Sunday, April 12, 2015

मोगम्बो का कविता पाठ

बाबुषा कोहली नाम मैंने पहली बार करीब तीन साल पहले सुना था। हिन्दी ब्लॉगिंग में देश-विदेश में सम्मान समारोह आयोजित करने वाली एकमात्र विश्वनीय संस्था ने बाबुषा को कोई इनाम देने की घोषणा की थी। बाबुषा जबलपुर से हैं। मैं उसी साल जबलपुर आया था। मुझे लगा है कोई स्कूल में पढ़ने वाली बच्ची होगी। ब्लॉग लिखती होगी। बाद में पता चला कि वो स्कूल में पढ़ने वाली बच्ची नहीं बल्कि स्कूल में बच्चों को पढ़ाने वाली मास्टरनी हैं।

फ़िर फ़ेसबुक पर  बाबुषा से मित्रता हुई। उनकी कवितायें पढते रहे। बातचीत शुरु हुई। कई बार  ’मोगम्बो खुश हुआ’ कहा बाबुषा ने तो हमने उनका नाम ’मोगम्बो’ धर दिया।’मोगम्बो’ की कवितायें और अन्य अभिव्यक्तियां हम फ़ेसबुक पर बांचते रहते थे। कभी-कभी तारीफ़ की कर दिया करते थे- दूर से। दूर से इसलिये क्योंकि एक तो कविता के मामले में अपन का हाथ थोड़ा तंग है दूसरे उनकी  कविताओं के ज्यादा नजदीक जाने से डर लगता था। कौन जाने कब मोगम्बो अपनी किसी कविता के किसी हिस्से से नोंचकर चांद हमारी तरफ़ उछाल दें और कह दे- ’कैच इट’ या फ़िर किसी नदी को कोड़े की तरफ़ अपने सर के ऊपर नचाते हुये फ़टकार दें सागर के सीने पर जिसकी आवाज से हमारे कान सुन्न हो जायें।

बीच -बीच में बाबुषा की नासाज तबियत और घरेलू  परेशानियों और आत्मीयों के विदा होने  की खबरें आईं। उनके दौरान बातचीत हुई लेकिन मिलना नहीं हुआ। बाबुषा अपना घर हमेशा हाथीताल बताती और हम अगली बार जब भी पूछते तो कहते -"तुम्हारा घर रद्दी चौकी में है न!"

इस बीच खबर आई कि बाबुषा की कवितायें ज्ञानपीठ से छप रही हैं और उनको कविता का नवलेखन सम्मान मिलना तय हुआ है। बधाई-सधाई की धूम मची। इसी हल्ले में पता चला कि उनकी कविताओं पर बातचीत और अन्य आयोजन के साथ उनका कविता पाठ का जबलपुर में होना तय हुआ है। विवेचना रंगमंडल की तरफ़ से यह आयोजन होना तय हुआ है।

जबलपुर के साहित्य से जुड़े लोगों की यह बहुत अच्छी बात लगी मुझे कि वे आपस में एक-दूसरे से जुड़े रहने की कोशिश करते हैं। बुजुर्ग साहित्यकारों का यथा सम्भव सम्मान बना हुआ है यहां। नियमित आयोजन होते रहते हैं। बाबुषा चूंकि  फ़ेसबुक और ब्लॉग की दुनिया से छापे की दुनिया में आईं और खुलकर सामने आने से कतराती रहीं अब तक इसलिये यहां साहित्य से जुड़े लोगों को उनके बारे में उतना पता नहीं रहा हो शायद। लेकिन जब ज्ञानपीठ के जरिये पता चला तो उनकी कविता पर बातचीत का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम की शुरुआत थोड़ी लेट हुई। मोगैम्बो जाम में फ़ंस गया था। उनके आते ही कार्यक्रम शुरु हुआ। पहले मनोहर बिल्लौरे जी के कविता संग्रह ’गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध’ का विमोचन हुआ। बिल्लौरे जी ने अपनी दो कविताओं का पाठ भी किया। उनकी कविता गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध की पंक्तियां हैं:


कैसे पीते हैं मूल-रोम
खनिज-जल, जाता है
कैसे पानी नीचे से ऊपर
ऊंचे पेड़ों की फ़ुनगी तक
गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध
जानना चाहता हूं।

 बाबुषा की कविताओं पर तरुण गुहा नियोगी ने बहुत अच्छा बोला। उन्होंने बाबुषा की कई कविताओं के उद्धरण देते हुये इस जिद्दी सी कवियत्री की रचना प्रक्रिया और अन्य पहलुओं पर विस्तार से बातचीत की। बाबुषा की पीढी की अन्य कवियों के उद्धरण देते हुये इनकी कविताओं की खासियत की तरफ़ इशारे किये। अनूठे बिम्ब विधान, समकालीन मोहभंग की स्थितियों के वर्णन के साथ आने वाले समय में आशावादी आसमान की तरफ़ उड़ने के हौसले के बीज हैं बाबुषा की कविताओं में।

बाबुषा की कविताओं पर बातचीत खतम करते हुये तरुण गुहा नियोगी ने उनको सावधान करते हुये इशारा किया कि अपनी कविताओं के बिम्ब विधान और अपने ही बनाये ताने-बाने की गिरफ़्त से बचने के लिये सचेत रहने की भी आवश्यकता है बाबुषा को।

