Monday, April 27, 2015

नम्बर तो ले लीजिये

आज दोपहर को पुलिया पर ये भाई मिले। सुस्ताते हुये। स्प्लेंडर मोटर साइकिल पर जाली दार प्लास्टिक के कवर की हमने तारीफ़ की तो खुश हो गए। बोले -बैठकर,चलाकर देखिये। हमको चलाना तो था नहीं। बस बात शुरू करना था सो तारीफ कर दिए और शुरू हो गया वार्तालाप। किसी व्यक्ति से जुड़ी किसी वस्तु की तारीफ़ करना शुरू करते ही बात की गाडी स्टार्ट हो जाती है। तबियत और हाल चाल,खासकर बुजुर्गों के साथ, भी संवाद शुरू करने का एक तरीका होता है।

प्रीतम सिंह नाम है भाईजी का।मनगवां में रहते हैं। ईंट, मिट्टी,... मौरम आदि ढोने का काम करते हैं। दो छोटे ट्रक हैं टाटा- 407 । एक पहले किसी दूसरे का था। किराए पर खुद चलाते थे। फिर एक अपना ट्रक खरीद लिया किस्तों में। ढाई साल में किस्तें चुका दीं। अब दो ट्रक हैं।

ड्राइवर रखा है। ड्राइवर को 1000 रूपये प्रति हफ्ता ड्राइवरी के और 1500 प्रति हफ्ता मजदूरी के देते हैं। मिट्टी के 700 रुपया ट्राली होते हैं। इसके ऊपर अगर ड्राइवर कमा ले तो वह उसका। और भी तय कमाई में से ऊपर ड्राइवर कमा ले तो उसका हिसाब नहीं लेते। वह कमाई उसकी।

35 साल के प्रीतम की शादी शायद लेट हुई। दो बच्चे हैं।बिटिया बड़ी है।चार साल की। लड़का और छोटा है। हमने पूछा-मोटर साइकिल पर पत्नी को कभी घुमाने ले जाते हो कि नहीं। इस पर प्रीतम ने बताया-हाँ, ले जाते हैं न!
इतना बतिया कर हम फैक्ट्री को चल दिए। पीछे से प्रीतम बोले-'मट्टी ,मौरम की जरूरत हो तो बताइयेगा।'हम बोले- 'हाँ, बताएँगे।' इस पर वो बोले-'नम्बर तो ले लीजिये।' हमने कहा-'नाम याद है। प्रीतम सिंह को पूछ लेंगे।जब जरूरत होगी तब।'

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