Wednesday, April 22, 2015

चाय की दूकान पर अड्डेबाजी

चाय की दूकान पर 'रेडियो धमाल 24 ऑर' बज रहा है।
गाना बज रहा है:

"ईश्वर सत्य है
सत्य ही शिव है...
शिव ही सुंदर है"


गाना आगे सत्यम शिवम् सुंदरम पर पहुंच जाता है।दोहराता है। सुन्दरम्। सुन्दरम्।

चाय वाला भी दोहराता है-"सत्यम शिवम् सुंदरम।"

दुकान पर बैठे बच्चे की बगल में बैठकर कहते हैं-"मोबाइल बड़ा अच्छा है।"

" मोबाइल नहीं ये आईफोन है।" वह हंसते हुए बताता है। गाना सुन रहा है-"जीवन पानी पानी।"

14-15 साल उमर होगी।दांत गुटका मसाला खाने से खराब हो गए हैं।अब छोड़ दिया। बरात में फ्लावर डेकोरेशन का काम करता है। खुद का काम। डुमना एयरपोर्ट के पास एक जगह से लौटे हैं काम करके।

गुटके की बिमारी इतनी आम है कामकाजी बच्चों में कि कोई नहीं खाता दीखता तो ताज्जुब होता है। खाना शुरु करते हैं। आदत पड़ जाती है। फिर छोड़ नहीं पाते।

"वर दन्त की पंगत कुंदकली
अधराधर पल्लव खोलन की।"

जब रचा गया होगा तब गुटके का चलन नहीं होगा।होता तो कवि जरूर कुछ गुटका सौंदर्य वर्णन करता।
गाना बज रहा है:

"सावन का महीना पवन करे शोर
जियरा झूमे ऐसे जैसे वन में नाचे मोर।"

बगल में एक भाई जी आ गए हैं।साइकिल के साथ देखकर साईकिल के फायदे बता रहे हैं। घुटने ठीक रहते हैं। नींद अच्छी आती है।भूख खूब लगती है। हड़बड़ी में नहीं चलानी चाहिए। जीसीएफ में काम करते हैं। चार्जमैन हैं।20 साल की नौकरी है।

फैक्ट्री के बारे में बताते हैं। इंदिरा गांधी के समय तक फैक्ट्री अच्छी चली। फिर नई भर्ती बन्द हो गयी।ठेके पर मजदूर आते हैं। 300 रुपये पर दस्तखत कराकर 100 रुपया देते हैं। सब ऐसे ही चलता है।

गाना बजने लगता है:
जलता है बदन
हाय जलता है बदन।
प्यास भड़की है
सरे शाम से जलता है बदन।

सुबह के समय शाम का गाना बज रहा है। लगता है गाने अमेरिका के लिए चलाये जा रहे हैं। वहां शाम होगी न अभी। अमेरिका की बात से मन किया डायलॉग मार दें-"अपने यहाँ सब कुछ तो अमेरिका के लिये ही हो रहा है।" लेकिन फिर नहीं मारे। कोई कहेगा-"ऊँची बात खैंच दी सिरीमान जी ने।"

अगला गाना बज रहा है:
"दिल अपना औ प्रीत पराई
किसने है यह रीत बनाई।"

साथ चाय पीता एक बच्चा साईकिल की तारीफ़ करता है।चलाने के लिए चाबी मांगता है। हम दे देते हैं। वह साइकिल वहीं खड़े-खड़े चलाकर देखता है। इस बीच हम सोच डालते हैं-"साइकिल लेकर फ़ूट लिया तो क्या करेंगे।फोटो खींच लें क्या। चाय वाला तो जानता होगा।बाबा भारती, उनका घोड़ा और खड्गसिंह की कहानी हार की जीत याद कर डालते हैं।"

हम भीषण अविश्वास के दौर से गुजर रहे हैं। नकारात्मक भाव हर जगह मन में तम्बू ताने बैठे हैं।बच्चा साइकिल की चाबी वापस देता है तो हम नकारात्मक भावों को हड़का के भगा देते हैं।वो सब बेशर्मी से हीहीही करते हुए सीयू कहते हुए एक दूसरे पर गिरते पड़ते तिडी-बिड़ी हो लिए।

गाना बजने लगा:
तुझे जीवन की डोर से बाँध लिया है
तेरे जुल्मों सितम मेरे सर माथे।

साढ़े सात बज गए हैं। विजय अभी तक नहीं पहुंचा। लगता है देर से उठा या लम्बा निकल गया। कल शादी में गया होगा। वहां से देर से लौटा होगा। हम दो चाय का पैसा 10 रुपया देकर साईकिल उठाकर चल देते हैं।
पीछे बजता गाना सुनाई दे रहा है:
छोटी सी ये दुनिया
पहचाने रास्ते
तुम कभी तो मिलोगे
तो पूछेंगे हाल।


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