Thursday, March 31, 2016

रण्डी की कदर हिजड़ों ने खो दी

चेन्नई के भोपाली ड्राइवर संस्कारधानी में
आज बहुत दिन बाद साइकिल स्टार्ट हुई। जैसे मार्च के महीने में लोग राज्य सरकारों में बाबू लोग कोटेशन, बिल, बाउचर तैयार करके रखते हैं और ग्रांट आते ही पूरी हिल्ले लगा देते हैं वैसे ही हमारी साईकल पैडल मारते ही फ़रफ़रा के चल दी।

मेस के बाहर कुत्ता मिला। कान फ़ड़फ़ड़ाकर बायीं टांग से पीठ खुलाई और सड़क पर दुलकी चाल से टहलने लगा। जब उसने अपनी पीठ खुजाने के लिये टांग उठाई तो मुझे लगा कि मुझे सलाम करने के टांग उठा रहा है। यह गलतफ़हमी तमाम लोगों को होती है। धिक्कार मुद्रा में उठे हाथ को समर्थन में उठे हाथ प्रचारित करके झांसेबाजी करते हैं।

एक आदमी सर ऊंचा करके आसमान की तरफ़ देख रहा था। मुझे लगा शायद कोई ऊंची बात सोचने की कोशिश में है। लेकिन बाद में पता चला कि वह कनेर के पेड़ से कनेर का फ़ूल तोड़ने के उचकने के लिये सही जगह खोज रहा था।

बाहर पुलिया पर दायीं पुलिया (जिसको हम बुर्जुआ पुलिया कहते हैं) पर एक बुजुर्ग आरामफ़र्मा थे। बायीं तरफ़ की सर्वहारा पुलिया पर तीन बच्चे टहलने के बीच बैठे थे। एक लड़का कान में मोबाइल तार (ईयर प्लग) घुसाये कुछ सुनते हुये दोस्तों को कुछ और सुना रहा था। मोबाइल चलने के साथ पावरबैंक से चार्ज भी हो रहा था।

चाय की दुकान पर तीन ड्राइवर बैठे चाय पी रहे थे। दो मद्रास से और एक कोटा से था। चाय के साथ बीड़ी पीते हुये आपस में बतियाते भी जा रहे थे। सुलगती हई बीड़ी उलटी करके हथेली में ऐसे छिपा रखी थी ड्राइवरों ने जैसे राजनीतिक पार्टियां विधान सभाओं में शक्ति परीक्षण के पहले अपने विधायक छिपाकर रखती हैं।

मद्रास वाला ड्राइवर के बातचीत में पेले (पहले), के रे हैं (कह रहे हैं) बोलने से लग रहा था कि भोपाली है। बाद में उसने बताया भी कि वह भोपाल का रहने वाला है। चेन्नई से तीन दिन पहले चला था। रात पहुंचा जबलपुर। रेडिएटर की फैन बेल्ट टूट गयी वर्ना कल ही पहुँच गए होते जबलपुर।

चेन्नई में बहुत दिन हुए रहते तो तमिल कुछ सीख गये होंगे? हमने पूछा।


सब तरफ सूरज भाई का जलवा है
अरे कुछ न सीखे। माचिस की डिबिया की खड़खड़ाहट जैसी बोली। पल्ले न पड़ती। वे सब समझ लेते हैं हमारी बात। इसलिए काम चलता है।

उधर की बोली न समझने के चलते कभी परेशानी होती होगी। कोई धोखा हुआ क्या कभी? पूछने पर बोले- हमको तो आजतक कोई धोखा नहीं हुआ। वहां का आदमी बढ़िया है। धोखेबाज नहीं।

सड़क की बात चली। बोले उधर की सड़क सब बहुत बढ़िया। मलाई जैसी। इधर की चौपट। नागपुर से जबलपुर में बारह बज गए आने में। उधर सड़क खराब होने पर फ़ौरन बनती है। इधर की तरह नहीं कि लटकी रहे।
टोल टैक्स 1500 रूपये से ऊपर का ठुक गया। कोटा वाला बोला- 'हमारे आने-जाने के 7000 रूपये हो जाएंगे।'
पहले ओवरलोड करके ले जाते थे गाड़ी। अब नहीं। 16 टन की गाड़ी है तो एक टन माल कम ही लादते हैं। 50 किलो भी कहीं ज्यादा पकड़ गए तो पांच हजार का चालान फाड़ते हैं। मगरमच्छ की तरह मुंह फाड़ते हैं बहन.....।

पहले दायें-बाएं करके निकल लेते थे। अब हर जगह आरटीओ चेकिंग नाका लगा दिया है। ट्रक ड्राइविंग पहले अच्छा काम था। लेकिन आजकल हाल खराब हैं। कोई ड्राइविंग में आना नहीं चाहता। नए ड्राइवरों और नए नियमों पर अपनी राय बताते हुए बोले:

रण्डी की कदर हिजड़ों ने खो दी
हिजड़ों की कमर लौंडों ने खो दी।

आजकल के लौंडे हिजड़ों से ज्यादा कमर मटकाते हैं।

बीड़ी पीने का तर्क देते हुए बोले- 'नींद से बचने के लिए पीते हैं। इसके बिना गुजारा नहीं।' हमने पूछा -'फिर दारु भी पीते होगे।' बोले -'दारु नहीं पीते। गांजा पीते हैं। दारू में ऐंठता है आदमी। कोई बोला -बे। दारु के नशे में आदमी बोलता है-क्या है बे! बवाल हो जाता है इतने में। गांजा में कोई गाली भी दे तो आदमी प्यार से बोलता है। गांजा दिलखुश नशा है।'

'पर गांजा तो बैन है।पुलिस पकड़ती होगी।' मैंने कहा।

'अरे काहे का बैन। पुलिस खुद बिकवाती है। पकड़े तो सौ रूपये का नोट दो और एक्सीलेटर दबाओ। आगे बढ़ो। सब कानून ऐसे ही चलते हैं। पैसे से सेटल होते हैं।'- ड्राइवर ने बताया।

लौटते हुए अगर भोपाल का माल मिल गया तो घर हो लेंगे। नहीं तो सीधे चेन्नई निकल लेंगे। कुछ पता नहीं कब घर जाएंगे। वैसे पंद्रह दिन में एक चक्कर लग जाता है घर का। लड़का भी ट्रक चलाता है।

उनको छोड़कर हम वापस लौटे। सब तरफ सूरज भाई ने पूरी रोशनी की ग्रांट फैला रखी थी। पेड़, पत्ती, फूल, सड़क, झाडी, दीवार सब तरफ धूप ही धूप। जितनी मन आये खर्च लो। एक महिला सड़क पर जा रही थी। उसकी परछाई उसके कद से कई गुना लंबी होकर सड़क पर पसरी थी।

सुबह हो गयी थी। मार्च महीने के आखिरी दिन की सुबह। कैलेंडर का सबसे लंबा दिन होता है मार्च महीने का आखिरी दिन। हफ़्तों पसरा रहता है। है न ?
https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10207737555290340

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2 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "मीठा मीठा गप्प गप्प और खारा खारा थू थू“ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. धर सड़क खराब होने पर फ़ौरन बनती है। इधर की तरह नहीं कि लटकी रहे। ...इधर के कब सुधरेंगे ..

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