Saturday, August 08, 2015

हफ्ते में एकाध मंगलवार/शनिवार और होते


पुलिया के पास ये दो महिलाएं मिलीं।तेजी से घर की तरफ जाती हुई। लाल माटी में रहती है।शनिवार को हनुमान मन्दिर से शनिचर की मंगनई करके लौट रही हैं। 15 से 20 लोग मांगने वाले आते हैं।मंगलवार और शनिवार दो ही दिन भीख अच्छी मिलती है।बाकी दिन सन्नाटा रहता है।

जैसे दफ्तरों में काम करने वाले कहते हैं कि काश हफ्ते में इतवार और होते वैसे ही शायद हनुमान मन्दिर में मांगने वाले कहते होंगे -काश हफ्ते में एकाध मंगलवार/शनिवार और होते।

भीख में जो पैसा मिलता है वह सब में बंटता है। 40-50 रूपये हरेक के हिस्से में आता है।

मांगने वाले आम तौर पर सुबह 5 से 6 बजे से लेकर शाम के 4 से पांच बजे तक बैठते हैं। कुछ लोग और देर तक भी बैठते हैं।

बातचीत में पीछे बिना चश्मे वाली माताजी ने बताया कि उनका डुकरा (आदमी) 4 साल पहले नहीं रहा।यादव हैं जाति से। पहले ठेकेदार के यहां दिहाड़ी मजदूरी करती थी।खेत में भी काम किया।लेकिन अब बुजुर्ग हो गयी तो ठेकेदार कहते हैं- अम्मा अब तुमसे काम नई हो सकता। सो का करें। मजदूरी में पेट पालने के लाने माँगन लगे।
बाल बच्चे के बारे में पूछने पर बताया-आठ बच्चे हुए। लेकिन सब एक-एक करके ऊपर चले गए।कोई न बचा।
दूसरी वाली माताजी के बेटे बहुरिया हैं। लेकिन वो अलग रहते हैं। ये भी पहले मजूरी करती थीं।लेकिन बुजुर्ग होने के बाद काम मिलना बन्द हो गया। इसलिए हनुमान जी की शरण में आ गईं। बजरंगबली तमाम के सहारे का काम करते हैं। इसीलिये तो भजन है न:

बजरंगबली मेरी नाव चली
जरा बल्ली दया की लगा देना।

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1 comment:

  1. पोस्ट पढ़ के सेंटी हुए :(
    कमेन्ट करने आया तो देखा कि सारे फेसबुक कमेन्ट है। ये टिप्पणी बक्सा यूजलेस हो गया है :)

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