Sunday, April 19, 2015

आज से तो हमारी एकदम पक्की दोस्ती

"अंकल आप सच में कमाल लिखते हैं।।आपकी जितनी तारीफ़ करूँ उतना कम है...और आपको एक बात बताऊ आपकी सारी पोस्ट्स पापा को भी पड़वाती हूँ...वो फेसबुक नहीं न चलाते पर मैं प...ढ़वा देती हूँ.."
यह संदेश कल मुझे भेजा Garima Bhartiya ने। पढ़कर खुश हो गये। पार्टी में थे। खुशनुमा माहौल था। यह संदेश पाकर और खुशनुमा हो गया। धन्यवाद देकर हमने पूछा -मेरी किस तरह की पोस्ट अच्छी लगती हैं इस पर गरिमा का कहना था:

"आपका पुलिया स्पेशल तो बस क्या कहूँ लाजवाब है..बिना उस पुलिया को देखे ही ऐसा लगता है जैसे बचपन से रोज जाती हूँ वहां"

हमने ’अच्छा  :)’ लिखा । गरिमा ने आगे कहा-

"आप आँखों देखा जैसा वर्णन करते हैं न वो बस लाजवाव है"

हम तारीफ़ सुनकर खुश हो गये और लिखा:

"अरे हम तो शर्मा गए बच्चा इतनी तारीफ़ सुनकर :) "

इस बीच हमने बात करते हुये गरिमा का प्रोफ़ाइल देखा। बरेली में रहती हैं।" झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में" वाले शहर में। छोटी-छोटी दो लाइना कवितायें लिखती हैं। एक छोटी बहन है जो इस साल इंजीनियरिंग फ़ाइनल में है। खुद गरिमा ने  B.Sc. फिर MBA फिर NET किया हुआ है। इतनी पढ़ाई पर मैंने कहा- तुम तो मेहनती बच्ची हो।

इस पर बच्ची का उदासी वाला आइकन आया और बताया :

"मेरा AMU में हो गया था P.HD के लिए सिलेक्शन हो गया था पर जिस दिन वहां ज्वाइन करना था उससे दो दिन पहले मम्मी की डेथ हो गयी थी फिर नहीं जा पायी घर छोड़कर और कोई था नहीं सँभालने वाला। पापा और एक छोटी बहन हैं घर पर। पापा जी अध्यापक हैं सरकारी।बहिन का इस साल बी.टेक हुआ है। मम्मी भी सरकारी अध्यापक थीं। "

हमने कहा- तुम बड़ी हो गयी अचानक।

इस पर गरिमा ने लिखा- "होना पड़ता है।ज़िन्दगी सब सिखा देती है।"

यह पढ़कर बच्ची के प्रति मन में ढेर सारा प्यार उमड़ आया। लिखा भी- खूब सारा प्यार।

गरिमा के कोई भाई नहीं है। तो बचपन से सारी जिम्मेदारी अपने आप उठाई हैं।

बातचीत बच्ची के भविष्य के बारे में हुई। 6 महीने में शादी होने वाली है।लव मैरिज । ईशान से। पापा के साथ एकदम बेटे जैसे हैं।

मित्र हम काफ़ी दिन से थे लेकिन बात पहली बार हो रही थी। लेकिन खूब हुई। अंत में बच्ची ने घोषणा की- "आज से तो हमारी एकदम पक्की दोस्ती"

गरिमा ने एक शर्त लगाई- "आप कल सुबह वाली अपनी पोस्ट हमारी दोस्ती के ऊपर लिखेंगे।"

हमने कहा -कोशिश करेंगे।

बच्ची ने ताना मारा- "मुझे नहीं पता आप लिखेंगे। आप अपनी उस पुलिया पर लिख सकते हैं मुझ पर नहीं।"
हमने कहा-" लिखेंगे। पक्का। "

अभी सुबह उठकर याद आया कल गरिमा से वायदा अपनी दोस्ती के बारे में लिखने का। बच्चियों का जिक्र जब भी करता हूं तो मुझे अपने मित्र मुकेश तिवारी की कविता पंक्ति हमेशा याद आती है:

"बच्चियां अपने आप में मुकम्मल जहां होती हैं।"

आज अपनी बच्ची दोस्त के बारे में लिखते हुये दुष्यन्त कुमार की कविता भी याद आ रही है:
जा तेरे स्वप्न बड़े हों।
भावना की गोद से उतर कर
जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें।
चाँद तारों सी अप्राप्य ऊचाँइयों के लिये
रूठना मचलना सीखें।
हँसें
मुस्कुराऐं
गाऐं।
हर दीये की रोशनी देखकर ललचायें
उँगली जलायें।
अपने पाँव पर खड़े हों।
जा तेरे स्वप्न बड़े हों।


गरिमा उसके मंगेतर/प्रेमी और गरिमा की प्यारी बहन को प्यार, आशीर्वाद और मंगलकामनायें। गरिमा के पिता जी को आदर और शुभकामनायें।

गरिमा आठ बजे उठेगी। तब देखेगी कि हमने अपना वायदा निभाया। अभी तो हम जा रहे हैं साइकिल चलाने।

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