Wednesday, November 26, 2014

सूरज भाई के साथ एक सुबह

सुबह उठे।अलसाये से लेटे रहे। दरवज्जा खोला तो देखा सूरज भाई पीपल के पेड़ के पीछे से झाँक रहे थे। पीपल के पत्ते जालीदार कुर्ते की तरह पहने। दिख भी रहे थे और नहीं भी दिख रहे रहे।लेकिन रौशनी उनके होने की गवाही दे रही थी।

अशोक का पेड़ पहली मंजिल तक दिख रहा है।किरणें अभी केवल ऊपरी पत्तों तक पहुंची हैं।अगली खेप में नीचे और फिर अंदर की पत्तियों तक पहुंचें शायद। विकास की तरह है यहां भी मामला। ऊपर ऊपर दीखता है।जरूरी नहीं अंदर तक भी पहुंचे।

सूरज की किरणें पानी के बर्तन पर पड़ रहीं हैं। प्लास्टिक के हैंडल पर पड़ती किरण की चमक किसी कान के कुण्डल से छिटकी हुई रौशनी की तरह लग रही है।इससे यही लगा की सूरज भाई डुप्लीकेट माल नहीं सप्लाई करते। 

प्लास्टिक का पानी बर्तन सामने कम लेकिन शीशे में ज्यादा चमक रहा है। आभासी चमक ज्यादा दिखती ही है भाई।

बगल के कर्नल साहब के अर्दली उनकी सेवा में लग गए हैं।जयहिंद साब कहते हुए मार्निंग नमस्ते कर रहे हैं।
अखबार बता रहा है कि मर्सिडीज ने 41 लाख रूपये की गाड़ी उतारी है। हम सोच रहे हैं अगले महीने साइकिल खरीद लें।

पता चला है कि संसद में कालेधन को लेकर जोरदार हंगामा हुआ। लोग यही पूछ रहे हैं -काला धन कहाँ है?
काला धन अगर बोल सकता तो शायद कहता- मोको कहाँ ढूंढें रे बन्दे मैं तो तेरे पास में।

संसद की बात चलते ही सूरज भाई चाय पीते हुए हमको धूमिल की कविता सुनाने लगे-
"हमारे देश की संसद
तेली की वह घानी है
जिसमें आधा तेल है
और आधा पानी है।"

हम वाह-वाह करते हुए और कविता सुनाने का आग्रह करते तब तक सूरज भाई लपककर आसमान में चमकते हुए अपनी ड्यूटी बजाने लगे।

सुबह के पास होने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा था।

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