प्रयागराज के महाकुंभ में कल भगदड़ में हुए हादसे में कुछ लोग 'शांत' हो गए। दुर्घटना में मारे गए लोगों के प्रति विनम्र श्रद्धांजलि ।
सुबह टीवी मीडिया हल्ला मचाते हुए बता रहा था, प्रधानमंत्री जी और मुख्यमंत्री जी तीन बार बात कर चुके हैं। बाद में माननीय मुख्यमंत्रीजी ने चार बार बात होने की जानकारी दी। पता नहीं मीडिया को पता नहीं रहा होगा या छिपा गया होगा लेकिन चार में से एक बातचीत कम बताई मीडिया ने। मतलब 25% का अंतर।
संतजनों ने अपने 'अमृत स्नान' स्थगित कर दिए। संतजनों और महमहिमों ने ,जहां हैं वहीं स्नान करने का अनुरोध किया। पता नहीं संतजन अपने स्नान ‘जहाँ वे हैं वहीं करते हैं’ या संगम पहुँचकर। वैसे भी सब श्रद्धालु बराबर होते हैं लेकिन कुछ ज़्यादा बराबर होते हैं।
दोपहर बाद अखाड़ों के 'अमृत स्नान' हुए। हेलीकाप्टर से पुष्प वर्षा भी हुई। कुछ पंखुडियाँ उन जगहों पर भी गिरी होंगी जहाँ भगदड़ में लोग मारे गए थे। जिनके परिजन मारे गए उनको यह भव्यता देखकर कैसा लगा होगा, समझना कठिन नहीं है।
दोपहर तक मारे गए लोगों की संख्या की जानकारी नहीं आयी। सोशल मीडिया पर बयान वायरल हुआ,' करोड़ों की संख्या के स्नान करने वाले श्रद्धालुओं की गिनती कर लेने वाले कुछ मृतकों की गिनती नहीं कर पा रहे हैं।'
शाम तक शायद मृतकों की संख्या के बारे में जानकारी होने पर मुख्यमंत्री जी भावुक हुए। सुबह प्रधानमंत्री जी से बातचीत में व्यस्त होने के चलने दुखी नहीं हो पाए तो शाम को हुए। भावुक क्या लगभग रो ही दिए। प्रदेश प्रधान होने के चलते दुःख तो होता ही है।
आंसुओं का प्रबंधन भी आगे बढ़ने के लिए ज़रूरी होता है।
सोशल मीडिया पर दुर्घटना पर कुछ लोगों सरकार को कोसना शुरू किया। समर्थक लोगों ने इस घटना पर ‘विघ्नसंतोषियों’ की भर्त्सना करते हुए इसे उनकी साजिश करार करते हुए इस घटना पर सरकार और व्यवस्था की आलोचना करने वालों की जमकर लानत-मलानत की। एक वरिष्ठ पत्रकार जी ने इस घटना पर सरकार को इस्तीफ़ा देने की सलाह देते हुए सरकार विरोधियों की जमकर आलोचना की। एक दूसरे वरिष्ठ पत्रकार जी ने एक बचकानी पोस्ट लिखी फिर विरोध होने पर यह कहते हुए हटा ली कि यह हमारे ड्राइवर ने बदमाशी की थी। बाद में यह भी लिखा,' हम तो ऐसे ही मज़े ले रहे थे।'
कुछ लोगों ने आज़म ख़ान के मेला प्रबंधन की तारीफ़ करते हुए उसको आज से बेहतर बताया। कभी उत्तर प्रदेश के ताकतवर मंत्री रहे आजम ख़ान जी आज जेल में हैं। राजनीति कब कहाँ करवट ले कहना मुश्किल होता है।
चतुर्वेदी जी ने लिखा है -सिनेमा हॉल में भगदड़ में अगर "Allu Arjun" को जेल हो सकती है, तो कुंभ भगदड़ में मौत के जिम्मेदार लोगों को जेल क्यों नही?
