Thursday, November 27, 2014

प्लेटफार्म पर मिलने वाली चाय और देश का चरित्र

"प्लेटफार्म पर मिलने वाली चाय से देश का चरित्र पता चलता है। यह देश कभी सुधर नहीं सकता।"

यह बात भीमसेन स्टेशन पर सुबह की चाय पीकर प्लास्टिक का ग्लास रेलवे की पटरी पर फेंकते हुए एक भाई साहब ने कही। चाय पांच रूपये की थी।ठण्डी भी थी।इसीलिए शायद भाई साहब गरम हो रहे थे।

हम कल चले जबलपुर से तो गाड़ी फुल भरी थी। RAC में साथ में एक स्वस्थ बाबा जी के साथ साझा सीट थी।60 साल की उमर के बाबा जी 36 साल पहले साधु हो गए थे।फतेहपुर के रहने वाले थे।हम बाबा जी से बतियाते हुए सीट के जुगाड़ में टहलते रहे टीटी के आसपास यह सोचकर कि कोई बर्थ खाली होगी तो झपट लेंगें।लेकिन आखिर में अंग्रेजी का 'अलास' कहकर सीट पर बैठ गए।

टीटी दूसरे डिब्बे में चला गया था।हम वहां भी गए। यह सोचकर कि वहां कोई बर्थ खाली होगी तो जुगाड़ लगाएंगे।वहां टीटी जी एक सवारी को पेनाल्टी लगा रहे थे।गणित बार-बार गड़बड़ा रहा था।1260 से होते करते जोड़ 1010 तक पहुंचा।तीन लोगों के परिवार में एक का टिकट कंफर्म नहीं था।यात्री का कहना था कि कायदे से केवल किराये का अंतर लेना लेना चाहिए टीटी को।टीटी का मत था नियम के हिसाब से पेनाल्टी पड़ेगी। कायदे और नियम में अंतत: नियम जीता। इस बीच यात्री ने अपने कई रिश्तेदारों के नाम गिना डाले टीटी को लेकिन टीटी चुपचाप पेनाल्टी बनाता रहा।

इस पेनाल्टी कथा में यात्री, टी टी , दर्शक और जिन लोगों के नाम यात्री ने बताया वे सब मिश्र, त्रिवेदी, शुक्ल घराने के ही लोग थे लेकिन पेनाल्टी होकर रही।इससे लगता है की रेलवे की पेनाल्टी में जातिवाद नहीं चलता। पेनाल्टी लगाने के बाद टीटी ने दो यात्रियों को कूपे के बाहर बर्थ पर बैठने की अनुमति दे दी। यात्रियों ने जबरदस्ती टाइप करते हुए पांच सौ रूपये टीटी के हाथ में ठूंस दिए।टीटी को यह गंदगी बर्दास्त नहीं हुई।उसने रूपये अपनी जेब के कूड़ेदान में फेंकते हुए ' स्वच्छ्ता अभियान ' में अपना विनम्र योगदान दिया।

लौटकर हम वापस आये तो बाबाजी बर्थ पर पाँव फैलाये बैठे थे।हमको देखकर पाँव समेट लिए।पहले तो बाबाजी के प्रति अवहेलना का भाव रहा।लेकिन फिर सोचा कि आशाराम और रामपाल की सजा इनको क्यों दें।यह ख्याल आते ही हमने सीनियर सिटीजन की उमर वाले बाबा जी को सीट पर लेट जाने को कहा।खुद बैठे रहे।भलमनसाहत दिखाने का मौका मिला।

साथ के एक यात्री परिवार हमारी हरकतों पर नजर रखे था। उससे हमारी यह भलमनसाहत बर्दाश्त न हुई।उसने अपनी दो छोटी छोटी बच्चियों को एक बर्थ पर लिटा दिया और अपनी सीट हमको दे दी। हमारी भलमनसाहत से बड़ी भलमनसाहत दिखा दी। हम थोड़ा ना नुकुर करते हुए बर्थ पर लेट गए।सो भी गए।

सुबह उठे तो भले परिवार को धन्यवाद देते हुए उनकी बच्चियों से भी बतियाये।बचपन की याद कविताएँ सबने सुनाईं। बाबाजी ने भी।

भीमसेन स्टेशन पर चाय वाला डायलॉग हुआ।पीछे देखा सूरज भाई एक तेल के वैगन के ऊपर बैठे मुस्करा रहे थे।उनको भी बर्थ नहीं मिली शायद। क्या पता कोई ऐसा परिवार मिला कि नहीं जिसने अपनी बर्थ उनको दे दी हो।

विदा होते समय मैंने बच्ची से कहा -तुम्हारे मम्मी,पापा का नेचर बहुत अच्छा है। यह बात उसने भागकर अपने पापा ,मम्मी को बताई। हम देख नहीं पाये लेकिन लगा कि यह सुनकर वे जरूर मुस्कराएं होंगे क्योंकि सूरज भाई के चहरे पर चमक बढ़ गयी थी।

कानपुर की सुबह महीने भर बाद देख रहे थे। खिली हुई धुप मानो कह रही थी-"झाडे रहो कलट्टरगंज।"

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