Thursday, January 08, 2015

वे आये, उन्होंने मारा और वे चले गये

फासिस्ट विरोधी से बहस नहीं करता, उसका मुंह तोड़ देता है। -परसाई

कल दोपहर के बाद फ़ेसबुक पर सूचना देखी फ़्रांस में वहां की प्रसिद्ध व्यंग्य पत्रिका चार्ली हेब्दो  के संपादक समेत दस लोगों को कुछ आतंकवादियों ने गोली मार दी। वे पत्रिका के दफ़्तर में आये, पत्रिका वालों को मारा और चले गये। नेट पर पत्रिका के कुछ कार्टून  दिखे। फ़्रेंच में हैं तो मतलब तो नहीं समझ आया लेकिन फ़ोटुयें देखकर लगता है कि पत्रिका धार्मिक कठमुल्लेपन की खिल्ली उड़ाती थी। उसी के प्रतिशोध में पत्रिका के लोगों को उड़ा दिया गया।

अभिव्यक्ति के मामले में फ़्रांस दुनिया का सबसे अव्वल देश माना जाता है। स्वतंत्रता, समानता और बराबरी के हिमायती देश में पत्रकारों के हाल हुये तो बाकी जगह क्या होगा?

पत्रकारों को मारने वाले मुस्लिम बताये जाते हैं। हाल में मुस्लिम आतंकवादियों  की गतिविधियां ज्यादा हो रही हैं। इसलिये दूसरे धर्म की कट्टरपंथियों की बांछे ,(बकौल श्रीलाल शुक्ल) वे उनके शरीर में जहां कहीं होती हों, खिली हुई हैं। वे बलभर मुस्लिम धर्म की बुराई करने में लगे हुये हैं। लेकिन सच्चाई यह है धर्म के नाम पर किसी भी  धर्म के अंध अनुयायी लोग मौका मिलते ही गदर काटने से बाज नहीं आते। उदार और उद्दात्त मूल्यों की स्थापना की मंशा से शुरु हुये धर्म धंधे से जुड़कर बाद में क्रूर होते गये। उद्दात्त मुखौटे के भीतर उनके इतने घाघ तरीके छिपे होते हैं कि खुदा खैर करे।

पता चला कि आतंकी फ़्रांस में ही पैदा हुये थे। इससे यह साबित होता है कि आधुनिक देश में पैदा होने का मतलब जाहिलियत से मुक्त हो जाना नहीं होता। जाहिलियत ऐसी चीज है जिसे आप अपने साथ कहीं भी ले जा सकते हैं।

किसी भी धर्म के अंधे अनुयायी उसके सबसे बड़े दुश्मन होते हैं। धर्म के प्रचार-प्रसार के उसके अच्छे तत्वों की नुमाइश की जाती है। बुरे तत्व दायें-बायें कर दिये जाते हैं ताकि उनको देखकर जनता भड़के नहीं और आंख मूंदकर धर्म मानने लगे। लेकिन आजकल के  लोग अपने धर्मों की इतनी भयंकर मार्केटिंग करने लगे हैं कि कोई भी भला आदमी डरकर उससे हाथ जोड़ ले।

मुस्लिम धर्म दुनिया में इतना फ़ैला हुआ है तो जरूर इसमें कुछ मूलभूत अच्छाइयां होंगी। इसके बारे में विद्वान लोग बता सकते हैं। लेकिन इतना पक्का है कि बिना कुछ अच्छाईयों के सिर्फ़ ताकत के जोर से कोई धर्म इतना नहीं फ़ैल सकता। लेकिन आज का समय असहिष्णुता का है। सो धर्म के मानने वाले अपनी अच्छाइयां भूलकर खराब माने जाने वाले काम करने में लगे हुये हैं।

मुस्लिम धर्म के आतंकवादी आजकल इतने सक्रिय हैं। वे दुनिया के उन्नत माने जाने वाले देशों के लोगों के खिलाफ़ जेहाद कहीं छिटपुट, कहीं संगठित करने में लगे हुये हैं। दुनिया के उन्नत माने जाने वाले देश यह समझते हैं कि वे जो भी कर रहे हैं सही कर रहे हैं। उन देशों की हरकतों को उन देशों में प्रचलित धर्म वालों के आक्रमण की तरह देख रहे हैं मुस्लिम आतंकवादी। संगठित आक्रमण का जबाब छिटपुट जेहाद से दे रहे हैं। आतंकवादियों का फ़ायदा तो निश्चित है। जीत गये तो यहां मजे हैं। मारे गये तो जन्नत में मजे।

पत्रिका के लोग मारे गये। वे अचानक मारे गये। उनमें से कुछ लोग अपना काम कर रहे होंगे। कोई कार्टून बना रहा होगा। कोई व्यंग्य लेख लिख रहा होगा। अपनी दिमागी कल्पना पर खुश हो रहे होंगे। यह सोचकर कि जब यह पूरा होगा तो लोग देखकर खुश होंगे। पढकर मुस्करायेंगे। उनको क्या पता रहा होगा कि दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनको मुस्कराना पसंद नहीं है। ऐसे भी लोग हैं दुनिया में जिनको लगता है कि अगर वे हंसेंगे तो उनका अस्तित्व खतम हो जायेगा। ऐसे लोग हैं दुनिया में जिनको लगता है कि अगर उनकी विसंगतियां उनको दिखा दी गयीं तो वे अंधे हो जायेंगे।

पत्रिका के लोग मारे गये। वे बहादुर लोग थे। उनको पता था कि वे जो कर रहे हैं इसके चलते उनकी जान जा सकती है। फ़िर भी वे अपना काम करते रहे। मारे भले गये लेकिन दुनिया के हर धर्म के कठमुल्लों को आईना दिखा गये वे। उनकी बहादुरी को सलाम। उनकी साहस को सलाम। उनकी शहादत को सलाम।

मेरी पसंद

कोई छींकता तक नहीं
इस डर से
कि मगध की शांति
भंग न हो जाए
मगध को बनाए रखना है तो
मगध में शांति
रहनी ही चाहिए
मगध है, तो शांति है।

 कोई चीखता तक नहीं
इस डर से
कि मगध की व्यवस्था में
दखल न पड़ जाए
मगध में व्यवस्था रहनी ही चाहिए
मगध में न रही
तो कहां रहेगी ?
क्या कहेंगे लोग ?
लोगों का क्या?
लोग तो यह भी कहते हैं
मगध अब कहने को मगध है
रहने को नहीं।

 कोई टोकता तक नहीं
इस डर से
कि मगध में
टोकने का रिवाज़ न बन जाए
एक बार शुरू होने पर
कहीं नहीं रुकता हस्तक्षेप -।

वैसे तो मगधनिवासियों
कितना भी कतराओ
तुम बच नहीं सकते हस्तक्षेप से -।

जब कोई नहीं करता
तब नगर के बीच से गुज़रता हुआ
मुर्दा
यह प्रश्न कर हस्तक्षेप करता है -
मनुष्य क्यों मरता हो?
श्रीकांत वर्मा
(`मगध´ संग्रह से)
 
 



 

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5 comments:

  1. अभिव्यक्ति पर हमले निरंतर बढ़ रहे हैं। वे लोगों को खत्म कर सकते हैं, विचारों को नहीं।

    श्रीकांत वर्मा की कविता बहुत कुछ बताती है।

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  2. samyik post.............post se poori tarah sahmat


    pranam.

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  3. डर गए थे उनसे .... और मर तो ये चुके हैं पहले से ....

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  4. आज 22/जनवरी/2015 को आपकी पोस्ट का लिंक है http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  5. मन के भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने...

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