Thursday, January 30, 2025

आंसुओं का प्रबंधन भी आगे बढ़ने के लिए ज़रूरी होता है

 


प्रयागराज के महाकुंभ में कल भगदड़ में हुए हादसे में कुछ लोग 'शांत' हो गए। दुर्घटना में मारे गए लोगों के प्रति विनम्र श्रद्धांजलि ।

सुबह टीवी मीडिया हल्ला मचाते हुए बता रहा था, प्रधानमंत्री जी और मुख्यमंत्री जी तीन बार बात कर चुके हैं। बाद में माननीय मुख्यमंत्रीजी ने चार बार बात होने की जानकारी दी। पता नहीं मीडिया को पता नहीं रहा होगा या छिपा गया होगा लेकिन चार में से एक बातचीत कम बताई मीडिया ने। मतलब 25% का अंतर।
संतजनों ने अपने 'अमृत स्नान' स्थगित कर दिए। संतजनों और महमहिमों ने ,जहां हैं वहीं स्नान करने का अनुरोध किया। पता नहीं संतजन अपने स्नान ‘जहाँ वे हैं वहीं करते हैं’ या संगम पहुँचकर। वैसे भी सब श्रद्धालु बराबर होते हैं लेकिन कुछ ज़्यादा बराबर होते हैं।
दोपहर बाद अखाड़ों के 'अमृत स्नान' हुए। हेलीकाप्टर से पुष्प वर्षा भी हुई। कुछ पंखुडियाँ उन जगहों पर भी गिरी होंगी जहाँ भगदड़ में लोग मारे गए थे। जिनके परिजन मारे गए उनको यह भव्यता देखकर कैसा लगा होगा, समझना कठिन नहीं है।
दोपहर तक मारे गए लोगों की संख्या की जानकारी नहीं आयी। सोशल मीडिया पर बयान वायरल हुआ,' करोड़ों की संख्या के स्नान करने वाले श्रद्धालुओं की गिनती कर लेने वाले कुछ मृतकों की गिनती नहीं कर पा रहे हैं।'
शाम तक शायद मृतकों की संख्या के बारे में जानकारी होने पर मुख्यमंत्री जी भावुक हुए। सुबह प्रधानमंत्री जी से बातचीत में व्यस्त होने के चलने दुखी नहीं हो पाए तो शाम को हुए। भावुक क्या लगभग रो ही दिए। प्रदेश प्रधान होने के चलते दुःख तो होता ही है।
आंसुओं का प्रबंधन भी आगे बढ़ने के लिए ज़रूरी होता है।
सोशल मीडिया पर दुर्घटना पर कुछ लोगों सरकार को कोसना शुरू किया। समर्थक लोगों ने इस घटना पर ‘विघ्नसंतोषियों’ की भर्त्सना करते हुए इसे उनकी साजिश करार करते हुए इस घटना पर सरकार और व्यवस्था की आलोचना करने वालों की जमकर लानत-मलानत की। एक वरिष्ठ पत्रकार जी ने इस घटना पर सरकार को इस्तीफ़ा देने की सलाह देते हुए सरकार विरोधियों की जमकर आलोचना की। एक दूसरे वरिष्ठ पत्रकार जी ने एक बचकानी पोस्ट लिखी फिर विरोध होने पर यह कहते हुए हटा ली कि यह हमारे ड्राइवर ने बदमाशी की थी। बाद में यह भी लिखा,' हम तो ऐसे ही मज़े ले रहे थे।'
कुछ लोगों ने आज़म ख़ान के मेला प्रबंधन की तारीफ़ करते हुए उसको आज से बेहतर बताया। कभी उत्तर प्रदेश के ताकतवर मंत्री रहे आजम ख़ान जी आज जेल में हैं। राजनीति कब कहाँ करवट ले कहना मुश्किल होता है।
चतुर्वेदी जी ने लिखा है -सिनेमा हॉल में भगदड़ में अगर "Allu Arjun" को जेल हो सकती है, तो कुंभ भगदड़ में मौत के जिम्मेदार लोगों को जेल क्यों नही?
दैनिक भास्कर के हवाले से उन्होंने लिखा -महाकुंभ में मौतों के जिम्मेदार 5 अफसर:एक ने पुल बंद किए, एक ने भीड़ बढ़ने दी, एक बोला- उठो, भगदड़ मचने वाली है।
भास्कर की इस खबर पर अफसरों के खिलाफ कार्यवाही होगी या भास्कर पर कहना मुश्किल है।
मेले में सुबह स्नान का आह्वान करते हुए कमिश्नर का वीडियो वायरल है। कमिश्नर साहब स्व. वंशीधर शुक्ल जी की कविता 'उठ जाग मुसाफिर भोर भई' के अंश 'जो जागत है सो पावत है, जो सोवत है सो खोवत है' सुनाते हुए लोगों से स्नान के लिए चलने का आह्वान कर रहे हैं।
सरकार ने मेले में हुई भगदड़ की जाँच के लिए कमेटी बनाई है। जाँच कमेटी की रिपोर्ट अगले कुम्भ से पहले आ ही जानी चाहिए। क्या पता कमेटी भगदड़ के लिए स्व. वंशीधर शुक्ल जी को भी न दोषी ठहरा दे कि उन्होंने ऐसी उद्भोधनकारी कविता क्यों लिखी जिसको दोहराकर कमिश्नर साहब ने लोगों को स्नान के लिए प्रेरित किया।
आज के हिंदुस्तान अख़बार में खबरों के क्रम इस प्रकार हैं :
-हादसे नहीं टूटा हौसला।
-महाकुम्भ के दूसरे शाही स्नान में साढ़े सात करोड़ श्रद्धालुओं ने लगाई डुबकी।
-अमृत स्नान से ठीक पहले हुई भगदड़ में 30 श्रद्धालुओं की मौत, 60 घायल।
-संगम पर सबके संयम से भीषण संकट टला।
-हादसे की जाँच को तीन सदस्यीय आयोग।
-मृतक आश्रितों को 25-25 लाख मुआवज़ा।
हादसे से नहीं टूटा हौसला बाक़ी खबरों के मुक़ाबले 4-5 गुना ज़्यादा बड़े फाँट में है। उसके ऊपर स्नान के लिए जाते संतजनों के फ़ोटो हैं जिसमें वे तलवार, त्रिशूल और डमरू लिए उल्लसित मुद्रा में हैं। यह फ़ोटो पहले का होगा या उनको कल भगदड़ में मारे जाने वाले लोगों के बारे में जानकारी नहीं होगी या फिर उनको इस बात कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि कुछ लोग मारे गए। एक संवेदनशील समाज के लिए तीनों ही स्थितियाँ चिंतनीय और शर्मनाक हैं।
बहुत पहले एक इंटरव्यू में गुजरात दंगे के बारे में एक सवाल के जबाब में तत्कालीन मुख्यमंत्री जी ने जो कहा था उसका मतलब था- 'मेरी असफलता रही कि मैं मीडिया को मैनेज नहीं कर पाया।'
कल हुई अफ़सोसनाक मौतों पर मीडिया और अख़बार की रिपोर्टिंग से पता चलता है कि सरकारों ने मीडिया मैनेजमेंट अच्छे से सीख लिया या कहें मीडिया ने अच्छे से सीख लिए है कि उसको कैसे मैनेज होना है।
महाकुंभ का आयोजन अपने आप में एक अनूठा आयोजन है। श्रद्धा न हो तब भी इतने भव्य आयोजन का गवाह होना अपने में विरल अनुभव है। जो लोग भी गए होंगे उनसे इसके बारे में पता चलता है।
महाकुंभ अभी 26 फ़रवरी तक चलना है। सब कुछ निर्विघ्न सम्पन्न हो इसके लिए सबसे ज़रूरी है कि कोई वी.आई.पी. दर्शन फ़ौरन बंद किए जाएँ। महाकुंभ श्रद्धालुओं के लिए रहे वी.आई.पी. के लिए नहीं। चाहे तो वी.आई.पी. 26 के बाद पूरे प्रोटोकाल से स्नान करें। पुण्य लूटें। जीवन सबसे अमूल्य है इसकी हर क़ीमत पर, हर स्तर पर रक्षा होनी चाहिए।

