Thursday, April 30, 2015

घड़े पर नक्कासी

आज सबेरे पुलिया पर मटकी बेचने निकली महिलाओं से मुलाक़ात हुई। रिछाई में रहती हैं दोनों जनी। कंचनपुर बेचने जाती हैं मटकी । बीच में पुलिया पड़ी तो सुस्ताने रुक गयीं।

मटकी ये लोग कुम्हार से खरीदती हैं। 35 रूपये की एक। 45 से 50 रूपये तक की बिक जाती हैं। मतलब 10 से 15 रूपये एक मटकी पर मिल जाते हैं।बेचने निकली महिलाएं सास-बहू थीं शायद। बहुरिया की टोकरी में सात मटकी थीं। सास की टोकरी में दो। सास की उम्र और ओहदे के चलते बहू सास से ज्यादा मटकी ले जा रही थी।
सुबह 7 बजे करीब घर से निकलक...र 10 बजे तक मटकी बेंचकर घर लौट आएँगी। कोई मटकी टूट गयी तो पूरा ही नुकसान समझो। घर लौटकर फिर खाना बनाएंगी। गर्मी में मटकी का काम है। बाकी दिनों में मजदूरी करती हैं दोनों। इनके घर वाले भी मजदूरी करते हैं।

फोटो खींचने की पूछने पर बहुरिया ने पल्ला सर के ऊपर धरा फिर फोटो खिंचाई। लेकिन तब तक हम फोटो खैंच चुके थे।

घड़े पर नक्कासी देखिये कितनी सुन्दर है।

साथ वाली बहन जी किसी बैग दबाये बगल में किसी सवारी के इंतजार में हैं।

यह पोस्ट सटाकर हम भी निकल रहे हैं स्टेशन के लिए। कानपुर की तरफ। आप मजे से रहिये। इस बीच कोई मटकी खरीदने के जाएँ तो ज्यादा मोलभाव के चक्कर में न पड़े।
 

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