Sunday, August 30, 2015

जहां देख लो जाम लगा

अनूप शुक्ल की फ़ोटो.कल जैसे ही कानपुर पहुंचे, लखनऊ चलने का फरमान जारी हुआ। पता तो पहले भी था लेकिन मन में कहीं यह भी था कि शायद न जाना पड़े।

जाने का साधन कार। स्टार्ट किये तो हुई नहीं। धक्का लगवाये - हो गयी। अपने देश में कोई काम बिना धक्का लगाये होता कहां है। देश की बात तो हवा-पानी के लिये कहे। यह बात तो न्यूटन बाबा के जड़त्व के नियम के हिसाब से है-' कोई भी वस्तु अपनी स्थिति में बनी रहना चाहती है जब तक उस पर बाह्य बल न आरोपित किया जाये।'

बैटरी का हमको कई महीनों से पता है कि खत्म हो चुकी है। अक्सर असहयोग धरना दे देती है। लेकिन धक्का लगने पर फिर स्टार्ट। सुबह एक बार धक्का लगने पर दिन भर चल जाती। जैसे क्रिकेट खिलाड़ी के रिटायरमेंट का हल्ला मचने पर वह अच्छा खेल जाता है और लोग डबल हल्ला मचाते हैं -'अभी बहुत क्रिकेट बची इसमें।इसको खेलने दिया जाय।' उसी तरह स्टार्ट होने के पहले सोचते कि बस आज ही बदलते हैं बैटरी। लेकिन गाड़ी चलने के बाद लगता अभी बहूत बैटरी बची है इसमें। इसको चलने दिया जाये।

बहरहाल गाड़ी जब स्टार्ट हो गई तो चल दिए।सड़क पर भीड़ मिली। गंगा बैराज पर तमाम लोग पिकनिक मनाते दिखे। आगे गंगा किनारे घास फ़ूस और हरियाली की चादर बिछी मिली। हम सुहानी धूप में गाना सुनते हुए चल रहे थे:

आजा सनम मधुर चांदनी में हम-तुम मिलें
तो वीराने में भी आ जायेगी बहार।
कुछ दूर आगे कई गाड़ियां कतार में खड़ी थीं।हम भी खड़े हो गए। लेकिन गाड़ी बन्द नहीं की। डर था कि कहीँ बन्द हो गयी तो धक्का परेड की जरूरत होगी।भीड़ में धक्का कौन लगाएगा।गर्मी से बचने के लिए एसी भी चला रहे थे। जाम देर तक लगता दिखा तो यह डर भी लगा कि पेट्रोल जो लगातार कम हो रहा था -कहीँ खत्म न हो जाए। बैटरी के कारण गाड़ी बन्द न करने के निर्णय और पेट्रोल के चलते बन्द करने की इच्छा के दो पाटों के बीच मेरा मन पिस रहा था।

इस बीच लोग अपनी-अपनी तरह से जाम से निकलने का प्रयास कर रहे थे। जिसको जहां जगह मिलती, घुस जाता। आगे जाकर फंस जाता। एक पगडण्डी टाइप रास्ता दिखा जो आगे जाकर क्रासिंग पर मिलता दिख रहा था। कुछ गाड़ी वालों ने बिना कुछ सोचे उस पर अपनी गाड़ियां हांक दीं। आगे जाकर फंस गए। जो जाम सिर्फ सड़क पर था वह अब वैकल्पिक रास्ते पर लग गया था। कुछ ऐसा ही जैसे वैकल्पिक राजनीति करने के हल्ले के साथ आये लोग परम्परागत राजनीति करने वालों जैसी ही और कुछ मामलों में और भी चिरकुट राजनीति करते पाये जाते हैं। हम मुख्य सड़क पर जाम में फंसे हुए पगडण्डी पर फंसे गाड़ीवानों के निर्णय पर हंस रहे थे।

इस बीच कई दुपहिया वाहन वाले दूसरी तरफ से उचक-उचककर खेत,पगडंडी होते हुए क्रासिंग के पास पहुंचने की कोशिश में लग गए। जाम की एक तीसरी लाइन भी लग गयी। तीनों लाइनों में फंसे गाड़ीवान यही समझ कर खुश हो रहे थे कि वे बेहतर जाम में फंसे हैं। अब यह अलग बात कि उनके साथ की सवारियां उनको इस बात के लिए कोस रहीं थीं कि वे गलत जाम में फंस गए।

