Tuesday, March 22, 2016

तुम्हें जीवन की डोर से बांध लिया है

फुटरेस्ट पर खड़े होकर बतियाते हुए बालक
सबेरे निकले साइकिल स्टार्ट करके तो पुलिया पर एक भाई अपना बदन तोड़ते दिखे। गरदन बड़ी दूर तक और देर तक घुमाई। ऐसा लगा मानो दिली तमन्ना गरदन धड़ से जुदा करके शरीर की सरकार अस्थिर करने की हो।

गरदन से फ़ुरसत हुये तो कमर पर हमला किया। इतनी घुमाई कमर मानो खोपड़ी पीछे करने का इरादा पक्का कर किया हो। पर अब शरीर के अंग कोई पार्टी के विधायक तो होते नहीं जो एक शरीर छोड़कर दूसरे में शामिल हो जायें। इसलिये बहुत कोशिश करने पर भाई साहब का शरीर एकजुट बना रहा।


सुबह की शाखा के स्वयंसेवक
एक महिला टहलते हुये बड़ी तेजी से हाथ हिलाते हुये जा रही थी। उसके हाथ कुछ छोटे से थे। ऐसा लगा कि तेज हाथ हिलाकर वह उनको कुछ लंबा करने की कोशिश कर रही थी। लेकिन हाथ उतने ही लम्बे बने रहे।
अभी सूरज भाई निकले नहीं थे लेकिन आसमान पर उजाला पसरा हुआ उनके आने की उद्घोषणा कर रहा था। सभी दिशाओं पर किरणों की सर्चलाईट मारते हुये बार-बार घोषणा सी कर रहा था -’हम सबके प्यारे जगतहृदय सम्राट सूरज भाई बस अभी पधारने ही वाले हैं।’

पक्षी चहचहाते हुये सूरज भाई का इंतजार कर रहे थे। कुछ तो गुस्से में चिंचियाते हुये भी दिख रहे थे मानो कह रहे हों--’ जल्दी आओ यार, देखकर फ़िर निकलें कुछ दाना-पानी खोजने के लिये।’


सेना का सामान लेकर जाती हुई मालगाड़ी
दीपा से मिलने गये आये। उसके पापा टमाटर काटकर सब्जी बनाने की तैयारी कर रहे थे। आसपास के कमाई करने के लिये आये लोग वापस अपने घरों को लौट गये थे। जाते समय ईंधन की बची हुई लकड़ी दीपा के पापा को दे गये थे। दीपा को जो किताबें कविता, कहानी की लाये थे उनमें से कुछ कवितायें उसने याद की हुई थीं। सुनाई भी हमको।

हमने पूछा- ’कैसे याद की?तुमको तो ठीक से पढ़ना आता नहीं।’

’मैडम ने पढकर सुनाई। हमने चीटिंग करके याद कर ली।’- दीपा ने बताया।

शोभापुर क्रासिंग बन्द थी। एक डम्पर का ड्राइवर बगल में रुके मोटरसाईकल वाले को बता रहा था कि चौराहे पर पुलिस वाले ने उससे 100 रुपये वसूल लिये। यह कहकर कि नो इंट्री लग गयी है। ड्राइवर को पता है कि नो इंट्री का समय नहीं हुआ था लेकिन अगर वह बहस करता तो डम्पर दिन भर के लिये थाने में खड़ा कर लेता पुलिस वाला इसलिये 100 रुपये थमा दिये पुलिस वाले को।


सूरज भाई का जलवा सब जगह है
नई दुनिया अखबार में खबर छपी है- ’प्रदेश में होगी सबसे स्मार्ट पुलिसिंग, ’वार रूम’ से सभी जिलों की निगरानी’। मतलब कोई वाहन इंट्री शुल्क चुकाये बिना अंदर नहीं घुसेगा शहर के।

ट्रेन आने में देर हुई तो मोटरसाईकल सवार बच्चा ड्राइवर सीट के फ़ुटरेस्ट पर खड़े होकर बतियाने लगा। उसकी टी शर्ट और पैंट में अलगाव हो गया। अंगप्रदर्शन टाइप होने लगा। होली का मौका होता तो कोई उसकी पैंट नीचे खींचकर ’बुरा न मानों होली है’ कहते हुये फ़ूट लेता।

