Saturday, January 04, 2025

"बेवकूफी का सफ़र रोचक है"- अरविंद तिवारी


 (वरिष्ठ व्यंग्यकार Arvind Tiwari जी ने मेरे यात्रा वृत्तांत, 'बेवकूफ़ी का सफ़र' को पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया दी है। अरविंद तिवारी जी ने समय निकालकर मेरी किताब पढ़ी और उस पर अपनी राय भेजी इसके लिए उनका आभार।

किताब की जो प्रति उनके पास भेजी गयी थी उसमें 149 पेज थे। किताब स्व प्रकाशन के तहत प्रकाशित है। बाद में किताब का सम्पादन करते हुए , जगह सेट करते हुए, संशोधित करने पर पेज 128 हो गए। किताब पाने के लिंक टिप्पणी में दिए जा रहे हैं।)
इधर के दिनों में कथेतर गद्य को बहुत महत्व दिया जा रहा है।कथेतर गद्य की किताबें खूब बिक रही हैं।संस्मरण,यात्रावृत्त,रिपोर्ताज,डायरी लेखन,रेखाचित्र, पत्र लेखन आदि कथेतर गद्य में शुमार होते हैं।सामान्यतः हर रचनाकार इन विधाओं में हाथ आजमाता है पर सफलता हर किसी को नहीं मिलती।उदाहरण के लिए अभी अभी बीती परसाई की जन्मशती पर, उनके संस्मरणों का पहाड़ देखने को मिला।पत्र पत्रिकाओं और सोशल मीडिया इन संस्मरणों से पटे रहे।पर संस्मरणों के इस पहाड़ में शायद ही किसी ने कांतिकुमार जैन जैसा संस्मरण लिखा हो।हमारे समय के सर्वश्रेष्ठ संस्मरण लेखक कांतिकुमार जैन हैं।अभी उनसे ऊपर समकाल में कोई रचनाकार नहीं है।उनको दिवंगत हुए ज्यादा समय नहीं हुआ है।
बहरहाल इस समय मैं अनूप शुक्ल का जिक्र करने जा रहा हूं जिनका यात्रा वृतांत"बेवकूफी का सफ़र"ई बुक पर प्रकाशित होकर प्रिंट किताब के रूप में आया। मेरे पास उन्होंने भेजा है,धन्यवाद।अनूप शुक्ल कथेतर गद्य में तेजी से उभरता हुआ नाम है।उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने उन्हें इस विधा के लिए दो बार सम्मानित किया है।एक बार पचहत्तर हज़ार रुपयों से तो दूसरी बार चालीस हज़ार रुपयों से।इस विधा में अनूप शुक्ल प्रायः रोज ही सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखते हैं जिसका एक बड़ा पाठक वर्ग है।149 (संशोधित 128) पृष्ठ की इस पुस्तक में विभिन्न समय पर की गई यात्राओं का यात्रावृत्त है।हवाई यात्रा,ट्रेन की एसी क्लास की यात्रा,स्लीपर की यात्रा से सामान्य कोच की ट्रेन यात्राएं इसमें शामिल हैं।
यदि हम यात्रावृत्त लेखन के इतिहास पर प्रकाश डालें तो 1871 में भारतेंदु हरिश्चंद्र के लिखे गए प्रथम यात्रावृत्त "सरयू पार की यात्रा"से लेकर 2024 तक सरयू में बहुत पानी बह गया है!इस इतिहास में सबसे उल्लेखनीय नाम राहुल सांकृत्यायन का है।अब तो इस विधा में ढेरों किताबें आ रही हैं।इस पुस्तक में स्थानीयता, तथ्यात्मकता, आत्मीयता,वैयक्तिकता,कल्पना,रोचकता आदि उपकरणों का यहां प्रयोग किया गया है।हर लेखक इस विधा में लिखता है।पर हर लेखक की शैली और चीजों को देखने का अंदाज़ ही उसकी कृति को विशिष्ट बनाता है।इस मायने में अनूप शुक्ल विशिष्ट लेखक हैं।उनकी व्यंग्यात्मक शैली इस वृतांत को पठनीयता प्रदान करती है।हवाई यात्रा का वर्णन करते समय लेखक कुछ इस तरह व्यंग्य में लिखता है।
"बिजली की कमी के चलते गर्माते लोगों को खुले हवाई जहाज़ में घुमाकर राहत पहुंचाई जा सकती है।"दरअसल अनूप शुक्ल ऊंचाई पर हवाई जहाज के बाहर माइनस तापक्रम पर टिप्पणी कर रहे थे।
रेल यात्रा में अनूप शुक्ल को कई हिंदी के कवि और शायर याद आते हैं।वह उनकी कविताओं को कोट करते चलते हैं।आलोक धन्वा की कविता पंक्ति"हर भले आदमी की एक रेल होती है,जो उसकी मां के घर की ओर जाती है।सबसे ज्यादा संवाद करने वाले रेल यात्री अनूप शुक्ल की नज़रों से छोटी से छोटी चीज भी छूट नहीं पाती।
"स्टैंडनुमा कैमरे के सामने खड़ा अकेला आदमी मुझे किसी तोप के मुहाने खड़ा आदमी सा लगता है।"
"गाड़ी सुकरी मंगेला में रुकी।स्टेशन से बाहर साइकिल खड़ी थी। लगता है इसी साइकिल का मॉडल देखकर मैकमिलन ने पहली साइकिल बनाई थी।"
"ट्रेन में अभी लोग सोए हुए हैं।सबको सोता देख लगता है मानो सब सोने के लिए ही आते हैं ट्रेन में।रात भर सोए सुबह उतर लिए।"
"ट्रेन पटरी पर भागती चली जा रही है।लगता है तेज भागती है फिर ठिठक जाती है।जैसे कोई पतंग उड़ाता हुआ ढील देता है,पतंग आगे भागती जाती है।"
"एक बच्ची हैंडपंप के हैंडल पर उछलती हुई पानी निकालने की कोशिश में लगी थी।पानी तो निकल नहीं रहा था,उसका बिना टिकट झूला झूलने का काम पूरा हो रहा था।"
"ऑटो वाला लहराते हुए चल रहा था।उसको अपना ऑटो जमा करना था।हमें लगा अपना ऑटो जमा करने से पहले हमको किसी अस्पताल में न जमा कर दे बालक!"
"जहाज़ इस तरह हिलने लगा मानो कोई घरैतिन सूप हिलाकर नाज(अनाज)पछोर रही हो।"
सामान्य घटनाओं में से दर्शन शास्त्र तक पहुंच जाना अनूप शुक्ल की अनूठी विशेषता है,जिसका उल्लेख मुझे जरूरी लगता है।दूसरे उनके प्रिय प्रकृति नायक सूरज जी उनके साथ साथ चलते हैं।
किताब अनूप जी ने अपने वरिष्ठ अधिकारी टी टी एस कृपा वेंकटेशन जी को समर्पित की है।
किताब का शीर्षक लब्ध प्रतिष्ठित व्यंग्यकार आलोक पुराणिक जी ने दिया। यों ही उन्होंने बेवकूफी का सफ़र नहीं बताया।कई जगह अनूप जी की बेवकूफियां उजागर होती हैं।यह भी लेखक की शैली है,जैसे,हमने कहा टाइम हो गया है।गाड़ी तीन किलोमीटर दूर सेंट्रल स्टेशन पर खड़ी है। आवाज़ देकर बुला लो।
कनपुरिया भाषा के तमाम शब्द इस यात्रावृत्त में भरे पड़े हैं।अच्छी किताब के लिए अनूप शुक्ल को बधाई।
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