Friday, April 24, 2015

करवटें बदलते रहे, सारी रात हम



रोहित् और् अभिषेक
सुबह उठ गए वही 5 बजे। 6 बजे तक करवटें बदलते रहे।सोचा गाना लिख दें-

"करवटें बदलते रहे, सारी रात हम"

लेकिन नहीं लिखे। हर कोई कहेगा-झूठ,झूठ,झूठ। सच ही तो है कि यह झूठ है। सो नहीं लिखे।

आज फैक्ट्री के सेक्टर एक की तरफ निकले साइकिल चलाने। लौट कर गेट नम्बर एक के पास चाय की दुकान पर रुके। दूकान पर एक कड़ाही में समोसे तले जा रहे हैं। संसद भवन के आकार की कड़ाही में समोसों का कोरम पूरा है। सब खौलते तेल में एक ही जगह पर धँसे एक दूसरे को ठेलते से लगते हैं। कड़ाही का खौलता तेल देखकर लग रहा है बहुत तेज बहस हो रही है समोसों में आपस में।

संसद की बात चलते ही धूमिल की कविता भागती हुई आती है और धप्प से बैठ जाती है स्क्रीन पर:

"हमारे देश की संसद
तेली की वह घानी है
जिसमें आधा तेल है
और आधा पानी है।"

चाय की दूकान और उसके आसपास चट्टानों पर बैठकर बतियाते लोगों को देखकर जेएनयू का गंगा ढाबा याद आता है। उन चट्टानों पर बैठकर अनगिनत लोग क्रांति, बदलाव, धर्म,राजनीति और समाज पर अंतहीन बहसें करते हैं। यहां बैठकर लोग नौकरी, मंहगाई, डीए, लड़कियों की शादी,बच्चों के भविष्य की बातें करते हैं।गंगा ढाबा का उत्तर आख्यान है यह ढाबा।

दो बच्चे अपनी अपनी मोटर साइकिलों पर बैठे पोहा जलेबी का नाश्ता कर रहे हैं।रोहित और अभिषेक।दोनों 'राज एक्सप्रेस' अखबार में प्रिंटिंग सेक्सन में काम करते हैं। रात की शिफ्ट से छूटे हैं। अखबार की छपाई के बारे जानकारी लेते हैं उनसे।अखबार का पेज सिविक सेंटर के आफिस में बनता है। छपाई रिछाई में।एक लाख करीब छपता है अखबार।रीवा,सतना,छिंदवाड़ा तक जाता है।

अभिषेक की आँख में मोटा चश्मा है। पावर -13 और -11 है।प्रिंटिंग में डिप्लोमा हैं।पहले एक डाक्टर के यहां एक्सरे बनाने का काम करते थे। उसका पानी आँख में चला गया तो आँख खराब हो गयी।इलाज कराना है।पिताजी पिछले साल खमरिया से रिटायर हुए। बम सेक्सन में काम करते थे।आँख के इलाज के लिए जाएंगे दो महीने में।

रोहित के पापा जीसीएफ में काम करते हैं।पैटर्न मेकर हैं।इंटर करके अखबार में आ गए।चार साल का अनुभव है काम का।

अख़बार की छपाई का काम रात भर चलता है। जिस दिन पत्रिका छपती है उस दिन और देर हो जाती है। हफ्ते में एक ब्रेक मिलता है।जब कभी गलती हो जाती है तो इंचार्ज झल्लाता है। लेकिन इसका बुरा नहीं मानते। गलती होने पर गुस्सा तो आएगा ही। वैसे भी काम करते हुए गलती हो जाना स्वाभाविक है।

दोनों बच्चों के पिता आर्डनेंस फैक्ट्री से सम्बंधित हैं। दोनों की नजर में फोरमैन बहुत बड़ा पद होता है।यह पद खत्म हुए एक दशक से ज्यादा हो गया है।दोनों बच्चे फैक्ट्री में भर्ती के बारे में जानकारी लेते हैं। लेबर की भर्ती कब होगी। लेबर की भर्ती जाने कब बन्द हो चुकी है। केवल मृतक आश्रित लोग भर्ती होते हैं इसमें। लेबर के सब कम ठेके पर होते हैं। ठेका न होने पर काम ठप्प हो जाते हैं।

चाय पीकर दोनों पास की पान की दुकान की तरफ जाते हैं।मीठी सुपाड़ी खाने। हम उनको समझाते हैं यह सब मत खाया करो। नुकसान करता है। आज ही अख़बार में पढ़ा कि एक पान मसाला वाला पान मसाले की टेस्टिंग के लिए मसाला खाता था। आदत पड़ गयी। 25 पुड़िया रोज खाने लगा। मुंह का कैंसर हो गया। उसके इलाज के बाद उसने पान मसाले का धंधा बंद कर दिया।