दैनिक भास्कर के हवाले से उन्होंने लिखा -महाकुंभ में मौतों के जिम्मेदार 5 अफसर:एक ने पुल बंद किए, एक ने भीड़ बढ़ने दी, एक बोला- उठो, भगदड़ मचने वाली है।
भास्कर की इस खबर पर अफसरों के खिलाफ कार्यवाही होगी या भास्कर पर कहना मुश्किल है।
मेले में सुबह स्नान का आह्वान करते हुए कमिश्नर का वीडियो वायरल है। कमिश्नर साहब स्व. वंशीधर शुक्ल जी की कविता 'उठ जाग मुसाफिर भोर भई' के अंश 'जो जागत है सो पावत है, जो सोवत है सो खोवत है' सुनाते हुए लोगों से स्नान के लिए चलने का आह्वान कर रहे हैं।
सरकार ने मेले में हुई भगदड़ की जाँच के लिए कमेटी बनाई है। जाँच कमेटी की रिपोर्ट अगले कुम्भ से पहले आ ही जानी चाहिए। क्या पता कमेटी भगदड़ के लिए स्व. वंशीधर शुक्ल जी को भी न दोषी ठहरा दे कि उन्होंने ऐसी उद्भोधनकारी कविता क्यों लिखी जिसको दोहराकर कमिश्नर साहब ने लोगों को स्नान के लिए प्रेरित किया।
आज के हिंदुस्तान अख़बार में खबरों के क्रम इस प्रकार हैं :
-हादसे नहीं टूटा हौसला।
-महाकुम्भ के दूसरे शाही स्नान में साढ़े सात करोड़ श्रद्धालुओं ने लगाई डुबकी।
-अमृत स्नान से ठीक पहले हुई भगदड़ में 30 श्रद्धालुओं की मौत, 60 घायल।
-संगम पर सबके संयम से भीषण संकट टला।
-हादसे की जाँच को तीन सदस्यीय आयोग।
-मृतक आश्रितों को 25-25 लाख मुआवज़ा।
हादसे से नहीं टूटा हौसला बाक़ी खबरों के मुक़ाबले 4-5 गुना ज़्यादा बड़े फाँट में है। उसके ऊपर स्नान के लिए जाते संतजनों के फ़ोटो हैं जिसमें वे तलवार, त्रिशूल और डमरू लिए उल्लसित मुद्रा में हैं। यह फ़ोटो पहले का होगा या उनको कल भगदड़ में मारे जाने वाले लोगों के बारे में जानकारी नहीं होगी या फिर उनको इस बात कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि कुछ लोग मारे गए। एक संवेदनशील समाज के लिए तीनों ही स्थितियाँ चिंतनीय और शर्मनाक हैं।
बहुत पहले एक इंटरव्यू में गुजरात दंगे के बारे में एक सवाल के जबाब में तत्कालीन मुख्यमंत्री जी ने जो कहा था उसका मतलब था- 'मेरी असफलता रही कि मैं मीडिया को मैनेज नहीं कर पाया।'
कल हुई अफ़सोसनाक मौतों पर मीडिया और अख़बार की रिपोर्टिंग से पता चलता है कि सरकारों ने मीडिया मैनेजमेंट अच्छे से सीख लिया या कहें मीडिया ने अच्छे से सीख लिए है कि उसको कैसे मैनेज होना है।
महाकुंभ का आयोजन अपने आप में एक अनूठा आयोजन है। श्रद्धा न हो तब भी इतने भव्य आयोजन का गवाह होना अपने में विरल अनुभव है। जो लोग भी गए होंगे उनसे इसके बारे में पता चलता है।
महाकुंभ अभी 26 फ़रवरी तक चलना है। सब कुछ निर्विघ्न सम्पन्न हो इसके लिए सबसे ज़रूरी है कि कोई वी.आई.पी. दर्शन फ़ौरन बंद किए जाएँ। महाकुंभ श्रद्धालुओं के लिए रहे वी.आई.पी. के लिए नहीं। चाहे तो वी.आई.पी. 26 के बाद पूरे प्रोटोकाल से स्नान करें। पुण्य लूटें। जीवन सबसे अमूल्य है इसकी हर क़ीमत पर, हर स्तर पर रक्षा होनी चाहिए।
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