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Wednesday, January 29, 2025

सड़क पर व्हाटसप भारत यात्रा


 कल बड़े दिन बाद साइकिल चलाई। नहा-धोकर , नाश्ता-पानी करके धूप में नहाने निकले। धूप हमको देखकर खिल सी गयी। दोनों को बहुत दिन बाद किसी आत्मीय से मिलने का सुख जैसा मिला।

एक मकान के बाहर एक आदमी पैर में कच्चा प्लास्टर बांधे पैर को धूप के सामने किए खड़ा था।फ़ैक्ट्री में काम करते समय किसी गोले की फ़ोरजिंग उसके पैर पर गिर गयी थी। पंजे में फ़्रैक्चर हो गया। तीन हफ़्ते की छुट्टी।
कैलास नगर की तरफ़ गए। नाले के पार एक इमारत के विधायक द्वारा उद्घाटन का चमकता पत्थर लगा था। इस तरफ़ की तमाम जमीन पर लोगों ने अवैध क़ब्ज़ा कर रखा है। इमारत जिस जगह पर बनी है पता नहीं वह अवैध क़ब्ज़े वाली है या नहीं लेकिन पूरी दुनिया में अवैध क़ब्जे का यही तरीक़ा चलन में हैं।
अमेरिका में अंग्रेजों ने क़ब्ज़ा किया। स्थानीय लोगों को मारकर, खदेड़कर किनारे कर दिया। अब अवैध लोगों को बाहर कर रहा है। लोगों को बाहर करने के साथ खुद भी बाहर हो जाना चाहिए अगले को। उसका क़ब्ज़ा भी अवैध ही है।
एक बाल काटने की दुकान पर बोर्ड लगा था -गुडलक हेयर ड्रेसर। बाल ठीक कटें न कटें यह आपका भाग्य। हमारे साथ अक्सर ऐसा होता है। पाँच में से तीन बार घर आने पर बताया जाता है-' ठीक नहीं कटाए बाल, सही नहीं लगी डाई।' कभी-कभी तो वापस जाना पड़ता है ठीक कराने।
एक बंगाली डाक्टर का बोर्ड लगा है, 'यहाँ बिना दर्द दांत उखाड़ा जाता है।'
एक चाय की दुकान पर बैठा एक बुजुर्ग चाय का कप चेहरे के पास किए उसकी भाप से अपना चेहरा सेंक रहा था। फेस टी स्टीम बाथ जैसा काम। चाय पीने के पहले चेहरा सेंकना मतलब एक पंथ दो काज।
सड़क पर हर मकान, दुकान के बाहर बैठे लोग धूप सेंक रहे थे।
एक मकान के बाहर एक महिला एक शेर की मूर्ति की पीठ पर हाथ रखे धूप सेंक रही थी। उसको देखकर मुझे सरकारी दफ़्तरों में 'मेकइन इंडिया' के लोगो वाले शेर की याद आई। सरकारी दफ़्तरों में तमाम चूहे जैसे दिल वाले लोगों ने अपने दफ़्तर की मेज़ पर बड़ी शेर की मूर्तियाँ रखी हुईं थीं। यदाकदा वे लोग शेर की पीठ पर हाथ फेरते हुए भी फ़ोटो खिंचाते दिखते थे। उस समय उनके चेहरे पर लोमड़ी जैसी मुस्कान अपने आप चिपक जाती थी। शेर, चूहा, लोमड़ी,इंसान का गठबंधन अद्भुत होता है।
लौटते हुए देखा तो पता चला कि जिसे मैं मकान समझा था वह संतोषी माता का मंदिर था। उसके चबूतरे पर बैठी धूप सेंकती महिलाओं ने बताया कि मंदिर बीस-पचीस साल पहले सबके सहयोग से बना था। ज़मीन किसकी थी यह उनको नहीं पता था। तमाम धार्मिक स्थल ऐसे ही सर्वजन सहयोग से बनते हैं।
सड़क किनारे नालियों से निकला गीला कूड़ा जगह-जगह पड़ा था। ऐसा लगा नाली विरोधी हरकतों के कारण कूड़े को 'नाली बदर' कर दिया गया है।जब तक कूड़ा सूखेगा और लोग इसे उठाने आएँगे तब तक कूड़े का काफ़ी हिस्सा फिर से नाली में शामिल हो चुका होगा जैसे कभी ज़िला बदर किए गए अपराधी समय बीतने पर ज़िले के सम्मानित नागरिक हो जाते हैं, देश द्रोह के आरोपी रहे लोग अखाड़ों के महामंडलेश्वर बन जाते हैं।
रामलला इंटर कालेज के मोड़ पर खड़े आटो वाले सवारियों का इंतज़ार कर रहे थे। धूप सेंकते ड्राइविंग सीट पर बैठे आटो वाले ने बताया- " सवारियों को अब इंतज़ार का सबर नहीं। सवारियों के मुक़ाबले आटो ज़्यादा हो गए हैं। कोई और काम नहीं तो यही कर रहे हैं।"
आगे एक जगह एक वैन खड़ी थी और पास में एक शेड सा लगा था। दोनों पर व्हाटसएप लिखा था। पता चला व्हाटसएप की तरफ़ से लोगों को व्यापार में सहयोग करने की मुहिम के रूप में कैंपेंन चलाया जा रहा था। व्हाटसएप भारत यात्रा के नाम से जानकारी देने की मुहिम चलाई जा रही है। इस बहाने शायद व्हाटसएप अपना कोई सर्वे कर रहा हो, कहना मुश्किल। लेकिन जिसको अपने व्यापार में कोई सहयोग चाहिए तो व्हाटसएप भारत यात्रा ( नम्बर +919160574425) से जुड़कर ले सकता है।
क्या पता कोई राजनीति से जुड़ा नमूना व्हाटसएप भारत यात्रा से चुनाव में झूठ बोलने के तरीक़े जानने की कोशिश करे। तब शायद व्हाटसएप भारत यात्रा एप कहे कि मालिक आपको सिखाने की औक़ात हममें नहीं है। आप स्वयंसिद्ध हैं।
व्हाटसएप भारत यात्रा के वालंटियरों से बात हुयी। हिसाम केरल के त्रिचूर से और मयंक पूर्वी चंपारन से हैं। दोनों इंजीनियर। हिसाम केरल से, मयंक आई.आई.टी. दिल्ली से कम्प्यूटर इंजिनीयरिंग की पढ़ाई किए हैं। हिसाम के पिता सीआरपीएफ में हैं इसीलिए अलग-अलग जगह पोस्टिंग हुई और यही कारण रहा होगा कि वे साफ़ हिंदी समझ-बोल पा रहे थे । मयंक के पिता बिहार में डाक्टर हैं।
शहर के एक बहुत सामान्य इलाक़े में व्हाटसएप की पैठ बनाने की कोशिश से लगा कि तकनीक और जानकारी देने के बहाने बाज़ार हमारे चारों तरफ़ अपनी पैठ बनाता जा रहा है।
रास्ते में तमाम रोचक नामों वाली दुकानें दिखीं। कई जगह लोगों से रास्ता पूछने के बहाने बतियाए। धूप सेंकते लोगों के चेहरों की चमक दिखी। एक जगह दो बुजुर्ग महिलाएँ धूप में बतियाती, गपियाती दिखीं।
काफ़ी दिन बाद साइकिल चलाने के चलते स्पीड थोड़ा कम रही। कई जगह रुके भी। गपियाते, बतियाते, फोनियाते, धूपियाते, मोबाइलियाते, सुस्ताते वापस लौटे। तीन घंटे की साइकिल यात्रा में कुल पंद्रह किलोमीटर यात्रा हुई। स्पीड के हिसाब से देखा जाए तो एक तिहाई रही। एक तिहाई मतलब थर्ड डिवीजन। थर्ड डिवीजन सही लेकिन पास तो हुए ही। ठीक है न?

