Friday, November 28, 2025

लोकतंत्र में जनता की जगह बाजार (कॉर्पोरेट) ने ले ली है

 आज का जनसत्ता अख़बार देखा। 20-20 (कुल 40) पेज के अख़बार में 10-20( कुल 30) पेज के विज्ञापन हैं। समाचार पत्र का एक चौथाई हिस्सा समाचार के लिए तीन चौथाई विज्ञापन के लिए। समाचार पत्र 'बाजार पत्र' में बदल गए हैं। अब बाजार ही चलाते हैं अख़बार। खबरों बेचारी सहमी सी डरी-डरी, सहमी-सहमी घुसती हैं अख़बार में।

अख़बारों के यह हाल लोकतंत्र की सरकारों की तरह हैं। कभी जनता का , जनता के लिए ,जनता के द्वारा वाले लोकतंत्र में जनता की जगह बाजार (कॉर्पोरेट) ने ले ली है। लोकतंत्र अब कारपोरेट के लिए, कारपोरेट का, कारपोरेट के लिए, कारपोरेट के द्वारा में बदल गए हैं।

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सांप्रदायिकता : प्रकृति, कारण और निदान' - परसाई

कुछ कटु पर सत्य वास्तविकताओं को स्वीकार करना होगा। अभी भी हिंदू मन में एक विजित जाति की हीनता की भावना है। मुसलमान में भी यह भावना है कि हम विजेता जाति के हैं और हमने इन पर हुकूमत की है। हिंदू और मुसलमान दोनों पर अंग्रेजों ने हमला किया। दोनों पर हुकूमत की। अंग्रेज़ ईसाई हैं। उन्होंने हिंदू-मुसलमान दोनों पर अत्याचार कम नहीं किए। मगर अंग्रेज़ों से न हिन्दू नफ़रत करता है न मुसलमान। स्वतंत्र भारत का पहला गवर्नर जनरल ईसाई अंग्रेज़ था। इसे हिंदू-मुसलमान दोनों ने सलाम किया। अंग्रेज़ मूर्तिपूजक हैं। वे ईसा के बुत की पूजा करते हैं। मगर मुसलमान इन बुतपरस्तों से नफ़रत नही करता। अंग्रेज़ साम्राज्यवादी थे। मुसलमान साम्राज्यवादी नहीं थे हैं। वे भारतीय ही हो गए। मगर हिंदू साम्राज्यवादी शोषक अंग्रेज से नफ़रत नहीं करता, उसे आदर्श मानता है, उसकी रहन-सहन में नकल करता है। अंग्रेजी साम्राज्य समाप्त हुआ, तो उसकी जगह ली नए प्रकार के अमेरिकी साम्राज्यवाद ने। अमेरिकी भी ईसाई है। मगर हिंदू जाति के बड़े-बड़े रहनुमा अमेरिका के भक्त हैं। यह क्या विरोधाभास है? कौन सा तर्क है इसमें?

हारे हुए निराश हिंदू मन ने अपने प्राचीन गौरव की याद की, उसका सहारा लिया और उस 'यूटोपिया' में जीकर, आधुनिकता का विरोध किया। उसने पुरातनवाद में जातीय गौरव की रक्षा खोजी। इस भावना ने उसे संकीर्ण, ज्ञान-विज्ञान विरोधी, अतीतजीवी और क्षुद्र बनाया। उधर मुसलमान के हाथ से हुकूमत अंग्रेजों ने छीनी। उसे गुलाम बनाया। वह हीनता की भावना से ग्रस्त हुआ, तो उसे भी इस्लामी अतीत की याद आयी कि उसने यूरोप और एशिया को रौंद डाला था। इस्लामी बिरादरी की याद आई। वह भी बुनियादी इस्लाम में पहुँचा और 7 वीं सदी के मक्का-मदीना में रहने लगा। वह खबाब देखने लगा फिर इस्लामी साम्राज्य की स्थापना के, क्योंकि -'उठता है फिर मुसलमां हर करबला के बाद।' मुसलमानों के कट्टर रहबर भी अमेरिकी साम्राज्यवाद के समर्थक हैं। 

-परसाई 

Tuesday, November 25, 2025

भुक्खड़ डोसा , स्वामी डोसा


 

नेता लोग चर्चा में बने रहने के लिए अक्सर ऊल जलूल बयान देते हैं। उसी तर्ज पर दुकान वाले ध्यान खैंचू नाम रखते हैं। आज लखनऊ, आशियाना में आमने-सामने दो दुकानें दिखीं। एक का नाम BHUKKAD डोसा दूसरे का नाम स्वामी डोसा। दोनों ही दुकानें बंद थीं इसलिए उनके नाम के मतलब पूछ नहीं पाये।

