जलवायु विहार से ट्रांसपोर्ट नगर करीब 3.5 किलोमीटर दूर है। ऑटो का किराया 50 से 60 रुपए के बीच पड़ता है। कल 84 रुपए में ऑटो बुक हुआ। कारण पूछने पर ऑटो वाले ने बताया -"अरे वो "हनीसिंह आ रखा है। किसी नेता ने बुलाया है उसके कारण भयंकर जाम है।"
हनीसिंह के चक्कर में हमारे तीस-पैंतीस रुपए ज़्यादा ठुक गए। हमने पूछा ऑटो वाले से -"तुम नहीं जा रहे हनीसिंह का गाना सुनने।"
"अरे हनीसिंह हमको रोटी थोड़ी देगा। कमाना तो ख़ुद पड़ेगा"-ऑटो वाले ने कहा। सड़क पर जाम के कारण वह हमको उल्टी तरफ़ से लाया। स्टेशन से करीब सौ मीटर पहले उतारकर चला गया।
कानपुर लखनऊ रोड पूरा गाड़ियों से पैक था। हम मेट्रो स्टेशन की तरफ़ बढ़ लिए।
इंदिरानगर में मेट्रो उतरे। वहाँ से घर पैदल ही आते हैं। कल सामान था साथ में। सोचा ऑटो कर लेंगे। लेकिन फिर सामने एक बच्चा रिक्शेवाला दिख गया। सोचा उसी के साथ चलें। उसने बताया -"तीस रुपए लगेंगे। हमने देखा कि देने के पैसे हैं हमारे पास फुटकर कि नहीं। पैसे थे। बैठ गए रिक्शे में।"
रिक्शे में बैठते हुए दूसरे रिक्शे वाले ने टोंका -"ये ले नहीं जा पायेगा। हमारे साथ चलो।"
हमने उसकी बात को तरजीह नहीं दी। हज़रते दाग़ की तरह बैठ गए तो बैठ गए रिक्शे पर।
रास्ते में बच्चे से बातचीत करते आए। उसने बताया - "वह बाराबंकी से आया लखनऊ। दो महीना पहले। आठवां पास है। बाप बाराबंकी में कार मैकेनिक हैं। यहाँ किराए पर रिक्शा चलाता है। रात में फुटपाथ पर सो जाता है। खाना होटल में खा लेता है। एक दिन का रिक्शे का किराया पचास रुपए पड़ता है। करण नाम है बच्चे का। "
हमने पूछा कि तुमने अपने पिता से कार का काम क्यों नहीं सीखा। इस पर उसने कहा -"हमारा दिमाग़ै नहीं लागत है। कुछ समझै माँ नाई आवत है।( हमको कुछ समझ में ही नहीं आता है।"
कित्ते कमाई हो जाती है पूछने पर बताया -"सौ-दुइ सौ रुपया मिल जात हैं। वही माँ खाना -पीना हुई जात है।"
उसको यह भी पता है अब रिक्शे में लोग नहीं बैठते। लेकिन अभी कोई विकल्प नहीं उसके पास रिक्शा चलाने के अलावा इसलिए रिक्शा चला रहा है। जब बंद हो जाएगा तब देखा जाएगा।
घर पहुँचकर उसने हमको उतारकर स्टेशन पर मिले उस रिक्शेवाला का जिक्र किया जिसने उसके रिक्शा चालन कौशल पर सवाल उठाया था। उसने कहा -"उई दारू पिए रहें। कहत रहैं हम रिक्शा न चला पइबे।"
हमसे पैसे लेने के बाद करन बोला -" रात के खाना भर के पैसा हुईगे । बीस-तीस रुपया और कमा लेव। सबेरे के नाश्ता का इंतजाम हुई जाई।"
हमने फ़ोटो लेने के लिए कहा तो वो खड़ा हो गया। लेने के बाद दिखाया उसको फ़ोटो तो बोला -"का करिहौ फ़ोटो?( फोटो क्या करोगे)।" हमने बताया कि ऐसे ही लिखेंगे। वह रिक्शे को पैडलियाते हुए चला गया।
एक खेलने कूदने की उमर का बच्चा घर से दूर अनजान शहर में रिक्शा चला रहा है। सुबह के नाश्ते के पैसे नहीं हैं उसके पास। उसको भरोसा है कि कुछ देर में कमा लेगा। इसी दुनिया में ऐसे लोग भी हैं जो दुनिया पर कब्जे के लिए लाखों लोगों को मरने-मारने के इंतजाम में लगे हैं। ऐसे लोगों के चलते ही करन जैसे लोग बच्चे समय से पहले बड़े हो रहे हैं। बूढ़े हो रहे हैं।
जो समाज हनीसिंह का गाना सुनने के लिए जाम लगा रहा है वही करनसिंह से रिक्शा चलवा रहा है।

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