Thursday, March 10, 2016

टेसू के फ़ूल जमीन का श्रंगार कर रहे हैं

झील के पानी में छप्प-छैयां करते सूरज भाई
मेस से बाहर निकलते ही पक्षी बड़ी जोर से चिंचियाते दिखे। ऐसे जैसे ’विजय माल्या’ जी के विदेश निकल लेने पर बैंक हल्ला मचा रहे हों। आसमान में भी धुयें की एक लकीर दिखी। बड़ी तेजी से दूर से भागती हुई। हमको फ़िर माल्या जी याद आये। मतलब हाल यह समझिये कि जिसमें देखो उसमें ’माल्या-मूरत’ ही दिख रही थी- ’देश का पैसा लेकर भागता अमीर।’

सड़क पर एक परिवार टहल रहा था। देखते-देखते बच्चा आगे दौड़ने लगा। जमीन पर धप्प-धप्प करते जूते रखता। पीछे उसका पिता भागने लगा। कुछ दूर आगे जाकर पिता ने बच्चे को पिछाड़ दिया। बच्चा पलटकर भागने लगा। पिता फ़िर पलटकर बच्चे को पकड़ने की मुद्रा में उसके पीछे भागने लगा। बच्चे की मां पिता-पुत्र के ’मार्निंग-कौतुक’ को देखते एक समचाल से टहलती रही। गरदन थोड़ा बायीं तरफ़ किये हुये।

दिहाड़ी कमाने निकला कुम्हार
एक सरदार जी आंखों में धूप वाला चश्मा लगाये कोई भजन गाते हुये टहलते जा रहे थे। एक महिला और टहल रही थी। बहुत धीरे-धीरे। लग रहा था उसको गरदन में कोई तकलीफ़ है। पैर में भी। शायद मन में भी।
एक आदमी ठेले पर कुछ घड़े रखे बेंचने के लिये ले जा रहा था। लालमाटी जायेगा। एक घड़ा 70 रुपये का। बताया कि सब बिक जाते हैं घड़े। पहले महिलायें भी घड़े बेचने जाते दिखीं थीं। पर वे घड़े अपने सर पर ढोकर ले जातीं थीं। लेकिन आदमी लोग सर पर ढोकर बेंचने जाते नहीं दिखें। दोनों के काम करने की सुविधाओं में अंतर है। लैंगिग भेदभाव। एक ही काम के लिये महिला को सर पर ज्यादा बोझ ढोना होता है।


परदेशी और सुशीला चाय की दुकान पर
सूरज भाई तालाब में उतरकर नहा रहे थे। किरणों के साथ मिलकर पानी में ’छप्प-छैंया’ करते हुये सूरज भाई प्रमुदित और किलकित से दिख रहे थे। हमने कहा -’तालाब का पानी गन्दा करने के जुर्म में तुम पर भी जुर्माना ठुक जायेगा समझ लो सूरज भाई।’

इस पर सूरज भाई बड़ी तेज खिलखिलाकर हंसे। सब दिशायें भी उनके साथ हंस पड़ीं। इसके बाद उन्होंने मुस्कराते हुये अपनी शाश्वत धमकी दी-’ हम भी फ़िर अपनी ऊष्मा का शुरुआत से लेकर आजतक का बिल भेज देंगे। सदियों तक चुकाते नहीं बनेंगे।’ हम उनको मुस्कराते हुये पानी में नहाता छोड़कर चले आये।


दीपा पानी भर लाई
पंकज टी स्टाल पर काफ़ी दिन बाद जाना हुआ। एक बुजुर्ग आदमी और बुजुर्ग महिला साथ बैठे चाय पी रहे थे। जमीन पर। आदमी ने बताया कि साथ की महिला उसकी बहन हैं। बाद में पता चला सगी बहन नहीं- बहन सरीखी हैं। अपनी तरफ़ से बताया ताकि हम उनको पति-पत्नी न समझ लें।

पति-पत्नी समझा जाना समझ लो कितना खराब समझा जाता है। :)

दोनों रीवां के रहने वाले हैं। दोनों के जीवन साथी खत्म हो गये। बच्चे नहीं हैं। मांगते-खाते हैं। जीसीएफ़ के सामने बैठते हैं। दस-बीस-तीस रुपये मिल जाते हैं। उसी से गुजर बसर खाना-पीना हो जाता है।