अंदाज़ लगा सकते हैं कि BHUKKAD डोसा भूखे लोगों की शरण स्थली होगी। भूखे लोगों की भूख का इलाज होता होगा। लेकिन इलाज मुफ्त नहीं होगा। फीस पड़ेगी। आजकल मुफ्त कुछ भी नहीं मिलता है। Nothing is free in this world .
स्वामी डोसा से हमको भाजपा के बुजुर्ग नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी जी की याद आई। स्वामी जी सनसनीखेज बयान देते रहते हैं। आजकल सरकार विरोधी बयान ज़्यादा देते हैं। हाल ही में उन्होंने एक बयान दिया जिसके अनुसार RSS वाले अमेरिका की तर्ज पर प्रधानमंत्री के अधिकतम दो कार्यकाल के हिमायती थे। लेकिन सत्ता में आते ही वे अपनी बात से पलट गए। शायद यह नीतीश कुमार जी की संगत का असर हो। वैसे RSS महान संगठन है। RSS के लोग समय के अनुसार अपने स्टैंड और बयान बदलते रहते हैं। तथ्यों की मनमानी व्याख्या करते रहते हैं। चंद्रमा की कलाओं की तरह अपने बयान बदलते रहते हैं।
भाजपा के लोग दिल्ली के प्रदूषण पर बवाल करते थे। सरकार को कोसते थे। अब जब सरकार में आए तो एक बयान आया किसी वैज्ञानिक का कि दिल्ली की भौगोलिक स्थति ही ऐसी है कि प्रदूषण देर तक बना रहना अपरिहार्य है। कितना प्यारा तर्क है। बहानेबाजी अपने देश के लोगों का नैसर्गिक गुण है।

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Monday, November 24, 2025

आर्यन टी स्टॉल


 

कल आर्यन टी स्टॉल दिखा। जलवायु विहार के सामने। लेकिन चाय का कोई इंतजाम नहीं दिखा वहां। काउंटर पर अंडे ही अंडे रखे थे। हमने चाय वाले से पूछा तो उसने बताया चाय का काम चला नहीं तो अंडे बेचने लगे। आर्यन बेटे का नाम है। अब आम आदमी अपने बेटे को मंत्री तो नहीं सकता, दुकान का नाम ही सही।

आर्यन टी स्टॉल चाय बेचने के लिए खुली थी। चाय नहीं बिकी तो अंडा बेचने लगे। पेट के लिए बिकना जरूरी है। यह दुनिया का चलन है। विकास का नाम लेकर आए लोग विभाजन के सामान बेचने लगे। चल रही है दुकान धड़ल्ले से।
चाय की दुकान एक गुमटी में है। सरकारी लिहाज से अवैध ही है। कभी किसी ने शिकायत की तो उजड़ जायेगी। अपने यहाँ बड़ी तादाद ऐसी ही दुकानों की हैं। चल रहीं हैं बिना किसी परमिशन के। दुकानें क्या, बड़ी-बड़ी संस्थाएं बिना परमिशन /रजिस्ट्रेशन के चल रही हैं। संस्कृति के नाम पर खुली दुकाने राजनीति के मुख्यालय बने हुए हैं। नाम कुछ और काम कुछ और।
दुनिया इसी तरह चल रही है। सेवा के नाम पर सत्ता पर काबिज लोग गुंडागिरी कर रहे हैं। दुनिया के सबसे समर्थ देशों के राज्याध्यक्ष दूसरे देशों से गुंडों की फिरौती की तरह पैसे माँग रहे हैं। ऐसा वे अपने देश को महान बनाने के नाम पर कर रहे हैं। महानता का रास्ता चिरकुटई की गलियों से होकर गुजर रहा है।
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Sunday, November 23, 2025

हनीसिंह बनाम करन



 जलवायु विहार से ट्रांसपोर्ट नगर करीब 3.5 किलोमीटर दूर है। ऑटो का किराया 50 से 60 रुपए के बीच पड़ता है। कल 84 रुपए में ऑटो बुक हुआ। कारण पूछने पर ऑटो वाले ने बताया -"अरे वो "हनीसिंह आ रखा है। किसी नेता ने बुलाया है उसके कारण भयंकर जाम है।"