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Tuesday, January 28, 2025

गूगल के मज़े

कल गाड़ी रिपेयर के लिए डालने गए। गाड़ी शेड से निकालते समय स्क्रीन पर कैमरे ने बताया कि निकल जाएगी गाड़ी। निकली तो गाड़ी लेकिन अगले बंपर पर लोहे के खंभे ने मोहब्बत से चूम लिया। जैसे कोई हीरो किसी हीरोईन का तगड़ा चुम्बन लेते हुए उसकी लिपिस्टिक भी चूस लेता होगा वैसे ही बंपर के कोने का पेंट खुरच गया। लोहे के खम्भे ने सफ़ेद बंपर पर काला निशान लगा दिया । चेहरा होता तो कहते नज़र बचाने के लिए है। लेकिन साल भर पहले की गाड़ी पर, जिसका कैसलेस बीमा उपलब्ध है, कोई भी निशान अखरता है।
वरिष्ठ नागरिक की उमर में हासिल चीजों का रखरखाव मुश्किल होता है। उम्रदराज लोगों द्वारा कमउम्र बीबी को सहेजने जैसा हिसाब। शहरों में नई गाड़ी चलाते समय लगता है कि सड़क पर लड़कियों को चलते हुए कैसा लगता होगा। अग़ल-बग़ल, आगे-पीछे चलती, आती-जाती हर गाड़ी देखकर लगता है कि हमारी ही गाड़ी को छेड़ने के लिए चल रही है। धड़ल्ले से बग़ल से गुजरते आटो शोहदों जैसे लगते हैं जिनका जन्म ही मासूम, नयी गाड़ियों को छेड़ने के लिए हुआ है।
बुढ़ापे में नई गाड़ी चलाते हुए सड़क का माहौल बाली की तरह लगता हैं जो चालक की आधी ड्राइविंग स्किल हर लेता है।
इस मामले में हमारी सैंट्रो सुंदरी का साथ हमेशा सुकून देह लगता है। पचीस साल से हमारा साथ दे रही सैंट्रो सुंदरी अब अगले पाँच साल तक और साथ रहेगी। आगे-पीछे, अग़ल-बग़ल, दाएँ-बाएँ तमाम ठोकरों और निशानों के बावजूद सैंट्रो सुंदरी चलने में कभी नख़रा नहीं करती। चाबी आधी घूमते ही कहीं भी चलने के लिए तैयार हो जाती है।
बहरहाल गाड़ी रिपेयर के लिए रिपेयर शाप ले जाने के लिए निकले। पहले भी कई बार जा चुके हैं। रास्ता भी सीधा है। लेकिन फिर गए गूगल शरण में। बताया 39 किलोमीटर दूर। हमें कुछ ज़्यादा लगा लेकिन चल दिए। आधे रास्ते पहुँचे तो लगा कुछ ज़्यादा ही दूर ले जा रहा गूगल बाबा। फ़ोन किया आमिर को जिसने मुझे गाड़ी दिलवाई थी। उसने बताया 16 किमी दूर है आर्मापुर से बाडी रिपेयर शाप। उतना तो हम चल आए थे। हमने फिर सर्च किया, गूगल अभी भी 23 किमी। हमने बाडी शाप फ़ोन करके लोकेशन माँगी। पता चला दूरी अभी भी 24 किमी ही थी।
हमने फिर गाड़ी से उतरकर पूछा किसान नगर कित्ती दूर है। पता चला पीछे छोड़ आए हैं। दो-तीन किलोमीटर। गाड़ी घुमा ली। अब गूगल ने बताया कि चार किमी दूर है बाडी रिपेयर शाप। पहुँचकर जमा की। वहाँ मौजूद भाई जी ने पूछा, अभी कुछ दिन पहले इसी बंपर को बदलवाया था न? पता चला वो दाँया वाला था। इस बार बायाँ ठुका है।रिपेयरिंग में भी संतुलन ज़रूरी है।
बात गूगल की हो रही थी। अभी भी बाडी रिपेयर शाप की दूरी 39 किमी ही बता रहा है। जबकि दूरी 16 किमी है। लगता है गूगल बाबा भी बुजुर्ग हो जाने के चलते चीजें ठीक से नहीं देख पा रहे। यह भी हो सकता है हमसे मज़े ले रहा हो गूगल बच्चा। वो तो कहो हम पूछ लिए कल वरना घंटे भर और सड़क पर टहलते रहते।
यह भी हो सकता है जैसा Dhirendra Srivas जी ने बताया -"गूगल अभी कुंभ में बिजी है इसलिए बाकी लोकेशन पर उत्ता धियान नहीं दे पा रहा है।"
गाड़ी की तरह अपना देश भी लोग ऐसे ही हांके चले जा रहे हैं। अपने-अपने डिज़ाइनर नक़्शे के सहारे। कोई बताता है अगले बीस साल में पहुँच जाएँगे, कोई चिल्लाता है मंज़िल तीस साल दूर है। कोई हल्ला मचाता है अरे ये वाला ड्राइवर देश की गाड़ी पचीस साल पीछे ले जा रहा है। उतारो इसको, हम चलाएँगे गाड़ी। हमको पता है मंज़िल। (इस हल्ले-गुल्ले में देश किधर जा रहा है यह जानने के लिए टिप्पणी में दी गयी पोस्ट देखिए)
लेकिन देश को इस हल्ले-गुल्ले से कोई मतलब नहीं। वह उधर ही चल देता है जिधर लोग उसे हांकते हैं। हज़ारों, लाखों, अरबों, खरबों स्टेयरिंग लगे हैं देश में। हरेक को लगता है कि देश को वही चला रहा है। वही हांक रहा है। देश को भी आगे-पीछे से कोई मतलब नहीं। वह बस चल रहा है, अपने तरह-तरह के ड्राइवरों की बाल सुलभ चिरकूटइयों को वात्सल्य से निहारता हुआ। सदियों से वह इस तरह की लीलाओं को देखता आ रहा है। न जाने कितने गूगल-फूगल, तुर्रम खां टाइप नमूनों को देख चुका है देश। अभी तो देश कुम्भ में डुबकी लगाते लोगों को निहार रहा है। डेढ़ सदी बाद आया है यह मौक़ा। ऐसे न जाने कितने कुम्भ देख चुका है देश। एक बार फिर सही।

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Monday, January 27, 2025

संत चौक मतलब स्टोरी चौक


 आजकल पढ़ने के हाल कुछ ऐसे हो रखे हैं कि विरले ही कोई किताब एक बार में पढ़ ली जाए। किताब मंगाते हैं। उलट-पलट के थोड़ा बहुत पढ़ते हैं। कभी भूमिका, कभी प्रस्तावना। कभी अंदर का भी कुछ। कुछ दिन में किताब अक्सर किनारे भी हो जाती है, तसल्ली से पढ़े जाने के लिए।