देखते-देखते बच्चा ड्राइवर की तरफ़ का दरवज्जा खोलकर अंदर बैठकर बतियाने लगा। जब ट्रेन निकली तो नीचे उतरा। उसकी फ़ोटो उसको दिखाई तो बडी तेज हंसा। इसके बाद वह मोटरसाईकिल और अपन अपनी साईकल स्टार्ट करके आगे बढ़ गये।

व्हीकल मोड़ की तरफ़ जाते हुये शाखा पर चार लोग दिखे। साइकिल सड़क पर खड़ी करके उनसे बतियाये। तीन बच्चे और एक युवा थे शाखा में। बच्चे कह रहे- ’आज भैय़ा जी देर से आये।’ कक्षा 6, 8 और 9 में पढ़ते हैं बच्चे। हमने कहा - कक्षा 7 का कोई बच्चा नहीं। हम 7 में पढ़ने लगते हैं ताकि क्रम बन जाये। सब हंसने लगे।
बच्चों के नाम पूछे तो बच्चों ने सावधान मुद्रा में खड़े होकर बताये। हर्ष राजभर, निखिल दुबे और एक नाम बिसर गया। भाई जी निखिल परस्ते 2008 में जबलपुर इंजीनियरिंग कालेज से पढाई करके फ़िलहाल मध्य प्रदेश पावर कारपोरेशन में काम करते हैं।

सुबह 630 से 730 तक का समय है शाखा का। झंडा वंदन,सूर्य नमस्कार, योग आदि के बाद फ़ुटबाल खेलने का प्लान था। हमने पूछा- ’आप लोगों की तो ड्रेस बदल गयी। पर आप अभी तक हाफ़ पैंट में हैं। इस पर निखिल ने बताया कि अभी आधिकारिक तौर पर नहीं बदली ड्रेस। जब बदलेगी तब पहनेगे।

हमने पूछा- ’आप दो चार ही लोग दिखते हैं शाखा में। कितने लोग जुड़े हैं इस शाखा से?’

15-20 लोग जुड़े हैं। लोगों की जाब लग गयी कहीं बाहर इसलिये कम हो गये लोग लेकिन आते रहते हैं कभी-कभी। -निखिल ने जानकारी दी।

”कोई आर्थिक सहायता भी मिलती है किसी से शाखा लगाने के लिये’- मैंने पूछा।

’ सब कुछ स्वयंसेवक को ही करना होता है। कोई सहायता नहीं मिलती कहीं से।’ निखिल ने बताया।

चलते हुये फ़ोटो खींची। झंडा निखिल के ठीक पीछे था। एक बच्चे ने मजे लेते हुये कहा- ’ ये भैया जी की टोपी है।’

चाय की दुकान पर एक आदमी अकड़ा सा बैठा चाय पी रहा था। हम भी सिकुड़कर उसके बगल में बैठ गये। चुपचाप चाय पीते रहे। बगल में रेल की पटरी पर एक मालगाड़ी खड़ी थी।खमरिया फैक्ट्री से 84 एम एम बम लेकर जा रही थी। 70 साल पुरानी रेललाइन से दो डब्बे पटरी से उतर गए। रेल लाइन की मरम्मत के बाद आगे बढ़ेगी गाड़ी।

लौटते हुये देखा कि शाखा में एक और जुड़कर कुल पांच लोग हो गये थे। आपस में फ़ुटबाल खेल रहे है।

झील के पास जाकर देखा सूरज भाई अपनी किरणों को फ़ैलाये पूरे तालाब पर अपना कब्जा कर लिये थे। ऊपर और नीचे दोनों जगह चमक रहे थे। सुबह हो गयी थी।

गाना बज रहा है:
’तुम्हें जीवन की डोर से बांध लिया है
तेरे जुल्मों सितम सर आंखों पर।’

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1 comment:

  1. कितने ही रंग नज़र आते हैं सुबह की सैर में
    बहुत सुन्दर

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