Thursday, August 13, 2015

तोरा मन दर्पण कहलाये

तोरा मन दर्पण कहलाये
भले बुरे सारे कर्मों को
देखे और दिखाए।

'पंकज टी स्टाल' पर गाना बज रहा है। आज सुबह पुलिया पर दो रिटायर्ड लोग मिले। हम पास गए तो उतर कर अटेंशन टाइप हो गए। हम हाल–चाल का आदान–प्रदान करके आगे बढ़ गए।

एक दम्पति आपस में बात करते हुये टहल रहे थे। महिला धीरे–धीरे चल रही थी। पैर में कोई तकलीफ सी थी। चलते हुए कुछ कह रही थी अपने उनसे। वो सामने गर्दन किये उसकी बात सुन रहे थे। सामने इतनी जिम्मेदारी से किये थे मानो उनको डर था कि पत्नी की तरफ मुंह करके सुन लेंगे तो सुनाई देना बन्द हो जायेगा।

एक महिला अकेली टहल रही थी। बाएं हाथ से साड़ी का पल्लू थामें दायें हाथ को चप्पू की तरह चलाती हुई टहल रही थी। पल्लू पकड़ने के चलते उसकी टहलने की गति आधी हो गयी थी। हमको परसाई जी का यह सूक्ति वाक्य –''इस देश की आधी ताकत लड़कियों शादी करने में बर्बाद हो जाती है' की तर्ज पर लगा–'देश की महिलाओं की आधी ताकत साड़ी का पल्लू सँभालने में खर्च हो जाती है।'

एक आदमी सड़क के किनारे खड़ा होकर पीटी कर रहा था। ऊपर हाथ करके जब वो दोनों हथेलियों को मिलाता होगा तो उनके बीच की हवा का तो दम घुट जाता होगा। हवा फड़फड़ाती हुई हथेलियों को दूर धकेलती  होगी। मुक्त होते ही आसपास की हवा के गले लगकर लंबी–लंबी साँस लेकर हाल ठीक करती होगी।

गाना बजने लगा:

'तू प्यार का सागर है
तेरी एक बूँद के प्यासे हम।'

बोलो सागर की बूँद भी भला कोई पीता है। लेकिन शायद वह 'थ्रो प्रापर चैनल' की बात हो। मतलब सागर अपना पानी बादल को देगा। बादल फिर हमको देगा पानी। प्यार होने के लिए भी कुछ न कुछ माध्यम चाहिए होता है। पहले भाई/बहन के दोस्त/ सहेलियिन या फिर पड़ोस से प्रेम का चलन था। समय के साथ क्रांतिकारी बदलाव आया है इस चलन में।

अगला गाना बजा:
'जोत से जोत जलाते चले चलो
प्रेम की गंगा बहाते चलो।'

गाने में साफ़ नहीं किया गया है कि प्रेम की गंगा प्रदूषण मुक्त होगी या फिर कानपूर/ बनारस वाली नाले,कचरे की संगति वाली गंगा।

सड़क पर एक आदमी बहुत तेजी से हाथ चलाता हुआ चला आ रहा है। हाथ तेजी से चलाते हुए उसको देखकर लग रहा है वह हवा को पहले दायें तरफ भेजता है। जैसे ही हवा दायें तरफ पहुँच जाती है वैसे ही वह उसको धकेल कर बायीं तरफ कर देता है।

दोनों हाथों के बीच की हवा झल्लाते हुए कोसती होगी। शायद मन में कह रही हो –ये मुआ हमको दफ्तर की फ़ाइल की दायें–बाएं इधर–उधर कर रहा है। ये नहीं कि हमको फेफड़े में भेजे हमरा काम पूरा हो। हवा को क्या पता कि फेफड़े तक पहुंच कर अपनी कार्बन डाई आक्साइड बनना सबके भाग्य में नहीँ होता। उसके लिए भी ऊपर पहुंच जरुरी होती है।

एक महिला सड़क पर सलीके से सड़क पर टहल रही है। 'मृदु मंद मंद मंथर मंथर/लघु तरणि हंसनी सी सुन्दर ।' महिला के दोनों  हाथ चप्पू की तरह इधर उधर हो रहे थे। मुझे लगा कि सड़क पर चलता इंसान आसमान में उड़ते पक्षी सरीखा ही होता है। आसमान में पंख जो काम करते हैं, सड़क पर वही काम हाथ करते हैं। सड़क मानो नदी हो और इस पर चलता इंसान नदी में तैरती नाव हो और इधर–उधर चलते हाथ इस 'मनुज नाव' की पतवार हैं जो चलने में सहायक होते हैं।हाथ न हों तो पैर को आगे चलने में बहुत मेहनत करनी पड़े।

नदी,नाव, पंख और आसमान के जिक्र से रमानाथ जी की कविता याद आ गयी:

'मेरे पंख कट गए हैं
वरना मैं गगन को गाता।'

पंख हम सबको मिलते हैं।अब यह हम पर है कि हम उससे कितना ऊपर उड़ते हैं। कितना आसमान छूते हैं। कुछ लोग अपने पंख रहते अपने क्षितिज छू लेते हैं। कई लोग समय बीत जाने पर पंख कट जाने का अफसोस करते हैं। इसलिए गुरु जब तक पंख हैं तब तक उड़ लो। जो हुनर है पास में उसे खूब निखार लो।

इसी कविता की आखिरी पंक्तियाँ हैं:

वो जो नाव डूबनी है
मैं उसी को खे रहा हूँ
पर डूबने से पहले
एक भेद दे रहा हूँ।

मेरे पास कुछ नहीं था
जो तुमसे मैं छिपाता।

मेरे पंख कट गए हैं
वरना मैं गगन को गाता।

तो मित्रों आज सुबह मेरे पास यही कुछ था लिखने के लिए । सब बता दिया बिना कुछ छिपाये। चलते समय गाना बज रहा है:

'प्यार के इस खेल में
दो दिलों के मेल में
तेरा पीछा न मैं छोड़ूंगा सोनिये
चाहे भेज दे तू जेल में।'

गाना सुनते हुए सोच रहा हूँ कि कितने बहादुर होते हैं प्रेम करने वाले जिनको जेल जाने की भी डर नहीं है।सोच तो यह भी रहा हूँ कि कैसा है वह समाज जहां प्रेम ,जो मानव जीवन का उत्कृष्टम भाव है, करने पर जेल जाना पड़े ।

नीचे फोटो में रांझी रोड पर बैठा कुत्ता शायद सूरज भाई को सलामी देने के इंतजार में है।

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1 comment:

  1. 'थ्रू प्रोपर चैनल' वाली बात पसंद आई :)

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