हनीसिंह के चक्कर में हमारे तीस-पैंतीस रुपए ज़्यादा ठुक गए। हमने पूछा ऑटो वाले से -"तुम नहीं जा रहे हनीसिंह का गाना सुनने।"
"अरे हनीसिंह हमको रोटी थोड़ी देगा। कमाना तो ख़ुद पड़ेगा"-ऑटो वाले ने कहा। सड़क पर जाम के कारण वह हमको उल्टी तरफ़ से लाया। स्टेशन से करीब सौ मीटर पहले उतारकर चला गया।
कानपुर लखनऊ रोड पूरा गाड़ियों से पैक था। हम मेट्रो स्टेशन की तरफ़ बढ़ लिए।
इंदिरानगर में मेट्रो उतरे। वहाँ से घर पैदल ही आते हैं। कल सामान था साथ में। सोचा ऑटो कर लेंगे। लेकिन फिर सामने एक बच्चा रिक्शेवाला दिख गया। सोचा उसी के साथ चलें। उसने बताया -"तीस रुपए लगेंगे। हमने देखा कि देने के पैसे हैं हमारे पास फुटकर कि नहीं। पैसे थे। बैठ गए रिक्शे में।"
रिक्शे में बैठते हुए दूसरे रिक्शे वाले ने टोंका -"ये ले नहीं जा पायेगा। हमारे साथ चलो।"
हमने उसकी बात को तरजीह नहीं दी। हज़रते दाग़ की तरह बैठ गए तो बैठ गए रिक्शे पर।
रास्ते में बच्चे से बातचीत करते आए। उसने बताया - "वह बाराबंकी से आया लखनऊ। दो महीना पहले। आठवां पास है। बाप बाराबंकी में कार मैकेनिक हैं। यहाँ किराए पर रिक्शा चलाता है। रात में फुटपाथ पर सो जाता है। खाना होटल में खा लेता है। एक दिन का रिक्शे का किराया पचास रुपए पड़ता है। करण नाम है बच्चे का। "
हमने पूछा कि तुमने अपने पिता से कार का काम क्यों नहीं सीखा। इस पर उसने कहा -"हमारा दिमाग़ै नहीं लागत है। कुछ समझै माँ नाई आवत है।( हमको कुछ समझ में ही नहीं आता है।"
कित्ते कमाई हो जाती है पूछने पर बताया -"सौ-दुइ सौ रुपया मिल जात हैं। वही माँ खाना -पीना हुई जात है।"
उसको यह भी पता है अब रिक्शे में लोग नहीं बैठते। लेकिन अभी कोई विकल्प नहीं उसके पास रिक्शा चलाने के अलावा इसलिए रिक्शा चला रहा है। जब बंद हो जाएगा तब देखा जाएगा।
घर पहुँचकर उसने हमको उतारकर स्टेशन पर मिले उस रिक्शेवाला का जिक्र किया जिसने उसके रिक्शा चालन कौशल पर सवाल उठाया था। उसने कहा -"उई दारू पिए रहें। कहत रहैं हम रिक्शा न चला पइबे।"
हमसे पैसे लेने के बाद करन बोला -" रात के खाना भर के पैसा हुईगे । बीस-तीस रुपया और कमा लेव। सबेरे के नाश्ता का इंतजाम हुई जाई।"
हमने फ़ोटो लेने के लिए कहा तो वो खड़ा हो गया। लेने के बाद दिखाया उसको फ़ोटो तो बोला -"का करिहौ फ़ोटो?( फोटो क्या करोगे)।" हमने बताया कि ऐसे ही लिखेंगे। वह रिक्शे को पैडलियाते हुए चला गया।
एक खेलने कूदने की उमर का बच्चा घर से दूर अनजान शहर में रिक्शा चला रहा है। सुबह के नाश्ते के पैसे नहीं हैं उसके पास। उसको भरोसा है कि कुछ देर में कमा लेगा। इसी दुनिया में ऐसे लोग भी हैं जो दुनिया पर कब्जे के लिए लाखों लोगों को मरने-मारने के इंतजाम में लगे हैं। ऐसे लोगों के चलते ही करन जैसे लोग बच्चे समय से पहले बड़े हो रहे हैं। बूढ़े हो रहे हैं।
जो समाज हनीसिंह का गाना सुनने के लिए जाम लगा रहा है वही करनसिंह से रिक्शा चलवा रहा है।


जनसेवा का जोखिम

 Manu Kaushal जी इतवार को अपनी पसंदीदा रचनाओं का पाठ फेसबुक पर पोस्ट करते हैं। इस हफ़्ते उन्होंने मेरे लेख 'जनसेवा का जोखिम' का पाठ किया है। ग्यारह साल पहले यह लेख मैंने तब लिखा था जब तमिलनाडु की मुख्यमंत्री को आय से अधिक संपति के मामले में जेल हुई थी। यह लेख नई दुनिया अख़बार के अधबीच कॉलम में छपा था। मनुकौशल जी ने इस लेख के माध्यम से उस जमाने की याद दिला दी जब सामाजिक जीवन में भ्रष्टाचार मुख्य मुद्दा होता था। लोग जेल जाते थे। लेख का लिंक टिप्पणी में दिया है।

मनुकौशल जी को उनके शानदार रचनापाठ के लिए आभार। धन्यवाद। शुक्रिया।

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Friday, November 21, 2025

माही पूड़ी कार्नर

 