लेकिन Jawahar Choudhary जी के नवीनतम उपन्यास ( उनका तीसरा उपन्यास) 'संत चौक' के साथ ऐसा नहीं हुआ। 20 जनवरी को जवाहर चौधरी जी के उपन्यास के छपने की सूचना मिली। अद्विक पब्लिकेशन को पैसा भेजकर उसी दिन ख़रीद लिया उपन्यास। 25 जनवरी को उपन्यास मिला। पढ़ना शुरू करते हुए थोड़ा अटके लेकिन फिर एक बार पठन-प्रवाह बना तो फिर दो दिन में पूरा उपन्यास पढ़ डाला। इसे इस उपन्यास की रोचकता और पठनीयता का प्रमाण माना जा सकता है।
उपन्यास वैसा ही है जैसा परिचय में बताया गया है -'उपन्यास में हमारे आसपास के पात्र हैं जो रोजमर्रा की कठिनाइयों और समस्याओं से जूझते और उनमें ही आनंद के अवसर जुटाते हुए जिंदगी गुज़ारते हैं। उपन्यास जीवन की, ख़ासकर हालिया समय के समाज की, कड़वी सच्चाइयों से हमें परिचित कराता है।
उपन्यास के पात्र मुकेश के बहाने नोटबंदी, सरकार के अघोषित नियंत्रण के तरीक़ों, जातिप्रथा की कड़वी सच्चाई, राजनीतिज्ञों के जुमलों, सांप्रदायिकता की राजनीति जैसी तमाम रोजमर्रा की बुराइयों पर सरसरी निगाह डालते हुए उपन्यास का तानाबाना बुना गया है।
ऐसा लगता है कि मुकेश को उपन्यास की रिपोर्टिंग करने के लिए ही संतनगर भेजा था जवाहर चौधरी जी ने। संत नगर में इतने किस्से होते हैं उपन्यास का एक पात्र कहता है," इधर सब लोगों का कोई न कोई स्टोरी है। जिसको भी मुँह खोलने को बोलो तो ज़ुबान पे एक स्टोरी तैयार मिलती है। संत चौक का नाम स्टोरी चौक करना चइए।"
आज के समय को बयान करते हुए चौधरी जी लिखते हैं ," नासमझी को अनदेखा करते रहना आज सबसे बड़ी समझदारी है। दिशा देने को कहा गया है ,"जाही विधि राखें राम,ताहि विधि रहिए।" इस पंक्ति में राम नहीं हैं सरकार है, सरकार मतलब हुज़ूर हैं, साहब हैं। विधि नियम और क़ानून को कहते हैं। इस एक पंक्ति से व्यवस्था या सिस्टम को समझा जा सकता है। महंगाई बढ़ रही हो, नौकरियाँ जा रही हों, मौतें हो रहीं हों, संस्थान बिक रहे हों, लोग दरबदर हो रहे हों तब भी कहीं बेचैनी उजागर नहीं है। अच्छा हो रहा हो या न हो रहा हो आप भक्ति भावना से मज़ा लीजिए, जो भी बुरा हो रहा हो उसे मुर्दों के खाते में डाल दीजिए।
एक समय बात-बात पर प्रधानमंत्री के छप्पन इंच के सीने वाले बयान के मज़े लेते हुए जवाहर चौधरी जी लिखते हैं," नुकती के पहाड़ के दो ढेर देखकर पार्षद-पति मोतीराम शर्मा और बोतल का सीना चौवन और त्रेपन हो रहा है और वे एक राष्ट्रीय रिकार्ड के काफ़ी क़रीब पहुँच गए हैं।"
धार्मिक कट्टरपंथी लोगों की सोच व्यक्त करते हुए यह संवाद देखिए," ख़ामोश...दो धर्मों के बीच नफ़रत होती है प्रेम कैसे हो सकता है। अगर कोई प्रेम करेगा तो हम करने नहीं देंगे। हम लोगों को जागरूक करेंगे। सच्चा जागरूक व्यक्ति कभी प्रेम नहीं करता है।"
हिंदू धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तन के कारण पर विचार करते हुए लिखते हैं जवाहर चौधरी," अगर अपने धरम में किसी को लात-जुटे मिलें, जानवरों की सी ज़िंदगी मिले, बासी जूठा खाना पड़े, घर में तख़त-कुर्सी नहीं रख सके, दूल्हा घोड़ी नहीं चढ़ सके न ही मंदिर की सीढ़ियाँ तब तो आदमी धरम बदलेगा ही ना! जिसको खाने को मिल रहा है, इज्जत मिल रही है तो वो धरम उसका है और वो धरम का है।
कुल 127 पेज के इस उपन्यास में जवाहर चौधरी जी आज के समय की तमाम विसंगतियों पर सरसरी निगाह डालते हुए रोचक अन्दाज़ में व्यंग्य किया है।
उपन्यास के कुछ पंच वाक्य जो पहली पढ़ाई में नोट कर पाया मैं वे यहाँ पेश हैं:
जवाहर चौधरी जी के उपनयस 'संत चौक' के कुछ पंच
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1. विज्ञापन कहते हैं कि ये चीज़ नहीं है अगर आपके पास तो मानों कि आप मनुष्य ही नहीं हैं। पता नहीं चलता कि लोग जीने के लिए मरे जा रहे हैं या विज्ञापनों में समा जाने के लिए।
2.साहब छोटी जात के हैं, इसलिए कुर्सी तभी ग्रहण करते हैं जब सवर्ण सिपाही गस्त पर होते हैं। बाक़ी समय वे बाक़ायदा बेंच शेयर करते हैं या टहलते रहते हैं। अन्यथा न लें इसे आस्था और संस्कार कहते हैं। आप जानते ही हैं कि आस्था हमेशा क़ानून से बड़ी होती है और संस्कार सभ्यता से।
3. बस चलाना हो या देश, न सुनना चलते रहने के लिए ज़रूरी माना जाता है।
4. सरकार किसी काम की नहीं होती। बोतल का वादा करके एक पउवे में वोट ले लेती है कमबख़्त।
5. भाग्य पर भरोसा करने की परम्परा नहीं हो तो इधर क्रांति होने में देर न लगे।
6. लोग संगठित हों तो ड्राइवर-कंडक्टर चाहे देश के ही क्यों न हों, ढीले पड़ जाते हैं।
7. गुंडे बदमास किसके भाई नहीं होते आजकल? दाऊद पूरे देश का भाई है कि नहीं।
8. आज कौन सा ऐसा धंधा है जिसमें चोट्टई नहीं होती है?
9. दुनिया जेबकटों से भरी पड़ी है। कोई छोटा कोई बड़ा, कोई छुपा है कोई उजागर।
10. मुसीबतें कभी अकेले नहीं आतीं हैं, वे प्रायः गठबंधन करके मोर्चा लेती हैं।
11. शरम जान पहचान वालों के बीच आती है, अनजान लोगों के बीच आदमी को सिर्फ़ हिम्मत आती है।
12. साहब को साहब बनाए रखने की ज़िम्मेदारी भी गरीब गुरबों पर ही होती है। जो लोग बस कंडक्टर की घुड़की से गोल हो जाते हों वो साहब के आगे एक ज़रूरी 'चीं' भी निकाल पाएँ इसमें संदेह है।
13. अगवाड़े जितना झक्क-भक्क मेकअप है पिछवाड़े उतनी ही गंदगी है।उस्ताद का कहना है इसी को मार्डन ज़माना कहते हैं।
14. जिसमें खोज की खाज होती है वही अच्छा पत्रकार बनता है।
15. आदमी महान वही होता है जिसके चेले बड़ी संख्या में हों। नाम तब क़ायम रहता है जब नाम लेवा हों।
16. आदमी पैसे के साथ दिक़्क़त कमाता है। कम कमाई कम दिक़्क़त, ज़्यादा कमाई ज़्यादा दिक़्क़त।
17. अव्यवस्था को बनाए रखने का प्रयास ही व्यवस्था है। पहले यह ज़िम्मेदारी धार्मिक पाखंडियों के पास थी, अब राजनीतिक गुंडों के पास भी है।
18. नासमझी को अनदेखा करते रहना आज की सबसे बड़ी समझदारी है।
19. जहां गफ़लत जैसा कुछ होता है वहाँ प्रेम जल्दी फलित होता है।
20. जब 144 लगी हो तो पुलिस से नहीं उलझना चाहिए। ऐसे मौक़ों पर पुलिस डंडा सेवक होती है।
उपन्यास शायद प्रकाशक द्वारा पुस्तक मेले के मौक़े पर लाने के उद्धेश्य थोड़ा जल्दबाज़ी में छपा है। इसके चलते कुछ वर्तनी की छुटपुट चूक रह गयी हैं।कुल बीस भागों में छपे उपन्यास के हर भाग की शुरुआत में छपे फ़ोटो साफ़ नहीं हैं। बेहतर होता उनको छोड़ ही दिया जाता। आगे की प्रतियों में शायद इसे ठीक किया जा सके।
उपन्यास की क़ीमत दो सौ रुपए हैं। उपन्यास ख़रीदने की कड़ी का विवरण जवाहर चौधरी जी की पोस्ट में दिया है। पोस्ट का लिंक टिप्पणी में।
प्रथम 100 प्रतियां खरीदने वाले लोगों में से तीन के 200 रुपए वापस भी हो सकते हैं। यह काम प्रकाशक करेगा। जवाहर चौधरी जी हमको इस बात का भी कुछ इनाम ज़रूर देंगे कि उनके उपन्यास के पहले कुछ पाठकों में अपन न सिर्फ़ शामिल हुए बल्कि पाठकीय प्रतिक्रिया भी दी।
जवाहर चौधरी जी को उनके इस रोचक उपन्यास के लिए बधाई।