अगर लोग जाम लगाने में लगे तो कुछ उसको खुलवाने में भी लगे थे।उन्होंने एक बस ड्राइवर को कोसते हुए सबको बता दिया कि अगर वह बस बीच में न घुसेड़ता तो अब तक जाम खुल जाता। पता चलते ही जाम में फंसे लोग मिलकर भुनभुनाते हुए बस वालों को कोसने लगे।इनमें वे लोग भी शामिल थे जिन्होंने इधर-उधर घुस कर स्थानीय जाम में इजाफा किया था। यह कुछ ऐसे ही जैसे लाखों का नियमित घपला करने वाले अरबों का घोटाला करने वालों को कैसे।

जाम खुलवाने वाले अनायास ही 'जाम दरोगा' हो गए। लाइन तोड़ कर आने वालों को घुड़कने लगे-'बहुत जल्दी है तुमको।सबर नहीं है। पीछे हटो।लाइन से लगो।' लोग पीछे हो जाते। इस बीच लोग गाड़ियों से हवा खोरी करने के लिए नीचे उतरने लगे। एक फुट आगे बढ़ने की गुंजाईश दिखती तो लपक कर बैठ लेते। एक ने पीक थूकने के इरादे से गाड़ी का दरवज्जा खोला। लेकिन इस बीच गाड़ी चल दी, उसने पीक सहित मुंह अंदर कर लिया।
अगल-बगल की गाड़ियों में लोग ऊबते हुए, झींकते हुए उबासी लेते हुए बैठे थे। कुछ लोग बतियाते हुए हंस भी रहे थे। कुछेक लोग अपने मोबाईल में घुसे मुस्करा रहे थे। शायद वे कोई मजेदार पोस्ट पढ़ रहे होंगे या मनपसन्द दोस्त से बतिया रहे होंगे। वे जाम में फंसे होते हुए भी जाम से बाहर थे। उनके मन कलकत्ता,दिल्ली, रामपुर, झुमरी तलैया में विचरण कर रहे होंगे- 'उनहिं न व्यापी जाम गति।'

जाम में फंसे हुए हमने त्यौहार के दिन बाहर निकलने के निर्णय को कोसा। निर्णय पत्नी का था लेकिन हम सीधे उनको जिम्मेदार ठहराने से बचना चाहते थे। इसलिए जिमेदारी के लिए 'हम' का प्रयोग कर रहे थे। वो यह समझकर चुप रहीं कि मैंने इस निर्णय की जिम्मेदारी अपने सर पर ले ली है। हम यह सोचकर प्रफुल्लित कि बहाने से ही सही मैंने आधा दोष तो उनके सर मढ़ ही दिया और वो कुछ बोल नहीं पायीं।
हमने भी मौका पाते ही जाम में फंसे-फंसे एक कविता फोटो सहित ठेल दी:
अहा सड़क जीवन भी क्या
जहां देख लो जाम लगा।
हमको मोबाईल व्यस्त देख श्रीमती जी ने देखा लेकिन कुछ बोली नहीं। इस बीच जाम दो फुट सरका तो उन्होंने कस के टोंका-'आगे बढ़ाओ गाड़ी।' उनके टोंकने में नाराजगी का भी तड़का था।हमने जल्दी से गाड़ी आगे बढ़ाई।गाड़ी कुछ ज्यादा ही तेजी से बढ़ी और आगे एक टेम्पो के एंगल से जा मिली। बम्पर घायल हो गया। गाड़ी खड़ी हो गयी।

गाड़ी को दुबारा स्टार्ट किया हुई नहीं। बैटरी 'धक्का मुआवजा' मांगने लगी। इसी विकट समय में जाम खुल गया। अगल-बगल की सब गाड़ियां चिंचियाने, भर्राने लगीं। हम निरीह से चाबी घुमा रहे थे। गाड़ी आगे नहीं बढ़ रही थी।

इसके बाद हम सबकी निगाहों में 'जाम विलेन' बन गए। पीछे वालों का वश चलता तो वो हमको रौंदकर आगे निकल जाते। फिर हमने 'जाम दरोगा' से अनुरोध किया धक्का लगाने का तो उसने मुझे कुछ सुनाने के लिए मुंह खोला लेकिन साथ में 'श्रीमती कवच' देखकर कुछ नहीं बोला। धक्का लगवाया। श्रीमती भी साथ लगने को हुईं तो बोला-आप गाड़ी में बैठिये। क्रासिंग के पास चढ़ाई में जाम में फंसी किसी की गाड़ी में धक्का लगाना बड़े पौरुष का काम है। हमारी गाड़ी ने नखरे किये लेकिन उसने उसको स्टार्ट होना पड़ा।

