Tuesday, January 28, 2025

गूगल के मज़े

कल गाड़ी रिपेयर के लिए डालने गए। गाड़ी शेड से निकालते समय स्क्रीन पर कैमरे ने बताया कि निकल जाएगी गाड़ी। निकली तो गाड़ी लेकिन अगले बंपर पर लोहे के खंभे ने मोहब्बत से चूम लिया। जैसे कोई हीरो किसी हीरोईन का तगड़ा चुम्बन लेते हुए उसकी लिपिस्टिक भी चूस लेता होगा वैसे ही बंपर के कोने का पेंट खुरच गया। लोहे के खम्भे ने सफ़ेद बंपर पर काला निशान लगा दिया । चेहरा होता तो कहते नज़र बचाने के लिए है। लेकिन साल भर पहले की गाड़ी पर, जिसका कैसलेस बीमा उपलब्ध है, कोई भी निशान अखरता है।
वरिष्ठ नागरिक की उमर में हासिल चीजों का रखरखाव मुश्किल होता है। उम्रदराज लोगों द्वारा कमउम्र बीबी को सहेजने जैसा हिसाब। शहरों में नई गाड़ी चलाते समय लगता है कि सड़क पर लड़कियों को चलते हुए कैसा लगता होगा। अग़ल-बग़ल, आगे-पीछे चलती, आती-जाती हर गाड़ी देखकर लगता है कि हमारी ही गाड़ी को छेड़ने के लिए चल रही है। धड़ल्ले से बग़ल से गुजरते आटो शोहदों जैसे लगते हैं जिनका जन्म ही मासूम, नयी गाड़ियों को छेड़ने के लिए हुआ है।
बुढ़ापे में नई गाड़ी चलाते हुए सड़क का माहौल बाली की तरह लगता हैं जो चालक की आधी ड्राइविंग स्किल हर लेता है।
इस मामले में हमारी सैंट्रो सुंदरी का साथ हमेशा सुकून देह लगता है। पचीस साल से हमारा साथ दे रही सैंट्रो सुंदरी अब अगले पाँच साल तक और साथ रहेगी। आगे-पीछे, अग़ल-बग़ल, दाएँ-बाएँ तमाम ठोकरों और निशानों के बावजूद सैंट्रो सुंदरी चलने में कभी नख़रा नहीं करती। चाबी आधी घूमते ही कहीं भी चलने के लिए तैयार हो जाती है।
बहरहाल गाड़ी रिपेयर के लिए रिपेयर शाप ले जाने के लिए निकले। पहले भी कई बार जा चुके हैं। रास्ता भी सीधा है। लेकिन फिर गए गूगल शरण में। बताया 39 किलोमीटर दूर। हमें कुछ ज़्यादा लगा लेकिन चल दिए। आधे रास्ते पहुँचे तो लगा कुछ ज़्यादा ही दूर ले जा रहा गूगल बाबा। फ़ोन किया आमिर को जिसने मुझे गाड़ी दिलवाई थी। उसने बताया 16 किमी दूर है आर्मापुर से बाडी रिपेयर शाप। उतना तो हम चल आए थे। हमने फिर सर्च किया, गूगल अभी भी 23 किमी। हमने बाडी शाप फ़ोन करके लोकेशन माँगी। पता चला दूरी अभी भी 24 किमी ही थी।
हमने फिर गाड़ी से उतरकर पूछा किसान नगर कित्ती दूर है। पता चला पीछे छोड़ आए हैं। दो-तीन किलोमीटर। गाड़ी घुमा ली। अब गूगल ने बताया कि चार किमी दूर है बाडी रिपेयर शाप। पहुँचकर जमा की। वहाँ मौजूद भाई जी ने पूछा, अभी कुछ दिन पहले इसी बंपर को बदलवाया था न? पता चला वो दाँया वाला था। इस बार बायाँ ठुका है।रिपेयरिंग में भी संतुलन ज़रूरी है।
बात गूगल की हो रही थी। अभी भी बाडी रिपेयर शाप की दूरी 39 किमी ही बता रहा है। जबकि दूरी 16 किमी है। लगता है गूगल बाबा भी बुजुर्ग हो जाने के चलते चीजें ठीक से नहीं देख पा रहे। यह भी हो सकता है हमसे मज़े ले रहा हो गूगल बच्चा। वो तो कहो हम पूछ लिए कल वरना घंटे भर और सड़क पर टहलते रहते।
यह भी हो सकता है जैसा Dhirendra Srivas जी ने बताया -"गूगल अभी कुंभ में बिजी है इसलिए बाकी लोकेशन पर उत्ता धियान नहीं दे पा रहा है।"
गाड़ी की तरह अपना देश भी लोग ऐसे ही हांके चले जा रहे हैं। अपने-अपने डिज़ाइनर नक़्शे के सहारे। कोई बताता है अगले बीस साल में पहुँच जाएँगे, कोई चिल्लाता है मंज़िल तीस साल दूर है। कोई हल्ला मचाता है अरे ये वाला ड्राइवर देश की गाड़ी पचीस साल पीछे ले जा रहा है। उतारो इसको, हम चलाएँगे गाड़ी। हमको पता है मंज़िल। (इस हल्ले-गुल्ले में देश किधर जा रहा है यह जानने के लिए टिप्पणी में दी गयी पोस्ट देखिए)
लेकिन देश को इस हल्ले-गुल्ले से कोई मतलब नहीं। वह उधर ही चल देता है जिधर लोग उसे हांकते हैं। हज़ारों, लाखों, अरबों, खरबों स्टेयरिंग लगे हैं देश में। हरेक को लगता है कि देश को वही चला रहा है। वही हांक रहा है। देश को भी आगे-पीछे से कोई मतलब नहीं। वह बस चल रहा है, अपने तरह-तरह के ड्राइवरों की बाल सुलभ चिरकूटइयों को वात्सल्य से निहारता हुआ। सदियों से वह इस तरह की लीलाओं को देखता आ रहा है। न जाने कितने गूगल-फूगल, तुर्रम खां टाइप नमूनों को देख चुका है देश। अभी तो देश कुम्भ में डुबकी लगाते लोगों को निहार रहा है। डेढ़ सदी बाद आया है यह मौक़ा। ऐसे न जाने कितने कुम्भ देख चुका है देश। एक बार फिर सही।

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