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Wednesday, January 22, 2025

व्हाट्सएप स्टार्ट न हुआ




आज सुबह मोबाइल आन करते ही कुछ नोटोफ़िकेशन दिखे । उनमें कुछ व्हॉट्सएप के भी थे। अधिकतर गुडमार्निंग वाले। संदेश देखने के लिए व्हाट्सएप देखने के क्लिक किया तो खुला नहीं। क्लिक करते ही बाहर हो जा रहा था। कई बार कोशिश की लेकिन मेसेज दिखे नहीं।
मोबाइल को रिस्टार्ट करके भी देखा। कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। एकाध लोगों से पूछा। किसी ने कहा व्हाट्सएप फिर से इंस्टॉल करो, किसी ने कुछ और सुझाव दिए। मैंने व्हॉट्सप डिलीट किया। फिर से डाउनलोड किया। पहली बार में बिजनेस वाला हुआ। उसने कुछ और विवरण पूछे तो लगा गड़बड़ है। फिर से दूसरा बातचीत वाला डाउनलोड किया।
व्हाट्सएप शुरू करते हुए उसने पूछा चैट और डाटा रिस्टोर करना है ? हमको लगा कि बाद में व्हाट्सएप अलग से भी पूछेगा तब हाँ कहेंगे। बिना डाटा रिस्टोर किए आगे बढ़ गए। व्हाट्सएप फौरन शुरू हो गया।
शुरू तो हो गया लेकिन सारा डाटा ग़ायब हो गया। मोबाइल की पूरी मेमोरी का आधे से अधिक हिस्सा इसी डाटा का था। मेसेज, फ़ोटो, वीडियो सब गायब। व्हाट्सएप एकदम नए पैदा हुए बच्चे सरीखा एकदम साफ़ सुथरा दिख रहा था। ढाई सौ जीबी से ऊपर की मेमोरी पर झाड़ू लग चुका था। पूरा व्हाट्सएप किसी नए चिकने फर्श की तरह चमक रहा था।
महीनों से जमा डाटा, चैट, फ़ोटो, वीडियो ग़ायब हो गए। अपने में अफ़सोस करने लायक बात। लेकिन याद करने पर ऐसा कोई डाटा याद नहीं आया जिसके डिलीट हो जाने का शिद्दत से अफ़सोस हुआ हो। कुछ निमंत्रण पत्र थे उनके से जो याद थे वो दुबारा मंगा लिए कुछ मंगा लेंगे। इसी बहाने तमाम ग्रुप देखे जिनके हम सदस्य थे। महीनों से कोई हलचल नहीं थी उनमें। सबसे बाहर आए। अभी तक बीस-पच्चीस से बाहर आए। आगे और से निकलेंगे।
आज के समय दुनिया में करीब तीन अरब व्हाट्सएप खाते हैं। मतलब दुनिया की आधी-आबादी के बराबर। हमारा खाता खत्म हुआ। पुराने का सारा नाम-ओ-निशान कम से कम हमारे लिए खत्म हो गया। हमारे खाते का पुनर्जन्म हुआ आज। हमारा खाता कह रहा होगा , फिर से इसी नाशुक्रे के नंबर पर आना था। हमको भी पुराने खाते की याद कुछ दिन में बिसरा जाएगी।
दुनिया में इंसान के साथ भी कुछ ऐसा ही होता होगा। दुनिया में कुछ साल , सदी बिताने के बाद अपने-अपने हिसाब से इंसान डिलीट हो जाता होगा। उससे जुड़ी यादें कुछ लोगों को कुछ समय तक कुछ लोगों के ज़ेहन में रहती होंगी। कोई अच्छा कहता होगा, कोई बुरा। कोई बहुत अच्छा, कोई बहुत बुरा। इतना बुरा भी नहीं था, इतना भला भी नहीं था कहते हुए याद रखने वाले लोग भी होंगे। तमाम लोगों की सही तस्वीर लोगों तक पहुँचती भी नहीं होगी और वे लोग दुनिया से विदा हो जाते होंगे। दुनिया के मोबाइल से उनका खाता डिलीट हो जाता होगा। Alok Puranik जी के लेख और इसी नाम से किताब पापा रीस्टार्ट न हुए’ की तरह।
हम सब भी ऐसे ही जी रहे हैं। एक क्लिक में खत्म हो जाने और किसी और रूप में रीइंस्टाल हो जाने वाले। हाहा, हुती जलवे और चुपचाप, निस्पंद जीने वाले सभी के हाल कमोबेश एक जैसे ही होने हैं। कोई गाजे-बाजे के साथ डिलीट होगा , कोई चुपचाप बिना किसी को डिस्टर्ब किए ओ हेनरी की कहानी ‘आख़िरी पत्ती’ के नायक की तरह।
यह लिखते हुए ख्याल आया कि पढ़ने वाले दोस्त यह न समझें कि कहीं तबियत खराबी या अवसाद के चपेटे में तो नहीं आ गए अनूप शुक्ल। तो डिस्क्लेमर यह कि ऐसा कुछ नहीं। अपन मस्त, धूप सेंकते, सूरज भाई के प्रसाद की विटामिन डी पंजीरी फाँकते मजे में हैं। आप भी मजे में रहिए। जो होगा देखा जाएगा। आप भी धूप खा लीजिए फ़ोटो में ।

