कल बड़े दिन बाद साइकिल चलाई। नहा-धोकर , नाश्ता-पानी करके धूप में नहाने निकले। धूप हमको देखकर खिल सी गयी। दोनों को बहुत दिन बाद किसी आत्मीय से मिलने का सुख जैसा मिला।
एक मकान के बाहर एक आदमी पैर में कच्चा प्लास्टर बांधे पैर को धूप के सामने किए खड़ा था।फ़ैक्ट्री में काम करते समय किसी गोले की फ़ोरजिंग उसके पैर पर गिर गयी थी। पंजे में फ़्रैक्चर हो गया। तीन हफ़्ते की छुट्टी।
कैलास नगर की तरफ़ गए। नाले के पार एक इमारत के विधायक द्वारा उद्घाटन का चमकता पत्थर लगा था। इस तरफ़ की तमाम जमीन पर लोगों ने अवैध क़ब्ज़ा कर रखा है। इमारत जिस जगह पर बनी है पता नहीं वह अवैध क़ब्ज़े वाली है या नहीं लेकिन पूरी दुनिया में अवैध क़ब्जे का यही तरीक़ा चलन में हैं।
अमेरिका में अंग्रेजों ने क़ब्ज़ा किया। स्थानीय लोगों को मारकर, खदेड़कर किनारे कर दिया। अब अवैध लोगों को बाहर कर रहा है। लोगों को बाहर करने के साथ खुद भी बाहर हो जाना चाहिए अगले को। उसका क़ब्ज़ा भी अवैध ही है।
एक बाल काटने की दुकान पर बोर्ड लगा था -गुडलक हेयर ड्रेसर। बाल ठीक कटें न कटें यह आपका भाग्य। हमारे साथ अक्सर ऐसा होता है। पाँच में से तीन बार घर आने पर बताया जाता है-' ठीक नहीं कटाए बाल, सही नहीं लगी डाई।' कभी-कभी तो वापस जाना पड़ता है ठीक कराने।
एक बंगाली डाक्टर का बोर्ड लगा है, 'यहाँ बिना दर्द दांत उखाड़ा जाता है।'
एक चाय की दुकान पर बैठा एक बुजुर्ग चाय का कप चेहरे के पास किए उसकी भाप से अपना चेहरा सेंक रहा था। फेस टी स्टीम बाथ जैसा काम। चाय पीने के पहले चेहरा सेंकना मतलब एक पंथ दो काज।
सड़क पर हर मकान, दुकान के बाहर बैठे लोग धूप सेंक रहे थे।
एक मकान के बाहर एक महिला एक शेर की मूर्ति की पीठ पर हाथ रखे धूप सेंक रही थी। उसको देखकर मुझे सरकारी दफ़्तरों में 'मेकइन इंडिया' के लोगो वाले शेर की याद आई। सरकारी दफ़्तरों में तमाम चूहे जैसे दिल वाले लोगों ने अपने दफ़्तर की मेज़ पर बड़ी शेर की मूर्तियाँ रखी हुईं थीं। यदाकदा वे लोग शेर की पीठ पर हाथ फेरते हुए भी फ़ोटो खिंचाते दिखते थे। उस समय उनके चेहरे पर लोमड़ी जैसी मुस्कान अपने आप चिपक जाती थी। शेर, चूहा, लोमड़ी,इंसान का गठबंधन अद्भुत होता है।
लौटते हुए देखा तो पता चला कि जिसे मैं मकान समझा था वह संतोषी माता का मंदिर था। उसके चबूतरे पर बैठी धूप सेंकती महिलाओं ने बताया कि मंदिर बीस-पचीस साल पहले सबके सहयोग से बना था। ज़मीन किसकी थी यह उनको नहीं पता था। तमाम धार्मिक स्थल ऐसे ही सर्वजन सहयोग से बनते हैं।