विवेचना रंगमंडल के कलाकारों ने बाबुषा की दो कविताओं की गायन प्रस्तुति भी की।इसके बाद बाबुषा ने अपनी कई कविताओं का पाठ किया। कविता पाठ के दौरान वे बताती रहीं ये कविता इस तरह हुई। कविता हुई। कवितायें हुईं जैसे बच्चियां हों कवियत्री की। कविताओं के होने की पृष्ठभूमि बताते हुये कि कविता कैसे हुई मोगैम्बो ने कई  सुनाई। सबसे अच्छी कविता मुझे ये लगी:

धड़ाम से ज़मीन पर गिरते 'बीपी' को उठा कर
डायरी वाले पलंग पर लिटा देना
'माइग्रेन' की एक नस खोल लेना कान के पीछे से
उड़ते पन्नों की तुरपाई करना
कविता पाठ के दौरान अपनी रचना प्रक्रिया, काफ़्काई बुखार और  अजीज मित्रों का जिक्र करते हुये बाबुषा ने कई कवितायें सुना डालीं। लोगों ने मन से सुनी भी। दाद भी दी। शुरुआत में बाबुषा की   अजीज मित्र प्रगति पांडे ने बाबुषा की कविताओं पर बातचीत करते हुये उनकी गुंडागीरी का हवाला दिया कि जब भी बाबुषा की तबियत नासाज होती है तो हालचाल पूछने पर उनको बाबुषा की दो-चार कवितायें सुननी ही पड़ती हैं। तरुण गुहा जैसे ही बाबुषा की कविताओं पर बोलने के लिये खड़े हुये वैसे ही स्पीकर धड़ाम से गिरा। इस पर उनकी सहेली ने कहा- "बाबुषा जहां हों वहां भूकम्प न आये ऐसा हो ही नहीं सकता।"

 ’भूकम्प जनरेटर’ बाबुषा अपने खास मित्रों ’प्रतिभा कटियार ,प्रगति पांडे और विवेक भैया’ को समर्पित कविता पढते हुये भावुक टाइप हो गयीं। दो घूंट  पानी पीकर उन्होंने मामले को रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश की थी लेकिन पता तो सबको चल ही गया था कि मोगम्बो की आंख के इनबॉक्स में सागर लहराया सा है।

अध्यक्षीय भाषण देते हुये श्रीमती शुभदा पाण्डेयजी ने महादेवी वर्मा से जुड़े कुछ संस्मरण सुनाये। इसके बाद तिवारी जी ने बहुत शानदार वक्तव्य दिया।

हाल में विनय अम्बर के बनाये बाबुषा की कविताओं के कई पोस्टर थे। पंकज स्वामी का संचालन बहुत अच्छा रहा।

इस इतवार और 14 तारीख के बीच में सोमवार की एक छुट्टी लेने से तीन दिन की छुट्टी मिल सकती थी। लेकिन हमें इसी शहर में रहना है बाबुषा के कविता कार्यक्रम और कल होने वाले व्यंग्य कार्यक्रम के चलते हमने ये छुट्टियां कुर्बान कर दीं। कार्यक्रम से लौटकर लगा ठीक ही किया।

बाबुषा को उनके ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार की फ़िर से ढेर सारी बधाईयां। वे  खूब खूब लिखें। खूब खूब छपें। इसी तरह के कविता आयोजनों में उनसे रूबरू हम सुनते रहे- "और इस तरह यह कविता हुई।"



मेरी पसंद

 धड़ाम से ज़मीन पर गिरते 'बीपी' को उठा कर
डायरी वाले पलंग पर लिटा देना
'माइग्रेन' की एक नस खोल लेना कान के पीछे से
उड़ते पन्नों की तुरपाई करना
कविता में रख देना 'ट्राइका' इस तरह
कि रतजगे की मारी आँखों को कमस्कम 0.25mg नींद नसीब हो
'बारिश' लिखना यूँ कि कोई ढूँढने लगे छाता
'आग' लिखना ऐसे कि कोई लफ़्ज़-लफ़्ज़ आँच में झुलसे
'क्रांति' लिखना कि सड़कों पर कारों से ज़्यादा दौड़ें विचार 
और अपराध-बोध सी लगे सुबह-सुबह रेडियो मिर्ची पर
RJ आश्विन की 'गुड मॉर्निंग'
'बेचैनी' यूँ लिखना कि मानो हर ट्रैफ़िक सिग्नल पर 
जलती मिल रही हो रेड लाइट
'बच्चा' ऐसे लिखना कि साइज़ ज़ीरो औरत भी अपने पेट पर महसूसे 
अठमासे उभार की धुकधुकी
'दुआ' लिखने से पहले तोड़ देना चार तारे
और चूरा गिलास में घोर-वोर के पी लेना
लिखना महबूब की आवाज़
कि जिस्म रोएँ के काँटों से भर जाए
और आँखों में महक उठे गुलाब
'प्रार्थना' ऐसी लिखना कि टूट जाए ईश्वर की नींद
मगर जिस दिन लिखना 'टू मिनट्स मैगी नूडल्स'
अपनी कलम की नोक तोड़ कर नर्मदा में फेंक आना
आराम करना सुकून मनाना साँस लेना
बा बु षा !
क़सम इस 'काफ़्काई बुखार' की 
लिखना जब भी
थर्मामीटर की रगों में दनदना के चढ़ते हुए पारे को स्याही कर लेना
लिखना 'प्यास' फिर 'पानी'
[ लिखना जब भी.. ]

-बाबुषा कोहली



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2 comments:

  1. आखिर आपसे कब तक छुपी रहती -सुवरण को खोजत फिरत
    और बाबू जी कवियत्री को सुधार लीजिये -बिजली सी कौंध गयी दो बार पढ़ते हुए!

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  2. बाबुषा कोहली जी के बारे में बहुत बढ़िया ब्लॉग पोस्ट प्रस्तुति हेतु आभार!

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