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Tuesday, January 21, 2025

अनूप जी को विनम्र श्रद्धांजलि



कल रात वरिष्ठ व्यंग्यकार , पत्रकार अनूप श्रीवास्तव जी के न रहने का समाचार मिला। अट्टहास पत्रिका और अट्टहास सम्मान के माध्यम से हिंदी हास्य-व्यंग्य के क्षेत्र में अनूप जी का यादगार योगदान रहा। बातचीत होने पर अपने पत्रकार जीवन और साहित्य से जुड़े अनगिनत किस्से सुनाते थे। हर किस्से से जुड़ा कोई दूसरा किस्सा था उनके पास। पुरानी और नई पीढ़ी से लगातार संवाद , संपर्क में रहते थे।

मेरे लेखन के लिए कहते थे, “महिलाओं के स्वेटर बुनने की तरह अनूप अपना लेखन बुनता है।” अद्भुत जिजीविषा थी उनके भीतर। बीमार होने, चोट लगने के बावजूद जरा सा ठीक होते ही सक्रिय हो जाते।
उनके न रहने से हास्य-व्यंग्य के क्षेत्र में अपूरणीय क्षति हुई है। अनूप जी को विनम्र श्रद्धांजलि ।

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Monday, January 20, 2025

बेहराम कॉन्ट्रैक्टर उर्फ़ बिजीबी









 Alok Puranik पर केंद्रित किताब आलोक पुराणिक- व्यंग्य का एटीएम की छापे की कमियों को देखते हुए सब लेख फिर से पढ़े। आलोक पुराणिक जी के इंटरव्यू फिर से पढ़े। अपनी बातचीत में उन्होंने उन लेखकों का ज़िक्र किया था जिनके लेखन से वे प्रभावित रहे। उनमें एक नाम बेहराम कॉन्ट्रैक्टर, जो कि बिजीबी (Behram Contractor, Busybee) के नाम से प्रख्यात थे का ज़िक्र था। परिचय के लिए टिप्पणी में लिंक देखिए।