पान मसाले की बुराइयां सबको पता होती हैं। लेकिन लोग आदत के चलते छोड़ नहीं पाते। जान के जोखिम पर जब छोड़ते हैं तब तक बहुत देर हो जाती है अक्सर। यही लगता है:

"सब कुछ लुटा के होश में आये तो क्या हुआ"

बच्चे जाते समय अखबार की एक प्रति मुझे देते हैं। उनको दो प्रतियां मिलती हैं।अखबार की मुख्य खबरें आप भी पढ़िए:

1.संसद से सड़क तक गजेन्द्र की मौत की गूँज
2.बीस करोड़ के कोयले की चोरी उजागर
3.राहुल ने शुरू की केदारनाथ की पैदल यात्रा
4.बीएसएनएल फोन से रात में करें मुफ़्त बातें
5.विवेक मूर्ति बने अमेरिका के सर्जन जनरल
6.चेतन भगत पर एक करोड़ का मुकदमा
7.सैंड्रा बुलाक सबसे खूबसूरत महिला
8.जेल में आशाराम से मिले सुब्रह्मण्यम

चेतन भगत पर मुकदमा उनकी किताब 'हाफ गर्लफ्रेंड' वर्णित अपमानजनक संदर्भ को लेकर मुकदमा पूर्व प्रिंसली स्टेट डुमरांव राजघराना के युवराज चन्द्र विजय सिंह ने किया है। कल उदय प्रकाश @Uday Prakash जी की कुछ कहानियों के बारे में चर्चा होने पर Samar ने बताया कि उन्होंने अपने समकालीनों का किस तरह जिक्र किया है। जिनका जिक्र हुआ उन लोगों ने उदय जी पर मुकदमा नहीं किया। किया होता तो वे किताबें खूब बिकतीं और तब शायद उदय जी अपनी 'ग्रीबी' (अश्क जी यही कहते थे अपनी गरीबी को)का इतना स्यापा नहीं करते शायद।

यह लिखते हुए उदय प्रकाश जी किताब 'ईश्वर की आँख' पलटता हूँ। उनके लेख " ब्रह्मराक्षसों की छायाएं गांधीजी की चप्पलें पहने घूम रहीं हैं" से कुछ अंश पोस्ट करने की सोचता हूँ।फिर सोचता हूँ शीर्षक काफी है।
एक और लेख "सरकारें पलटती हैं जहां हम दर्द से करवट बदलते हैं " में उदय प्रकाश जी ने बचपन में खुद के सोन नदी में डूबने से बचने की घटना का जिक्र करते हुए लिखा है:

"सोन नदी के जल में मेरी वह अंतिम छटपटाहट अमर हो जाती। मृत्यु के बाद। लेकिन नदी की घाट पर कपड़े धो रही धनपुरिहाइन नाम की स्त्री ने इसे जान लिया। नदी की धार में तैरकर,खोजकर उसने मुझे निकाला और जब मैं उसके परिश्रम के बाद दुबारा जिन्दा हुआ ,तो उसे इतना आश्चर्य हुआ कि वह रोने लगी।

तब से मैं स्त्रियों को बहुत चाहता हूँ।सिर्फ स्त्रियां जानती हैं कि किसी जीव को जन्म या पुनर्जन्म कैसे दिया जाता है।"

इसी लेख में उदय जी ने अपने पूर्वजों की आयु सीमा का जिक्र करते हुए लिखा था कि उनके यहाँ कई पीढ़ियों ने 46 वर्ष की आयु रेखा को पार नहीं किया।यह भी कि सबकी मृत्यु कैंसर से हुई।

इस बारे में लिखते हुए उन्होंने लिखा-"यह सच है कि अब ,जबकि मैं चालीस पार कर रहा हूँ , दो शब्द सबसे ज्यादा मेरी चेतना में उपस्थित हैं-'मृत्यु' और 'कैंसर'।"

यह संयोग ही है कि जिस दिन मैंने उनका यह लेख पढ़ा उसके अगले दिन ही उनका 47 वां जन्मदिन था।मैं दिल्ली में था। मैंने उनको फोन करके बधाई दी थी -आपको बधाई कि आप अपनी कई पीढ़ियों द्वारा अलंघ्य आयु रेखा को पार कर रहे हैं। फिर उनसे मुलाक़ात भी हुई। सोलह साल पहले की यह बात ऐसे ही याद आ गयी।
कहां से टहलते कहां तक पहुँच गए। चलिए आप मजे कीजिये। हम भी चलते हैं दफ्तर। आपका दिन शुभ हो मंगलमय हो।


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