हो गई। जनरल स्टोर, इलेक्ट्रानिक स्टोर और रोजमर्रा के इस्तेमाल के सामान की दुकानें। दुकानों पर खरीदार कम ही दिखे। शायद रात हो जाने के कारण लोग घरों में हो। चहल-पहल कम ही दिखी सड़कों पर।
रास्ते में एक चौराहे पर एक छुटके बोर्ड पर महात्मा गांधी की फोटो के साथ कोई संदेश लगा था। शायद मलयालम में। वहाँ आसपास कोई दिखा भी नहीं जिससे पूछ सकते कि क्या लिखा है इसमें।
एक घर के पास मोटर साइकिलों, गाड़ियों का जमावड़ा था। घर के अंदर तमाम लोग बैठे थे। बाहर खड़े एक लड़के ने बताया कि किसी की मौत हो गई थी। उसके बाद की नमाज और दूसरे कार्यक्रम हो रहे थे।
आगे ही सड़क किनारे कब्रिस्तान दिखा। कब्रें सड़क किनारे तक थीं। कब्रों पर पत्थर लगे थे। उन पर स्थानीय भाषा में दफ़नाये जाने वाले लोगों के विवरण लिखे थे। बगल में लोगों के घर बने हुए थे। आजकल जिस कदर ज़मीन की कमी हो रही है, उसको देखते हुए आने वाले समय में मृतकों को दफ़नाना भी एक चुनौती होता जा रहा होगा।
सड़क किनारे बनी पुलिया पर दो लोग बैठे मोबाइल पर कुछ खेल रहे थे। रास्ता पूछने के बहाने उनसे बात करने लगे। अपना खेलना स्थगित करके वे हमसे बतियाने लगे। जम्फ़र और शफी । उनमें से एक होटल में काम करते हैं , दूसरे मछुआरे हैं। उन्होंने बताया कि वे मोबाइल में 'आन लाइन सट्टा' खेल रहे थे। उनके काम में बाधा न पड़े यह सोचकर हम आगे चल दिए।
सट्टा से करीब 30 साल पहले की एक दफ़्तर के दिनों की घटना याद आई। हमको हमारे साहब ने बात करने के लिए बुलाया था। दफ़्तर दूर था। टहलते हुए पहुंचे। साहब कहीं राउंड पर निकलने वाले थे। हमको देखकर रुक गए। बोले -"कहाँ थे इतनी देर? सट्टा खेल रहे थे क्या?"
हमने कहा -"क्या कह रहे हैं आप?"
साहब को लगा कुछ गड़बड़ बोल गए वो। उन्होंने कहा -"अरे हम ऐसे ही मजाक कर रहे थे।"
हमने साहब से कहा -" सर, मजाक तो ठीक है। हमको भी मजाक की आदत है। आपका मजाक तो हमने सह लिया। लेकिन आप हो सकता है हमारा मजाक न सहन कर पायें।"
साहब ने कुछ कहा नहीं। चुपचाप राउंड पर चले गए। दुबारा फिर कभी हँसी-मजाक नहीं हो पाया।
आज इस घटना को याद करते हुए लगा कि हमारी और साहब की उम्र और पद में काफ़ी अंतर था। लेकिन हमको लगता रहा कि कोई बात ग़लत लगे तो जबाब जरूर दिया जाना चाहिए। स्वतः स्फूर्त तरीक़े से होता रहा मेरे साथ हमेशा। इसका हमको नुकसान भी हुआ कई बार लेकिन यह सुकून हमेशा रहा कि चुप नहीं रहे।
आगे आगाती के मुख्य चौराहे पर कई जगह जाने के संकेतक लगे थे। एक चाय की दुकान पर बैठे लोग बतिया रहे थे। हम बार-बार बची हुई दूरी मोबाइल में देखते जा रहे थे। आगे फ़ेमिली रेस्टोरेंट भी खुला था लेकिन लोग बहुत कम थे वहाँ। सड़क पर इक्का-दुक्का वाहन और लोग गुजरते हुए दिख रहे थे।
हमारे ठहरने वाली जगह के पास दूसरे रेस्ट हाउस में लोग जमा थे। स्थानीय कलाकारों बाँस डाँस (बंबू डांस) कर रहे थे। ज़मीन की सतह से बाँस उठाते-रखते हुए उसके बीच से गुजरते हुए डांस। यह मिजोरम का एक पारंपरिक और प्राचीन नृत्य है। इसे चेराव (Cheraw) के नाम से भी जाना जाता है। इस नृत्य में, नर्तक क्षैतिज रूप से रखे गए बांस के खंभों के बीच कूदते और चलते हैं, जबकि अन्य लोग बांस को थामे रहते हैं और एक लयबद्ध पैटर्न बनाते हैं। डांस वीडियो आप इस पोस्ट पर पहुँचकर देख सकते हैं -https://www.facebook.com/share/v/178B7L9wqy/
कलाकारों ने कुछ देर डांस करने के बाद बाहर से आए लोगों से कहा कि वे भी डाँस करें। एक महिला और एक पुरुष ने चुनौती स्वीकार की। कलाकारों ने उनको सिखाया। महिला ने तो पहली बार में ही ठीक से डांस कर लिया। लेकिन पुरुष ने कुछ ग़लतियाँ करने के बाद अंतत: कर ही लिया। दोनों के डांस अभ्यास के बाद उनका शो ख़तम हो गया। हम भी अपने होटल लौट आए। डिनर करके कुछ देर समुद्र के किनारे टहले। लहरों का शोर सुना। इसके बाद कमरे पर आकर सो गए।
यह हमारे लक्षद्वीप प्रवास की आख़िरी रात थी। अगले दिन हमको वापस लौटना था।
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