बिजीबी ((1930 - 9 अप्रैल 2001) अंग्रेज़ी में लिखते थे। अपनी लगभग 35 साल के लेखन में शुरुआती लेखन उन्होंने द फ्री प्रेस जर्नल , द टाइम्स ऑफ़ इंडिया ( बॉम्बे ) और मिड-डे रहते हुए किया । फिर उन्होंने 1985 में अपना अख़बार शुरू किया द आफ़्टरनून डिस्पैच एंड कूरियर (The afternoon Despatch and Courier)। इस अख़बार में बिजीबी का स्तम्भ 'राउंड एंड अबाउट' (Round and about) अखबारी के आख़िरी पन्ने पर बाएँ कोने पर छपता था। बिजीबी के लेखन की लोकप्रियता ही थी कि पाठक अख़बार पीछे से पढ़ना शुरू करते थे। इसी तरह की बात लोग शरद जोशी जी के स्तम्भ प्रतिदिन के बारे में भी कहते हैं कि उनका लिखा पढ़ने के लिए लोग अख़बार पीछे से पढ़ना शुरू करते थे।
शरद जोशी जी के 'प्रतिदिन' को पसंद करने वाले पाठकों को बिजीबी को भी पढ़ना चाहिए।
आलोक पुराणिक से पहली बातचीत ,जिसमें उन्होंने बिजीबी का ज़िक्र किया था, 2006 में हुई थी, लगभग अठारह साल पहले। कई बार उस बातचीत और बाद की बातचीतों को भी देखा था जिसमें भी बिजीबी का ज़िक्र था। लेकिन उनके बारे में जानने की ज़हमत नहीं उठाई। इस बार पुराने इंटरव्यू देखे तो उत्सुकता हुई कि पता करें कि ये बिजीबी कौन हैं जिनके लेखन से आलोक पुराणिक जी प्रभावित हैं।
नेट पर खोज की तो पता लगा कि बिजी बी तो बीहड़ लेखक रहे। उनके लेखन के मुरीद बड़े बड़े लोग रहे हैं ख़ुशवंत सिंह, शोभा डे, मारियो पूजो और तमाम पाठक भी। बिजी बी नियमित लिखते थे। चार सौ-पाँच सौ शब्दों के लेख। 35 साल तक नियमित लिखना अपने में सिद्ध लेखक का काम है। उनका लेखकीय नाम बिजीबी का मतलब (कोई ऐसा व्यक्ति जो बहुत सक्रिय या मेहनती हो ) भी उनके काम के अनुरूप था। उनके लेखन सहज आम इंसान को समझ में आने वाली भाषा में है।मज़े-मज़े में बड़ी बात कह जाने का हुनर।
अटल बिहारी बाजपेयी जी प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने मज़े लेते हुए लिखा, " बाजपेयी जी का परिवार न होने के कारण सबसे बड़ा लफड़ा यह है कि लोग अपना काम किसके ज़रिए करवाएँ।" राजनीति में किसी का पक्षधर न होते हुए, बिना कटु हुए, सबसे मज़े लेते हुए लिखना बिजीबी के लेखन की ख़ासियत है।
काफ़ी देर बिजीबी के बारे में जानकारी लेने के बाद उनका कुछ लेख भी पढ़े। देखा तो उनकी किताबें भी आनलाइन दिखीं। उनके परिचय और लेखन से प्रभाव कुछ ऐसा कि जितनी किताबें दिखीं सब ख़रीद लीं। कुल जमा सात किताबें। सब किताबें क़रीब एक हज़ार की पढ़ी। चार-चार सौ पेज की किताबें डेढ़ सौ रुपए की। सुंदर छपाई। बढ़िया काग़ज़।
किताबें ख़रीदने का अपना यही अन्दाज़ है। किसी किताब या लेख़क के बारे में अच्छा सुनते हैं तो फ़ौरन किताब ख़रीदने का मन करता है कि किताब ख़रीद ली जाए। तमाम किताबें ऐसी हैं जो ख़रीद लीं। आने पर उलट-पलट के थोड़ी बहुत पढ़ के रख ली हैं। कुछ पढ़ भी लीं। जो नहीं भी पढ़ीं उनके बारे में लगता है कभी पढ़ेंगे। कभी भी यह अफ़सोस नहीं होता कि ये किताब बेकार ख़रीदी। किताबें समृद्धि और सुकून का एहसास दिलाती हैं।
बहरहाल बात हो रही थी बिजी बी की। बिजीबी के लोकप्रिय और नियमित लेखन को समय पर करने के हिमायती थे। बिजीबी का ज़िक्र करते हुए प्रख्यात लेखिका शोभा ड़े ने लिखा है ,"and the one thing he had taught me was to keep my nose down and get on with it. A job has to be done. And please ...no fuss. Keep it zippy.Keep is simple. And make that fast. Deadlines were deadlines." (और एक चीज़ जो उन्होंने मुझे सिखाई वह यह थी कि अपनी नाक नीची रखनी है और आगे बढ़ना है । काम तो करना ही है और कृपया...कोई झंझट नहीं। इसे ज़िप्पी (जीवंत) रखें। आसान रखें। और इसे जल्दी करो। समय पर काम करना ही है।)
बिजीबी को भारत का आर्ट बुचवाल्ड (Art Buchwald) बताया गया। बिजीबी आर्ट बुचवाल्ड के प्रशंसक थे। आलोक पुराणिक बेहराम कॉन्ट्रैक्टर के प्रशंसक हैं। अपन आलोक पुराणिक को पसंद करते हैं। पसंदगी की चेन चल रही है।
आलोक पुराणिक जी ने बेहराम कॉन्ट्रैक्टर से लेखन में क्या सीखा यह वे बताएँगे लेकिन काम को समय पर करने का सलीका और बिना किसी लफड़े में पड़े लिखने के गुर जरुर सीखे। यही वजह रही क़ि वे वर्षों तक अख़बारों में नियमित लिख सके। आलोक पुराणिक कहीं भी, किसी भी जगह बैठकर समय पर लेखन पूरा करके अख़बारों, पत्रिकाओं को दे देते हैं।
बेहराम कॉन्ट्रैक्टर के बारे में फ़िलहाल इतना ही। बाक़ी फिर उनको और पढ़ने के बाद।

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गुजारे के लिए जेल




आज अख़बार में एक खबर पढ़ी। खबर का शीर्षक है-"जापान में अकेलापन दूर करने जेल जा रहे बुजुर्ग।" खबर के अनुसार जापान के टोक्यो शहर में मौजूद जेलों में इन दिनों बुजुर्ग अपराधियों की तादाद बढ़ती जा रही है। अपनी ग़रीबी और अकेलापन दूर करने के लिए छोटे अपराध में जेल जाना पसंद कर रहे हैं।

सभ्य समाज में जेल जाना बेइज़्ज़ती मानी जाती है। लेकिन जब खाने-पीने के लाले के साथ अकेलापन भी जुड़ जाए और इंसान बुजुर्ग भी हो जाए तो जीवन जीने के लिए जेलयात्रा भी एक उपाय है। जापान में जेल में बुजुर्गों को नियमित भोजन, मुफ़्त स्वास्थ्य सेवा और लोगों का साथ मिलता है। इसीलिए बुजुर्ग छोटे-मोटे अपराध करके जेल जा रहे हैं।
खबर सुनकर ओ हेनरी की एक कहानी याद आ गयी, "द कॉप एंड द एंथम।" इसका नायक एक गरीब बालक है सोपी। ग़रीबी के कारण उसके खाने-पीने के लाले पड़े रहते हैं। सोपी गुज़ारे के लिए जेल जाने की कोशिश में कई अपराध करता है, लेकिन वह गिरफ़्तार होने में विफल रहता है। फिर, जब वह अपना जीवन बदलने का फ़ैसला करता है और वास्तव में कुछ नहीं करता है, तो उसे एक अधिकारी द्वारा पकड़ा जाता है, उस पर आरोप लगाया जाता है, और उसे तीन महीने की जेल की सज़ा सुनाई जाती है।
अपने देश में भी विकट ग़रीबी है। लोगों को जीवन यापन के लिए पाँच किलो अनाज दिया जा रहा है। चुनाव के अलावा सरकार इस योजना को शायद इसलिए भी ख़त्म करने में हिचकती है कि कहीं इसके ख़त्म होते ही अपराध करके जेल जाने की कोशिश न करने लगें। लोग जेल जाने के लिए बवाल काटने लगें।जो जननेता जितने अधिक लोगों के जेल जाने का इंतज़ाम कर देगा वो उतना बड़ा लीडर कहलायेगा। जेल जाते लोग नारे लगा सकते हैं , वो है तो मुमकिन है। लेकिन अगर कभी ऐसा होगा तो जेल व्यवस्था चरमरा जाएगी।इसलिए यही मनाते है कि यह बवाल जापान तक ही सीमित रहे।

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