Saturday, August 15, 2015

क्या आजादी क्या सिर्फ तीन थके हुए रंगो का नाम है

कल रात ट्रेन में बैठे। चलते ही तीन बच्चे बगल में आ बैठे। बोले– बैठ जाएँ अंकल जी।हमने कहा–ठाठ से। कहां तक चलना है? बोले –सिहोरा तक। सिहोरा मतलब –चालीस मिनट।

सिहोरा में बच्चे उतर गए। इतनी देर में सबके हाल समाचार हो गए। उतरते हुए हैप्पी जर्नी भी बोल गए।

3 टियर में चार्जिंग प्वाइंट देखकर सुखद लगा। फ़ालतू में एसी में जाने के लिये हुडकते हैं। वहां चार्जिंग प्वाइंट एक और मोबाइल चार। साइड बर्थ पर भी चार्ज। मतलब वातानुकूलित डिब्बे से ज्यादा चार्जिंग प्वाइंट। अब यह अलग बात कि जब चार्ज करने के लिए मोबाइल लगाया तो उसकी केवल एक बत्ती जली। मानो चार्जिंग बिंदु हमसे चैटिंग करते हुए बायीं आँख मारने वाला फोटो बना रहा हो।

सामने वाले भाई जी ने पहले ठोंक पीटकर चार्जिंग प्वाइंट को ठीक करने की कोशिश की। लेकिन नठिया बैरी ठीक न हुआ। इसके बाद सामने वाले भाई जी ने अपना मोबाईल निकालकर हमारा चार्ज करने का उदार न्योता दे दिया। वो बात अलग कि हमरे पास पावर बैंक भी था इसलिए हम उनसे बोले–पहले आप कर लीजिये फिर करेंगे।

थोड़ी देर बाद टिफिन खोलकर सर झुककर खाना खाये। कुछ सालों पहले लोग रेल में खाना साझा करके खाते थे। लेकिन अब सब अपना अपना।खीर भी रखी थी मेस बालक ने। चावल कड़े लगे। हम यह सोच रहे थे कि चावल कम पके हैं या फिर ये प्लास्टिक वाले चावल हैं।

चद्दर बिछाकर बीच वाली बर्थ पर सो गए। नींद का इंतजार करने लगे। लेकिन नींद लगता है कहीँ टहल रही थी। नेटवर्क कंचनमृग की तरह आ जा रहा था।ऑनलाइन मित्र के जबलपुर में किये नमस्ते का जबाब कटनी में मिला। मेसेज बेचारे का क्या हाल हुआ होगा। टावर टावर भटकते हुए मेरे मोबाईल में आने के लिए कितना बेचैन हुआ होगा सन्देश।

करवट बदलते हुए कई बार पेट के बल लेटने को हुए लेकिन दिल के फड़फड़ाने की बात सोचकर रुक गए। पेट के बल लेटने पर हुई परेशानी की बात हमने क्या बताई कि अब हाल यह कि कई शुभचिंतक नमस्ते बाद में करते हैं यह पहले पूछते हैं–पेट के बल तो नहीं लेटे? रहीमदास जी सही ही कहे थे:

रहिमन निज मन की व्यथा,मन ही रखो गोय
सुनि अठिलैहैं लोग सब,बाँट न लैहै कोय।
कुछ समझ में नहीं आया तो मन किया थोडा बोर हो ले। लेकिन बोरियत भी कहीँ फूट ली थी। फिर हमने सोचा कि भले खुद न हो लेकिन मित्रों को तो कर ही सकते हैं सो 'कट्टा कानपुरी' के सौजन्य से यह तुकबन्दी ठेल दी:
ट्रेन तो पटरी पर चल रही है
चांदनी खेत में टहल रही है।
यादों से कह रहे चुप बैठो,
बेफालतू में मचल रही है।
नींद न जाने किधर फूट ली,
इंतजार में आँख बिछल रही हैं।
बहुत देर तक नेटवर्क इसको लिए टहलता रहा।पोस्ट ही नहीं की कविता। बोला –इतनी रात को इतनी बोर तुकबन्दी क्यों ठेल रहे भाई जी। हमने हड़काया –अरे ज्यादा कविता मर्मज्ञ मत बनो। फटाक से पोस्ट करो वरना आजादी की पूर्वसंध्या पर तुम्हारे खिलाफ पोस्ट लिख दूंगा एक ठो।

जहां हड़काया नेटवर्क ने फौरन तुकबन्दी ठेल दी।

गोविंदपुरी स्टेशन पर उतरे तो एक महिला, जो शायद किसी रिश्तेदारी में जा रही थी, अपने बच्चे को हड़का रही थी–ज्यादा जिद करोगे तो यहीं छोड़ देंगे। सीढ़ियों पर लोग सिंहासन की तरह बैठे थे।कोई अपनी कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं। हम बचते हुए उतरे।

हमारे ऑटो वाले को हमने फोन कर दिया था। वो इंतजार करते मिले।घर पहुंचकर देखा तो अख़बार वाले मिसिर जी अख़बार लिए खड़े थे। टीवी पर प्रधानमंत्री जी भाषण दे थे।

घर पहुंचते ही वाईफाई नेटवर्क फ़ड़फ़ड़ा के मोबाइल में घुस गया।पत्नी स्कूल गयीं थी। घर में काम करने वाली चन्दा दो कप चाय बना लाई। एक कप में एक ग्लास में। हम चाय पीते हुए यह पोस्ट लिख रहे हैं यह सोचते हुए कि ऐसी आजादी और कहां ?

याद तो धूमिल की कविता भी आ रही है:
'क्या आजादी क्या सिर्फ तीन थके हुए रंगो का नाम है
जिन्हें एक पहिया ढोता है
या इसका कोई खास मतलब होता है।'
लेकिन हमने धूमिल की कविता से कहा–बहन जी आज आप नेपथ्य में रहिये थोडा। आज 'यह देश है वीर जवानों का,अलबेलों का मस्तानों का दिन है'। 'अरुण यह मधुमय देश हमारा' का दिन है।

आप सबको स्वतन्त्रता दिवस की शुभकामनायें।

नीचे फोटो में मेरी नातिन स्वतन्त्रता दिवस की पूर्व सन्धया पर अपने स्कूल की फैंसी ड्रेस में भारत माता के वेश में।फोटो बिटिया Swati ने भेजा।

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