आज मीडिया में किसी नेता की लोकप्रियता का पैमाना है यह कि उसके कहने पर इतने लोग जमा हुए। गलत पैमाना है यह। जमा तो लोग ऐसे ही हो जाते हैं। नेता की लोकप्रियता इस बात से आंकी जानी चाहिए कि उसके कहने पर जाम हट गया ।जो जितना बड़ा जाम हटवा दे वह उतना बड़ा नेता।

आगे थोड़ी देर पर फिर जाम मिला। लेकिन हम बड़े जाम को झेलकर आये थे सो ज्यादा डरे नहीं। लेकिन गाड़ी बन्द नहीं की। हमको पक्का पता चल गया था कि बैटरी के दिन पुरे हुए। इसको न बदला तो किस्तों में नर्क रोज मिलेगा। दूसरों की भलमनसाहत का बहुत इम्तहान लेना ठीक नहीं।

हमने अपने हुंडई के अखिलेश को फोन लगाया। हमारी गाड़ी जब भी कहीँ रुकी हमको सबसे पहले वही याद आते। सोचा ऐसा न हो कि बैटरी बदलवा लें और समस्या कोई और हो। अखिलेश ने नम्बर बताया उन्नाव के हुंडई डीलर का। हम वहां पहुंचे। पता चला कि वे लोग जाने ही वाले थे पर फोन आया अखिलेश का तो रूक गए। एकदम वहीं पर बैटरी ने फिर दम जैसा तोड़ दिया।फिर वर्कशाप के लोगों ने धक्का लगाकर गाड़ी स्टार्ट की। देखकर तय पाया गया कि बैटरी ही गयी है। अब उसको विदा करने का वक्त आ गया।

समस्या जो हम सोच रहे थे वही थी यह सोचकर थोड़ा अच्छा लगा यह जानकर कि हम सही सोच रहे थे।हम और वर्कशाप वाले इस बात पर एकमत थे कि बैटरी बदल देने के अलावा कोई चारा नहीँ। यह कुछ सरकार और विपक्ष के इस बात पर एकमत होना जैसा था कि देश से गरीबी, भुखमरी मिटानी होगी।

बैटरी बदलने का निर्णय लेने के बाद बैटरी खोज शुरू हुई। वर्कशाप वाले रखते नहीं बैटरी। बगल की दुकान बन्द। एक ने बताया कि पास में एक दुकान पर हो सकती है। हम पत्नी को वर्कशाप पर छोड़कर फिर से गाड़ी को धक्का स्टार्ट करके बैटरी खोज में निकले। वर्कशाप का एक बच्चा साथ था। आगे मोड़ पर बैटरी ने फिर असहयोग किया। गाडी फिर रुक गयी। बच्चा अकेला। धक्का दे नहीं पा रहा था। अंतत: वह पैदल गया बैटरी खोज में। पांच मिनट की दूरी पर थी दुकान।

बच्चा जब चला गया तो हमको पत्नी की सुरक्षा की चिंता हुई।वर्कशाप में उनको अकेला छोड़ आये थे।कोई और ग्राहक थे नहीं। कई बार फोन किये उनको कोई न कोई बात के बहाने। अपने कार से आने के निर्णय को भी कोसा। मोटरसाइकिल से भेजना चाहिए था बैटरी लेने बच्चे को।

लेकिन कुछ देर में ही बच्चा बैटरी वाले को लेकर आ गया। दोनों ने मिलकर धक्का लगाया गाडी को। गाडी दुकान पर पहुंची। बैटरी बदली गयी। 15 साल गाड़ी पुरानी गाड़ी के तो लगा अच्छे दिन आ गए। हम गाड़ी को बार-बार स्टार्ट करते हुए उस सुख को महसूस करते रहे जिससे कई दिनों से वंचित रहे।

आगे जाम फिर मिला। लेकिन हम उससे ज्यादा चिंतित हुए बिना 'जाम सुख' लेते हुए कभी चींटी और कभी खरगोश की चाल से लखनऊ पहुंचे। अब लौटते समय न जाने किस गति से लौटना हो।

कानपुर और लखनऊ दो स्मार्ट सिटी बनने वाले हैं।दोनों के बीच की 80 किमी की दूरी है। दो स्मार्ट शहरों की 80 किमी की दुरी तय करने में 8 घण्टे लगे।स्मार्ट शहर बन जाने पर इसमें कोई बेहतरी होगी लगता नहीं।
हम इसी तरह स्मार्ट होते जा रहे हैं।

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