सड़क किनारे नालियों से निकला गीला कूड़ा जगह-जगह पड़ा था। ऐसा लगा नाली विरोधी हरकतों के कारण कूड़े को 'नाली बदर' कर दिया गया है।जब तक कूड़ा सूखेगा और लोग इसे उठाने आएँगे तब तक कूड़े का काफ़ी हिस्सा फिर से नाली में शामिल हो चुका होगा जैसे कभी ज़िला बदर किए गए अपराधी समय बीतने पर ज़िले के सम्मानित नागरिक हो जाते हैं, देश द्रोह के आरोपी रहे लोग अखाड़ों के महामंडलेश्वर बन जाते हैं।
रामलला इंटर कालेज के मोड़ पर खड़े आटो वाले सवारियों का इंतज़ार कर रहे थे। धूप सेंकते ड्राइविंग सीट पर बैठे आटो वाले ने बताया- " सवारियों को अब इंतज़ार का सबर नहीं। सवारियों के मुक़ाबले आटो ज़्यादा हो गए हैं। कोई और काम नहीं तो यही कर रहे हैं।"
आगे एक जगह एक वैन खड़ी थी और पास में एक शेड सा लगा था। दोनों पर व्हाटसएप लिखा था। पता चला व्हाटसएप की तरफ़ से लोगों को व्यापार में सहयोग करने की मुहिम के रूप में कैंपेंन चलाया जा रहा था। व्हाटसएप भारत यात्रा के नाम से जानकारी देने की मुहिम चलाई जा रही है। इस बहाने शायद व्हाटसएप अपना कोई सर्वे कर रहा हो, कहना मुश्किल। लेकिन जिसको अपने व्यापार में कोई सहयोग चाहिए तो व्हाटसएप भारत यात्रा ( नम्बर +919160574425) से जुड़कर ले सकता है।
क्या पता कोई राजनीति से जुड़ा नमूना व्हाटसएप भारत यात्रा से चुनाव में झूठ बोलने के तरीक़े जानने की कोशिश करे। तब शायद व्हाटसएप भारत यात्रा एप कहे कि मालिक आपको सिखाने की औक़ात हममें नहीं है। आप स्वयंसिद्ध हैं।
व्हाटसएप भारत यात्रा के वालंटियरों से बात हुयी। हिसाम केरल के त्रिचूर से और मयंक पूर्वी चंपारन से हैं। दोनों इंजीनियर। हिसाम केरल से, मयंक आई.आई.टी. दिल्ली से कम्प्यूटर इंजिनीयरिंग की पढ़ाई किए हैं। हिसाम के पिता सीआरपीएफ में हैं इसीलिए अलग-अलग जगह पोस्टिंग हुई और यही कारण रहा होगा कि वे साफ़ हिंदी समझ-बोल पा रहे थे । मयंक के पिता बिहार में डाक्टर हैं।
शहर के एक बहुत सामान्य इलाक़े में व्हाटसएप की पैठ बनाने की कोशिश से लगा कि तकनीक और जानकारी देने के बहाने बाज़ार हमारे चारों तरफ़ अपनी पैठ बनाता जा रहा है।
रास्ते में तमाम रोचक नामों वाली दुकानें दिखीं। कई जगह लोगों से रास्ता पूछने के बहाने बतियाए। धूप सेंकते लोगों के चेहरों की चमक दिखी। एक जगह दो बुजुर्ग महिलाएँ धूप में बतियाती, गपियाती दिखीं।
काफ़ी दिन बाद साइकिल चलाने के चलते स्पीड थोड़ा कम रही। कई जगह रुके भी। गपियाते, बतियाते, फोनियाते, धूपियाते, मोबाइलियाते, सुस्ताते वापस लौटे। तीन घंटे की साइकिल यात्रा में कुल पंद्रह किलोमीटर यात्रा हुई। स्पीड के हिसाब से देखा जाए तो एक तिहाई रही। एक तिहाई मतलब थर्ड डिवीजन। थर्ड डिवीजन सही लेकिन पास तो हुए ही। ठीक है न?
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