सुबह की रसोई बनाते कामगार
परदेशी नाम है आदमी का। उमर साठ के ऊपर होगी। औरत के पेट में ट्यूमर था। दस साल पहले गुजर गयी। महिला का नाम सुशीला है। उनका पति सालों पहले गुजर गया। खून छरछराता था। एक ही जगह रहते हैं दोनों। खाना अलग-अलग बनाते हैं। पंकज ने बताया कभी -कभी चाय पिला देते हैं दोनों को। हमने भी चाय भर के पैसे दिये दोनों को और अपना काम खत्म समझा।

वहीं तीन लड़के चाय पीते हुये एक ही सिगरेट से बारी-बारी से सुट्टा लगा रहे थे। सरकार ने सिगरेट मंहगी करके युवा शक्ति को एक जुट होने का मौका दिया है।

दीपा से मिलने गये। उसके पापा ने कुंडम से आये कुछ लोगों को अपने ठीहे के पास बनाने-खाने की जगह दे दी। मतलब बुला लिया कि आओ बनाओ-खाओ। सबका अकेलापन दूर होगा।

कुंडम से आये लोग सुबह का खाना बना रहे थे। लकड़ी साथ लाये हैं। होली तक रुकेंगे। घर में सब लोग हैं। मां-पिता-बच्चे-पत्नी और परिवार। अभी वहां कोई काम नहीं तो यहां चले आये। 250 रुपये रोज के मिलते हैं।


बटलोई में आटा मांढ़ा जा रहा है
एक आदमी बटलोई में आटा मांड़ रहा था। दूसरा शीशे में खुद को निहार रहा था। हमने पूछा -’घर में भी खाना बनाते हो ऐसे कभी? ’ वो बोले- ’घर में बाई है न! बोई बनाती है। पर जब जरूरत पड़ती है तो बनाते भी हैं।’

दीपा पानी भरकर आ गयी। सर पर अल्युमिनियम की पतीली में पानी भरे। आज उसकी छुट्टी है। उसके पापा ने उसको नहाने के लिये चिल्लते हुये कहा। वह चुपचाप अंदर चली गयी। हमने उसके पापा से कहा-’ ऐसे चिल्लाया मत करो भाई। प्रेम से बोला करो।’ वह बोला- ’ प्रेम से बोलते हैं तो यह हमको बेवकूफ़ समझती है। बात नहीं मानती।’ कहने का मन हुआा (लेकिन कहा नहीं)-’ बेवकूफ़ तो हो ही तुम जो ऐसा समझते हो। प्रेम से बोलो तो बच्ची ज्यादा अच्छे से काम करेगी।’


टेसू के फूल जमीन का श्रंगार करते हुए
लौटते हुये क्रासिंग बन्द मिली। ट्रेन धड़धड़ाते हुये निकली। ओवरब्रिज के पास टेसू के पेड़ से फ़ूल नीचे झरे हुये पड़े थे। बहुत खूबसूरत लग रहे थे। अनायास पुष्प की अभिलाषा कविता याद आ गयी:

’मुझे तोड़ लेना वनमाली
उस पथ पर देना तुम फ़ेंक
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ पर जायें वीर अनेक”
चलिये। चला जाये। कर्तव्य पथ डट जाया जाये। कविता याद करते हुये:
’वह शक्ति हमें दो दयानिधे
कर्तव्य मार्ग पर डट जावें’
मल्लब अगर कोई कर्तव्य मार्ग पर नहीं डटा है और कोई उसको टोंकता है तो अगला तसल्ली से कह सकता है -"क्या करें भाई! दयानिधे से शक्ति की ग्रांट आई ही नहीं! कैसे डट जायें कर्तव्य मार्ग पर? शक्ति की ग्रांट आये तभी तो डटें।" ये दयानिधे हमारे खिलाफ़ षडयन्त्र कर रहे हैं  :)


सूरज भाई सुबह से कर्तव्यमार्ग पर डटे हुये हैं और हमको बहानेबाजी करता देखकर मुस्करा रहे हैं। सुबह हो ही गयी।
 https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10207499661063133

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