Thursday, January 15, 2015

रोजी बाजार दिलाता है

नाम ओंकार। गले में 'जय माता दी' का दुपट्टा।साइकिल की उमर करीब पचीस साल। 5 नंबर की बीड़ी पीते हुए ये भाईजी आज मिले पुलिया पर।साइकिल का चेन कवर और पहिये का कवर लगभग गल चुका था।बात करते हुए बीड़ी पुलिया पर रगड़ते हुए बुझा दी।खड़े होकर बात करने लगे।

ओंकार मजदूरी करते हैं। अधारताल के पास एक जगह जाकर खड़े होते हैं। कोई काम पर ले जाता है तो दो ढाई सौ रूपये मिल जाते हैं।दो लड़के हैं। एक लड़का ट्रैक्टर चलाता है। दूसरा खमरिया के पास एक गाँव में मजदूरी करता है। एक बेटी भी है जिसकी शादी पिछले साल कर चुके हैं।

आज मजदूरी नहीं मिली तो उदासी तो स्वाभाविक है। लेकिन ऐसा होता है कभी-कभी। 

लेकिन यह तय है कि नाम ओंकार होने और गले में जय माता दी का दुपटटा होने के बावजूद रोजी का जुगाड़ नहीं हुआ। रोजी बाजार दिलाता है देवी/देवता नहीं। लेकिन यह भी देख रहे हैं कि हर देवी/देवता के अनुयायी अपने-अपने देवता की मार्केटिंग करने में लगे हुए हैं।

एक बार मन किया कि पूछें कि चार बच्चों के बारे में क्या विचार रखते हैं ओंकार। लेकिन फिर यह बेहूदगी नहीं की।हाथ में माइक भी तो नहीं था।

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3 comments:

  1. अच्छा किया बेहूदगी की बातें बेहूदों पर छोड़ दिया।

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  2. कल 25/जनवरी/2015 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.....
    गणतन्त्र दिवस की शुभकामनाएँ।

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