महेंद्र सिंह धोनी भारत के सफलतम क्रिकेटरों में रहे हैं। उनको माही, कैप्टन कूल और थाला आदि कई नामों से जाना जाता है यह उनके निकनेम है। माही संस्कृत शब्द मही से बना है। इसका मतलब 'पृथ्वी' या 'मछली'होता है । इसके अलावा यह नाम "नदी", "महान पृथ्वी", "स्वर्ग और पृथ्वी का मिलन" या "नंबर एक" भी हो सकता है।

माही कई उत्पादों के विज्ञापन भी करते हैं। कई आय के स्रोत्र हैं उनके। कल सड़क पर जाते समय एक ठेलिया पर लिख दिखा -'माही पूड़ी कार्नर।' मतलब माही की पूड़ी की भी दुकान है। इसके बारे में लोगों को पता ही नहीं होगा। माही नाम क्यों रखा दुकान वाले ने यह पता करना है। पूड़ी के दाम भी पता करना है।
महेंद्र सिंह धोनी को पता चले तो क्या पता वो भी कहें -'माही नाम का प्रयोग हमारे अलावा और कोईं न करे।'
कल श्रीलाल शुक्ल मार्ग के नाम पर लोगों की प्रतिक्रियाएं आईं। श्रीलाल शुक्ल जी का निधन 2011 में हुआ। सड़क मार्ग का नामकरण 2016 में हुआ। इसलिए नाम के आगे पद्मभूषण लिखवाने में उनकी सहमति का सवाल ही नहीं उठता। नाम रखने वालों ने शायद 'पद्मभूषण' शब्द को उनसे नाम के आगे यह सोचकर जोड़ा होगा कि इससे उनको ज्यादा मान मिलेगा। लेकिन उनकी कीर्ति पद्मभूषण होने के कारण नहीं, श्रीलाल शुक्ल होने से है। अपने लेखन और खासकर उपन्यास 'रागदरबारी' के कारण वे सदियों तक याद किए जायेंगे ।

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Thursday, November 20, 2025

श्रीलाल शुक्ल मार्ग

 



श्रीलाल शुक्ल जी ने एक बातचीत में अपनी विचारधारा के बारे में कहा था -"मैं सड़क के बीच कुछ कदम पर बायीं ओर खड़ा हुआ हूँ।" मतलब थोड़ा वामपंथी रुझान वाली विचारधारा के हिमायती थे श्रीलाल शुक्ल जी।

श्रीलाल शुक्ल जी लखनऊ के इंदिरा नगर मोहल्ले में रहते थे। उनके घर की तरफ़ जाने वाली सड़क का नामकरण उनके नाम पर कर दिया गया है। सड़क के बीचो-बीच लिखा है -'पद्मभूषण श्रीलाल शुक्ल मार्ग।'
सड़क के बीच में 'श्रीलाल शुक्ल मार्ग' लिखा देखकर लगा कि श्रीलाल शुक्ल जी की विचारधारा को थोड़ा बायें से घसीटकर बीचो-बीच खड़ा कर दिया गया है। मतलब उनकी विचारधारा थोड़ा बायें से दाईं तरफ़ चलकर बीचों बीच खड़ी हो गई है। क्या पता कल को वह एकदम दायीं तरफ़ आकर जाये।
श्रीलाल शुक्ल जी के नाम के आगे पद्मभूषण लिखा देखकर लगा यह उपाधि ज़बरियन उनके गले में चिपट गई है। 'श्रीलाल शुक्ल मार्ग' अपने में पर्याप्त और पूर्ण नाम होता मार्ग। लेकिन नाम के पहले उनको मिला सरकारी अलंकरण लिखा देखकर लगता है कि उनकी पहचान उनके पद्मभूषण होने से है। देश में पद्मभूषण तो कई लोगों को मिला होगा लेकिन श्रीलाल शुक्ल जी अनूठे हैं। अकेले हैं।
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टॉप फैंस का आभार

 


फेसबुक तरह-तरह से अपना उपयोग करवाता है। इसी बहाने वह लोगों को अपने में उलझाए रहता है। लोग यहां रहेंगे तभी उसका धंधा चलेगा।

इसी सिलसिले में आज फेसबुक ने मेरे पचास टॉप फैन की लिस्ट थमा दी। कहा कि अपने टॉप फैंस का शुक्रिया अदा करो। यह कुछ इसी तरह जैसे किसी मेहमान के आने पर घर के बच्चे से कहा जाता है -" बेटा अंकल, आंटी के पैर छुओ। नमस्ते करो।"
फेसबुक की सलाह मानते हुए मैं अपने टॉप फैन के प्रति आभार व्यक्त करता हूं।