Sunday, April 12, 2015

पुल पार करने से नदी पार नहीं होती

आज सुबह जरा आराम से उठे। उठकर साइकिल लेकर निकल लिए। चाय की दूकान पर गाना बज रहा था-
फूल तुम्हें भेजा है खत में
 फूल नहीं मेरा दिल है।

पता नहीं एस एम एस और ईमेल के जमाने में खत कौन भेजता है। लेकिन गाना जबर लगता है। प्रेममय।

बगल में दो बच्चे चाय पीते हुए एक पालीथीन से नमकीन हथेली में भर भर कर खा रहे थे। पता चला वे गया से
जबलपुर भर्ती के लिए इम्तहान देने आये हैं। सीधे स्टेशन से आये हैं। सेंटर पास में ही है। भर्ती हमारे यहां ही होनी है। महीनों से इंतजामात हो रहे हैं। साथी लोग सुबह ही दफ्तर और वहां से इम्तहान सेंटर निकल चुके हैं।
चाय की दूकान से पहले वापस लौटने की सोची। फिर आगे बढ़ गए। शहर की तरफ।सतपुला होते हुए निकले। जीसीऍफ़ फैक्ट्री की तमाम संस्थान,इमारतें देखते हुए।100 साल हुए करीब इसको बने हुए। शहर के इतिहास का जरूरी हिस्सा है। अनगिनत लोगों की यादें और किस्से जुड़े हैं यहां से। बताते हैं कि महेश योगी महर्षि होने के पहले जीसीएफ फैक्ट्री के मुलाजिम थे।


आगे सड़क के किनारे लगे घरों की महिलाएं देहरी के पास खड़ी,बैठी बतियाती दिखीं। लाइन से छोटे छोटे बने घरों के बाहर आपस में बतियाती महिलाओं को देखकर लगा कि दुनिया में सबसे ज्यादा बतकही महिलाओं द्वारा की गयी हो शायद अपने घर की देहरी के पास बैठे हुए।

सदर पारकर देखा कि दो साइकिल सवार साइकिल किनारे खड़ी किये बतिया रहे थे। बात करते हुए एक आदमी मोबाईल का सिम बदल रहा था।पूछने पर पता चला कि वे मकान बनवाने के काम में सहायता देने वाले कामगार हैं। घर से खाना लेकर निकले हैं। शाम तक लौटेंगे।


ग्वारी घाट के पास सब्जी मार्केट से लोग सब्जी खरीद रहे थे। सब्जी वाले सड़क के किनारे लाइन से बैठे थे। सड़क के डिवाइडर की तरह।

ग्वारी घाट पर एक मिठाई की दूकान पर नास्ता किया।दूकान वाले ने बताया -"पांच पीढ़ियों से यह दूकान चल रही है। प्रेमनाथ आते थे तो हमारे दादा जी के साथ चाय पीते थे। यहीं बगल में घर है प्रेमनाथ का।"

आने-जाने वालों से नर्मदे हर कहते हुए अभिवादन करते हुए दूकान वाले ने 'कक्कड़ भर्ता' के बारे में बताया। दाल बाटी को यहां 'गक्कड़ भर्ता' कहते हैं।समोसा जलेबी के 17 रु लगे।


ग्वारी घाट से वापस लौटने की सोचते सोचते साइकिल नाव में धरकर नदी पार कर गए। नदी यहॉ 15 फ़ीट करीब गहरी है। नाव वाले से पूछा कितने फेरे करते हो दिन में तो बोले-कभी गिनती नहीं की।

नदी पार करते हुए नरेश सक्सेना की कविता पंक्ति याद आई:
पुल पार करने से
नदी पार नहीं होती।

नाव से ही देखा एक महिला नदी में उतरी। पीठ के बल लेटने वाली मुद्रा में डुबकी लगाई नदी में। लगा अब तो गई। लेकिन वह पांच सात डुबकियां लगा कर बाहर निकल आई। वहीं कपड़े बदलकर घर चली गयी।

पार उतरकर देखा नदी में तमाम लोग नहा रहे थे। कुछ लोग डुबकियां लगाते हुए,कुछ छप्प छइयां करते हुए।एक बुजुर्गवार नदी के किनारे ऊंचाई पर बैठे हुए निर्लिप्त भाव से सुट्टा लगा रहे थे। मैं उनको देखते हुए और नर्मदा जी को नमन करते हुए आगे बढ़ गया।

नर्मदे हर।
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